गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'भारतेंदु युग की स्त्री कविता'
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| गरिमा श्रीवास्तव |
सामान्य तौर से देखने पर यह लगता है कि इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ कर इतिहास में स्त्रियाँ प्रायः नदारद हैं। यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर ऐसा क्यों है? साहित्य में भी इस प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। गरिमा श्रीवास्तव ने अपने महत्त्वपूर्ण शोध लेख के जरिए वास्तविकता की पड़ताल की है। इसके लिए उन्होंने भारतेन्दु युग की स्त्री कविता की तहकीकात की है। ज्ञातव्य है कि भारतेन्दु युग से ही आधुनिक हिन्दी साहित्य की शुरुआत मानी जाती है। अपनी पड़ताल करते हुए उन्होंने पाया है कि आमतौर पर जो दिखाया बताया जाता है सच वही नहीं है। सच का पहलू कुछ और ही है। मुंशी देवी प्रसाद द्वारा सम्पादित ‘महिला मृदुवाणी’ का प्रकाशन 1904 में हुआ। इसमें उस समय की 35 कवयित्रियों की रचनाएँ इसमें संकलित हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं : कविरानी चौबे लोकनाथ जी स्त्री अर्धांगिनी जी, ठाकुरानी काकरेची जी, कुशला, खगनिया, गिरिधर कविराय की स्त्री, चंद्रकला बाई, चाम्पादे रानी, छत्रकुंवरी बाई, जामसुता जाडेची जी, श्री प्रताप बाई, झीमा, पंडितानी तीजांजी, ताज, तुलछराय, पद्मा, बीरा, प्रतापकुंवरी बाई, मीरा बाई, बाघेली श्री रणछोड़ कुंवरी जी, महारानी जी श्री रत्न् कुंवरी बाई जी, रसिक बिहारी, रामप्रिया जी, रायप्रवीन या प्रवीनराय, बाघेली विष्णुप्रसाद कुंवर जी, बिरजू बाई, विरंजी कुंवर, बिहारी सतसई के कर्ता की स्त्री, बिहारी दास की पुत्री, ब्रजदासी, शेख रंगरेजन, श्री सरस्वती देवी, सहजो बाई, सुन्दर कुंवरी बाई, हरीजी रानी चावड़ी जी। गरिमा श्रीवास्तव अपने आलेख में लिखती हैं 'क्या कारण है कि बरसों तक मीरां, सहजो बाई और ताज सरीखी दो-चार के अलावा इतिहास की किताबों में स्त्रियों का ज़िक्र नहीं किया गया? जिन स्त्रियों ने लिखा भी वे अक्सर दूसरों के नाम से या छद्म नामों से छपीं। क्या हम इसके मनो- सामाजिक कारणों को बतौर पाठक और आलोचक देख पाने में सक्षम होते हैं, जबकि हर युग की आवश्यकतानुसार इतिहास भी पुनर्व्याख्या की मांग करता है। ऐसे में नवजागरण ही नहीं प्रत्येक दौर की स्त्री रचनाशीलता की पुनर्व्याख्या होनी चाहिए।' स्त्रियों के लिए यह सफर आसान नहीं था। जो पितृसत्तात्मक समाज स्त्रियों को घर की चारदीवारी में बांधे रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा था, वह स्त्रियों के लेखन को आसानी से स्वीकार कैसे कर सकता था। शुरुआती दौर में स्त्रियों को लिखने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। अपने आलेख में गरिमा आगे लिखती हैं 'स्त्रियों के लिखे हुए को इतिहास से, अपने मूल्यांकन के लिए किन-किन स्तरों पर जूझना -टकराना पड़ता है, कैसे वे लिख कर प्रतिरोध की संस्कृति का निर्माण करती हैं, इससे ही ‘प्रसंग’ पैदा होता है। आज के युग का इतिहास जो एजेंडा देता है, रचनाकार उससे टकरा कर ही ‘प्रसंग’ का निर्माण कर सकता है। इतिहास ही नहीं इतिहास लेखन की पूरी परंपरा से टकराती, उपेक्षित ये स्त्रियाँ क्या अपने लिखे हुए के पुनर्विश्लेषण की मांग नहीं करती हैं?' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'भारतेंदु युग की स्त्री कविता'।
'भारतेंदु युग की स्त्री कविता'
गरिमा श्रीवास्तव
जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा था : “एक सावधानी बरतते हुए हम यह मान सकते हैं कि जो ज्ञान पुरुष स्त्रियों से उनके बारे में हासिल करते हैं, भले ही वह उनकी संचित संभावनाओं के बारे में न हो कर, सिर्फ़ उनके भूत और वर्तमान के बारे में ही क्यों न हो, तब तक अधूरा और उथला रहेगा, जब तक कि स्त्रियाँ स्वयं वह सब कुछ नहीं बता देतीं, जो उनके पास बताने के लिए है।”
भारतेंदु हरिश्चंद्र उस उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध का साहित्यिक प्रतिनिधित्व कर रहे थे जिसका राजनीतिक परिदृश्य जटिल और परस्पर विरोधी तत्त्वों से मिल कर बना था। समकालीन रचनाकारों की वैचारिकता के निर्माण में भाषिक, साम्प्रदायिक विमर्श और पितृसत्ता की भूमिका थी। वे सुधारोन्मुख दीखने के साथ-साथ औपनिवेशिक प्रभु वर्ग के हित-विरोधी भी नहीं दिखना चाहते थे। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जिस गद्य-पद्य का निर्माण हो रहा था उस दौर की राजनीति में स्त्री-प्रश्न उभार पर था, इस दौर में राजनीति और जेण्डर दोनों परस्पर असम्बद्ध नहीं, बल्कि कई स्तरों पर सम्बद्ध दीखते हैं। पश्चिमी रहन-सहन के साथ औपनिवेशिक जीवन-शैली के संघर्ष और स्त्री-प्रश्न पर वैचारिक अंतराल ने रचनाकारों को टकराने-जूझने तथा इसे अपना राजनीतिक एजेण्डा बनाने का अवसर दिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘बालाबोधिनी’ पत्रिका (1874-1877) का संपादन किया जिसमें स्त्रियों से संबंधित लेखों को प्रकाशित किया गया। भारतेंदु के प्रयासों से उनके काल में सार्वजनिक मंचों पर स्त्री-संबंधी विमर्श शुरू हो गए थे। दरअसल यह वह समय था जब समूचे भारतीय परिदृश्य पर हमें स्त्री प्रश्नों का उभार देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए कन्नड़ के प्रथम उपन्यास ‘इंदिरा बाई' (1899) की चिंता के केंद्र में बाल-विवाह जैसी अहितकर सामाजिक प्रथाएँ हैं। गुलवाडी वेंकटराव उपन्यास में पाठकों को चरित्र-सुधार संबंधी उपदेश देते हुए लिखते हैं—“पाठक इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य पूछ सकते हैं। सच्चाई और हृदय की पवित्रता ही इहलोक और परलोक में सार्थकता दे सकती है। यह पुस्तक इसी बात को प्रमाणित करने के लिए लिखी गयी है।” इस दौर में पुरुषों द्वारा जिस साहित्य का निर्माण हो रहा था वह उनके इस एजेंडे की पूर्ति में सहायक बना। इस दौर में हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं के लेखक अपने-अपने समुदाय के भीतर स्त्रियों की दशा में सुधार की चिंता करते दिखने लगे। दूसरी तरफ़ स्त्रियों द्वारा लिखे साहित्य को किसी सीमा तक उपेक्षित किया गया। जैसा कि जर्मेन ग्रीयर कहती हैं “एकदम शुरू से ही स्त्री को हमारा देखना, चेतन और अचेतन रूप से ऐसी पूर्वधारणाओं के कारण एकांगी होता है, जिन्हें गढ़ने से हम बच नहीं पाते और यह जान नहीं पाते कि वे कब गढ़ी गईं।”
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| गुलवाडी वेंकटराव का कन्नड़ उपन्यास इंदिरा बाई |
लेकिन हाल के शोध से यह बात सामने आई कि भारतेंदु के पहले और उनकी समकालीन कई स्त्रियाँ थीं जो कविताएँ रच रही थीं, जिन्हें हर संभव उपेक्षित किया गया। प्रस्तुत आलेख निम्नलिखित बिन्दुओं पर विमर्श की प्रस्तावना करता है –
1. भारतेंदु हरिश्चंद्र के साथ साथ कौन-सी स्त्रियाँ काव्यलेखन कर रही थीं?
2. इन स्त्रियों की रचनात्मक अंतर्वस्तु का वैशिष्ट्य क्या था?
3. वैश्विक स्तर पर इन स्त्री रचनाकारों के आपसी समानता और असमानता के बिंदु क्या थे?
4. नवजागरण और पुनर्जागरण की स्त्री रचनाकारों की साहित्यिक स्वीकृति और उपेक्षा के कारण क्या थे?
5. अइस दौर की स्त्रियों की रचनात्मकता के विभिन्न आयाम क्या थे?
