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स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'एक सिनेमाबाज की कहानी' का अन्तिम और दसवाँ खण्ड।

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      विभिन्न तकनीकों के चलते सिनेमा भी अपना रूप बदल रहा था। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में सिनेमाहाल की जगह मल्टीप्लेक्स लेने लगे थे। हिन्दी सिनेमा पर अब पूंजीपतियों और कारपोरेटों का आधिपत्य स्थापित होने   लगा था। अब फिल्मों के नाम ही नहीं उनके वर्ण्य विषय भी बदलने लगे थे। आम आदमी , उसकी समस्याएं और उसके दुःख सुख सिनेमा से गायब होने लगे थे। सिनेमाहाल बन्द होने से चवन्निया दर्शक भी गायब होने लगे थे। सैकड़ो रुपये खर्च कर सिनेमा देखना इनके ही नहीं बल्कि निम्न माध्यम वर्ग के लिए भी बूते के बाहर था। कोरोना महामारी ने सिनेमाहालों का एक तरह से वारा न्यारा ही कर दिया। विकल्प की खोज ओ टी टी ( ओवर द टॉप ) प्लेटफॉर्म की खोज के साथ हुई। अब नई फिल्में इसी प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने लगीं। यह एक वैश्विक प्लेटफॉर्म है जिस तक आम आदमी की पहुँच मुश्किल है। सिनेमा पूरी तरह अपना रूप बदल चुका है। सिनेमा का ऐसा अवसान हमारी कल्पना के परे...