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दीबा नियाज़ी की कविताएं

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दीबा नियाज़ी आजादी एक ऐसा शब्द जिसकी कामना दुनिया के सभी इंसान अपने लिए करते हैं। आजादी ऐसी अनुभूति है जिसका समर्थन हर विचारधारा करती है। यहां तक कि तानाशाह भी आजादी के नाम पर ही अपना सारा खेल अंजाम देते हैं। यह अलग बात है कि दूसरे को आजादी दे पाना अत्यंत कठिन काम है। तथाकथित उदारवादी भी सही मायने में इसे बरत नहीं पाते। वस्तुतः इंसान की फितरत खुद को औरों से बेहतर दिखाने की होती है और इस क्रम में वह जाने अंजाने ऐसा वातावरण रचता है जिसमें वह दूसरे के अधिकारों को कुचल कर आगे बढ़ता रहता है। इस मामले में स्त्री वह पक्ष है जो पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पुरुषों के दमन और शोषण का अनवरत शिकार होती रहती है। वैवाहिक जीवन में वह उस पति के साथ रहने जीने के लिए विवश होती है, जो प्रायः हर दिन उसका किसी न किसी तरह शोषण करता रहता है। लड़कियों के आचार, व्यवहार, खाने पहनने, घूमने, पढ़ने, लिखने पर जिस तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं, वह इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। दुनिया के सारे धर्म स्त्रियों पर ही तमाम तरह के प्रतिबन्ध लगाते हैं।  एदीबा नियाज़ी नई कवयित्री हैं। उनकी कविताओं में स्त्री जीवन के त्रासद जीव...