भारतेंदु युग की स्त्री-कविता के तयशुदा पैटर्न हमें अब तक उपलब्ध कविताओं में दिखाई पड़ते हैं-
1. लोक सम्पृक्ति
2. आध्यात्मिकता
3. भक्ति और प्रेम
4. गृहस्थी और वैराग्य
5. राष्ट्रप्रेम
6. आत्मालोचन
7. फुटकल-समस्यापूर्ति, प्रकृति चित्रण आदि
8. शिक्षा और उपदेशात्मकता
इस दौर में, स्त्रियों की रचनाओं को एक जगह रखकर उनके साहित्यिक परिचय सहित पाठक को उससे परिचित कराने के पहले प्रयास के तौर पर मुंशी देवी प्रसाद द्वारा सम्पादित ‘महिला मृदुवाणी’ को देखा जाना चाहिए। यह संग्रह 1904 ई. में छपा, जिसकी भूमिका में मुंशी देवी प्रसाद ने रेखांकित किया - “..अकेले पुरुष ही चौदह विद्यानिधान नहीं हुए हैं, वरन स्त्रियाँ भी समय-समय पर ऐसी होती रही हैं जो सोने-चांदी और रत्नजड़ित आभूषणों के अतिरिक्त विद्या-बुद्धि और काव्य-कला के दिव्यभूषणों से भी भूषित थीं और अब भी हैं जिन के बखान अनेक पुस्तकों और जनश्रुतियों में विद्यमान हैं ...प्राचीन ग्रंथों और कवि-वृत्तान्तों की खोज की थी तो उस प्रसंग में कुछ कविता ऐसी भी मिली जो काव्य कुशला कमलाओं के कोमल मुखारविंदों की निकली हुई थीं। हमने उसी को संग्रह कर के यह छोटा-सा ग्रन्थ बनाया है और महिला मृदुवाणी नाम रखा है।” यह भूमिका 23 मई 1904 को जोधपुर, राजस्थान में लिखी गयी। इस संग्रह में निम्नलिखित कवयित्रियों के जीवन परिचय समेत उनकी कुछ रचनाओं को उद्धृत किया गया। कविरानी चौबे लोकनाथ जी स्त्री अर्धांगिनी जी, ठाकुरानी काकरेची जी, कुशला, खगनिया, गिरिधर कविराय की स्त्री, चंद्रकला बाई, चाम्पादे रानी, छत्रकुंवरी बाई, जामसुता जाडेची जी, श्री प्रताप बाई, झीमा, पंडितानी तीजांजी, ताज, तुलछराय, पद्मा, बीरा, प्रतापकुंवरी बाई, मीरा बाई, बाघेली श्री रणछोड़ कुंवरी जी, महारानी जी श्री रत्न् कुंवरी बाई जी, रसिक बिहारी, रामप्रिया जी, रायप्रवीन या प्रवीनराय, बाघेली विष्णुप्रसाद कुंवर जी, बिरजू बाई, विरंजी कुंवर, बिहारी सतसई के कर्ता की स्त्री, बिहारी दास की पुत्री, ब्रजदासी, शेख रंगरेजन, श्री सरस्वती देवी, सहजो बाई, सुन्दर कुंवरी बाई, हरीजी रानी चावड़ी जी जैसी 35 कवयित्रियों की रचनाएँ इसमें संकलित हैं। स्त्री साहित्येतिहास की दृष्टि से यह पहला उल्लेखनीय कार्य है। देखने की बात यह है कि रामचंद्र शुक्ल ने इसके पच्चीस वर्ष बाद हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा लेकिन उसमें मीराबाई के अलावा किसी कवयित्री को उल्लेखनीय नहीं समझा। इसके बाद सन 1931 में ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल' ने स्त्री कवि कौमुदी में संकलित करने का उल्लेखनीय प्रयास किया, जिसमें मीरा बाई, ताज, खगनिया, शेख, छत्रकुंवरी बाई, प्रवीणराय, दयाबाई, कविरानी, रसिक बिहारी, ब्रजदासी साईं, प्रतापकुंवरी बाई, सहजो बाई, झीमा, सुंदर कुंवरी बाई, चम्पादे, विरन्जी कुंवरी, रत्नकुंवरि बीबी, प्रताप बाला, बाघेली विष्णु प्रसाद कुंवरि , रतन कुंवरि बाई, चन्द्रकला बाई, जुगलप्रिया, रामप्रिया, रणछोड़ कुंवरि, गिरिराज कुंवरि सरीखी मध्यकालीन रचनाकारों से ले कर उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दौर तक की हेमंतकुमारी चौधरानी, रघुवंश कुमारी, राजरानी देवी, सरस्वती देवी, बुन्देला बाला, गोपाल देवी, रमा देवी, राज देवी, रामेश्वरी नेहरु, कीरति कुमारी, तोरन देवी शुक्ल ‘लली’, प्रियंवदा देवी और उसके बाद के दौर में भी रचनारत सुभद्राकुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, कुसुम माला सम्मिलित हैं। स्त्री कवि कौमुदी के संपादक ज्योति प्रसाद मिश्र का हवाला देते हुए इसकी ताज़ा पुनर्प्रस्तुति की भूमिका में कहा गया -“ग्रन्थ में लिखित दोनों भूमिकाएं (ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ तथा रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ कृत) इस तथ्य से सहमत हैं कि हिंदी साहित्य में इतिहास लेखन सदैव लैंगिक पूर्वग्रहों का शिकार रहा है। इसलिए स्त्रियों का लेखन सामने नहीं आया। यदि आया भी तो, उसका समुचित उल्लेख साहित्यिक इतिहासों में प्रायः नहीं मिलता।” इन स्त्री रचनाकारों के अलावा भी कमला चौधरी, गोपाल देवी, तारा पांडे, पुरुषार्थवती देवी, प्रियंवदा देवी, बुंदेला बाला (गुजराती बाई) महादेवी वर्मा, रघुवंश कुमारी, रमा देवी, राजकुमारी श्रीवास्तव, राज देवी, राजराजेश्वरी देवी त्रिवेदी, रामकुमारी देवी चौहान, रामप्रिया, रामेश्वरी देवी गोयल, रामेश्वरी देवी मिश्र ‘चकोरी ‘रामेश्वरी नेहरु, विद्यावती कोकिल से ले कर सुभद्रा कुमारी चौहान, हेमंत कुमारी चौधरानी और होमवती देवी तक नवजागरण के दौर की कवयित्रियों की लम्बी फेहरिस्त है।
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| चित्र में बायें से खड़ी-किशोरी देवी, राम कुमारी, विद्यावती "कोकिल" और राम कुमारी की बहन बैठी बायें से-रामेश्वरी देवी "चकोरी", विष्णु कुमारी मंजु, सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, तोरण देवी "लली" |
अक्सर यह शिकायत इतिहास लेखकों को रहती है कि इनमें से कई स्त्रियाँ ऐसी हैं जिन्होंने या तो छद्म नामों से लिखा या फिर इनके लिए किसी और ने लिखा और प्रसिद्धि इन्हें मिली। यह भी कि यदि कोई स्त्री उत्कृष्ट रचना करने में सक्षम हो भी गई तो उसके मूल्यांकन का मापदंड पुरुष ही रहे। इस बात को मैं शेख रंगरेजन के प्रसंग में स्पष्ट करना चाहूंगी। शेख रंगरेजन संवत 1712 में जन्मे आलम नामक ब्राह्मण कवि की पत्नी थी। आलम ने धर्म परिवर्तन करके उससे विवाह किया था क्योंकि वे शेख की रचनात्मकता के कायल थे। उन दोनों का सम्मिलित काव्य संग्रह ‘आलम केलि’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ, जिसमें कवित्त और सवैया छंद में 400 पद संकलित हैं। लाला भगवानदीन ने शेख रंगरेजन की कविताई की प्रशंसा करते हुए कहा है- “शेख यदि आलम से बढ़ कर नहीं हैं तो कम भी नहीं। प्रेम की जिस धारा का प्रवाह आलम में है वही शेख में। दोनों की रचनाएँ ऐसी मिलती-जुलती हैं कि उनका एक दूसरे से पृथक करना कठिन हो जाता है। नायिका भेद और कलापूर्ण काव्य की दृष्टि से शेख को पुरुष कवियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उसकी शुद्ध भाषा, सरल पद्धति और सुव्यवस्थित भाव -व्यंजना है। शेख के पहले और बाद में भी बहुत दिनों तक शेख जैसी ब्रजभाषा किसी भी कवयित्री ने नहीं कही।” अब यह भी देख लीजिये कि ‘स्त्री-कवि कौमुदी’ की भूमिका लिखने वाले श्री राम शंकर शुक्ल ‘रसाल’ का उसी शेख रंगरेजन की रचनात्मकता के बारे में क्या कहना है, वे लिखते हैं: “हो सकता है कदाचित शेख के स्नेहासव पान से मदोन्मत्त भावुक प्रेमी ने ही प्रेम-प्रवाद में आ कर शेख के नाम से रचना की हो, जो शेख के नाम से प्रसिद्ध हो गयी हो।” स्पष्ट है कि स्त्री के लिखे के प्रति पुरुष आलोचकों और इतिहास-लेखकों की दृष्टि पूर्वाग्रह मुक्त कभी नहीं रही। वे यह समझ ही नहीं पाए कि रचनात्मक अभिव्यक्तियों के पीछे मनोसामाजिकी की प्रमुख भूमिका होती है। ऐसे किसी भी समाज में जहां आत्म को व्यक्ति से संवाद की छूट नहीं होती, पर्दा और चारदीवारी के भीतर जो भी, जैसे भी उपलब्ध हो सका- चाहे वह राससुंदरी देवी