विनोद दास का संस्मरण 'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण'

 


संस्मरण 

'सज्जनता और ज्ञान की चमक: कुँवर नारायण'  


विनोद दास 


हम उन यादों से बार-बार गुज़रना चाहते हैं जो हमारे साथ पहली बार घटित होती हैं। पहली बार देखी गयी फिल्म। पहली बार पढ़ी गयी किताब। पहली बार लिखी गयी कविता। किसी को देखने पर पहली बार धड़का दिल। पहली बार की गयी रेल या हवाई यात्रा। 

मुझे आज अपने मन की वह घुमड़न याद आ रही है जब किसी किताब को पढ़कर उस पर पहली बार कुछ लिखने की इच्छा अंकुरित हुई थी। किताब थी-कुँवर नारायण का कहानी संग्रह-'आकारों के आसपास'। 

छोटे कलेवर की कहानियाँ। कथ्य और शिल्प में विविधता और नवाचार। बहुस्तरीय अर्थ अनुभव से समृद्ध ताज़ी और मर्मस्पर्शी भाषा। कवि की कहानियाँ होने के बावजूद संवेदना के धरातल पर लिजलिजे रोमान से सायास दूरी। कहानी होते हुए कहानी के पारम्परिक विन्यास से मुक्त। 

उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए कभी लगता कि कोई निबन्ध पढ़ रहे है तो कभी लगता कि किसी छोटी नीतिकथा से कोई सबक सीख रहे हैं। इनमें कभी संस्मरण का आस्वाद मिलता तो कभी किसी मामले घटना को पढ़ते हुए अखबार की रपट की याद आती। यह एक सुखद संयोग भी था कि उन दिनों कुँवर नारायण के साथ ही रघुवीर सहाय,श्रीकान्त वर्मा,सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे कुछ कवियों के कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुए थे। यही नहीं, कवियों की कहानियों की अलग कोटि कवि-कथाकार को लेकर साहित्यिक वायुमंडल में चर्चा भी चल रही थी। 

उन दिनों मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.ए. प्रथम वर्ष का छात्र था। हिन्दी आलोचना से अपरिचित और निस्पृह रहने के बावजूद जैसे-तैसे समीक्षा लिख ली थी। आत्मविश्वास की बहुत कमी थी। समझ में नहीं आ रहा था कि किसे इसे पढ़ाकर राय लूँ। 

यह आपातकाल का दौर था। आपातकाल के आतंक के चलते मुद्राराक्षस जी आकाशवाणी की अपनी सरकारी नौकरी छोड़ कर लखनऊ में दुर्विजयगंज में अपने पैतृक घर में रहने लगे थे। उनसे इतना परिचय हो गया था कि उन्हें अपना लेख दिखा सकूँ। सरसरी तौर से लेख पढ़ने के बाद उन्होंने सुझाव दिया कि आप क्यों नहीं एक बार कुँवर नारायण जी को दिखा लेते। मैंने कुछ कमज़ोर स्वर में कहा कि “मैं उनसे परिचित नहीं। दूसरे वह बड़े व्यवसायी हैं। उन्होंने खुद अपने परिचय में लिखा है कि वे मोटर बेचते हैं ताकि साहित्य का धन्धा न करना पड़े। वह मुझसे मिलेंगे?” मुद्राराक्षस जी ने प्रतिवाद करते हुए कहा कि यह सच ही कि वे धनी हैं और व्यस्त रहते होंगे, लेकिन वह मिलनसार और बेहद सज्जन हैं। आप उनसे फोन पर समय लेकर मिल सकते हैं। उन्होंने उनका फ़ोन नम्बर एक चिट पर लिख भी दिया। 

बहरहाल मेरा मिलने का साहस नहीं हुआ। दुबारा मुलाकात होने पर मुद्रा जी ने सहज ही पूछा कि कुँवर जी से मुलाकात हुई। मेरे न कहने पर उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाते हुए कहा कि आपका लेख अच्छा है। कुँवर जी को अच्छा ही लगेगा। आप निःसंकोच फ़ोन कर के मिल लीजिए। 

फ़ोन करना मेरे लिए संकट का सबब था। मेरा कोई मित्र या सम्बन्धी लखनऊ में नहीं था जिसके घर में फ़ोन हो। अचानक एक दिन सहसा ख्याल आया कि पोस्ट ऑफिस से फ़ोन किया जा सकता है। 

