गोरख पांडेय के भोजपुरी गीत

 

क्रांतिकारी रचनाकार - गोरख पांडे  


जन्म - सन्‌ 1945

पुण्यतिथि - 29 जनवरी 1989


भोजपुरी काव्य संग्रह 'भोजपुरी के नौ गीत' (1978)  

'जागते रहो सोने वालो' (1983)

गद्य-पद्य संकलन 'स्वर्ग से विदाई' (1989) 

'लोहा गरम हो गया है' (1990)

शोध पुस्तक 'धर्म की मार्क्सवादी धारणा' (2003)

'समय का पहिया' (2005) 


गोरख पांडेय के भोजपुरी गीत


नेह की पाती 


तू हव श्रम के सुरुजुवा, हम किरिनिया तोहार

तोहरा से भगली बन्हनवा के रतिया,

हमरा से हरियर भइली धरतिया

तू हव जग के परनवा हो, हम संसरिया तोहार


तोहरा से डगरेला जिनगी के पहिया

हमरा से बन बन उपजेले रहिया

रचना के हव तू बसूलवा हो, हम रुखनिया तोहार


हमरा के छोडि के ना जइह बिदेसवा

जइह त भुलिह न भेजल सनेसवा

तू हव नेहिया के पतिया हो, हम अछरिया तोहार


तोहरे हंथौडवा से कांपे पुंजीखोरवा

हमरे हंसुअवा से हिली भुँईचोरवा

तू हव जुझे के पूकारवा हो, हम तुरहिया तोहार


चाहे जहाँ रहिह जो न माथवा झुकइब

हमरा के हरदम संगे संगे पइब

तू हव मुकुति के धारवा, हो हम लहरिया तोहार।



जागरण


बीतऽता अन्हरिया के जमनवा हो संघतिया

सबके जगा दs

गंउवा जगा द आ सहरवा जगा दs

छतिया में भरल अंगरवा जगा दs

जइसे जरे पाप के खनवा हो संघतिया

सबके जगा दs


तनवा जगा द आपन मनवा जगा दs

अपने जंगरवा के धनवा जगा दs

ठग देखि माँगे जगरनवा हो संघतिया

सबके जगा दs


नेहिया के बन्हल परनवा जगा दs

अँसुआ में डूबल सपनवा जगा दs

मुकुती के मिल बा बयनवा हो संघतिया

सबके जगा दs


हथवा जगा द हथियरवा जगा दs

करम जगा द आ बिचरवा जगा दs

रोसनी से रचऽ नया जहनवा हो संघतिया

सबके जगा दs


बीतऽता अन्हरिया के जमनवा हो संघतिया

सबके जगा दs



बारहमासा


मेघ ओनवे असाढ कजरार सजना

हर-बैल ले के चलल जवार सजना

धान रोपे गइली धनिया तोहार सजना

लेकिन घर में अकाल के पसार सजना

सावन खेत-खेत कजरी-मल्हार सजना

हम एक जुनि कइलीं अहार सजना

भादो मास में उपास के अधार सजना

रोवे मड़ई गरीबी के निहार सजना

नियराइल गंवे गंवे जब कुआर सजना

फसल काटे गइनी दुखवा बिसार सजना

अपने घरे आइल बोझा दुइ चार सजना

चढल कातिक जोते बोवै के सुतार सजना

मास अगहन आसा पर तुसार सजना

तन लुगरी भइल तार-तार सजना

पूस-माघ में उपास के अधार सजना

चुभे हा‌ड निरमोहिया बयार सजना

फागुन-चइत काटे दांवे के लहार सजना

पेट कटलो प करजा सवार सजना

धरती तबे बइसाख के मझार सजना

एक ठो रोटी दिन-दिन भर कुदार सजना

रंग देहि के भइल जरि छार सजना

फिर से जेठ में उपासे के अधार सजना

अस जिनगी जिअल धिरकार सजना।



मेहनत के बारहमासा


चले मेहनत से सबके अहार सजनी

बिना रोटी के न झनके सितार सजनी

हमरी मेहनत से रेल अउरी तार सजनी

हमरी मेहनत से प्यार आ विचार सजनी


दुख रोवले से मिली नाही पार सजनी

कोडि खनि धरती दिहली संवार सजनी


ओपर कब्जा कईले ठग बटमार सजनी

