श्वेता मिश्रा की कविताएँ
श्वेता मिश्रा हर नया कवि अपने आसपास की घटनाओं, विडंबनाओं और अनुभूतियों को अपने कविता का विषय बनाता है। कवि के आसपास कुछ ऐसा घटित हो रहा होता है जो उसे लिखने के लिए प्रेरित करता है। कवि लिख कर मुक्त होने की कोशिश करता है लेकिन यह मुक्ति हर बार छलावा साबित होती है और वह फिर किसी वाकयात को शब्द दृश्य में ढालने की कोशिश करने में जुट जाता है। यह प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। श्रीकान्त वर्मा की पंक्ति उधार लेकर कहूँ तो 'जो सोचेगा, वह सिहरेगा'। यह सोचना किसी भी रचनाकार के लिए यातना से कम नहीं होता। श्वेता ने कविता की दुनिया में अपने प्रारम्भिक कदम रख दिए हैं। किसी भी बच्चे का पहला कदम बड़ा रोचक होता है। इस कदम का परिजन उत्सुकता से इंतज़ार करते हैं। इस कदम में भावी जीवन के असंख्य कदमों की आहट छुपी होती है। श्वेता ने कविता को बरतना सीख लिया है। उनकी कविता 'चौके पर चाँद' इस बात की तस्दीक करती है। लेकिन आगे की उबड़-खाबड़, कह लें, कठिन राह उन्हें खुद अपने कदमों से ही तय करनी है। हाँ, इतना जरूर कहा जा सकता है कि श्वेता की रचनात्मकता में काफी संभावनाएं हैं। नए कवि के प्रति अपनी शुभकामना...