कल्पना मनोरमा की डायरी का अंश 'उत्तरहीन प्रश्नों के साथ'
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| कल्पना मनोरमा |
मानव शरीर नश्वर है, यह बात सभी जानते हैं। इसके बावजूद सभी मनुष्यों की अपनी अपनी महत्वाकांक्षाएं होती हैं। किसी की ढंकी छुपी, किसी की खुली खुली। इसके लिए सब भरसक प्रयास भी करते हैं। वे भी जो यह कहते नहीं थकते कि उनकी कोई महत्वाकांक्षा ही नहीं है। जनसेवा की बात करने वाले तथाकथित समाजसेवी हों या जन नेता हों या फिर धर्मोपदेश देने वाले महात्मा, सबकी अपनी-अपनी हसरतें होती हैं। कल्पना मनोरमा अपनी डायरी में लिखती हैं "कभी-कभी सोचती हूँ कि इतिहास के बड़े नाम और हमारे समय के छोटे-बड़े नामों में मूल अंतर कितना है? पैमाना अलग है, मनोवृत्ति शायद नहीं। सिकंदर ने संसार जीतना चाहा था। तो क्या हम अपने-अपने छोटे संसार जीतना नहीं चाहते हैं? किसी को भूभाग चाहिए था, किसी को प्रतिष्ठा। किसी को साम्राज्य चाहिए था, किसी को अनुयायी। इच्छा का आकार बदल जाता है, उसकी प्रकृति नहीं।" डायरी लेखन साहित्य की ऐसी विधा है जिस पर आजकल कम बात होती है। लेकिन ये अंश अक्सर ही विचारोत्तेजक होते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कल्पना मनोरमा की डायरी का अंश 'उत्तरहीन प्रश्नों के साथ'।
डायरी
'उत्तरहीन प्रश्नों के साथ'
(मन, स्मृति, अनुभव और जीवन से जुड़े अंश)
कल्पना मनोरमा
2 नवंबर 2023
आज संध्या के समय, जब अँधेरा आसमान से झूलने वाला था, तब ध्यान से देखा। नारंगी रंग का सूरज कर्मों की रेखा छोड़ता हुआ जैसे धरती पर कोई संदेश लिख जाता है कि विदा लेना भी एक कला है। उसी तरह प्रत्येक जीवन जाते हुए अपने पीछे कोई न कोई रेखा तो छोड़ता ही होगा। वह रेखा कभी कालिमा से भरी होती होगी, तो कभी सुनहरी आभा से दमकती हुई।
यह विचार आते ही स्मृतियों ने दस्तक दी। बचपन में एक बार गरुड़ पुराण सुना था। उसमें वर्णित था कि जब जीव जीवन त्याग कर परलोक की ओर जाता है, तो अपने कर्मों के अनुसार अनेक अवस्थाओं से गुजरता है। आसमान के पार घटती उन घटनाओं की कल्पना से मन काँप उठता था। फिर उन्हें जानने की इच्छा होती। माँ से पूछने जाती तो माँ हँस कर कह देतीं, "मर कर ही देखना होगा।" साथ ही यह भी कहतीं, "तुम तो सतमार्गी हो, तुम्हें तो स्वर्ग मिलेगा।" और मैं स्वर्ग की कल्पनाओं में खो जाती।
अब लगता है कि जीवन और मृत्यु के बीच क्या आदमी बार-बार मरता और जीता नहीं? हर कामना के बीच जीवन अपने तईं अड़ा खड़ा दिखाई देता है। आटा, नमक, तेल और मातृत्व के दायित्व कल्पनाओं को भी सुला देने का माद्दा रखते हैं। लेकिन उम्र की चढ़ाई चढ़ते हुए अब, जब समय फिर अपनी ओर लौटने का संकेत देने लगा है, तो लगता है कि जितने स्वर्ग और नर्क गरुड़ पुराण में वर्णित हैं, वे सब यहीं इसी स्थूल दुनिया में मौजूद हैं। कहीं और नहीं। यह भी समझ में आने लगा है कि कितने ही सत्संग सुन लिए जाएँ, घंटी, माला और पूजा-पाठ कर लिए जाएँ, जब तक कर्म स्वच्छ नहीं होंगे, रेखा सुनहरी होने से रही।
मनुष्य अपने ही कर्मों से अपना स्वर्ग और नर्क स्वयं रचता है।
27 नवंबर 2024