की तरह चैतन्य चरित के चुरा कर फाड़े गए पन्ने हों या चूल्हे की राख में छिपा कर रखी गयी खड़िया हो, उसी को पढ़ -गुन कर साहित्य लेखन में प्रवृत्त हुईं, जिन्हें व्यवस्थित औपचारिक शिक्षा कभी नसीब ही नहीं हुई, जिन्होंने सदियों से श्रोता और अधीनस्थ की ही भूमिका निभाई। भाषिक संस्कारों के नाम पर, शासक वर्ग के पितृसत्ताक मुहावरे और अभिव्यक्तियाँ मिलीं, या कामगार जन की भाषा जिनसे उनका रोजमर्रा का संपर्क रहा करता। ऐसे में, उनकी भाषा और मुहावरे पितृसत्तात्मक हों यही स्वाभाविक था, फिर जिन विषयों का चयन उन्होंने लिखने के लिए किया, वे पितृसत्तात्मक प्रभावों से मुक्त कैसे हो सकते थे! नवजागरण के दौर की जिन रचनाकारों ने काव्य रचनाएँ कीं, उनके योगदान को आलोचकों द्वारा कभी खुले मन से स्वीकारा भी नहीं गया। रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ जिन्होंने कवयित्रियों के संग्रह की भूमिका लिखी, वे साहित्येतिहास में स्त्री रचनात्मकता की अवहेलना की बात स्वीकार करते हुए भी, उन्हें दोयम दर्जे की रचनाकार मानते हैं, लिखते हैं: “बोध-वृत्ति साधारणतया स्त्रियों में उतने अच्छे रूप में नहीं मिलती जितनी वह पुरुषों में मिलती है। ...इसलिए स्त्रियाँ भक्ति रचनाओं में ज्यादा रमती हैं अन्य विषयों की तरफ उतना आकर्षित नहीं होतीं।”...गार्हस्थ्य सम्बन्धी विषयों में दक्षता प्राप्त करना स्त्रियों का एक परमोच्च कर्तव्य है।” स्त्रियों को मर्यादा सम्बन्धी दिशा-निर्देश देने से आलोचक नहीं चूके, आज भी नहीं चूकते ऐसे में स्त्रियों की बोध-वृत्ति सीमित नहीं होगी तो क्या होगा? सहज-स्वाभाविक मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति की छूट उन्हें थी नहीं, शिक्षा और बाहरी समाज से संपर्क के अवसर या तो रुद्ध थे या थे तो बहुत कम। सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक और निजी, ये चार तरह की सेंसरशिप उन पर हावी थी। ऐसे में वे या तो पुरुषों के पैटर्न पर समस्या-पूर्ति कर रही थीं, जिनमें बूंदी की चंद्रकला बाई, तोरन देवी सुकुल, रमा देवी, बुंदेला बाला की रचनाओं को देखा जा सकता है या श्रृंगार और नीतिपरक कविताओं की तर्ज़ पर लिखने वाली साईं, छत्रकुंवरी बाई जो कृष्ण प्रेम की अभिव्यक्ति कर रही थीं। लेकिन ये किसी भी विषय पर लिखें, उनका लिखना अपने आप में ही, चली आ रही सामाजिक व्यवस्था में एक प्रकार का हस्तक्षेप है. गृहस्थी और दैनंदिन जीवन-चर्या में आकंठ डूब कर भी आत्माभिव्यक्ति के लिए व्याकुल सरस्वती देवी लिखती हैं –
‘जब लग मैं मैके रही लिखत पढ़त रहि नित
अब घर पर परबस परी रहि नहिं सकति सुचित।।
गृहकारज व्यवहार बहु परे संभारन मोहिं
लिखत पढ़न इक संग ही यह सब कैसे होहि।।
समाचार के पत्र जे आवत हैं मम पास
तिनके देखन के लिए मिलत न मोहिं सुपास।।
स्त्रियाँ किस तरह चुपचाप तत्कालीन राजनीतिक परिवर्तनों को सुन-गुन रही थीं, इसके प्रमाण स्वरुप रानी गुणवती को देखा जा सकता है। ये वही रानी गुणवती थीं, जिनकी लिखी तीन पुस्तकों की चर्चा श्री राम नरेश त्रिपाठी ने ‘राजमाता दियरा जीवन चरित्र’ में की थी। सूपशास्त्र, वनिता बुद्धि विलास और भगिनी मिलन की रचना करने वाली गुणवती ने 11 जून 1922 को कस्तूरबा गाँधी को लिखे एक पत्र में यह छंद लिखा:
“सिन्धु तीर एक टिटहरी,
तेहिको पहुंची पीर सो प्रन ठानी अगम अति,
विचलत न मन धीर,
तेहि प्रन राखन के लिए अड़ गए मुनि बीर,
परम पिता को सुमिरि कै सोखेऊ जलधि गंभीर।"
इस छंद से रानी गुणवती के काव्य कौशल के साथ-साथ उनकी राजनैतिक सोच और पकड़ परिलक्षित होती है। इस तरह प्रतिरोध के स्वर हमें पूरे नवजागरण और भारतेंदु युग के दौरान और बाद में भी सुनाई देते हैं, लेकिन उनको सुनने और देखने में नज़रिए का भेद होने से कवयित्रियाँ, पुरुष रचनाकारों जैसी मेधावी नहीं जान पड़तीं। जिस तरह की अमूर्त भाषा का प्रयोग ये स्त्रियाँ करती हैं, उसका विश्लेषण विशिष्ट संवेदना की मांग करता है। इसे महादेवी की कविता के माध्यम से भली-भांति समझा जा सकता है –
‘शलभ मैं शापमय वर हूँ!
किसी का दीप निष्ठुर हूँ!
ताज है जलती शिखा
चिनगारियाँ श्रृंगारमाला;
ज्वाल अक्षय कोष सी
अंगार मेरी रंगशाला;
नाश में जीवित किसी की साध सुन्दर हूँ!’
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| महादेवी वर्मा |
नंद दुलारे वाजपेयी ने इसकी व्याख्या कवयित्री के आध्यात्मिक उत्थान के लिए व्याकुल आत्मा के सन्दर्भ में की है, जबकि इसे निजी अनुभूतियों की अमूर्त अभिव्यक्ति के तौर पर समझा जाना ज़रूरी है। ऐसा समय और समाज जहां स्त्री को नितांत निजी कोना उपलब्ध नहीं, वहां उसकी चुप्पी के भी मायने हैं और मितकथन के भी। स्त्रियों के लिखे हुए ये ‘टेक्स्ट’ हमें चेतावनी देते हैं कि मौन और मितकथन का अर्थ रिक्ति नहीं है, जो अपनी बात को कहने के लिए प्रकृति और आत्मा-परमात्मा के रूपक का सहारा ले रही है वह इसलिए नहीं कि ईश भक्ति में मुब्तिला उसका मन सांसारिक रह ही नहीं गया है या उसके पास कहने को और कुछ नहीं है, बल्कि इसकी ज्यादा सम्भावना है कि उसके पास कहने को इतना ज्यादा है कि योग्य श्रोता (लैंगिक विभेद से मुक्त मस्तिष्क वाला श्रोता) मिलना मुश्किल है। ये हमारे ज्ञान और संवेदना की सीमा है जो हमें उसकी चुप्पी के पीछे छिपे अर्थ- सन्दर्भों को खोलने नहीं देती। कुछेक चुने हुए विषयों पर ही लिखना, लौकिक प्रेम की प्रच्छन्न अभिव्यक्ति के लिए भक्ति, अध्यात्म और राष्ट्रप्रेम का सहारा लेना, ऐसे ही सीमाबद्ध आलोचकों को ध्यान में रख कर की गयी ‘सेल्फ सेंसरशिप’ है। अमृत राय ने महादेवी पर टिप्पणी करते हुए लिखा है : “महादेवी के काव्य को मूलत: आत्मकेन्द्रिक, आत्मलीन कहना ठीक है; अपनी ही पीड़ा के वृत्त में उसकी परिसमाप्ति है। संसार की पीड़ा का स्वत: उसके लिए अधिक मूल्य नहीं है, मूल्य यदि है तो कवि की पीड़ा के रंग को गहराई देने वाले उपादान के रूप में।”
स्त्री मात्र को ही भावना और अश्रु से जोड़ कर उसे कम बौद्धिक या अबौद्धिक मानने में परंपरा से सुविधा रही है। महादेवी समेत अधिकांश कवयित्रियों को भावना और संवेदना की कवयित्रियाँ कहा गया है। स्त्रियाँ भी बड़ी ही विनम्रता से स्वयं को निचले दर्जे का रचनाकार स्वीकारती रही हैं। इसे अपने लेखकीय अस्तित्व को बचाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए। मुक्तिबोध ने सुभद्राकुमारी चौहान के सन्दर्भ में उनकी बौद्धिकता को रेखांकित करते हुए लिखा है: “सुभद्रा जी की भावुकता कोरी भावुकता नहीं है, वाह्य जीवन पर संवेदनात्मक मानसिक प्रतिक्रियाएं हैं। यही कारण है कि उनकी कविताओं में भाव मानव -सम्बन्ध से, मानव- सम्बन्ध विशेष परिस्थिति से, विशेष परिस्थिति सामाजिक-राष्ट्रीय परिस्थिति से, एक अटूट सम्बन्ध-श्रृंखला में बंधी हुई है। भाव के सारे सन्दर्भों का निर्वाह उनके काव्य में हो जाता है। इससे उनकी वास्तविक भाव -सम्पन्नता का, संवेदनशीलता का, चित्र हमारे सामने खिंच जाता है।”
स्त्रियों के लिखे हुए को भावुकता का उच्छलन कह कर उन्हें द्वितीय श्रेणी की रचनाकार ही माना गया। सुभद्राकुमारी चौहान और महादेवी वर्मा की अनेक कवितायेँ, भावुक कविताओं की पुनर्व्याख्या करने के लिए हमें विवश करती हैं. कई स्थानों पर भावुकता का इस्तेमाल वे एक स्ट्रेटज़ी के रूप में करती हैं, मसलन सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता को लें :
