विश्व के लोकधर्मी कवियों की परम्परा-4: नाजिम हिकमत
विश्व के लोकधर्मी कवियों की परम्परा पर हमने जनवरी 2013 में एक श्रृंखला आरम्भ की थी। इस क्रम में आप वाल्ट व्हिटमैन, बाई जुई और मायकोवस्की पर आलेख पहले ही पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत है वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी का तुर्की के प्रख्यात लोकधर्मी कवि नाजिम हिकमत पर यह आलेख। नाजि़म हिकमत: सहज -सरल लोकधर्मी जातीय कवि 1951 के बर्लिन समारोह में नाजि़म ने भारत के बारे कहा है, हिंदुस्तान, बे-जोड़ हिन्दुस्तान को, तुर्की का, बेजोड़ तुर्की का सलाम और उसकी मोहब्बत’। इससे लगता है नाजिम अपने देश की तरह ही उन देशों को सम्मान देते थे जो औपनिवेशिक साम्राज्य से या तो मुक्त हो चुके हैं या उससे मुक्त होने को संघर्षरत हैं। अपने देश तुर्की के बारे में उनकी एक सुविख्यात कविता है, ‘मेरे देश’। इसमें उन्होंने अपने और देश के एकात्म होने के रिश्ते बताये हैं। यह रिश्ते ऐसे हैं कि आदमी और देश को परस्पर एक दूसरे का पूरक बनाते है। कितने रूपों में कितनी तरह से कितनी भंगिमाओं में ये रिश्ते साकार होते हैं नाजि़म इस कविता में बताते हैं - तुम कोई खेत हो और...