कमलेश भट्ट कमल का आलेख 'नये मिज़ाज की ग़ज़ल के शायर बशीर बद्र'
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| बशीर बद्र |
बीते 28 मई 2026 को नामचीन शायर बशीर बद्र का निधन हो गया। बशीर बद्र ऐसे शायर थे जिनकी लिखी पंक्तियां लोगों के जुबान पर बस गईं हैं। ऐसा सौभाग्य कम रचनाकारों को प्राप्त हो पाता है कि वे जब अपनी पढ़ाई करने के लिए जाएं तो उनकी रचनाएँ खुद उनकी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल हों। बशीर साहब को यह सम्मान प्राप्त था। उनकी लिखी पंक्तियां 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/ तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में' उस संवेदनशीलता को दर्शाती हैं जो एक आम आदमी से शिद्दत से जुड़ी हुई हैं। बद्र साहब को अपने लेखन पर इस कदर यकीन था कि उस जमाने की मशहूर पत्रिका शबे खून के सम्पादक शम्सुर्रहमान फारूखी ने जब अपनी पत्रिका में उनकी गजलों को प्रकाशित नहीं किया तो बद्र साहब ने किसी से कहा था कि 'क्या समझते हैं उनके रिसाले में नहीं छपेगा तो बशीर बद्र शायर नहीं बन पाएगा?' उनके लेखन के दम खम से आज दुनिया परिचित है। उनके पहले संग्रह पर लिखते हुए कवि रामेश्वर शुक्ल अंचल ने लिखा था- 'डॉ. बशीर बद्र की गजलों का यह संकलन भाषा और भाव दोनों की दृष्टि से पारंपरिक उर्दू-गजल से हट कर है। भाषा में सरलता का प्रवाह है और अनेक पंक्तियां दिल को छू लेती हैं। ...कथा का साफ-सुथरापन है और कहीं-कहीं अनुभूति का पैनापन पाठक को सहज ही आकर्षित करता है। बशीर-बद्र मुशायरों के तरन्नुमी तेवरों के कवि हो कर भी रस और प्रभाव की दृष्टि से साहित्यिक दृष्टि में अपना स्थान बनाते रहे हैं। उर्दू-कविता के नये दौर के श्रेष्ठ कवियों में उनकी गणना की जाती है।' बशीर साहब पर पहली बार के लिए लिखने के क्रम में मैंने चर्चित गजलकार कमलेश भट्ट कमल से सम्पर्क किया। कमलेश जी ने अपना आलेख तत्काल उपलब्ध करा दिया था। आज इस आलेख को हम पहली बार पर प्रकाशित कर रहे हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कमलेश भट्ट कमल का आलेख 'नये मिज़ाज की ग़ज़ल के शायर बशीर बद्र'।
स्मरण
'नये मिज़ाज की ग़ज़ल के शायर बशीर बद्र'
कमलेश भट्ट कमल
बशीर बद्र (15 फरवरी 1935-28 मई 2026) उर्दू शायरी के उस धारा के नायक शायर हैं, जहाँ भाषा बेहद आम फ़हम और सीधे दिल में उतरती हुई मालूम पड़ती है। यह वही उर्दू है, जो हिंदी के इतना करीब है कि यहाँ केवल लिपियों का फर्क रह जाता है। इसके पीछे कहीं न कहीं अवध की मिट्टी का भी प्रभाव है, क्योंकि तब के फैजाबाद जिले की अकबरपुर तहसील और अब के अंबेडकर नगर ज़िले का छोटा-सा गांव बुकिया जो बसखारी बाजार से आठ किलोमीटर की दूरी पर है, उनका पैतृक गांव है। दरअसल सैयद मोहम्मद बशीर नामक जो शख़्स आगे चल कर उर्दू शायरी की दुनिया में डॉ. बशीर बद्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ, उसका जन्म स्थान उसके जीते जी ही क्यों विवादित हो गया, यह आश्चर्य की बात है। रेख़्ता पोर्टल एक साथ अयोध्या और कानपुर दो जगहों की बात करता है। लेकिन इतना तो तय है कि उनका पैतृक स्थान मौजूदा अंबेडकर नगर का बुकिया गांव ही है, जैसा कि अयोध्या के पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह 'दि वायर' पर अपने आलेख 29/5/2026 में उल्लेख करते हैं। लेकिन उनके जन्म स्थान के विवाद के बीच अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने भी अपनी श्रद्धांजलि में उनके जन्म स्थान को अयोध्या ही बताया है। अयोध्या यानी पुराना फैजाबाद। लेकिन फैजाबाद में बशीर बद्र के पिता कभी रहे, इसका ज़िक्र नहीं मिलता है। ऐसे में यह लगभग तय है कि उनका जन्म बुकिया गांव में ही हुआ। धीरे-धीरे लोग जन्मस्थान के नाम पर गांव का नाम छोड़ देते हैं और सिर्फ जिले का नाम जुड़ा रह जाता है। प्रसिद्ध पत्रकार मधुकर उपाध्याय इसमें एक बात और जोड़ते हैं। वे कहते हैं एक बार बशीर बद्र के एक रिश्तेदार से उनकी भेंट हुई, जो खुद भी एक शायर थे और टांडा में रहते थे। उन्होंने मधुकर जी से बहुत शिकायती लहजे में कहा था कि बशीर बद्र अपना नाम अगर 'बशीर बुकियावी' लिखते तो क्या बिगड़ जाता? यह बात स्पष्ट करती है कि, हो न हो, उनका जन्म स्थान बुकिया ही हो, जो पुराने फैजाबाद जिले का एक गांव था।
यह यूँ ही नहीं है कि मौजूदा दौर के जिन दो बड़े रचनाकारों की वजह से भोपाल को जाना जाता है उनमें बशीर बद्र और दुष्यंत कुमार (1933-1975) सबसे महत्वपूर्ण हैं और समकालीन भी। ग़ज़लों ने दुष्यंत कुमार को आसमान जैसी ऊँचाई दी और बशीर बद्र को भी। दोनों की ग़ज़ल की भाषा और उसके लहजे को ले कर एक ही राय थी। लेकिन दोनों के साथ एक विडंबना यह रही कि दुष्यंत कुमार जहां केवल 42 साल की उम्र पा सके, बशीर बद्र 91 साल की भरपूर उम्र पाने के बावजूद भी पिछले 14-15 सालों से डिमेंशिया के शिकार रहे।
पिछली 23 मई 2026 को हिंदी ग़ज़ल के एक कार्यक्रम में भोपाल जाने पर मैंने भोपाल के अपने कुछ मित्रों से बशीर साहब का नाम लिया, तो सब ने एक ही बात बताई कि उनकी हालत अच्छी नहीं है। वे अब न किसी को पहचानते हैं, न किसी से बात कर सकते हैं। ऐसे में आलोक त्यागी के घर आदित्य नगर की ओर जाते हुए बड़ा ताल के किनारे 'कोहे फिज़ा' का बोर्ड देख कर भी मन में उठने वाली हलचल के बावजूद उनसे मिलने का संयोग नहीं बन पाया और अब तो यह कभी मिलना ही नहीं है। लेकिन मुझे याद आता है कि शायद वर्ष 2000 ई. के आस पास कभी जब मैं पहली भोपाल यात्रा पर गया था, तब 'कोहे फिज़ा' भी गया था। कोहे फिज़ा यानी भोपाल का वह खूबसूरत इलाका, जहां बशीर साहब 1987 के मेरठ दंगों में अपनी घर-गृहस्थी गंवाने के बाद ईदगाह हिल्स के 11, रेहाना कालोनी में स्थाई रूप से आ कर बस गए थे। तब तक भोपाल निवासी डॉ. राहत बद्र के साथ शादी को कोई 14 वर्ष गुज़र चुके थे और देवनागरी लिपि में उनका ग़ज़ल संग्रह 'उजाले अपनी यादों के' प्रकाश में आ कर हिंदी प्रेमियों के कंठ का हार बन चुका था। शिवोमा प्रकाशन, जबलपुर द्वारा 15 फरवरी 1990 को बहुत खूबसूरत और कलात्मक अंदाज़ में प्रकाशित तथा जबलपुर के ही विनीत पाठक द्वारा संपादित, 78 ग़ज़लों और 5 शेरों का 100 पृष्ठों वाला यह संग्रह डॉ. राहत बद्र को ही समर्पित था। यह संग्रह मेरे पास अभी तक मौजूद है। संग्रह के समर्पण में डॉ. बशीर बद्र ने लिखा था-