बहुत दिनों तक हुई प्रतीक्षा
अब रूखा व्यवहार न हो
अजी, बोल तो लिया करो तुम
चाहे मुझ पर प्यार न हो
जरा-जरा सी बातों पर
मत रूठो मेरे अभिमानी
लो, प्रसन्न हो जाओ, गलती
मैंने अपनी ही मानी।
मैं भूलों की भरी पिटारी
और दया के तुम आगार,
सदा दिखाई दो तुम हँसते
चाहे मुझसे करो न प्यार।
ध्यान देने की बात है कि परिवार के अनुशासन से राष्ट्र सेवा के नाम पर मुक्ति - भले वह कुछ ही समय के लिए हो, इन कवयित्रियों के लिए कितना महत्त्व रखती है! कलम पकड़ना उसने सीख लिया है, कवयित्री के रूप में वह स्थापित भी हो रही है लेकिन जहां गृहस्थी और पति की बात आती है, वह किसी से मुठभेड़ करने के पक्ष में नहीं है। झुक कर, विनम्रता से स्वयं को भूलों भरी पिटारी बताते हुए समझौते के पक्ष में है, ज्यों वह किसी रूठे बच्चे को मना रही हो। भावुकता और विनम्रता यहाँ पर प्रतिरोध के औज़ार के रूप में समझे जाने चाहिए। जिस स्त्री के भावुक पद्य को पढ़ कर हम बारम्बार द्रवित हो उठते हैं, उसका मौन और अश्रु हमें रुला-रुला जाते हैं। दरअसल यह पितृसत्ता और तयशुदा व्यवस्था के भीतर अपनी निज की पाई हुई स्वाधीनता की रक्षा करने की बौद्धिक रणनीति है। यदि हम इस भावुक साहित्य की तरफ गौर फरमाएं तो इन कवयित्रियों का रुदन, करुणा ये सब हमें भावुक पाठक बनाती है और हमारा ध्यान हमारे बहते हुए अश्रुओं पर चला जाता है; और यहीं पर रचनाकार सफल हो जाती हैं। सवाल यह है कि क्या इस भावुक कविता को हम एक साहित्यिक उपविधा के रूप में देख सकते हैं, जो प्रत्येक युग के साहित्य में अनिवार्यतः विद्यमान है, जिसे भारतेंदु की कविता में भी सुना जा सकता है :
कहाँ करूणानिधि केशव सोये,
जागत नेक न जदपि बहुबिधि भारतवासी रोए।
जिसमें निजी मुक्ति की कामना का उद्दात्तीकरण कर के उसे राष्ट्रमुक्ति से जोड़ दिया गया, इसी तरह महादेवी, जहां वे कहती हैं : कीर का प्रिय आज पिंजर खोल दो जिनकी निजी मुक्ति की आकांक्षा राष्ट्र मुक्ति और उससे भी आगे स्त्री मात्र की मुक्ति से जुड़ जाती है। भावुकता के इस उद्दात्तीकरण को क्या हम बतौर साहित्यिक मूल्य देख सकते हैं?।अब तक के सौन्दर्यशास्त्रीय चिंतन के जो प्रतिमान रहे हैं, उनमें स्त्री को तुच्छ मानवी के रूप में चित्रित किया गया या उसमें देवत्व के सभी काल्पनिक गुणों की प्रतिष्ठा कर दी गयी है। सामाजिक धरातल पर उसे तुच्छ समझने का भाव ही प्रमुख है, जिसमें यह निहित है कि स्त्री का लिखना हाशिये का लेखन है, उसके लिखे का अर्थ ही है कि उसमें घरेलू अर्थ-छवियाँ और दैनंदिन के खटराग के वर्णन प्रमुख होंगे, जिसे मुख्यधारा के स्तर तक पहुँचने के लिए अभी लम्बी कवायद की ज़रूरत होगी।उसकी कविता में गलदश्रु भावुकता होगी, यदि वह श्रेष्ठ रचना लिख भी ले तो उसके पुरुष प्रेरणा स्रोत ढूंढे जायेंगे। शायद इसीलिए उसपर हमेशा आदर्श भारतीय नारी बनने का दबाव तारी रहता है, सुभद्राकुमारी चौहान लिखती हैं –
पूजा और पुजापा प्रभुवर,
इसी पुजारिन को समझो;
दान -दक्षिणा और निछावर,
इसी भिखारिन को समझो।
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| सुभद्रा कुमारी चौहान |
अकादमिक दृष्टि से भावुकता को देखना बहुत दूर तक सही नहीं हो सकता, इसके बावजूद नवजागरण की स्त्री कविता और आज की स्त्री- कविता को अंतर्ग्रथित करने का काम यह भावुकता ही करती है। सुजान क्लार्क ने 'सेंटीमेंटल मॉडर्निज़्म' शीर्षक पुस्तक में भावुकता और आधुनिकता का पारस्परिक सम्बन्ध विश्लेषित करते हुए लिखा है: “स्त्रीवाद को एक उत्तर आधुनिक पहचान की आवश्यकता है।” रचनाकार भावुकता को एक रणनीति के तौर पर लेती हैं, इसलिए उन्नीसवीं शताब्दी की भावुक रचनाकारों और बीसवीं-इक्कीसवीं सदी की आधुनिक स्त्रियों में आपस में एक गहरा संबंध है। ये दोनों ही लिख कर अपने-आप को विविध विषयों के माध्यम से अभिव्यक्त करती हैं, लिंग और जेंडर के परे अपने-आप को स्वतंत्र एजेंसी के रूप में पहचनवाने की कोशिश करती हैं। उन्नीसवीं सदी और इस सदी की रचनाकारों को ‘नैतिक ऊर्जा'’ के सन्दर्भ में समान धरातल पर विश्लेषित किया जा सकता है। इस नैतिक ऊर्जा के कारण ही पाठक को सीधे-सीधे संबोधित करने का साहस आता है, जो भक्ति काल से ले कर नवजागरण की कविताओं में दीखता है। सच है कि दृष्टिकोण को बदल कर इतिहास की बहुत सारी दरारें भरी जा सकती हैं।
यह तय है कि शोध और आलोचना की भी अपनी सीमायें होती हैं और यह बात रामविलास शर्मा जैसे आलोचकों पर भी लागू होती है जिन्होंने पूरे साहित्येतिहास में एक भी स्त्री रचनाकार को उल्लेखनीय नहीं माना, जबकि भक्ति और रीति काल में हमें स्त्रियों की पूरी परंपरा मिलती है जो रचनारत थीं। लेकिन क्या कारण है कि बरसों तक मीरां, सहजो बाई और ताज सरीखी दो-चार के अलावा इतिहास की किताबों में स्त्रियों का ज़िक्र नहीं किया गया?जिन स्त्रियों ने लिखा भी वे अक्सर दूसरों के नाम से या छद्म नामों से छपीं। क्या हम इसके मनोसामाजिक कारणों को बतौर पाठक और आलोचक देख पाने में सक्षम होते हैं, जबकि हर युग की आवश्यकतानुसार इतिहास भी पुनर्व्याख्या की मांग करता है। ऐसे में नवजागरण ही नहीं प्रत्येक दौर की स्त्री रचनाशीलता की पुनर्व्याख्या होनी चाहिए। समाज और सत्ता से स्त्री के बदलते सम्बन्ध, उसके लेखन के भीतर छिपी हुई दुविधाएं, जो दरअसल उसकी ईमानदारी का परिचय देती हैं, सर्वोच्च सत्ता को लौकिक रूप में पहचानने की कोशिश, अपने नाम की जगह ‘अबला पतिप्राणा’ जैसे पदों का प्रयोग, वर्तमान सन्दर्भों में विवेचन करके ही स्त्री साहित्येतिहास की मुकम्मल समझ विकसित की जा सकती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल के सन्दर्भ में कहा था कि इसमें मौलिकता का अभाव है। नवजागरण के दौर में कई आंदोलनों के सामने आने से मौलिकता एक आलोचनात्मक पद के रूप में विकसित हुई। इतिहास को देखने और इतिहास में शामिल होने योग्य विषयों की सारवस्तु बदली। हमने मौलिकता की सामाजिक भूमिका को देखना शुरू किया, साथ ही समाज को एक आलोचनात्मक दलील (क्रिटिकल आर्गुमेंट) के रूप में देखने की कोशिश भी। भक्तिकाल की तरह इस दौर के रचनाकारों में भी लोकचिंता अपनी पूरी अकादमिक ईमानदारी के साथ दिखाई पड़ती है। इस लोक-चिंता के स्वरुप को दलील के रूप में देखे जाने की ज़रूरत है। आज की आलोचना इतिहास का सन्दर्भ (रेफ़रेंस) तो देती है लेकिन आज के लिए उसे ‘प्रसंग’ के रूप में इस्तेमाल नहीं करती। इतिहास आज कितने स्तरों पर संघर्ष करता है, उससे प्रसंग का निर्माण होता है। स्त्रियों के लिखे हुए को इतिहास से, अपने मूल्यांकन के लिए किन-किन स्तरों पर जूझना-टकराना पड़ता है, कैसे वे लिख कर प्रतिरोध की संस्कृति का निर्माण करती हैं, इससे ही ‘प्रसंग’ पैदा होता है। आज के युग का इतिहास जो एजेंडा देता है, रचनाकार उससे टकरा कर ही ‘प्रसंग’ का निर्माण कर सकता है। इतिहास ही नहीं इतिहास लेखन की पूरी परंपरा से टकराती, उपेक्षित ये स्त्रियाँ क्या अपने लिखे हुए के पुनर्विश्लेषण की मांग नहीं करती हैं?