पूछताछ के बाद महानगर पोस्ट ऑफिस मिला। तसल्ली हुई कि फ़ोन वहाँ था। मेज पर रखा काले कछुवा सा फ़ोन का काला डिब्बा मुझे डरा रहा था। फ़ोन करने का यह मेरा पहला अवसर था। गोल चक्के की सुराखों में अँगुली डाल कर नम्बर मिलाना और फिर चोगा उठाकर एक प्रतिष्ठित कवि से बात करने की सोचते ही मेरी धुकधुकी बढ़ने लगती। सिक्का डालकर बात करने वाला यह फ़ोन नहीं था। पोस्टमॉस्टर सामने बैठा था और मुझे घूर रहा था। एक बार मैंने सोचा कि फ़ोन करना टाल दूँ। पोस्ट मास्टर की धमकाती   नज़र का सामना करने से बचने के लिए चिट पर लिखे नम्बर मिलाये। उधर से आवाज़ आने में देर लगी तो घबड़ाकर चोगा क्रैडल पर रख दिया। कॉल लग चुकी थी। पोस्टमॉस्टर ने हडकाने की मुद्रा में कहा कि आपने बात क्यों नहीं की। आपको इस काल का पैसा देना होगा। मैंने दुबारा चिट पढ़ कर नम्बर डायल किया। घण्टी बजते ही रिसीवर से हैलो की कोमल आवाज़ आयी। मैंने अपना नाम बताकर मुद्राराक्षस जी का ज़िक्र किया। उनसे मिलने का प्रयोजन बताया। उन्होंने कहा कि कभी भी आइये.। अन्ततः रविवार को सुबह मिलने की बात तय हुई।  

वह खुशनुमा सुबह थी। उनका घर बादशाह नगर रेलवे स्टेशन के करीब था। बाराबंकी से छोटी लाइन की ट्रेन से हम बादशाह नगर स्टेशन उतरे। हस्तलिखित लेख की प्रति साथ थैले में थी। अब लेख दिखाने का उत्साह कम, डर ज्यादा लग रहा था। शानदार घर की घंटी बजाने पर कुछ देर बाद उनका एक सहायक आया। उसकी आँखों में कुछ ऐसा भाव था जैसा चन्दा माँगने वाले को देखकर दरबान को होता है। मैंने बताया कि उन्होंने मिलने के लिए बुलाया है। हालाँकि भीतर से लौटने के बाद उसकी भाव-भंगिमा थोड़ी बदली हुई थी। 

वह हमें ससम्मान मकान के पिछले हिस्से में ले गया जहाँ बेल और लताओं के कुञ्ज में बेंत की एक मेज के पास चार बेंत की कुर्सियाँ पड़ी हुई थीं। तरह-तरह के फूल मुस्करा रहे थे। गुलाब ज्यादा थे। हम वहीं बैठकर फूलों की वाटिका के सौन्दर्य को निरखते हुए इन्तज़ार करने लगे। सर्दियों के दिन थे। लताओं से छन कर आती हुई धूप देह पर आँख-मिचोली खेल रही थी। सफ़ेद कुरता-पायजामा में मोटे फ्रेम के चश्में के साथ कुँवर जी ने आते ही विलम्ब के लिए क्षमा माँगी। उन्होंने बताया कि वे स्नान कर रहे थे। वह गम्भीर थे। उनके चेहरे पर ज्ञान और सज्जनता की एक दुर्लभ चमक थी। परिचय के दौरान लखनऊ विश्वविद्यालय का जिक्र चलते ही वह अपने समय को याद करने लगे। उन्होंने उमंग से बताया कि रघुवीर सहाय एम.ए. अँग्रेज़ी में उनके सहपाठी थे। वैसे एक वर्ष वरिष्ठ थे लेकिन परीक्षा न देने का कारण साथ हो गए थे। उन्हें यह भी बताते हुए कोई झिझक नहीं थी कि उन दिनों रघुवीर सहाय जी का हिन्दी साहित्य के परिदृश्य से उनकी तुलना में अधिक परिचय था। यही नहीं, उनकी पत्रिका युग चेतना में जब रघुवीर सहाय की कविता हिन्दी प्रकाशित हुई थी तो हिन्दी जगत के एक असहिष्णु वर्ग ने किस तरह से उसका विरोध किया था। 

बातचीत का सिलसिला चल निकला। उन्होंने फिर बताया कि उन दिनों अज्ञेय की कविता संग्रह “हरी घास पर क्षण भर” प्रकाशित हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय के लॉन पर उस संग्रह को पढ़कर रघुवीर सहाय और वे दोनों मित्र उन कविताओं के आधुनिक बोध पर मुग्ध थे। यही नहीं, उस पर उन्होंने गहन चर्चा भी की थी। एक तरह से हिन्दी की आधुनिक कविता से उनका पहला साक्षात्कार था। इसी क्रम में पूछने पर उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह अज्ञेय जी ने उन्हें तीसरे तारसप्तक में कवि के रूप में शामिल किया था। 

उन्हें अपना लेख पढ़ाने के लिए मैं कसमसा रहा था। वह उस सिलसिले में कोई बात ही नहीं कर रहे थे। जिक्र छेड़ने पर उन्होंने कहा कि इसे मेरे पास छोड़ दीजिए। पढ़ कर इस पर अगली बार बात करेंगे। इसी बीच भारती जी भी आयीं। थोड़ी देर बाद सैंडविच के साथ पॉट में चाय भी आयी। चाय पीने के दौरान भारती जी की आत्मीय उपस्थिति से यह लगा जैसे हम किसी परिवार के बीच बैठे हों। 

सच में उनका घर उस दिन से अपना लगने लगा। इतना अपना कि जब तक कुँवर जी लखनऊ में रहे,उनके यहाँ जाने के पहले फ़ोन करने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई। हम उनसे एक जिज्ञासु छात्र की तरह मिलते थे। वह अपना वात्सल्य खुलकर हम पर लुटाते थे। उनकी लाइब्रेरी से पुस्तकों-पत्रिकाओं के लेनदेन का सिलसिला अबाध गति से चलता था। लोग उनकी किताबें कई बार वापस नहीं करते थे। इसके लिए उन्होंने एक उपाय निकाला था कि वह किताब का आवरण निकाल कर रख लेते थे ताकि उन्हें यह स्मरण रहे कि कौन किताब ले गया है।  