'तमाम उम्र के हासिल
डॉ. राहत बद्र
के नाम'
और समर्पण पृष्ठ पर राहत बद्र के स्केच के नीचे एक शेर लिखा था-
चाँद चेहरा, ज़ुल्फ़ दरिया, बात ख़ुशबू ,दिल चमन,
इक तुझे दे कर ख़ुदा ने दे दिया, क्या-क्या मुझे।
पहली पत्नी के निधन के बाद राहत बद्र के साथ डॉ. बशीर बद्र ने 1986 में दूसरी शादी की थी और यह राहत बद्र ही थीं, जिन्होंने 1987 के दंगों में लगभग सभी कुछ गंवा देने के बाद डिप्रेशन की कगार पर पहुंच चुके बशीर बद्र को संभाला और एक शायर के रूप में फिर से खड़ा किया। डॉ. राहत बद्र स्वयं भी उर्दू शायरा और लेखिका हैं।
दरअसल डॉ. बशीर बद्र की रूमानियत और उनका प्रेम एकनिष्ठ प्रेम था, उर्दू की औसत शायरी वाला सतही प्रेम नहीं था। उनका प्रेम दिल से किया गया प्रेम था, उनका समर्पण आत्मा की गहराइयों से किया समर्पण था। 'उजाले अपनी यादों' के ब्लर्ब पर जबलपुर निवासी प्रसिद्ध कवि रामेश्वर शुक्ल अंचल ने लिखा था-
'डॉ. बशीर बद्र की गजलों का यह संकलन भाषा और भाव दोनों की दृष्टि से पारंपरिक उर्दू-गजल से हट कर है। भाषा में सरलता का प्रवाह है और अनेक पंक्तियां दिल को छू लेती हैं। ...कथा का साफ-सुथरापन है और कहीं-कहीं अनुभूति का पैनापन पाठक को सहज ही आकर्षित करता है। बशीर-बद्र मुशायरों के तरन्नुमी तेवरों के कवि हो कर भी रस और प्रभाव की दृष्टि से साहित्यिक दृष्टि में अपना स्थान बनाते रहे हैं। उर्दू-कविता के नये दौर के श्रेष्ठ कवियों में उनकी गणना की जाती है।'
इस संदर्भ में ही पुस्तक के दूसरे ब्लर्ब लेखक जबलपुर के फीरोज़ कमाल की ये पंक्तियां भी गौर किए जाने योग्य हैं। फीरोज़ कमाल लिखते हैं-
'यूँ तो बशीर बद्र नई-दिशा के मुनफ़रिद शायर हैं, जिन्हें उर्दू दुनिया में जदीद-शायरी का इमाम कहा जाता है, उनकी शायरी की ख़ूबियां मोहताजे-तआरुफ नहीं लेकिन जिस नए अंदाज में हमारे शहर से 'उजाले अपनी यादों के' प्रकाशित हो रही है, मेरी राय है कि इसे अहले-अदब में न सिर्फ मील का पत्थर बल्कि एक मंजिल की संज्ञा दी जावेगी।'
उस दिन कोई आधे घंटे मैं डॉ. बशीर बद्र के साथ रहा था। यह वही दौर था, जब 1999 में उन्हें करीब-करीब भाजपाई बता कर उनका तिरस्कार किया जा रहा था। हुआ यह था कि डॉ. बशीर बद्र के लिए बहुत ख़ास रहे वर्ष 1999 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार के साथ ही उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया गया था। पद्मश्री सम्मान उन्हें 23 मार्च 1999 को तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन के हाथों मिला था। चूंकि पुरस्कार के निर्णय के समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी, इसलिए बुद्धिजीवियों में इस पुरस्कार पर विवाद और सवाल खड़े किए गए और डॉ. बशीर बद्र को भाजपाई बता कर उनका तिरस्कार-बहिष्कार भी शुरू कर