उनके जूता सी के भईली हम चमार सजनी


उनके डोली ढोके हो गईली कहार सजनी

तेल पेरली उनके चमकल कपार सजनी


हम मइल भइलीं तेली कलवार सजनी

गाडी गढली, गढली खुरपा कुदार सजनी


हम कहल गइली बढई लोहार सजनी

जाति पांति के उठवले दीवार सजनी


बाटि दिहले किसान परिवार सजनी

हम खटि खटि हो गईली गंवार सजनी


ऊ आराम कइले भइले हुसियार सजनी

भागि धरम करम अवतार सजनी


एहि खून चुसवन के हथियार सजनी

उलटा चले नाहीं देब संसार सजनी


सगरी जिनगी पर बाटे हक हमार सजनी।



जमीन


केकरे नांवे जमीन पटवारी

केकरे नांवे जमीन?

कागज कइसन कलमिया कइसन

कइसन घोडा लगमिया कइसन

कोरट कचहरी मे केकर सवारी

कइसन नियाव के जीन?


केकर करनी आ केकर भरनी

केकर नाव केकर बैतरनी

केकरे जांगरि से माटी फुलाईलि

के खाये चाउर महीन?


जाडा, गरमी, बरखा ना जनली

गोँहू ओसवली त भूसा बनली

कांहे बरध सब खेतवा चरले

हम भइली कउडी के तीन?


नालिश कइली दरोगा आइल

बाबू के बंगला मुरगा कटाइल

मडई फुंकि तमाशा देखले

चमकवले संगीन।


जेकरे धुरिया मे जिनगी सिराइल

ओकर नउँवा कंहवा बिलाइल

जे दहरती से दुरे रहेला

कइसे करेला अधीन!


खून पसीना नगरिया लूटल

लखि-लखि धीरज के बन्हवा टूटल

अब हम किसान-मजूरा मिलि के

हक लेइब चोरन से छीन।



नेहिया


कइसे चलेलेँ सुरुज चनरमा ....

कइसे चलेलेँ सुरुज चनरमा

धरतिया हे पिया केकर बनावल?

सुरुज चनरमा चले अपनी गतिया

धरतिया हे धनि गति के बनावल

माटी मे बोके आपन परानवाँ

फसलिया हे पिया केकर उगावल?


माटी मे बोके आपन परानवाँ

फसलिया हे धनि हमरे उगावल।

रचना के हथवा बिचरवा के रंगवा

सुरतिया हे पिया केकर जगावल?


रचना के हथवा बिचरवा के रंगवा

सुरतिया हे धनि हमरे जगावल।

मनवा के बगिया अजदिया के फुलवा

इ नेहिया हे पिया केकर लगावल


मनवा के बगिया अजदिया के फुलवा

इ नेहिया हे धनि तोहरे लगावल।



समाजवाद


समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई

अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...

नोटवा से आई, बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...

गाँधी से आई, आँधी से आई

टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...

काँगरेस से आई, जनता से आई

झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...

डालर से आई, रूबल से आई

देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...

वादा से आई, लबादा से आई

जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...

लाठी से आई, गोली से आई

लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...

महंगी ले आई, ग़रीबी ले आई

केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...

छोटका का छोटहन, बड़का का बड़हन

बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...

परसों ले आई, बरसों ले आई

हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...