नौकरी के सिलसिले में दिल्ली आने के बाद उनसे सम्वाद कुछ टूट गया। यह तब फिर जुड़ा जब कवि कमलेश ने मुझे कुँवर नारायण पर एक पुस्तक सम्पादित करने का प्रस्ताव दिया। कमलेश जी तब “सातवाहन” नामक एक प्रकाशन शुरू कर चुके थे। वह अपने कविता संग्रहों के अलावा विजयदेव नारायण साही का कविता संग्रह “साखी”, मनोहर श्याम जोशी  तथा कृष्ण वलदेव वैद्य का कथा संग्रह भी छाप चुके थे। यह प्रस्ताव काफ़ी आकर्षक और मेरे अनुकूल था। मैंने उनसे जुड़ी सामग्री एकत्र करना शुरू कर दी। कथाकार मृणाल पाण्डेय से कुँवर नारायण की कहानियों पर एक नया लेख लिखवाया। कवि विष्णु खरे से भी उनकी कविता पर लिखने की बात कर ली थी। उन दिनों कमलेश डी-4 कालिंदी में रहते थे जो मिजोरम के राजनेता लाल डेन्गा का घर था। कमलेश जी राजनीतिक रूप से जॉर्ज फर्नांडीस के करीब माने जाते थे। शुरू में मुझे उनके इस पक्ष की जानकारी नहीं थी। उनके पास अपनी निजी विशाल लाइब्रेरी थी। स्वामीनाथन सरीखे अनेक शीर्ष चित्रकारों की पेंटिंग्स भी उनके दीवारों की शोभा बढ़ाती थीं। मैं अक्सर दफ़्तर के कार्यदिवस में सुबह उनके घर मिलने जाता। कमलेश जी आँखें मलते हुए उठते। फिर घर के भीतर चाय बनाने चले जाते। चाय बनाने की उनकी प्रक्रिया इतनी लंबी और व्यापक होती कि मैं भीतर ही भीतर कसमसाता रहता। मुझे अपने दफ़्तर भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड लोदी रोड पहुँचने की हड़बड़ी रहती। कमलेश जी विधिवत ट्रे में टी पॉट, मिल्क पॉट और सुगर पॉट के साथ नमूदार होते।  कहना न होगा कि मुझे यह ट्रे में सजी चाय बहुत भारी पड़ती।

मुझे याद है कि कमलेश जी नामवर जी से भी कुँवर नारायण पर लेख लिखवाने के लिए उनके पास गये। नामवर जी ने लेख नहीं लिखा। कुँवर जी ने भी अपने लेखों आदि की फोटो प्रतियाँ मुझे उपलब्ध करायीं। कमलेश जी की यह योजना तब खटाई में पड़ गयी जब मैंने दिल्ली छोड़ दी। बैंक ऑफ़ बड़ौदा पटना में नौकरी के लिए चला गया। उनके पास तमाम एकत्र सामग्री कहाँ गयी, पता नहीं चला। पटना प्रवास के दौरान कुँवर जी से सम्वाद टूट सा गया। सम्वाद के तार फिर तब जुड़ गये जब नाबार्ड में नौकरी के सिलसिले में लखनऊ लौट आया। अब भारतीय ज्ञानपीठ से युवा कविता पुरस्कार के तहत कविता संग्रह “खिलाफ़ हवा से गुज़रते हुए" छप चुका था। 

इस दूसरे दौर मैं उनसे कुछ खुल चुका था। उनसे बहस भी कर लेता था। वह लोकतान्त्रिक थे। धैर्य से मुझे भी सुनते थे। अपना मत दृढ़ता के साथ रखते थे। लखनऊ के साहित्यकारों की एक बात मुझे हमेशा मोहती थी कि वे अपने चेले या अनुयायी नहीं बनाते। दोस्ताना व्यवहार और बराबरी के स्तर पर सम्वाद ने मुझे थोड़ा मुँहजोर बना दिया था। मैं उनका आदर करता था। वह भी शायद मुझे प्यार करते थे। उनकी सम्पन्न हैसियत के चलते मैं उन्हें कभी अपने घर आमन्त्रित करने को सोचता भी नहीं था। विनीता को भी ऐसे सम्बन्धो के निर्वाह में संकोच रहता। लेकिन कुँवर जी मेरे घर दो या तीन बार अपनी सहधर्मिणी भारती जी के साथ आये। पहली बार आने पर मेरे छोटे बेटे चटपट ने उनकी चप्पलें छिपा दीं। उनके चेहरे पर झुँझलाहट की एक पतली लहर तक नहीं, स्नेह-सिक्त मुस्कराहट थी। जब मैं लखनऊ से तबादले पर जयपुर जाने लगा तो एक शाम लखनऊ के मित्रों को अपने गरीबखाने पर आमन्त्रित किया। इसमें कुँवर नारायण, मुद्राराक्षस, रवीन्द्र वर्मा, शीला रोहेकर, रमेश दीक्षित, वन्दना मिश्रा, राकेश, वीरेन्द्र यादव, अखिलेश, कवि राजेश वर्मा, अतुल कुमार आदि आये। अचानक इस कार्यक्रम में जबलपुर से कथाकार-संपादक ज्ञानरंजन और उनकी पत्नी भी आ गयीं। पूरा माहौल गुलज़ार हो गया। जम्मू से कवि मनोज शर्मा का आना भी हमें अच्छा लगा। उस दिन भी मेरे बेटे चटपट ने कुँवर जी की चप्पलें छिपा दीं। कुँवर जी उस दिन खूब हँसें। उन्होंने कहा कि लगता है कि यह लड़का मुझे इतना चाहता है कि मुझे यहाँ से जाने नहीं देना चाहता। पिछली बार भी इसने मेरे चप्पलें छिपा दीं थीं। 