दिया गया। लेकिन डॉ. बशीर बद्र इस स्थिति से विचलित नहीं हुए और उनका साहित्यिक सफर पहले की तरह जारी रहा। तब ग़ज़ल में मेरी कोई खास गति नहीं थी। मैं बस ग़ज़ल की दुनिया में आ ही रहा था, लेकिन उनकी शायरी की तासीर मुझे उनके दरवाजे तक ले गई थी, वही शायरी, मोबाइल और सोशल मीडिया के बगैर पूरी दुनिया जिसकी कायल हो चुकी थी। वही सोशल मीडिया जिसने लगातार दो दिन तक यह भ्रम फैला कर अफसोस और सुर्खियाँ बटोरीं कि बशीर बद्र साहब के जनाजे में केवल 15-20 लोग ही शामिल हो पाए थे! लेकिन उसी सोशल मीडिया ने बहुत जल्दी ही इस झूठ का पर्दाफ़ाश भी कर दिया और तब यह बात निकल कर सामने आई कि पद्मश्री बशीर बद्र के जनाजे में, बकरीद जैसे बड़े त्योहार के बावजूद, सरकारी अमले सहित 200-250 लोगों की मौजूदगी तो थी ही। यूं भी किसी साहित्यकार या कलाकार की शव-यात्रा में शामिल लोगों की संख्या मात्र से उसके क़द पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अन्यथा प्रेमचंद हिंदी के सबसे कमजोर रचनाकार होते। विरोधाभास यह है कि साहित्य की दुनिया प्रेमचंद की ही शव-यात्रा को स्मृति में जीवित रखे हुए है, सैकड़ों-हजारों की भीड़ वाली शव-यात्राएं तो कब की भुलाई जा चुकी हैं।
डॉ. बशीर बद्र की प्रकाशित उर्दू शायरी की पुस्तकों में 'इकाई', 'इमेज', 'आमद', 'आहट', 'आस' और 'कुल्लियाते बशीर बद्र' शामिल हैं। इनमें से 'आस' के लिए उन्हें वर्ष 1999 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। इसी प्रकार वे उर्दू आलोचना में भी सक्रिय थे और इस सिलसिले की उनकी पुस्तकों 'आजादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला' और 'बीसवीं सदी में ग़ज़ल' को उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण माना गया है। अब कदाचित उनके गद्य लेखन पर भी नए सिरे से बातचीत होगी। यदि बशीर बद्र साहब मुशायरों की दुनिया में व्यस्त न होते और पिछले 14-15 साल डिमेंशिया ने जाया न कर दिए होते तो शायद वे और बहुत कुछ महत्वपूर्ण लिख पाते। जैसा कि शीन काफ़ निजा़म लिखते हैं- 'अगर ये मुशायरे में न होते, तो पता नहीं, कितनी ऊंचाई तक ग़ज़ल विधा को ले जाते।'
अलीगढ़ का बशीर बद्र के जीवन में अहम योगदान रहा है। पिता की बीमारी और बाद में उनके देहांत की वजह से शुरुआत में बशीर बद्र की पढ़ाई में कई व्यवधान आए। बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालय में दाखिला ले कर उन्होंने न केवल बी.ए., एम.ए. व पीएच.डी. की डिग्रियां हासिल कीं, बल्कि वहीं उर्दू के अस्थाई प्रवक्ता भी नियुक्त हो गए। बाद के वर्षों में वे मेरठ कॉलेज में उर्दू प्राध्यापक और फिर उसके विभागाध्यक्ष भी रहे। मेरठ कालेज से उनका संबंध 1990 तक बना रहा। सोशल मीडिया की कुछ खबरों पर भरोसा करें तो उनकी पीएच.डी. की डिग्री कोई 48 साल बाद उन्हें उनके भोपाल स्थित घर में सुपुर्द की जा सकी। बशीर बद्र ने 1973 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 'आजादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला' विषयक शोध प्रबंध जमा किया था। इस पर पीएच.