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बेजी जैसन के कविता संग्रह 'गुम गौरयों की चुप दुनिया' पर देवेश पथ सारिया की समीक्षा 'मनुष्यता की करुण पुकार'

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मनुष्य जहां पर भी है वह अपनी समस्याओं में परेशान रहता है। यह परेशानी मनुष्य की विशिष्टता भी है। वह इन समस्याओं से जूझते हुए ही आगे अपनी राह बनाता है। इस तरह मनुष्य बाहर तो परेशान है ही, खुद अपने अन्दर भी युद्धरत रहता है। जब तक जीवन है तब तक जीवन की समस्याएँ हैं। यानी समस्याएँ जीवन की निशानी हैं। मौत के बाद सारी समस्याएँ जैसे एकबारगी खत्म हो जाती हैं। बेजी जैसन अपनी कविताओं में मनुष्य की इन समस्याओं को गम्भीरता के साथ प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए ऐसे लगता है जैसे हम खुद इन समस्याओं से दो चार हो रहे हों। हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से बेजी जैसन का कविता संग्रह 'गुम गौरयों की चुप दुनिया' प्रकाशित हुआ है। कवि देवेश पथ सारिया ने इस संग्रह की समीक्षा लिखी है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं बेजी जैसन के कविता संग्रह 'गुम गौरयों की चुप दुनिया' पर देवेश पथ सारिया की समीक्षा 'मनुष्यता की करुण पुकार'। पुस्तक समीक्षा  'मनुष्यता की करुण पुकार' देवेश पथ सारिया बेजी जैसन को मैं एक बेजोड़ अनुवादक के तौर पर जानता आया हूँ। उन्होंने ओशन वुओंग और सायत नोवा ...

देवेश पथ सारिया का आलेख 'मानसिक स्वास्थ्य के इर्द-गिर्द'

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  देवेश पथ सारिया हमारे समाज में आज भी कई ऐसी रूढ़ियां और मान्यताएं हैं जो सच न होने के बावजूद अपनी बनावटी वास्तविकता के साथ जन समुदाय में प्रचलित हैं। मानसिक स्वास्थ्य की समस्या ऐसी ही है। ऐसे व्यक्ति को हमारे समाज द्वारा तुरन्त पागल घोषित कर दिया जाता है। लोग उस व्यक्ति का मजाक उड़ाने लगते हैं। उसके बारे में ऊलजलूल बातें शुरू हो जाती हैं। जबकि होना यह चाहिए कि ऐसे व्यक्ति के साथ समाज सहानुभूति के साथ पेश आए। कवि देवेश पथ सारिया उचित ही लिखते हैं कि "अगर ठीक से जाँच कराएँ तो अधिकांश भारतीय मेडिकल मानकों के अनुसार किसी न किसी मानसिक समस्या का शिकार निकलेंगे। हमारे समाज में परिवार और स्कूल में ही ठीक से बच्चों से व्यवहार नहीं किया जाता। इसके साथ ही जिस बेतरतीबी से यहाँ वैवाहिक रिश्ते तय किए जाते हैं, प्रायः वैवाहिक जीवन भी कोई बहुत सुखद नहीं होता। इस सब का परिणाम यह होता है कि हर व्यक्ति बहुत सारे ट्रॉमा ले कर घूम रहा होता है। यौन अपराध भी एक बहुत बड़ी जनसंख्या को ऐसा नासूर दे देते हैं जो ताउम्र बना रहता है। आमतौर पर बचपन में होने वाले इन अपराधों में कोई करीबी रिश्तेदार गुनहगार होत...

योसा बुसोन के हाइकु, हिन्दी अनुवाद : देवेश पथ सारिया

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  योसा बुसोन हाइकु मूलतः जापानी कविता की एक विधा है। यह मात्र तीन पंक्तियों में ही लिखी जाती है। इसका भी अपना मात्रात्मक पदबंध होता है। हाइकु में आमतौर पर पहली पंक्ति में पाँच अक्षर, दूसरी में सात और तीसरी में पाँच अक्षर होते हैं। हाइकु में प्रकृति या किसी क्षणिक अनुभव को संक्षिप्त और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया जाता है। कहा जा सकता है कि यह अनुभूति के चरम क्षण का पद्यांकन है। "हाइकु का जन्म जापानी संस्कृति, परम्परा, जापानी जनमानस और सौन्दर्य चेतना में हुआ और वहीं यह पुष्पित पल्लवित हुआ है। हाइकु में अनेक विचार-धाराएँ मिलती हैं- जैसे बौद्ध-धर्म चीनी दर्शन और प्राच्य-संस्कृति। हाइकु को काव्य विधा के रूप में बाशो (1644-1694) ने प्रतिष्ठा प्रदान की। हाइकु मात्सुओ बाशो के हाथों संवर कर 17वीं शताब्दी में जीवन दर्शन से जुड़ कर जापानी कविता की युगधारा के रूप में प्रस्फुटित हुआ। आज के समय में हाइकु जापानी साहित्य की सीमाओं को लाँघ कर विश्व साहित्य की निधि बन चुका है। योसा बुसोन (1716-1784) एदो युग के कवि-चित्रकार थे। उनका जन्म ओसाका के क़रीब हुआ। उन्हें अपने युग के सर्वश्र...