कुँवर जी उन दिनों लखनऊ के कार्यक्रमों में कम शिरकत करते थे। सुखद यह था कि मैं जब भी उन्हें अन्तर्दृष्टि पत्रिका के तहत किसी कार्यक्रम में आमन्त्रित करता, वह ज़रूर आते। श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास “पहला पड़ाव” उपन्यास पर आयोजित संगोष्ठी में उन्होंने एक संक्षिप्त परचा भी पढ़ा था। 

जब कभी कुँवर जी के बारे में सोचता हूँ तो आँखों के सामने उनके घर विष्णु कुटी का चित्र घूमने लगता है। महानगर स्थित इस घर को उन्होंने बड़ी चाव और सुरुचि से बनाया था। लखनऊ आवास विकास से प्लाट खरीदा था। इसका पूरा वास्तुशिल्प उन्होंने किसी पेशेवर वास्तुशिल्पी से नहीं, स्वयं परकल्पित किया था। इस घर में संगीत संगोष्ठियाँ होती थीं। पण्डित जसराज सरीखे शास्त्रीय गायक अपनी प्रस्तुतियाँ देते थे। नामवर सिंह ठहरते थे। सत्यजित राय मिलने आते थे। एक बात मुझे अक्सर हैरान करती है कि उनके घर में कभी किसी व्यवसायी से मेरी मुलाक़ात नहीं हुई जबकि वह स्वयं वह “स्पीड मोटर” नामक शोरूम के स्वामी थे। दरअसल उनका व्यवसाय में मन कम रमता था। सत्यजित राय ने इसी घर में उनके भतीजे को देख कर उसे अपनी फिल्म “शतरंज के खिलाड़ी” में बच्चे की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका दी थी। इस घर के पिछले हिस्से में कुछ दिन नरेश सक्सेना ने अपना स्टूडियो खोला था जहाँ उन्होंने हिन्दी की अनेक कविताओं को रिकॉर्ड किया था। लखनऊ की बाढ़ में कुँवर जी का घर भी चपेट में आ गया था जिसमें नरेश जी की तमाम रिकॉर्डिंग डूब गयी। कुँवर जी की भी अनेक महत्वपूर्ण किताबें भी। बाद के दिनों में कुँवर जी  के लिए यही प्यारा-न्यारा घर लखनऊ छोड़ने का बायस बना। इस घर के बगल की सड़क पर एक मन्दिर बना जहाँ से दिन रात लाउडस्पीकर पर तेज आवाज़ में भजन कीर्तन से उनकी शान्ति छिन गयी। जिस लखनऊ को तहज़ीब के लिए जाना जाता था, वहाँ हुडदंगियों का बोलबाला होने लगा। नतीज़ा यह हुआ कि कुँवर जी ने लखनऊ छोड़ कर दिल्ली को अपना आशियाना बना लिया। 

लखनऊ छोड़ने पर निजी तौर पर शायद उन्हें सुकून मिला हो लेकिन लखनऊ के सांस्कृतिक परिदृश्य को निश्चित ही घाटा हुआ। 

दिल्ली में मुलाक़ात होने पर कुँवर जी काफ़ी प्रसन्न दिखे। यहाँ स्पीड मोटर शो रूम की अपनी व्यावसायिक ज़िम्मेदारी से भी वह मुक्त थे, एक तरह से वह पूरा वक्ती लेखक बन गये। दरअसल वह सिर्फ कवि नहीं थे,विभिन्न कला अनुशासनों से उनकी अंतरंगता थी। फिल्म, चित्रकला, संगीत, नाटक के गुणग्राही ही नहीं, वह अच्छे अध्येता भी थे। कुछ दिनों तक वह उत्तर प्रदेश संगीत अकादमी के अध्यक्ष भी रह चुके थे। उन्होंने अपने इस कार्यकाल के दौर में अकादमी से राष्ट्रीय स्तर की सृजन प्रतिभाओं को जोड़ने की कोशिश की थी। वहाँ कुछ नवाचार भी कर रहे थे लेकिन सरकारी तन्त्र की उठा-पटक से उबकर जल्दी ही अकादमी से इस्तीफ़ा दे दिया था। लखनऊ में जिस सांस्कृतिक परिवेश की कमी उन्हें महसूस होती थी, दिल्ली में ऐसी सांस्कृतिक दुनिया में विचरने के लिए उन्हें भरपूर सुअवसर प्राप्त थे। गम्भीर फिल्मों खासतौर से विश्व सिनेमा में उनकी गहरी रूचि थी। उनके पास डीवीडी और किताबों के रूप में विश्व सिनेमा का बड़ा खजाना था। वह सारिका और नवभारत टाइम्स के प्रतिनिधि के तौर पर अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में भागीदारी करते थे जिसके चलते वह उन पर लेख भी लिखते थे। हालाँकि फिल्मों के बारे में उन्हें जितना ज्ञान था, उस दृष्टि से मुझे उनके वे लेख हमेशा अपूर्णता का बोध कराते थे। फिल्मों के बारे में उन दिनों हिन्दी में कम लिखा जाता था, ऐसे में हिन्दी का एक वरिष्ठ कवि विश्व सिनेमा पर लिखता है, यह बात भी बड़ी महत्त्वपूर्ण थी। 

