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भूमिका द्विवेदी अश्क की कहानी ‘मायूस परिन्दे’

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भूमिका द्विवेदी अश्क  किसी भी राज्य का पहला दायित्व यह होता है कि वह अपने राज्य की सीमा के अंतर्गत आने वाले सभी लोगों के जान-माल की हिफाजत करे और उन्हें सुकून से रहने का वातावरण प्रदान करे। लेकिन जब राज्य और उसकी सँस्थाएँ अपना कर्तव्य भूल कर कट्टरपन्थी जमात को संतुष्ट करने के लिए भेदभावकारी रवैया अपनाने लगती हैं तब दिक्कतें उठ खड़ी होती हैं। जिस पुलिस, प्रशासन से व्यक्ति न्याय की उम्मीद करता है अगर वही रक्षक की जगह भक्षक की भूमिका निभाने लगे तो...? यह ‘तो’ आज भी एक यक्ष प्रश्न की तरह है। युवा कथाकार भूमिका द्विवेदी अश्क इस कहानी में इन्हीं सवालों से टकराती हैं। इस कहानी में पुलिस की उस उदंडता और क्रूरता का बेबाक वर्णन है जो अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की बजाए असुरक्षा की भावना को ही बढ़ावा देता है। ऐसे तत्वों से उनके सामान्य कर्तव्य क्या सामान्य इंसानियत की अपेक्षा तक नहीं की जा सकती। तो आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं भूमिका द्विवेदी की कहानी ‘मायूस परिन्दे’।             मायूस परिंदे भूमिका द्विवेदी अश्क दंगा अपने प...