आज मन हुआ कोई मिले और बस चुपचाप पास में बैठा रहे। कोई बात न करे। बस नदी के किनारे चलती हवा का स्पर्श साथ-साथ महसूस करे। घास की ठंडक पैरों में उतरती रहे और वह कभी-कभी मेरी ओर देख ले। उसकी आँखों में अपना पूरा अक्स दिखाई दे। इतना भर ही बहुत होता। लेकिन ऐसा संभव नहीं।
वे अधीर अँधेरे भी अब अच्छे लगने लगे हैं, जिनमें कहीं चुपचाप फूल उग आते हैं। तितलियों का यूँ आना-जाना अच्छा लगता है। किसी अनसुनी धुन की तरह उनका आस-पास बने रहना मन को भाता है। लेकिन कानों में न जाने कितनी पराई ध्वनियाँ भरी रहती हैं कि अपनी पसंद की आहट भी कई बार सुनाई नहीं देती। तब अँधेरे से भी मोहभंग होने लगता है।
पहले मन हर बात का अर्थ पूछता था। अब लगता है, कुछ चीज़ों का बस होना ही पर्याप्त है। हर अनुभूति को शब्दों में बदलना जरूरी नहीं। कुछ सुख ऐसे भी होते हैं जो बिना नाम के मन में टिके रहते हैं। इसलिए कि भीतर कहीं थोड़ी-सी जगह अब खाली कर रही हूँ। बस इतनी कि कोई छोटी-सी खुशी आ कर बैठ सके, तितली की तरह। कोई स्मृति बिना शोर किए ठहर सके, किसी पुराने गीत की तरह। कोई विश्वास बिना प्रमाण माँगे मन की देहरी पर देर तक टिका रह सके।
अजीब है कि मन को हमेशा बड़े सहारे नहीं चाहिए होते। कई बार वह चुटकी-भर अपनापन माँगता है। उतना ही, जितना एक थकी हुई दोपहर को पेड़ की छाया चाहिए होती है। कई बार सहारे तितली के पंख जितने हल्के होते हैं। किसी फूल की गंध जितने क्षणिक। फिर भी उन्हीं के सहारे मन एक और दिन पार कर लेता है। शायद इसलिए कि मन के भीतर अब थोड़े-से सहारों के लिए एक अनकही-सी गुंजाइश बनने लगी है।
4 फ़रवरी 2025
कभी-कभी चाहती हूँ कि मैं एक किताब लिखूँ और वह ऐसे पाठक तक पहुँचे जिसे प्रतिक्रिया देने की जल्दी न हो। जो लेखक को खुश करने के लिए नहीं, अपनी आत्मा में घुलने के लिए मेरी किताब पढ़े। इबारत में अपने मन का स्पंदन महसूस करे। वहीं अटके जहाँ मैं अटकी थी। मेरी लेखकीय उलझन को महसूस करे, पर जल्दी-जल्दी पसंदीदा शब्द चुन कर उसे सुलझाने की हड़बड़ी न करे। जैसे मैं भावनाओं के उफान में देर तक शब्द, भाव और मन को तौलती रहती हूँ।
वह किताब को डूब कर नहीं, घूम-घूम कर पढ़े। जैसे कोई पुराना शहर देखा जाता है। एक गली से दूसरी गली, एक मोड़ से दूसरे मोड़ तक। पन्ने गंदे हों, उँगलियों के निशान रह जाएँ, परवाह न करे। कुछ पंक्तियाँ बार-बार पढ़े, कुछ यूँ ही छूट जाने दे। कुछ पर ठहरे, कुछ के पास से गुजर जाए। बच्चों को पढ़ाए, समझाने के लिए नहीं, भाषा से परिचय के लिए। यह दिखाने के लिए कि हर बात का अर्थ निकालना ज़रूरी नहीं होता। कुछ बातें केवल महसूस करने के लिए होती हैं।
मैं चाहती हूँ, मेरी किताब पढ़ कर वह मुझे खोजे और मैं उसे न मिलूँ। इसलिए नहीं कि मैं छिप जाना चाहती हूँ, बल्कि इसलिए कि लिखते समय भी पूरी तरह मौजूद कहाँ रह पाई थी। लिखते समय मन का एक हिस्सा हमेशा किसी स्मृति में भटकता रहता है, कोई हिस्सा किसी अनकहे दुःख के पास बैठा रहता है, कोई हिस्सा आने वाले समय की ओर देखता रहता है। शायद इसी कारण लेखक अपनी पूरी उपस्थिति कभी किसी किताब में दर्ज नहीं कर पाता। और यह भी कि वह तय न कर पाए कि जो उसने पढ़ा, वह पूरा हुआ या कहीं अटका है। उसी जगह जहाँ मैंने लिखना छोड़ा था। क्योंकि कुछ लेखन समाप्त नहीं होते, वे बस लेखक के हाथ से निकल कर पाठक के भीतर अपनी अगली यात्रा शुरू कर देते हैं।