डी. की डिग्री तो उन्हें मिल गई थी, लेकिन तरह-तरह के व्यवधानों के चलते वर्ष 2021 में पूरे 48 साल बाद, पीएच.डी. की डिग्री भौतिक रूप से उनके घर भोपाल तब पहुँची, जब वे न तो उसकी लिखावट समझने में समर्थ थे और न ही उसके मायने। परिवार के मुताबिक, डिग्री को सीने से लगाते वक्त वे किसी बच्चे की तरह खुश थे। इस थीसिस में उन्होंने अपने 87 शेर शामिल किए थे। कहा जाता है कि बशीर बद्र ने कोई 18000 शेर लिखे। उर्दू-हिन्दी के साथ ही वे फारसी और अंग्रेजी के भी विद्वान थे। गुजराती, फ्रेंच और अंग्रेजी में भी उनकी किताबों के अनुवाद हुए। वे मध्य प्रदेश उर्दू साहित्य अकादमी के अध्यक्ष रहे। उन्हें चार बार उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी अवार्ड मिला, साथ ही बिहार उर्दू अकादमी द्वारा भी सम्मानित किया गया।
कहा जाता है कि 20 वर्षीय विशाल भारद्वाज, जो आगे चल कर प्रसिद्ध फिल्मकार के रूप में जाने गए, तब सेकेंडियर के छात्र थे और अक्सर बशीर बद्र के पास जा कर उनकी ग़ज़लें सुना करते थे। ये ग़जलें उन्हें याद हो जाती थीं। मेरठ दंगों के बाद उन तीस-चालीस ग़ज़लों को विशाल भारद्वाज ने अपनी याददाश्त के आधार पर लिख कर बशीर बद्र को वापस लौटाया था। यह विशाल भारद्वाज जैसे युवा की जबर्दस्त याददाश्त का करिश्मा तो था ही, लेकिन यह उन ग़ज़लों की ताकत को भी प्रमाणित करता है, जो बहुत जल्दी लोगों के जेहन में उतर जाती थीं।
पुलिसिया पृष्ठभूमि से आने और स्वयं के नौकरी-पेशा जीवन की शुरुआत पुलिस विभाग से करने के बावजूद बशीर बद्र की शायरी, भाषा और लहज़े में एक खास तरह का अनुशासन और नाज़ुक मिज़ाजी दिखाई देती है। यह उन्हें उस प्राध्यापकीय जीवन की वजह से मिली जो उन्होंने पहले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में और बाद में 1974 से मेरठ कालेज में जिया।
देखने की बात यह है कि हर बड़ा शायर अपने कुछ शेरों के माध्यम से ही अवाम के दिल में अपनी जगह बनाता है। डॉ. बशीर बद्र का एक शेर है-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
यह शेर उन्होंने तब कहा था जब 1987 के दंगों में मेरठ का उनका मकान दंगाइयों के गुस्से की भेंट चढ़ कर जल गया था। उस आग में तब उनका घर ही नहीं जला था, बहुत सारा साहित्य भी उसके साथ ही जल कर नष्ट हो गया था। लेकिन इस शेर को बशीर बद्र ने कभी अपने साथ घटी घटना तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि यह हर मजलूम की आह बनता चला गया। दरअसल असली और बड़ी कविता वही है जो अपने समय का अतिक्रमण कर के कालातीत बन जाय। बशीर बद्र के पास इस तरह की शायरी के और भी कई नमूने हैं-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।
•
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।
•
मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।
•
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा।
•
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा।
•
जिंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीन,
पांव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।
इसी तरह के कुछ और लोकप्रिय शेर भी देखे जा सकते हैं-
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़़ेंगे रास्ता हो जाएगा।
•
दोस्ती जमकर करो पर इतनी गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।
•
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।
•
हम दिल्ली भी हो आए हैं लाहौर भी घूमे,
ऐ यार मगर तेरी गली तेरी गली है।
•
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो,
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो।
•
कभी कभी तो छलक पड़ती हैं यूँ ही आँखें,
उदास होने का कोई सबब नहीं होता।
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सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ,
मैं जहाँ भी जाऊँगा उसको पता हो जाएगा।
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शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है।
अब जबकि बशीर बद्र का बहुत सारा कलाम देवनागरी लिपि में भी आ चुका है, उनकी शेरो-शायरी और उनके आलोचकीय मेयार पर कई कोणों से अलग से बात की जा सकती है। मोटे तौर पर डॉ. बशीर बद्र की शायरी तमाम नए-नए रूपकों और नई-नई उपमाओं से भरी पड़ी है। कदाचित इसीलिए उनकी शायरी में एक ऐसी ताज़गी अठखेलियाँ करती दिखाई देती है, जो किसी को भी अपना बना लेने में सक्षम है। लेकिन फिलहाल इस सबके विस्तार में जाने का यह अवसर नहीं है। 'उजाले अपनी यादों के' के अलावा देवनागरी लिपि में उपलब्ध उनकी कुछ पुस्तकें हैं- 'आस' (वाणी प्रकाशन), 'उजालों की परियां' (डायमंड पॉकेट बुक्स), ‘रोशनी के घरों से' (डायमंड पॉकेट बुक्स), 'सात ज़मीनें एक सितारा' (परिचित बुक्स), 'फूलों की छतरियां' (परिचित बुक्स), 'मुहब्बत ख़ुशबू है' (परिचित बुक्स) आदि।
सुप्रसिद्ध गज़ल गायक स्व. जगजीत सिंह के साथ डॉ. बशीर बद्र की जुगलबंदी ने उनकी लोकप्रियता को पूरी दुनिया में और भी विस्तार व व्यापकता दी है। शेरो-शायरी की दुनिया से अपरिचित तमाम लोग उन्हें जगजीत सिंह के गायन की वजह से जानते हैं। कुछ लोग तो जगजीत सिंह द्वारा गाई गई ग़ज़लों को जगजीत सिंह का ही कलाम समझ बैठते हैं।
डॉ. बशीर बद्र के साथ कई सारे किस्से भी जुड़े रहे। बड़े तथा चर्चित लोगों के साथ ऐसे किस्सों का जुड़ा होना कोई अनहोनी बात नहीं है। कहा जाता है कि बद्र साहब 11 साल की उम्र से ही शायरी लिखने लगे थे। एक किस्सा यह भी है कि जब वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एम ए की पढ़ाई कर रहे थे तो उनकी ग़ज़लें एम ए के पाठ्यक्रम में शामिल थीं। कहा जाता है कि एक बार उनके एक प्रोफेसर ने उनके इस शेर का मतलब उनसे ही पूछ लिया-
‘अब मिले हम तो कई लोग बिछड़ जाएंगे
इंतजार और करो अगले जनम तक मेरा।'