कुँवर नारायण को निजी तौर से जानने वालों में शायद ही कोई ऐसा हो जो उनकी जीवन साथी भारती नारायण को न जानता हो। हम कहीं किसी साहित्यिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम या समारोह में भारती जी को देखते थे तो सहज ही समझ जाते थे कि आसपास ही कुँवर जी भी होंगे। वह कुँवर जी से सिर्फ़ इतनी ही दूर रहती थी कि कुँवर जी उनकी नज़रों के घेरे में रहें। यह किसी पत्नी की शक भरी निगरानी नहीं थी,मीठे दाम्पत्य के गहरे लगाव की यह पक्की डोर थी जिसमें वे दोनों अन्तरंग रूप से बँधे थे। एकाध कार्यक्रम में कुँवर जी के साथ भारती जी को नहीं देखा तो न जाने क्यों लगा कि वह उनके बिना कुछ अधूरे-अधूरे से लग रहे हैं। कुँवर जी अपने स्वाभाविक रंग में तभी होते थे जब वे भारती जी के साथ होते थे। कुँवर जी की शादी बढ़ी उम्र में हुई थी। भारती जी कोलकाता में पली-बढ़ी थी। उनमें बंगाली स्त्री की आभा, लावण्य और सौन्दर्य भी झलकता थ। कुँवर नारायण और भारती नारायण के बीच एक युवा की भीगती मसों के रोमांस का असर जरूर कम दिखता था लेकिन उनके अन्तर्लोक के सुरभित वायुमण्डल  की सुवास आसपास बिखरी रहती थी। कुँवर नारायण “आत्मजयी” जैसी गम्भीर और दार्शनिक कृति लिख चुके थे। भारती जी ने एक बार आत्मीय बातचीत में मुझे बताया था कि कुँवर जी से विवाह के लिए उनकी “हाँ” कहने के पीछे एक महत्वपूर्ण बात यह भी थी कि वह आत्मजयी सरीखी बड़ी रचना के कवि थे जिसे पढ़कर वह उनकी प्रशंसक बन चुकी थीं। लखनऊ से कलकत्ते की लम्बी दूरी को पाटकर उनके एक साथ होने-रहने की दिशा में “आत्मजयी” कृति एक महत्त्वपूर्ण सीढ़ी थी। 

कुँवर जी और भारती जी को एक साथ किसी आयोजन में देखना इतना प्रीतिकर लगता कि अक्सर मैं उन अधिकाँश साहित्यकारों के बारे में सोचता रहता जो अपनी जीवन संगिनी को साहित्यिक कार्यक्रमों में अपने साथ नहीं लाते। एक सहज कारण मुझे यही समझ में आता कि शायद उनकी सहचरी को साहित्य में जरा सी भी दिलचस्पी न होगी। ऐसा होने की पूरी आशंका है। हमारे यहाँ परिवार द्वारा तय की गयी शादी में कन्या और वर की रुचियों के बीच सामंजस्य को जरा सी भी तरज़ीह नहीं दी जाती है। परिवार की सामाजिक-वित्तीय हैसियत और वर की आय तथा रूपरंग पर ही बल रहता है। ऐसे में लेखकों की पत्नियों की साहित्यिक अभिरुचि न होने पर वह इन कार्यक्रमों में आने के लिए मना भी करती होंगी। हालाँकि मैं कई बार यह भी सोचता रहता कि क्या कभी हमारे साहित्यकार बन्धुओं ने उन्हें अपने संग साहित्यिक कार्यक्रमों में ले जाने के लिए उत्साह दिखाया होगा। मुझे लगता है कि ऐसा कम होता है। साहित्यकार अक्सर ऐसा करने से बचते हैं। इसके अनेक सामाजिक और निजी कारण होते होंगें। इनका अध्ययन करने की जरूरत है। 