वह मेरी दूसरी किताब की प्रतीक्षा करे, जैसे लिखते समय मैं उसकी करती हूँ। समझने की ज़िद में नहीं, खुद को कुछ भूल जाने के लिए। शायद पढ़ना और लिखना अंततः यही है—अपने भीतर से बाहर निकलना नहीं, बल्कि अपने भीतर किसी नई जगह तक पहुँच जाना।
18 जनवरी 2026
सुबह से मन किसी अनकहे आश्चर्य की प्रतीक्षा करता रहा। ऐसा कुछ, जिसे शब्दों में न बाँधा जा सके। लेकिन दिन अपने सामान्य ढंग से चलता रहा।
शाम को चाय पीते हुए ध्यान आया कि कुछ तारीखें मन में अलग तरह से दर्ज रहती हैं। वे कैलेंडर पर छपी बाकी तारीखों जैसी नहीं होतीं। उनके साथ जीवन का कोई मोड़ जुड़ा होता है, कोई निर्णय, कोई रिश्ता, कोई स्मृति। समय चाहे कितना भी बीत जाए, मन उन्हें अपने ढंग से सँजोए रखता है।
उसी क्षण लगा कि मेरे मन को उत्सवों से उतना लेना-देना नहीं, जितना इस बात से कि कोई उन तारीखों का अर्थ समझता है या नहीं। क्या बिना कहे यह समझा जा सकता है कि कुछ दिन केवल दिन नहीं होते। वे हमें याद दिलाते हैं कि जीवन कब और कैसे बदलता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा। उनके भीतर बीते हुए वर्षों की धूप, छाँव, हँसी, थकान, उम्मीद और साथ चलने की अनगिनत स्मृतियाँ चुपचाप जमा रहती हैं।
फिर महसूस हुआ कि मन की अपेक्षाएँ ही बार-बार मेरे भीतर दुःख का टार जमा करती हैं। होना यह चाहिए कि सामने वाला भूल गया, तो मुझे भी भूल जाना चाहिए। क्योंकि जीवन के सामने इससे कहीं बड़े प्रश्न खड़े हैं। लेकिन जीवन अपने ढंग से चलता रहता है और मन अपने ढंग से प्रतीक्षा करता रहता है।
रात गहराने लगी तो अपने ही ऊपर हँसी आई। कितनी बार लगता है कि जीवन को समझ लिया है। लोगों को समझ लिया है। अपने भीतर की उलझनों को समझ लिया है। और फिर कोई छोटी-सी घटना आ कर बता जाती है कि मेरी समझ अभी भी कितनी कच्ची है।
कुछ विचार इतने साफ़ होते हैं कि उन्हें छू लेने का मन करता है। कुछ इतने उलझे होते हैं कि उनकी ओर देखने की भी इच्छा नहीं होती। भावनाएँ भी वैसी ही हैं। न पूरी तरह कहने लायक, न पूरी तरह छिपाने लायक। वे बस मौजूद रहती हैं, बिना किसी घोषणा और शोर के।
हर भावना का कोई स्पष्ट अर्थ होना ज़रूरी नहीं होता। उनका होना ही कई बार पर्याप्त होता है।
अब यह भी धीरे-धीरे समझ आने लगा है कि हर दिन उत्सव नहीं होता। थके हुए, उदास और थोड़े झल्लाए दिनों में कोई कहानी नहीं बनती। लेकिन वही दिन भीतर चुपचाप कुछ छोड़ जाते हैं।
आज पूरा दिन एक छोटी-सी प्रतीक्षा के नाम रहा। मन भी पूरा कहाँ होता है। उसके भीतर हमेशा कुछ न कुछ बाकी रह जाता है। कोई इच्छा, कोई प्रश्न, कोई प्रतीक्षा।
अजीब है, उम्र के इस पड़ाव पर आ कर समझ में आने लगा है कि जीवन की हर कमी को भरा नहीं जा सकता। कुछ रिक्त स्थान हमारे साथ-साथ चलते हैं। वे हमेशा दुःख नहीं देते, लेकिन अपनी उपस्थिति ज़रूर दर्ज कराते हैं।
शायद जीवन का एक नाम यह भी है।
23 जनवरी 2026
आज वसंत पंचमी है। सुबह से ही ज़बान और दिमाग में बिटनिया बुआ छाई हुई हैं। यह भी ठीक से याद नहीं कि वे मायके में थीं या ससुराल में। सोचती हूँ, आज ही के दिन वे क्यों याद आईं?