बशीर बद्र ने अपनी ओर से इस शेर का अर्थ समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे प्रोफेसर को संतुष्ट नहीं कर सके। इसका ज़िक्र किया ही जा चुका है कि बशीर बद्र ने अपने शोध-प्रबंध में अपने ही 87 शेर उद्धृत कर लिये थे। एक किस्सा यह भी है कि उनका मशहूर शेर 'उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो...' का दूसरा का दूसरा बदायूं के शायर जनाब अर्शी शेखूपुरी साहब के इस शेर से लिया गया है-
'कफ़न दाबे बगल में इसलिए फिरता हूं मैं अर्शी
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए।'
लेकिन उर्दू के लोग बताते हैं कि उर्दू शायरी में यह रिवायत रही है कि किसी मशहूर शेर के मिसरे को उधार ले कर उस पर अपना मिसरा जोड़ कर उसे मुकम्मल कर दिया जाय। ऐसा तरही मुशायरों में भी होता आया है। बशीर बद्र ने शायद यही किया था। यह भी कि उस ज़माने के मशहूर आलोचक और बशीर बद्र के हमउम्र शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने अपने उर्दू रिसाले 'शब-ख़ून' में उनकी ग़ज़लें कभी प्रकाशित नहीं कीं। इस पर बशीर बद्र ने किसी से कहा था कि क्या समझते हैं उनके रिसाले में नहीं छपेगा तो बशीर बद्र शायर नहीं बन पाएगा? इसी तरह का एक मशहूर वाकया यह भी बताया जाता है कि 02 जुलाई 1972 को हुए भारत-पाकिस्तान शिमला समझौते के दौरान जुल्फ़िकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी को एक शेर अर्ज़ किया था-
'दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों।'
इस पर इंदिरा गांधी ने कहा था कि हमारा शेर हमें ही अर्ज कर रहे हैं!
प्रसिद्ध उर्दू साहित्यकार शीन काफ़ निज़ाम बशीर बद्र को याद करते हुए 29/5/2026 के 'हिन्दुस्तान' समाचार पत्र में लिखते हैं-
'उनका एक शेर बेजोड़ है-
खूबसूरत, उदास, खौफ़जदा
वो भी है बीसवीं सदी की तरह।
इस तरह का इजहार तब नहीं था, जब बशीर साहब लेखन में आए थे। यह नई ग़ज़ल में उनका खास कारनामा था और उन्हीं के साथ चला गया। उनके पास रूमानियत से चीजों को देखने का जो सलीका था, वह उनके जरिए ही पहली बार हिन्दुस्तान में शुरू हुआ था।'
अपने इसी लेख में निज़ाम साहब उन्हें ग़ज़ल की दुनिया में 'नए लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करने वाला शायर बताते हैं और कहते हैं कि '20वीं सदी में ग़ज़ल की चार-पांच हस्तियों को गिनने जाएंगे, तो उनमें एक नाम बशीर बद्र का होगा।'
कहना न होगा कि हमने बशीर बद्र के रूप में उर्दू के जिस बड़े शायर को अभी-अभी खोया है, उसकी शायरी उर्दू शायरी की आबरू जैसी है। मुशायरों के मंच से ले कर किताबों के पन्नों तथा गायकों के कंठों तक उस शायरी की ऐसी प्रसिद्धि से किसी को भी ईर्ष्या हो सकती है। गहराई से अध्ययन किया जाएगा तो पता चलेगा कि डॉ. बशीर बद्र ने उर्दू शायरी की दुनिया को फिर से एक नई ताज़गी, नये अहसास और नये रंग की भाषा से भरने की कोशिश की है और ऐसा करने वाले दुनिया में रोज़-रोज़ पैदा नहीं होते।
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| कमलेश भट्ट कमल |
सम्पर्क
1512, कारनेशन-2,
गौड़ सौंदर्यम् अपार्टमेंट,
ग्रेटर नोएडा वेस्ट-201318,
मोबाइल : 9968296694.


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