स्त्री साहित्येतिहास के सन्दर्भ में इतिहास में स्त्री लेखन की जगह और काल निर्धारण का प्रश्न महत्वपूर्ण है। यदि स्त्री-मुक्ति की दृष्टि से विचार किया जाए तो सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक बिन्दुओं पर पुरुषों को मिली छूट और स्वतंत्रताएं बिलकुल भिन्न तरीके की रहीं और लगभग स्त्रियों के नितांत विपरीत। यूरोपीय पुनर्जागरण को देखने से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है। शेष यूरोप की अपेक्षा इटली में 1350 से 1530 के बीच ज्यादा तेज़ी से आधुनिकता का प्रवेश हुआ। वस्त्र उद्योग और कपड़ा मिलों ने उत्तर सामंती सामाजिक संबंधों को नए सिरे से निर्मित किया। उद्योग धंधों के विकास और श्रम-रोजगार के अवसरों ने नए ढंग की सामाजिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के दरवाजे खोले, जिसके लिए यह पूरा युग जाना जाता है। बावजूद इसके, स्त्रियों के लिए इस पुनर्जागरण का कोई अर्थ नहीं था। औद्योगिक विकास और श्रम के अवसरों ने स्त्रियों पर नकारात्मक प्रभाव ही डाला। प्राक-पूंजीवादी व्यवस्था, राज्य और उनके द्वारा बनाये हुए सामाजिक संबंधों ने पुनर्जागरण के दौर की स्त्रियों की स्थिति को उनकी सामाजिक हैसियत के अनुरूप अलग-अलग ढंग से प्रभावित किया। आभिजात्य और बुर्जुवा वर्ग की स्त्रियों के लिए नवजागरण (रेनेंसा) का अर्थ वही नहीं था जो साधनहीन, धनहीन स्त्री के लिए था। इसके अतिरिक्त जब भी हम पुनर्जागरण काल में स्त्री-पुरुष समानता या उनको मिले समानाधिकारों की बात करते हैं, हमें स्त्रियों के मुद्दे पर उनको मिली स्वतंत्रता के सन्दर्भ में अवश्य सोचना चाहिए। इस दृष्टि से जान केली के अनुसार चार बिन्दुओं पर सोचा जा सकता है:
1. पुरुष यौनिकता की तुलना में स्त्री यौनिकता पर नियंत्रण।
2. स्त्रियों की आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में भूमिकाएं (स्त्री-पुरुष के बीच श्रम-विभाजन, स्त्रियों का संपत्ति पर अधिकार, राजनीतिक अधिकार, श्रम के लिए मिलने वाले पारिश्रमिक की दर-पुरुषों की तुलना में, शिक्षा और रोज़गार के अवसर आदि)
3. समाज की सामूहिक सोच के निर्माण में स्त्रियों की सांस्कृतिक भूमिका पर विचार, साथ ही इस कार्य के लिए उन्हें शिक्षा की कैसी सुविधाएँ मुहय्या करवाई गयी हैं।
4. समाज में स्त्रियों के बारे में किस तरह की विचारधारात्मक निर्मितियां कार्य करती हैं? तथा कला, साहित्य और दर्शन के अंतर्गत किस तरह की स्त्री-छवि का अंकन किया जाता है?
वैचारिक मानदंड के अंतर्गत हमें दो बातों पर ध्यान देना चाहिए, पहला तो अनुमान के आधार पर ये अंदाजा लगाना कि किसी समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति क्या है और स्त्रियाँ अपने बारे में क्या और कैसे सोचती हैं? पुरुषों द्वारा लिखे हुए साहित्य में स्त्री-यौनिकता का प्रश्न था ही नहीं, तक कि पश्चिम के पुनर्जागरण में भी स्त्री-यौनिकता की भूमिका पर नज़र डालने से कुछ दिलचस्प बातें सामने आती हैं। ध्यान रहे कि यह वही पश्चिम है जहां स्त्री-शिक्षा पर सबसे ज्यादा बल दिया गया। यौनिकता के सम्बन्ध में पुनर्जागरण के दौर में स्त्री मुद्दों मसलन प्रेम, विवाह, शिक्षा, परिवार के सम्बन्ध में पितृसत्ताक समाज का नजरिया क्या भारतीय समाज से अलग था या उनकी यौनिकता के बारे में वहां भी अवकाश का उतना ही और वैसा ही अभाव था जैसा कि भारत में। इसके अतिरिक्त निजी संपत्ति पर आधिपत्य के सन्दर्भ में पश्चिम में स्त्रियों की तुलनात्मक रूप से क्या स्थिति थी, यह जानना ज़रूरी है।
पुनर्जागरणकालीन स्त्री ने मध्यकालीन सामंती समाज से प्राक-आधुनिक राष्ट्र राज्य तक जो रास्ता तय किया उससे परिवार और राजनीति की संरचना में आमूल बदलाव देखे गए। इस दौर में स्त्री नैतिकता के नए प्रतिमान गढ़े गए, बोकाशियो और अरस्तू जैसे विचारकों ने स्त्रियों के लिए दैहिक शुचिता, मानसिक पवित्रता को अनिवार्य जीवन मूल्यों के रूप में घोषित कर दिया। साथ ही पब्लिक स्फियर में पुरुष की श्रेष्ठता को बारम्बार स्थापित करने का प्रयास किया गया और ऐसे सब मामले जिनमें नीति-निर्धारण या नेतृत्व की ज़रूरत नहीं होती,उनमें स्त्रियों को स्थान दिया गया। रेनेसां के सम्पूर्ण विचार में स्त्री के लिए घरेलू देवदूती की भूमिका तजवीज़ की गयी, एथेंस को इसके उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है जहां कला और बौद्धिकता के उत्कृष्ट माहौल में भी स्त्रियों के लिए घर की चारदीवारी को ही सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता था। समूचे दरबारी साहित्य में स्त्रियों के प्रति रुढ़िग्रस्त मानसिकता के दर्शन होते हैं, जिसके पीछे सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों को देखा जा सकता है। 11 वीं और 12 वीं शताब्दी में दरबारों में जो प्रेम सम्बन्धी काव्य दांते जैसे कवियों ने लिखा उससे एक नई तरह की साहित्यिक परंपरा की शुरुआत हुई, जिसने मध्यकालीन प्रेम-सम्बन्धी अवधारणाओं और वर्जनाओं की जगह प्रेम और नैतिकता का एक नया ही आदर्श सामने रखा। इससे पहले की दरबारी कविता सामंतशाही मूल्यों से संत्रस्त कविता थी, जिसमे किसी अधीन या किसान स्त्री की कामना करने वाले सामंत को प्रेरित करने वाले स्रोत थे, इस सन्दर्भ में कुलीन या सामंत के लिए कोई नैतिक बंधन नहीं था, दूसरी तरफ स्त्री के लिए प्रेम का अर्थ था-कि वह प्रेमपात्री बन कर ही खुश रहे और प्रेमी की प्रत्येक इच्छा का सम्मान करे, उसे प्रसन्न रखे’- दरबारी प्रेम दरअसल प्रेमियों के बीच पारस्परिक स्वच्छन्दता की वकालत करता था। लेकिन दूसरे ढंग से देखें तो इस तरह का प्रेम आभिजात्य और कुलीन स्त्रियों को ही प्रेम करने करने का अधिकार देता था, जबकि अधीनस्थ और गरीब स्त्रियाँ प्रेम पात्र बन कर और ज्यादा अधीनस्थ बन जाती थीं। दरअसल दरबारी किस्म के प्रेम में अधीनता के कई आयाम थे - सबसे पहले तो स्त्री को घरेलू और पालतू बनाना, जिसके लिए भले ही स्त्री के आगे घुटने टेक कर प्रेम की भिक्षा मांगनी पड़े, या विनम्रतापूर्वक प्रेम-निवेदन करना। दूसरे स्त्री को ऐसे भावात्मक नियंत्रण में रखना कि वह स्वतंत्रता की कल्पना भी न कर सके और प्रेम का यथोचित प्रतिदान देने के लिए निरंतर प्रस्तुत रहे। तीसरे उससे इस योग्य बनाना कि वह पति/प्रेमी के प्रति कर्तव्यशील, पवित्र और ईमानदार रहे, जबकि सामंत या जमींदार और स्त्री के सम्बन्ध एकरैखीय नहीं हो सकते थे। पितृसत्तात्मक व्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप ये सम्बन्ध बदलते रहते थे, और इस तरह दरबारी-प्रेम दाम्पत्य संबंधों से बिलकुल अलग और स्वतंत्र हुआ करते थे। पारिवारिक सम्बन्ध अपनी गति और सीमा में चलते रहते थे, उनका सामंत की अन्यान्य प्रेमिकाओं