हो सकता है इसलिए कि मन पीछे-पीछे लौटते हुए सरसों के संस्कार वाले उस वसंत को खोज रहा था और उसी की गैल में बिटनिया बुआ मिल गईं। बिल्कुल वैसे ही जैसे कुछ स्मृतियाँ बिना बुलाए लौट आती हैं।
बचपन में वसंत पंचमी केवल एक तिथि नहीं होती थी। वह पीली सरसों के खेतों, धूप में सूखते कपड़ों, रसोई में पीले चावलों वाली खीर की गंध और घर भर की चहल-पहल के साथ आती थी। तब यह नहीं मालूम था कि बड़े होने पर ऋतुएँ भी अलग-अलग घरों में बँट जाती हैं। कुछ मौसम देह के साथ रहते हैं, कुछ स्मृतियों के साथ।
आज बिटनिया बुआ को याद करते हुए लगा कि स्त्रियाँ शायद अपने मायके को कभी पूरी तरह छोड़ती ही नहीं। वे उसे अपने भीतर किसी तह में रख लेती हैं। बरसों बाद भी कोई मौसम, कोई गीत, कोई गंध उस तह को खोल देती है।
मायके से बुलावे आएँ या न आएँ, स्मृतियाँ बुलावे की मोहताज नहीं होतीं। जब चाहती हैं, आ कर चौखट पर बैठ जाती हैं। आज भी वे ऐसे ही चली आईं। पहले सरसों के फूल आए, फिर कच्चे आँगन की याद और उनके पीछे-पीछे बिटनिया बुआ।
बिटनिया बुआ ने आज की वसंत पंचमी को बचपन वाली वसंत पंचमी में बदल दिया। स्मृतियों की स्थिर झील में मौसम भी कंकड़ उछाल सकता है।
31 मई 2026
ख्यालों का क्या! आते ही रहते हैं। लेकिन क्या खुद की मृत्यु का ख्याल आता है? हाँ, मुझे आने लगा है। जब दुनिया को सुंदर और लोगों को सहृदय पाती हूँ, तब लगने लगता है कि इतना सुंदर सब कुछ एक दिन छूट जाएगा। उसी पल ध्यान अरस्तू, प्लेटो, चाणक्य, अशोक, सिकंदर और अकबर तक चला जाता है। फिर सोचने लगती हूँ कि इस संसार को किसी के आने और चले जाने से कभी कोई फर्क पड़ता है? बहुत देर तक उलझी रहती हूँ, लेकिन जब उत्तर नहीं मिलता तो सुबह की चाय के साथ दिन को हाँक देती हूँ।
आज भी यही हुआ। सुबह चाय के साथ मोबाइल खोला तो वही परिचित संसार सामने था। शब्दों का संसार। विचारों का संसार। और उनके बीच मनुष्यों का संसार। कोई स्वयं को स्थापित करने में व्यस्त था, कोई दूसरे को विस्थापित करने में। कोई अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहा था, कोई किसी और की उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगा रहा था। देखने में सब अलग-अलग था, पर भीतर से सब एक जैसा लगा। मानो हर व्यक्ति समय से कह रहा हो, "मुझे याद रखना।" शायद मनुष्य की सबसे पुरानी आकांक्षा यही है कि किसी भी हाल में उसे याद रखा जाए। लेकिन समय की आदत कुछ और है। वह किसी को याद रखने का वादा नहीं करता। अगर याद रखने लायक कुछ किया होगा तो उसे इतिहास की ओर धकेल कर आगे बढ़ता रहता है।