दूसरे, हमारे साहित्यिक आयोजन क्यों इतने बोझिल, नीरस और उबाऊ होते हैं कि किसी साहित्यकार की पत्नी एक बार जाने की बाद दुबारा जाने के लिए लालायित नहीं होती। इन कार्यक्रमों को कम से कम इतना सरस बनाया जा सकता है कि उन में आम पाठक पहुँचकर साहित्य को पढ़ने के लिए प्रेरित हो सके। यहाँ कहने का आशय सिर्फ़ इतना है कि अगर लेखक अपने साथ इन कार्यक्रमों में अपनी पत्नी को भी ले जाएँ तो जहाँ उस परिवेश की बौद्धिक समृद्धि से उनका भावबोध परिष्कृत और विकसित होगा,वहीं अपने जीवन सहचर के जीवन और विचार के निकट पहुँचने के लिए उनका रास्ता भी प्रशस्त होगा। हालाँकि कई बार यह भी लगता है जो कवि-लेखक रात-रात भर जाग-जाग कर किसी नवोदित महिला रचनाकारों की कच्ची-कूड़ा रचनाओं को सुधार कर मुदित होते रहते हैं,वे क्या कभी अपनी जीवन संगिनी के साथ किसी अच्छी कविता या कहानी पढ़कर उसके बारे में भी चर्चा करके ऐसा कोई स्फूर्तिदायक परिवेश अपने घर में रचने की कोशिश करते होंगें। फिर मुझे ख्याल आता है कि अगर इन लेखकों के घर में स्वस्थ सांस्कृतिक परिवेश नहीं है तो उनकी अर्धांगिनी की हालत क्या होती होगी जिनके साथ उनको अपना पूरा जीवन बिताना है। 

एक साहित्यकर्मी का अक्सर सोना-जागना, ओढ़ना-बिछाना साहित्य और सिर्फ़ साहित्य होता है। यही नहीं, साहित्यकारों की अपनी एक खास दुनिया भी होती हैं। उनकी अनगिनत किताबें, पत्र-पत्रिकाएँ, समारोहों में भागीदारी, उनके दृश्य-अदृश्य साहित्यिक-सांस्कृतिक मित्र और पाठक। इन सबसे भी अधिक उनका सृजनात्मक अकेलापन। इस अराजक और अमानवीय संसार को अपनी कल्पना और स्वप्न के अनुरूप मानवीय और सुन्दर बनाने की ज़िद तथा सनक। इन सबसे अलग लेखक अपना एक निजी संसार भी रचते हैं। ऐसे पारिवारिक पर्यावरण में निरासक्त होकर घरेलू जिम्मेदारियों को निभाना सचमुच उनकी सहचरी के लिए बड़ी चुनौती होती है। लेखक की पत्नियों को लेखक की दुनिया से तालमेल करके परिवार के सान्निध्य में ऐसा संरचनात्मक ढांचा तैयार करना पड़ता है जिसमें अपने जीवन साथी को इतनी जगह दे सकें ताकि वे निर्विघ्न और अबाध रूप से सृजन कर्म कर सकें। यह प्रक्रिया जब सफल हो जाती है तो उस युगल का जीवन सँवर जाता है, अन्यथा दोनों ही अपना जीवन इस तरह काट देते हैं जिनमें एक दूसरे के सांसारिक रूप को थोड़ा जानने के बावजूद वे एक दूसरे की मानसिक दुनिया के भीतर प्रवेश नहीं कर पाते।

ऐसे पता नहीं कितने साहित्यिक घर होंगे जिनमें पति-पत्नी के मन के कमरे बन्द पड़े रहते होंगे। अगर खुलते भी होंगे तो उन कमरों में मीठी छेड़छाड़, हास-परिहास, नोक-झोंक, मान-मनौव्वल की तुलना में बेशुमार दबी चीखें, दीवारों पर खून की बूँदें, नाखूनों के खरोंच और सिर पटकने के निशान ही नहीं, दाम्पत्य जीवन के कंकाल के मिलने की आशंका अधिक होगी। दूसरों की दुनिया को अपनी कृतियों में एक जासूस की तरह उकेरते हुए और स्त्रियों की दशा पर अपनी रचनाओं में भावपूर्ण सुन्दर शब्दों में ज़ार-ज़ार बिलखते हुए वे खुद अपनी पारिवारिक दुनिया से कितना छल करते रहते हैं,यह कई बार कुछ साहित्यकारों के करीब जाने पर बहुत जल्दी पता चल जाता है। अगर मैं सही हूँ तो कान्ता भारती का उपन्यास “रेत पर मछली” को अपवाद मानें तो लेखक की पत्नी पर केन्द्रित मैंने कोई उपन्यास नहीं पढ़ा है। यदि कोई कथाकार लिखे तो एक देखी-जानी दुनिया के अनन्त जटिल रहस्यों से हमें परिचय मिल सकता है। 

मैं मूल विषय से भटक गया हूँ। दरअसल मैं कुँवर नारायण और भारती नारायण के दाम्पत्य की समझ के बारे में बात कर रहा था। वह सही अर्थों में उनकी सहचरी रही हैं। यह विचित्र है कि जब हम किसी की बहुत करीब होते हैं तो उनका कोई चित्र भी याद के लिए नहीं रखते। कुँवर दंपत्ती का कोई चित्र मेरे पास नहीं है लेकिन उस युगल का चित्र-बिम्ब आकाश में चन्द्रमा की तरह मन में टँगा रहता है। भारती जी की हमेशा कोशिश रहती थी कि कुँवर जी के रचना स्रोतों को बचाए रखने में सहयोग कर सकें। वह निर्विघ्न लिख-पढ़ और सोच सके, इसका भी पूरा ख्याल रखतीं थीं। यह भी सच है कि इसमें कुँवर जी की सुदृढ़ आर्थिक स्थिति और अपने व्यापार से अधिक कमाने के प्रति उनके वीतरागी मन का भी कम योगदान नहीं था। 