से कोई लेना-देना नहीं होता था। एक सामंत की एकाधिक प्रेमिकाएं हो सकती थीं और वह पत्नी से यौन शुचिता की अपेक्षा रखता था, वहीँ प्रेमिका से इस तरह की मांग करना संभव नहीं था क्योंकि विवाहेतर प्रेम अलग था और वह विवाह-संस्था को कहीं से भी ध्वस्त नहीं करता था। लेकिन कलात्मक सृजन के लिए विवाहेतर सम्बन्ध ही महत्वपूर्ण विषय बना। ऐसा नहीं था कि इससे विवाह संस्था नितांत अप्रभावित ही रही, लेकिन उसकी चरमराहट और टूटन सामंतशाही के अंतर्गत अति सामान्य प्रवृत्ति के रूप में पहचानी गयी। सवाल यह है कि ऐसे सम्बन्ध आखिर ‘अवैध’ माने जाने के बावजूद समाज में चलते कैसे रहे? इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि विवाह एक ऐसा सम्बन्ध था जो दूसरों के द्वारा स्थिर किया हुआ होता था, सामाजिक जीवन के निर्वहन के लिए विवाह को ज़रूरी माना गया। चर्च द्वारा भी विवाहेतर संबंधों को हीन माना जाता था लेकिन इस तरह के दरबारी प्रेम (courtly love) या विवाहेतर संबंध को वैधता भी प्रदान की। ईसाइयत में प्रचलित प्रेम की अवधारणा ने इसे परिपुष्ट भी किया। ईसाईयत में प्रेम को सर्वोपरि माना गया और प्रेम की उद्दात्तता में यौनेच्छा का विरेचन करने पर बल दिया गया। धीरे-धीरे विवाहेतर संबंधों में प्रेम और सेक्स का मिश्रण हो गया और ईसाईयत के उपदेश किसी काम न आ सके और ऐसे संबंधों पर सामन्ती समाज की खलबलियाँ मंद पड़ने लगीं। धन और साधन संपन्न लोग चर्च के उपदेशों को उसी सीमा तक ग्रहण करते थे, जिस सीमा तक वह उनके निहित हितों के साधन में सहायक था।
जान केली के अनुसार दरबारी प्रेम के स्वरुप में निरंतर बदलाव आते रहे। बारहवीं शताब्दी के दौरान इस तरह का प्रेम और आकर्षण दरबारों में हास्य और मज़ाक का विषय भी बना और बहुत सारा साहित्य विवाहेतर प्रेम संबंधों और प्रसंगों को लेकर मनोरंजक साहित्य भी लिखा गया। Adultery या अवैध प्रेम संबंधों को लेकर चर्चाएँ भी खूब हुआ करती थीं। इन सबके बीच स्त्री की चतुराई, मूर्खता, सौन्दर्य और धोखों के किस्से और चर्चे दरबारों में चर्चा का आम विषय थे। उधर स्त्री से यह अपेक्षित था कि एक ओर वह विवाह में पति को भी प्रसन्न रखे, दावतों का आयोजन करे और दूसरी ओर प्रेमी के प्रति भी समर्पित रहे। शुचिता और नैतिकता के मिश्रण और द्वंद्व में ‘प्रेम’ एक आकस्मिक घटना के रूप में सामने आया करता। अवैधता बहुत तरह की सावधानी की मांग करती थी लेकिन प्रेम ऐसे संबंधों में भी विशुद्ध प्रेम की इरोटिक प्रकृति से इंकार नहीं किया जा सकता। इसकी अपेक्षा पुनर्जागरण के दौर की स्त्री अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्र हुई। वह प्रेम सम्बन्ध रखने या न रखने के लिए स्वाधीन थी। स्पष्टत: यह वैचारिक मुक्ति की ओर संकेत करता है, जिसमें स्त्री अपनी इच्छा से सम्बन्ध रखने की दिशा में कदम बढ़ाती दीखती है। ऐसे बहुत से साहित्यिक साक्ष्य मिलते हैं जिनमें स्त्री विवाहेतर सम्बन्ध रख रही थी-जिसमें वह स्वेच्छा से आवाजाही भी कर रही थी। आदान-प्रदान के सम्बन्ध के बावजूद। क्या ये प्रसंग सिर्फ साहित्य का विषय थे या सामाजिक परिस्थितियाँ भी स्त्री के प्रति मानसिक अनुकूलन को बदल रही थीं?लेकिन स्त्री की पवित्रता की पारंपरिक अवधारणा और पुरुष पर उसकी निर्भरता के बावज़ूद प्रेम संबंधों में स्वच्छंद आवाजाही आश्चर्य पैदा करती है। विवाहेतर और दरबारी प्रेम सम्बन्ध एक तरह का स्टेटस सिम्बल भी था, और बहुत प्रचलित था। समूचे मध्यकालीन यूरोपीय साहित्य में परस्त्री प्रेम की कवितायेँ और श्रृंगार प्रसंग भरे पड़े हैं, यह तभी संभव था जब पितृसत्ता इसे प्रश्रय और सहयोग देती क्योंकि चर्च की तयशुदा नैतिकता इसके खिलाफ़ पड़ती थी। हालाँकि शुरूआती दौर में चर्च और पुरुष प्रधान समाज को इस तरह के संबंधों से कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि इसमें पुरुष के लिए ढेर स्वतंत्रता थी। दिक्कत तब शुरू हुई जब स्त्रियाँ भी अपनी यौनिकता को लिए सामने आने लगीं। जहां ईसाईयत का मूलाधार परदुःख कातरता, करुणा और प्रेम था, वहीँ साहित्य में ऐसे प्रेमी का करूण चित्रण होने लगा, जो अपने मालिक की पत्नी से प्रेम करता है, निवेदन करता है और उसके लिए प्राण न्योछावर करने को तैयार रहता है। वह स्वामी को धोखा देता है पर स्वामिनी की सेवा करने के लिए, उसकी प्रसन्नता के लिए हरदम तैयार रहता है। इस तरह का प्रेम वैधता की श्रेणी में नहीं आता था, जो इस बात की तरफ भी संकेत करता है कि अधिकतर आभिजात्य विवाह-सम्बन्ध किसी राजनैतिक लाभ या धन के लिए स्थिर होते थे, जिनमें प्रेम और भावात्मक लगाव का अभाव होता था। दरबारी प्रेम को विषय बना कर लिखे गए साहित्य से ऐसी भावनाएं विरेचित भी होने लगीं और पारंपरिक साहित्य से उसकी टकराहट भी बढ़ी। सामंती माहौल में स्त्री की यौनिक और अन्य आवश्यकताओं में कोई फ़र्क नहीं किया जाता था और परिवारों की आतंरिक संरचना में धर्म और चर्च का भय भी अंतर्गुम्फित था। दूसरी तरफ ऐसे सामंती परिवार जहां संपत्ति का उत्तराधिकार स्त्री को मिलता था वहां पति उसकी पूरी खानदानी संपत्ति की देखभाल और प्रबंधन किया करता था, ऐसी स्त्री से विवाह सम्बन्ध बनाने के लिए अच्छे अच्छे परिवारों के व्यक्ति आतुर रहते थे। पति या प्रेमी से सुने हुए अनुभवों और कभी कभी स्वयं उपस्थित रह कर भी स्त्रियाँ राजदरबार में कवितायेँ और गीत लिखती थीं - जिनका मूल स्वर रोमांटिक होता था, रनिवासों और अन्तःपुरों में ऐसे नाटक भी खेले जाते थे जो मुख्यत: प्रेम पर आधारित होते थे। प्राक-आधुनिक युग आते -आते दरबार सिर्फ दिखावे की चीज़ रह गए थे लेकिन अब भी साधारण स्त्रियों के लिए राजनीतिक सत्ता या नेतृत्वकारी भूमिका प्राप्त करना दूर की बात थी, बावजूद इसके कि कुछ स्त्रियाँ सफल शासक भी हुईं। लेकिन आमतौर पर स्त्री के प्रति समाज का जो रवैया था उसे नोबेलिटी पर लिखी पुस्तक में देखा जा सकता है जिसमें स्त्रियों से शिक्षित होने के साथ-साथ अच्छी नृत्यांगना, गायिका, चित्रकार, सुंदरी और आकर्षक व्यक्तित्वशाली बनने की अपेक्षा की गयी है। इस दिनों स्त्री से अपने आप को ऐसा बनाने की अपेक्षा की गयी जो दूसरे को प्रसन्नता और जीवन्तता से भर दे। लेकिन आकर्षक दीखना और आकर्षित करना ये दो बातें थीं -जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण थीं,जबकि दरबारों में चर्चा का विषय था राजनीति और युद्ध। वह स्त्री जो दरबार में आती-जाती थी उससे यह अपेक्षा की जाती थी कि वह आकर्षित करे, लुभाए लेकिन नीति-निर्धारण या राजनीतिक मसलों पर कोई राय न रखे। उसका युवा और आकर्षक दीखना, हाव-भाव सञ्चालन में सावधानी बरतना ही ज़रूरी था, दरबारों में अक्सर पुरुष ही वक्ता की भूमिका में होते थे और स्त्रियाँ श्रोता। स्त्रियों को कैसा दीखना, कैसा होना चाहिए, इसके बारे में भी पुरुष ही सोचते थे।