धीरे-धीरे आई, चुपे-चुपे आई

अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई



सपना


सूतल रहलीं सपन एक देखलीं

सपन मनभावन हो सखिया,

फूटलि किरनिया पुरुब असमनवा

उजर घर आँगन हो सखिया,

अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा

त खेत भइलें आपन हो सखिया,

गोसयाँ के लठिया मुरइआ अस तूरलीं

भगवलीं महाजन हो सखिया,

केहू नाहीं ऊँचा नीच केहू के न भय

नाहीं केहू बा भयावन हो सखिय,

मेहनति माटी चारों ओर चमकवली

ढहल इनरासन हो सखिया,

बैरी पैसवा के रजवा मेटवलीं

मिलल मोर साजन हो सखिया।


गुहार


सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूं लड़े बदे भइया।


कब तक सुतब, मूंदि के नयनवा

कब तक ढोवब सुख के सपनवा

फूटलि ललकि किरनिया, चल तूहूं लड़े बदे भइया

सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूं लड़े बदे भइया।


तोहरे पसीनवा से अन धन सोनवा

तोहरा के चूसि-चूसि बढ़े उनके तोनवा

तोह के बा मुट्ठी भर मकइया, चल तूहूं लड़े बदे भइया

सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूं लड़े बदे भइया।


तोहरे लरिकवन से फउजि बनावे

उनके बनूकि देके तोरे पर चलावें

जेल के बतावे कचहरिया, चल तूहूं लड़े बदे भइया

सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूं लड़े बदे भइया।


तोहरी अंगुरिया पर दुनिया टिकलि बा

बखरा में तोहरे नरके परल बा

उठ, भहरावे के ई दुनिया, चल तूहूं लड़े बदे भइया

सुरु बा किसान के लड़इया, चल तूहूं लड़े बदे भइया।


जनमलि तोहरे खून से फउजिया

खेत करखनवा के ललकी फउजिया

तोहके बोलावे दिन रतिया, चल तूहूं लड़े बदे भइया

सुरु या किसान के लड़इया, चल तूहूं लड़े बदे भइया।



‘वोट’ 


‘पहिले-पहिल जब वोट माँगे अइले

तोहके खेतवा दिअइबो

ओमे फसली उगइबो 

बजड़ा के रोटिया देई-देई नुनवा

सोचलीं कि अब त बदली कनुनवा 

अब जमीनदरवा के पनही न सहबो,

अब ना अकारथ बहे पाई खूनवा 


दुसरे चुनउवा में जब उपरैलें त बोले लगले ना

तोहके कुँइयाँ खोनइबो

सब पियसिया मेटैबो

ईहवा से उड़ी-उड़ी ऊँहा जब गैलें

सोंचलीं इहवा के बतिया भुलैले

हमनी के धीरे से जो मनवा परैलीं

जोर से कनुनिया-कनुनिया चिलैंले 


तीसरे चुनउवा में चेहरा देखवलें त बोले लगले ना

तोहके महल उठैबो

ओमे बिजुरी लगैबों

चमकल बिजुरी त गोसैयाँ दुअरिया

हमरी झोपड़िया मे घहरे अन्हरिया

सोचलीं कि अब तक जेके चुनलीं

हमके बनावे सब काठ के पुतरिया 


अबकी टपकिहें त कहबों कि देख तूँ बहुत कइल ना

तोहके अब ना थकइबो

अपने हथवा उठइबो

हथवा में हमरे फसलिया भरल बा

हथवा में हमरे लहरिया भरलि बा

एही हथवा से रूस औरी चीन देश में

लूट के किलन पर बिजुरिया गिरल बा 

जब हम इहुँवो के किलवा ढहैबो त एही हाथें ना

तोहके मटिया मिलैबो

ललका झंडा फहरैबो

त एही हाथें ना

पहिले-पहिल जब वोट माँगे अइले ....’



‘माया महाठगिनी हम जानी

(विद्रोही संत कवि से क्षमा-याचना सहित)


‘सुनो भाई साधो!

माया महाठगिनि हम जानी,

पुलिस फौज के बल पर राजे बोले मधुरी बानी

यह कठपुतली कौन नचावे पंडित भेद न पावें

सात समंदर पार बसें पिय डोर महीन घुमावें

रूबल के संग रास रचावे डालर हाथ बिकानी

जन-मन को बाँधे भरमावे जीवन मरन बनावे

अजगर को रस अमृत चखावे जंगल राज चलावे

बंधन करे करम के जग को अकरम मुक्त करानी

बिड़ला घर शुभ लाभ बने मँहगू घर खून-पसीना

कहत कबीर सुनो भाई साधो जब मानुष ने चीन्हा

लिया लुआठा हाथ भगी तब कंचनभृग की रानी’




साभार : आखर 

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