कुँवर जी स्वयं बहुत अनुशासित थे। अपनी चीज़ों को काफ़ी सहेज कर और सलीके से रखते थे। कोई किताब या सन्दर्भ को खोजने में उनको मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी। भारती जी,कुँवरजी से मिलने वालों की गर्मजोशी, उत्साह और आत्मीयता से जहाँ सत्कार करती थीं, वहीं उनके बीच बैठ कर संवाद में सक्रिय हिस्सेदारी भी करती थी। कुँवर जी उनकी राय को काफ़ी महत्व भी देते थे। वह झील पर उठती हुए लहरों की तरह कुँवर जी की हर छोटी से छोटी अनुभूति को ओझल होने से पहले ही समझ लेती थीं। कुँवर जी जी उनका बेहद आदर भी करते थे।  

इस सिलसिले में मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है जो कुँवर जी ने मुझसे साझा किया था जिसे मैं बताने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। 

एक बार आयोवा विश्वविद्यालय के अन्तराष्ट्रीय राइटिंग प्रोग्राम के प्रतिनिधि कुँवर जी से मिलने लखनऊ स्थित उनके आवास पर आए थे। आयोवा विश्वविद्यालय अमेरिका के छोटे शहर आयोवा में है। यह अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम है जिसे वहाँ के एक प्रोफेसर पॉल एंगिल ने प्रारम्भ किया था। इसमें चयनित लेखकों को वहाँ तक आने-जाने का हवाई जहाज का किराया,रहने खाने-पीने का व्यवस्था और कुछ खर्च आदि के लिए डॉलर दिए जाते हैं। पहले यह कार्यक्रम एक वर्ष का होता था जो शायद बाद में दो महीने का हो गया है। विश्व के नामचीन साहित्यकार वहाँ एकत्र होते हैं। उनमें आपसी संवाद होता है। लेखक अपनी रचनाएँ पढ़ते हैं। अमेरिका की एक शान्त ज़गह में कवि-कथाकार-नाटककार अनौपचारिक रूप से एक दूसरे से मिल-जुल कर परिचित होते हैं। जिन लेखकों को कई बार हम सिर्फ़ किताबों के पिछले पृष्ठ पर छपे उनके चित्रों या उनकी पढ़ी हुई रचनाओं से जानते हैं,उनसे सहभागी की कई बार मैत्री भी हो जाती है। इसके बारे में सबसे पहले हिन्दी कवि श्रीकान्त वर्मा ने अपने एक संस्मरण में विस्तार से लिखा था। इस कार्यक्रम में हिन्दी से श्रीकांत वर्मा, निर्मल वर्मा, प्रयाग शुक्ल, गगन गिल और मंगलेश डबराल जैसे ख्यातिलब्ध कवि भाग ले चुके हैं। मंगलेश डबराल ने यात्रा संस्मरण के रूप में एक छोटी पुस्तक “एक बार आयोवा" भी लिखी है।  

कहना न होगा कि यह प्रोग्राम किसी भी लेखक के लिए लुभावना हो सकता है। इस कार्यक्रम के लिए कुँवर जी का चयन लगभग कर लिया था। कार्यक्रम के प्रतिनिधि इसकी सूचना देने और उनसे कुछ औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए उनसे मिलने लखनऊ स्थित उनके आवास आए थे। बातचीत में हमेशा की तरह भारती जी भी मौजूद थीं। अचानक आयोवा के उस प्रतिनिधि ने कुँवर नारायण से कहा कि मैं आपसे कुछ बात एकान्त में करना चाहता हूँ। कुँवर जी का सहज उत्तर था कि आपको जो भी बात करनी है, कर सकते हैं, यहाँ से कोई बात बाहर नहीं जायेगी। आयोवा प्रतिनिधि ने भारती जी की उपस्थिति की ओर संकेत किया। कुँवर जी ने कहा कि वह मेरे पत्नी हैं। प्रतिनिधि उसी तरह चुप बैठे रहे। समय की नज़ाकत को समझ कर भारती जी स्वयं पहल कर के बैठक से सटे कमरे में चली गयीं। यह बात कुँवर जी को बेहद नागवार लगी। भारती जी के चले जाने के बाद प्रतिनिधि ने फिर कुँवर जी के बायोडाटा को पढ़ते हुए कहा कि आपने अपने परिचय में लिखा है कि आपने जिन कुछ देशों की यात्रा की है, उनमें कुछ कम्युनिस्ट शासित रहे हैं। अपने बायोडाटा से इसे हटा दे और वहाँ इसका ज़िक्र न करें। 