रेनेसां के दौर की स्त्रियों की रचनाओं के कथ्य और परिवेश पर बीसवीं शताब्दी में ही ध्यान दिया गया, जब उनकी रचनाओं के संग्रह प्रकाश में लाने की कोशिशें हुईं। इससे पहले माना जाता था कि दरबार से सम्बद्ध एवं दरबारी साहित्य से प्रभावित स्त्रियाँ पुरुषों की तर्ज़ पर कुछ कवितायेँ रच रही थीं और शिक्षित होने का अधिकार और सुविधा उन्हीं के पास थी, इसलिए साहित्येतिहास में उन्हीं का ज़िक्र भी आया और विभिन्न भाषाओँ में उन्हीं के अनुवाद भी प्रस्तुत किये गए। इनसे आगे के दौर में रेनेसां ने कई छंदबद्ध रचनाकार, स्त्री नाटककार उत्पन्न किये, जिनकी रचनाओं की उपेक्षा की गयी, जबकि यदि सिर्फ इंग्लैण्ड की कवयित्रियों की रचनाओं को उदाहरण स्वरुप देखा जाये तो रेनेसां के दौर की स्त्री रचनात्मकता के विभिन्न आयाम सामने आ सकते हैं, जो इतिहास की विस्मृत-उपेक्षित कड़ियों को श्रृंखलाबद्ध करने और पुरुष-दृष्टि से लिखे साहित्येतिहास को चुनौती देते हैं। इन स्त्रियों की रचनात्मकता का क्षेत्र बहुआयामी है -मातृत्व, प्रेम, आध्यात्मिकता, सांसारिक, भौतिक समस्याएं, उनके सामाजिक रुझान, स्वयं को स्थापित करने का प्रयास और पितृ सत्ता को चुनौती देती रचनाकारों को संज्ञान में लेना ज़रूरी है। इस दौर की पहली कवयित्री इज़ाबेला व्हिटनी की पहली कविता 1553 में छपी थी। वह शहर से गुज़ारिश करती है कि उसे गुमशुदगी में ही दफ़न कर दिया जाए –
“मुझे गुमशुदगी में दफ़न कर दो
और कभी मेरा नाम भी मत लो”
इज़ाबेला व्हिटनी, एलिजाबेथ फर्स्ट, एनी सेसिल दे वेरे, मैरी सिडनी, मैरी रोथ जेन, एलिज़ाबेथ कवेंडिश एनी द्रोविस, एमिलिया लान्येर, एमिलिया लान्येर, राचेल स्पेघट एलिस सटक्लिफ, एन्नी ब्रोड्स्ट्रीट जैसी स्त्रियाँ इस दौर के प्रारंभ में लिख रही थीं। इनको मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है -
पहली तो वे जो बुर्जुआ परिवारों से जुड़ी हुई थीं, जिन्हें शैक्षिक, आर्थिक मदद के लिए किसी के सामने हाथ फ़ैलाने की ज़रूरत नहीं थी।
दूसरी वे जिन पर पर सेंसरशिप इतनी हावी थी कि प्रारंभ में इन्होंने सृजन की जगह अनुवाद को ही अपनाया जिनमें एलिजाबेथ फर्स्ट, एनी सेसिल दे वेरे और मेरी सिडनी थीं।
तीसरी तरह की रचनाकार वे थीं जो साधारण परिवारों से सम्बद्ध थीं, लेकिन दरबारों से भी किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई थीं।
एनी द्रोविस, एमिलिया लान्येर, डायना प्रिमरोज़ इसी श्रेणी में आती हैं लेकिन वे अक्सर हाशिये पर ही रहा करती थीं, उन्हें हमेशा संरक्षण की आवश्यकता का अहसास होता रहा। इज़ाबेला व्हिटनी, राचेल स्पेघट, एलिस सटक्लिफ और ऐनी ब्रोड्स्ट्रीट की रचनाओं से ज़ाहिर होता है कि उन्हें आर्थिक संरक्षण की ज़रूरत थी, यद्यपि वे बुर्जुआ वर्ग से सम्बद्ध थीं और कोई न कोई घरेलू रोज़गार करती थीं। व्हिटनी ने लिखा कि मैं शरीर और मस्तिष्क से परिपूर्ण हूँ पर धन से कमज़ोर हूँ।” लान्येर ने लिखा कि उसे पुरानी व्यवस्था के बीत जाने का अफ़सोस है। ये दोनों ही अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति की चर्चा करती हैं। व्हिटनी कविताओं के लिए मिलने वाले पारिश्रमिक से असंतुष्ट है और लान्येर को उम्मीद है कि कम्बरलैंड की काउनटेस मार्गरेट क्लिफ्फोर्ड उसके सेवा-कार्यकाल को बढ़ा देगी। इनकी कविताओं को पढ़ कर ऐसा लगता है कि वे अपनी आर्थिक स्थिति को ले कर चिंतित थीं और अपने समकालीन पुरुष रचनाकारों की तरह ही रचनाओं के लिए पारिश्रमिक की अपेक्षा करने लगी थीं, जबकि उन्हें पुरुषों की तुलना में व्यक्तित्व-विकास के बहुत कम अवसर प्राप्त थे।इन्होंने लैंगिक आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक आधार पर समूह बनाये हुए थे। यह ठीक पुरुष रचनाकारों की तर्ज़ पर था, धनी और समृद्ध रचनाकारों का समूह गरीब रचनाकारों से अपने आप को अलगा लेता था। दरबार और सत्ता से निकटता, उच्चपदस्थ अधिकारियों से संपर्क के आधार पर समूह बना करते थे। इसके बावज़ूद ऐसी रचनाकार भी सामने आयीं जिनका दरबारों से कोई सम्बन्ध नहीं था, दूसरे रचनाकारों में जेंडर के आधार पर विशेष भेदभाव नहीं था, स्त्री और पुरुष दोनों समान सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के अविभाज्य अंग थे। स्त्री और पुरुष दोनों के लिए बतौर लेखक स्थापित होने में धन और पद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, किसी कवि के सम्बन्धी कहाँ कहाँ स्थापित हैं उसके निजी और सामाजिक संपर्क किन लोगों से हैं, यह उसकी रचनाओं की चर्चा के लिए महत्वपूर्ण था। लान्येर जैसी कवयित्री कविता में इसी तरह का संसार रचती है जिसमें वह कम्बरलैंड की काउंटेस की मदद के प्रति आभार व्यक्त करती है, वह अपने गाँव से निर्वासन की तकलीफ व्यक्त करती है और ऐसा संसार रचती है जहाँ कवि और संरक्षक आपस में अत्यंत सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में रहते हैं। लान्येर पहली कवयित्री है जो गाँव पर कविता लिखती है। मेरी सिडनी और मैरी रोथ ने भी बाढ़ से उफनती नदी का चित्रण कविताओं में किया है। मेरी सिडनी उफनती नदी को मानव अस्तित्व को हिला देने वाला मानती हैं
नदियाँ, हाँ नदियाँ जो चिंघाड़ती हैं
सागर की उफनती लहरों सी नदियाँ चिंघाड़ती हैं
तोड़ती हुई कगारों को, सीमाओं को पार करती
नदियाँ चिंघाड़ती हैं।
कहीं वह आसमान के राजा को संबोधित करती हुई लिखती है:
आकाश के देवता
दृढ़ और सत्य तुम्हारे वचन झूठे हैं।
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| वर्जीनिया वुल्फ़ |
रेनेसां की कवयित्रियों में स्वर-वैविध्य है, कभी उनमें आध्यात्मिकता का स्वर है तो कभी व्यंग्य, कभी वे नास्टेल्जिक हैं तो कभी आत्माभिव्यक्ति के लिए व्याकुल दीखती हैं; मसलन व्हिटनी व्यंग्य का अत्यंत प्रभावी प्रयोग करती हैं। वर्जीनिया वुल्फ़ ने 'रूम ऑफ़ वंस ओन' में लिखा था कि स्त्रियाँ स्थायित्व और सुरक्षा चाहती हैं। प्राक आधुनिक कवयित्रियां घर और घर के अभाव को सामान्य रूप से कविता का विषय बनाती हैं। जेन और एलिज़ाबेथ कवेंडिश अपने घर की स्मृति में कवितायेँ लिखती हैं। उधर ऐनी ब्रैडस्ट्रीट घर छूटने की यातना को अभिव्यक्त करती है। घर के अलावा परिवार जनों की मदद, उनके भावनात्मक सहयोग और उनके न रहने पर उपजे अभाव को भी कवितायेँ अभिव्यक्त करती हैं। मेरी सिडनी, फिलिप और राबर्ट सिडनी एक परिवार के थे वैसे ही मेर्री र्रोथ के साथ विलियम हर्बर्ट जुड़े थे, कवेंडिश परिवार में जेन, एलिज़ाबेथ विलियम और मार्गरेट कवेंडिश और एनी सेसिल मशहूर साहित्यिक परिवार से सम्बद्ध थीं। साहित्यिक पृष्ठभूमि से आई हुई ये रचनाकार साहित्य की दुनिया से सुपरिचित होती थीं। सबसे दिलचस्प यह है कि साधारण या बुर्जुआ वे चाहे किसी भी पृष्ठभूमि-साधारण या बुर्जुआ से सम्बद्ध हों - आत्म से संवाद की प्रक्रिया सभी में लक्षित होती है। 