कभी-कभी सोचती हूँ कि इतिहास के बड़े नाम और हमारे समय के छोटे-बड़े नामों में मूल अंतर कितना है? पैमाना अलग है, मनोवृत्ति शायद नहीं। सिकंदर ने संसार जीतना चाहा था। तो क्या हम अपने-अपने छोटे संसार जीतना नहीं चाहते हैं? किसी को भूभाग चाहिए था, किसी को प्रतिष्ठा। किसी को साम्राज्य चाहिए था, किसी को अनुयायी। इच्छा का आकार बदल जाता है, उसकी प्रकृति नहीं।
फिर प्रश्न उठता है कि यदि अंततः सब कुछ समय की धूल में मिल ही जाना है, तो यह होड़ क्यों? जब यह ख्याल आया तो लगा शायद इसीलिए मनुष्य केवल नश्वर नहीं है, वह अपनी नश्वरता के प्रति सचेत भी है। और यही चेतना उसे बेचैन करती है। वह कुछ ऐसा कर जाना चाहता है जो उसके बाद भी बना रहे। कोई भवन बनाता है, कोई राज्य। कोई ऐसी किताब लिख जाना चाहता है जो लोगों की स्मृतियों में बनी रहे।
दरअसल हम सब अपने-अपने ढंग से समय के विरुद्ध छोटी-छोटी लड़ाइयाँ लड़ते रहते हैं, लेकिन समय पर अंतिम विजय शायद किसी की नहीं होती।
यह सोचते हुए भी उन लोगों पर हँस नहीं पाती हूँ जो स्वयं को बड़ा सिद्ध करने में लगे हैं। क्योंकि सच तो यह है कि मैं भी उनसे अलग कहाँ हूँ। लिखते समय क्या मैं भी नहीं चाहती कि मेरे शब्द किसी के मन में ठहरे रहें देर तक? कि मेरे जाने के बाद भी मेरी कोई पंक्ति कहीं जीवित रहे? अंतर केवल इतना है कि किसी की इच्छा मुखर है, किसी की मौन।
यही बात मुझे दूसरों के प्रति थोड़ा उदार बना देती है। शायद हम सब एक ही भय के अलग-अलग रूप हैं। किसी को मृत्यु का भय है, किसी को विस्मृति का। और शायद विस्मृत हो जाने का भय मृत्यु से भी अधिक गहरा है। इतना सब सोचने के बाद भी उत्तर हाथ नहीं आता कि संसार को किसी के आने और चले जाने से फर्क पड़ता है या नहीं। शायद संसार को नहीं पड़ता, लेकिन कुछ लोगों को पड़ता है। किसी एक व्यक्ति का जाना किसी एक हृदय में एक रिक्त स्थान छोड़ जाता है। और संभवतः जीवन का अर्थ भी इसी में छिपा है। संसार में नहीं, मनुष्यों के दिलो-दिमाग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना।
बाहर धूप फैल रही है। पेड़ों की पत्तियाँ हवा के साथ हिल रही हैं। दुनिया अपनी गति से चल रही है। मेरे प्रश्न अब भी मेरे साथ हैं। और मैं अपने उत्तरहीन प्रश्नों के साथ एक और दिन को हाँक देने की तैयारी में हूँ।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)






डायरी अनुभूतियों का संसार है.कल्पना जी की भाषा सुन्दर है और अच्छा लिखा है.
जवाब देंहटाएंडायरी में अपने मन को लिखना यूं आसान भी है और कठिन भी। कल्पना जी ने लिखा। बधाई
जवाब देंहटाएंडायरी लेखक के मन ,विचार, भाव को जानने और लेखक की नजर से दुनिया को एक नयी दृष्टि से देखने का जरिया है । कल्पना जी अपने लेखन ,विचार,भाषा की समृद्धता से हर बार आकर्षित करती हैं ,उनकी डायरी के यह अंश इस विचार को सही सिद्ध कर रहे हैं।
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