भारती जी के प्रति किये गए उस प्रतिनिधि के व्यवहार से पहले ही भीतर से कुँवर  नारायण जी अत्यन्त क्षुब्ध थे। आयोवा प्रतिनिधि की इस शर्त से वह और भी रुष्ट हो गए। उन्होंने अपने बायोडाटा में किसी प्रकार के परिवर्तन करने से दृढ़ता से इनकार कर दिया। यही नहीं, उन्होंने उस कार्यक्रम में जाने से भी यह कह कर मना कर दिया कि बायोडाटा में परिवर्तन करना एक सच को छिपाना है। ऐसा करना एक नैतिक बेईमानी होगी। यहाँ यह बात रेखांकित करना आवश्यक है कि दो ध्रुवीय विश्व में उन दिनों किसी भी अमेरिकी संस्थान का कम्युनिज्म के प्रति पूर्वाग्रह होना कोई छिपी बात नहीं थी। कुँवर जी राजनीतिक रूप से कभी वामपंथी भी नहीं रहे हैं। वे चाहते तो सहज ही उस प्रस्ताव को स्वीकार कर सकते थे। लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। 

मैं नहीं जानता कि हिन्दी में ऐसे कितने रचनाकार होंगे जो अपनी नैतिकता और अपने जीवन साथी का सम्मान के लिए इतने लाभप्रद प्रस्ताव को ठोकर मार सकते हैं?

मेरी हार्दिक इच्छा थी कि कभी कुँवर जी के हाथों से मेरी किसी किताब का विमोचन हो। यह सुयोग भी बन ही गया। भारतीय भाषा परिषद का एक वृहत आयोजन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय बहावलपुर हाउस के सभागार में हुआ था। इस कार्यक्रम की रूपरेखा में मेरा भी सक्रिय सहयोग था। दिल्ली स्थित अनगिनत साहित्यिक सितारों की उपस्थिति ने इस एक दिवसीय आयोजन को गरिमामय बना दिया था। त्रिलोचन शास्त्री, डॉक्टर कपिला वात्सायन, कृष्णा सोबती, डॉक्टर नामवर सिंह, नेमि चन्द जैन, कुँवर नारायण, मृणाल पाण्डेय, अशोक वाजपेयी, डॉक्टर प्रभाकर श्रोत्रिय, केदार नाथ सिंह, मंगलेश डबराल, पंकज सिंह, विष्णु नागर आदि थे। दर्शक दीर्घा में राजेन्द्र यादव आदि थे। इसी कार्यक्रम में भारतीय भाषा परिषद द्वारा प्रकाशित मेरी कविताओं के अँग्रेज़ी अनुवाद का संचयन “द वर्ल्ड ऑन द हैण्डकार्ट” का विमोचन कुँवर नारायण जी ने किया था। 

अशोक वाजपेयी ने इण्डिया इन्टरनेशनल सेन्टर में कुँवर जी की जन्म हीरक जयन्ती पर एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया था। उन दिनों में कोलकाता में था। इस कार्यक्रम में उनकी आलोचना पर कवि-सम्पादक गिरधर राठी जी ने आलोचना, यतीन्द्र मिश्र ने उनके कला लेखन पर तथा उनकी कविता पर मैंने एक आलेख पढ़ा था। वह आलेख किंचित क्रिटिकल हो गया था। कुछ लोगों मेरे विश्लेषण और व्याख्या से सहमत थे और कुछ असन्तुष्ट थे कि इस मार्मिक अवसर पर मुझे ऐसा नहीं लिखना चाहिए था। डॉ नामवर सिंह और केदार नाथ सिंह ने सराहना की। आयोजन में कुँवर नारायण के प्रेमीजन से हॉल खचाखच भरा था। कृष्णा सोबती, प्रयाग शुक्ल, नरेश सक्सेना, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, अपूर्वानन्द आदि के चेहरे अभी भी स्मृति में तैर रहे हैं। मुझे इस बात पर बिलकुल भी नहीं अचरज हुआ कि कुँवर जी ने मेरे लेख की तिक्तता के बारे में कुछ न कह कर सिर्फ़ मेरी पत्नी और बच्चों का हालचाल इस भीड़ भरी सभा में भी पूछा। दरअसल उनकी उपस्थिति अपने आसपास को सकारात्मकता की वायु से आलोड़ित कर देती थी। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि किसी रचना की आलोचना भी बिना उग्र और तिक्त हुए भी की जा सकती है। उन्होंने स्वयं हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास की आलोचना इसी तर्ज़ पर की थी। अपनी शान्त निश्छलता में इतना भव्य, गरिमापूर्ण लेखक हिन्दी में मैंने नहीं देखा। उनके व्यक्तित्व की अपनी धज ही अलग थी। 

कुँवर जी को अन्तिम दिनों में काफ़ी शारीरिक कष्ट भी रहा। नेत्र की ज्योति क्षीण हो गयी थी। अस्पताल में काफ़ी दिन अचेतन अवस्था में रहे। वह इस पार्थिव संसार में अब नहीं हैं लेकिन मुझे यकीन है कि भारती जी उनके इतनी निकट रही है कि वह हमेशा समझती होंगी कि वह कहीं नहीं गए हैं,अपनी स्टडी में बैठकर कुछ लिख-पढ़ रहे होंगे।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मां की मृत्यु पर कविताएं

गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'भारतेंदु युग की स्त्री कविता'

लकी राजीव की कहानी 'पारोमिता'