अशरफ़ अबूल-याज़िद की कविताएं

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  अशरफ़ अबूल-याज़िद अशरफ़ अबूल-याज़िद (जन्म : 1963) मिस्त्र के कवि, उपन्यासकार हैं। वह पिछले 33 साल से सांस्कृतिक पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वह अनेक अरबी प्रकाशन संस्थानों से संबद्ध रहे हैं। मौलिक एवं अनूदित मिला कर उनकी कुल 42 पुस्तकें प्रकाशित हैं। वह अनेक अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित हैं। सृष्टि के अनन्त विस्तार में संवेदनाओं, अनुभूतियों और सूक्ष्मताओं को जिस विधा में बेहतर तरीके से दर्ज किया जा सकता है वह विधा कविता ही हो सकती है। इस मामले में दुनिया भर के कवियों को परस्पर जोड़ने का काम कविता ही करती है। मूसलाधार बारिश में एक बूंद के अनदेखा रह जाने का दर्द वस्तुतः कवि ही बयां कर सकता है। वह बारिश जिसका समूचा वजूद ही बूंदों पर टिका होता है। ठीक वैसे ही जैसे इस दुनिया के निर्मित होने में एक एक आदमी का हाथ है। लेकिन धर्म, जाति और राष्ट्र जैसी संस्थाओं बीच वह लगभग खो जाने के लिए अभिशप्त होता है। अशरफ़ अबूल-याज़िद मिस्र के चर्चित कवि हैं और उनकी कविताएं दुनिया की कई एक भाषाओं में अनूदित हुई हैं। कवि देवेश पथ सारिया ने अशरफ़ अबूल-याज़िद की कविताओं का उम्दा हिन्दी अनुव...

देवेश पथ सारिया की पुस्तक 'छोटी आँखों की पुतलियों में' का एक अंश और पुस्तक की समीक्षा

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  देवेश पथ सारिया कवि लेखक देवेश पथ सारिया ने ताईवान में रहते हुए अपने अनुभवों को शब्दबद्ध किया है। नई दिल्ली के सेतु प्रकाशन ने इस किताब को 'छोटी आँखों की पुतलियों में' नाम से प्रकाशित किया है। नाम से ही जाहिर है कि इस पुस्तक के लेखक का अंदाज़ शायराना है। युवा कवि देवेश ने कुछ बेहतर कविताएं लिखी हैं। साथ ही विश्व के उम्दा कवियों के कविताओं का उन्होंने हिन्दी में अनुवाद भी किया है। देवेश की भाषा पर पकड़ बेजोड़ है। जब वे अपनी रौ में होते हैं भाषा के साथ खेलते हुए नजर आते हैं। भाषा के साथ खेलना आसान नहीं होता। महारत हासिल करने वाला ही ऐसा कर पाता है। 'छोटी आँखों की पुतलियों में' देवेश का लेखकीय खिलंदड़ापन स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। इस किताब से देवेश ने अच्छे गद्यकार के रूप में एक उम्मीद दिखाई है। देवेश के इस किताब की एक समीक्षा की है देवांशी गुप्ता ने।  आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं देवेश पथसारिया की किताब 'छोटी आँखों की पुतलियों में' का एक अंश और देवांशी गुप्ता की समीक्षा ताईवान प्रवास की खट्टी मीठी यादों का रिपोर्ताज। ताइवान डायरी 'छोटी आँखों की पुतलि...

दुन्या मिखाइल दुन्या मिखाइल की कविताएं, अनुवाद : देवेश पथ सारिया

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  दुन्या मिखाइल जीवन के कई रंग हैं। रंगों का कोलाज जीवन को निर्जीव होने से बचाता है। जब कोई कवि इस कोलाज को शब्द रंग देने लगता है तब एक कविता साकार होती है। वह कविता जिसके सरोकार व्यापक होते हैं। जिसमें संवेदनाएं कुछ इस तरह घुल मिल जाती हैं कि सहज ही वे अपनी लगने लगती हैं।  दुन्या मिखाइल इराक़ में पैदा हुई कवयित्री हैं। वह लंबे समय से अमेरिका में रह रही हैं। वह अब अमेरिकी नागरिक भी हैं। उनके कविता-संकलन चर्चित रहे हैं और उन्हें कुछ प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले हैं। हिंदी सहित संसार की कई भाषाओं में उनकी कविताओं का अनुवाद समय-समय पर होता रहा है। युवा कवि देवेश पथ सारिया ने हमारे अनुरोध पर  दुन्या मिखाइल की कविताओं का अनुवाद पहली बार के लिए किया है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं  दुन्या मिखाइल की कविताएं। दुन्या मिखाइल की कविताएं हिन्दी अनुवाद : देवेश पथ सारिया (1) कछुए की तरह पीठ पर उठाए अपना घर मैं फिरती हूं दरबदर। (2) दीवार पर लगा शीशा नहीं दिखाता अब  उन लोगों के चेहरे  जो गुज़रते थे  उसके सामने से। (3) मृत व्यक्ति चाॅंद जैसी हरकत करते हैं धरती को पीछे ...