1970 के दशक तक पश्चिमी स्त्रीवादी आलोचना ने स्त्री रचनाकारों और उनकी आत्मकथाओं के अन्तःसम्बन्ध को पूरी तरह उजागर कर दिया, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि इस दौर में वे किसी वैचारिक चेतना पर केन्द्रित न रह कर निजी अनुभूतियों को वाणी देने में मुब्तिला थीं। एलिज़ाबेथ प्रथम की कवितायेँ कैद के दिनों की तकलीफ का बयान करती हैं। व्हिटनी भी आर्थिक अभाव के दिनों, लान्येर विगत यौवानानुभवों, कवेंडिश बहनों ने सिविलवार के अनुभवों के आत्मपरक सन्दर्भ कविताओं में दिए हैं। प्रेम और शोकगीत – ये दो सन्दर्भ कथ्य के तौर पर इनकी कविताओं में सामान्यतः पाए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर मेरी सिडनी ने अपने मृत भाई फिलिप की स्मृति से ही पाम अनुवाद की शुरुआत की। जेन कवेंडिश ने भी अपनी बहन एलिज़ाबेथ को याद करते हुए लिखा। एनी सेसिल-दे-वेरे ने अपने दिवंगत पुत्र की स्मृति में लिखा। एनी ब्रैडस्ट्रीट भी अपने पौत्र की स्मृति को कविता का विषय बनाती हैं।
पारिवारिक सम्बन्ध, जीवन की भावुक प्रतिक्रियाएं इन सबको कविता का विषय बनाना इस बात को दर्शाता है कि ये रचनाकार बौद्धिकता से ऊपर भावुकता को प्रधानता दे रही थीं, निकट परिजनों की मृत्यु और अभाव शोकगीतियों में अभिव्यक्त हो रहा था। जहाँ दरबारी कविता में निजी-दुःख सुख को गोपन रखने की प्रवृत्ति थी वहीँ इस दौर की स्त्रियाँ खुलकर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर रही थीं। आश्चर्य नहीं कि इस दौर में स्त्रियों ने लौकिक प्रेम को काव्य की वस्तु के रूप में सहजता से स्वीकार किया। हिंदी में तो स्त्रियों द्वारा लौकिक प्रेम की प्रकट अभिव्यक्ति के खतरे बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही उठाये जाने शुरू हुए; जबकि इंग्लैण्ड में मैरी रोथ के सानेटों में उनके चचेरे भाई और प्रेमी विलियम के प्रति अकुंठित प्रेम अभिव्यक्त हो चुका था। रोथ का प्रेम विलियम के प्रति दुखांत ही रहा। दरबारी समीकरण, रिश्ते-नाते परिवार और उत्कट प्रेम के बावजूद दोनों का न मिल पाना तत्कालीन सामाजिक-पारिवारिक संबंधों के विश्लेषण का नज़रिया भी प्रदान करता है। इसी सन्दर्भ में एलिज़ाबेथ प्रथम की कविता An Answer को देखा जा सकता है, जो वाल्टर रेले के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है। एलिजाबेथ कवेंडिश भी प्रेम की अभिव्यक्ति की राह में किसी वर्जना को नहीं मानतीं। एनी ब्रोड्स्ट्रीट अपने अनुपस्थित पति के बारे में लिखती है :
My head, my heart, mine eyes, my life, nay, more.
यह वही भाषा और वही रूपक हैं जो दरबारी कविताई में प्रयुक्त होते थे। यद्यपि अधिकांश शोकगीत नितांत निजी हैं, लेकिन प्रेम कवितायेँ सहज और उत्कट हैं, जिनसे सामान्य पाठक का साधारणीकरण हो जाता है। ये कवितायेँ आत्मपरक अधिक हैं, जिनमें आधुनिक कविता के बीज परिलक्षित होते हैं। सामान्य श्रेणी की कवितायेँ भी ये स्त्रियाँ लिख रही थीं जिनमें राजनैतिक, धार्मिक-विश्वास और आस्थाएं अभिव्यक्त हो रही थीं।
इनकी रचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि स्त्रियाँ व्यक्तिगत मसलों से सामाजिक-सार्वजनिक मसलों की तरफ जा रही थीं। रचनाओं में आत्मविश्लेषण का पैनापन और विषय का चुनाव इसका प्रमाण है। अधिकांश रचनाकार राजनीतिक विषय के रूप में शासक एलिज़ाबेथ के जीवन को ग्रहण करती दीखती हैं। साम्राज्ञी एलिज़ाबेथ की लोकप्रियता, उनकी सरकार, राष्ट्रीय नीतियां आम जनता की रूचि और चर्चा का विषय थीं। स्त्रियाँ उन्हें सत्ता और स्त्री नेतृत्व के अद्भुत समन्वय के प्रतीक के तौर पर देखती थीं। एलिज़ाबेथ के बारे में ब्रोडस्ट्रीट लिखती है:
Now say, have women worth? or have they non?
or had they some, but with our Queen it’s gone?
Nay masculines, you have thus taxed us long,
But she, thoughdead, will vindicate our wrong;
Let such as say our sex is void of reason
Know ‘tis a slander now, but once was reason’
कवयित्रियों में ऐसी कोई नहीं है जिसने रानी एलिज़ाबेथ की चर्चा किसी न किसी रूप न की हो। ड्रोविच, सिडनी, स्पेघट, प्रिमरोज़ और ब्रोड्स्ट्रीटने रानी को धर्म-संस्थापिका के रूप में चित्रित किया, उधर इज़ाबेला व्हिटनी, एलिज़ाबेथ प्रथम, एनी सेसिल, लान्येर, रोथ और कवेंडिश बहनों ने सीधे-सीधे धर्म के प्रति निष्ठा तो नहीं दिखाई पर जीवनी और अन्तःसाक्ष्यों में उनके प्रोस्तेटेन्ट धर्म के प्रति रुझान स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। इनमें से सिर्फ एलिस सत्कलिफ्फ़ ही ऐसी है जो कैथोलिक धर्म के प्रति अपने रुझान को स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त करने का साहस करती हैं, जबकि सन 1634 में जब वह लिख रही है तब इस तरह की काव्यात्मक अभिव्यक्ति करना खतरे से खाली नहीं था। यह इस बात को पुष्ट करता है कि प्राक-आधुनिक काल की कवयित्रियाँ अपने विश्वासों के सन्दर्भ में खतरे उठाने का साहस कर रही थीं और अपनी कविताओं में बार-बार ईश्वरीय सत्ता का ज़िक्र भी करती थीं, जो उन्हें भौतिक जगत में बाधाओं से टकराने की हिम्मत देती है। यह भी गौरतलब है कि इन स्त्रियों को पितृसत्ता द्वारा निर्धारित मोरल पुलिसिंग से भी टकराना पड़ता था, जो कमोबेश आज के सन्दर्भ में भी सही है। स्त्री का आज्ञाकारिणी, मौन रहना आदर्श माना गया, वहीँ वह भौतिक शब्द लिख कर पुरुषप्रधान क्षेत्र में सेंध लगाती है। प्रकाशन से उसका लिखा हुआ भी अन्य रचनाकारों की तरह ही पाठकों के व्यापक संसार तक पहुँचने लगा। ऐसा नहीं कि पाठकों ने बड़ी उदारता से ग्रहण किया हो या इनकी प्रतिभा को सराहा हो, उलटे लेखिकाओं की चारित्रिक शुचिता पर प्रश्नचिन्ह लगाये जाने लगे और उन्हें जुगाडू, लाभ-लोभ के लिए सम्बन्ध स्थिर करने वाली ‘असती’ का ख़िताब मिला। बहुत संभव है कि कई रचनाकार सेंसरशिप और लोकापवाद की वजह से अपना लिखा छपवाने को राजी नहीं हुईं। उनकी रचनायें - नाटक, प्रहसन, कवितायेँ बंद कमरों के भीतर ही प्रदर्शित हुयीं, कही-सुनी गयीं या यों कह लें पारिवारिक हदबंदी में रहीं और आम जनता तक पहुँच ही नहीं पायीं। लिखने और प्रकाशित होने के सन्दर्भ में स्त्रियों को बहुत हीन दृष्टि से देखा जाता था, इसीलिए आधुनिक काल तक भी रेनेसां काल की कई नाट्य-रचनाएँ पाठकों-दर्शकों तक नहीं पहुँचीं, जिनकी रचना स्त्रियों द्वारा की गयी थी। प्राप्त पांडुलिपियाँ इस तथ्य को पुष्ट करती हैं कि स्त्रियाँ सिर्फ प्रेम और क्षोभ की कविताओं की रचना तक ही सीमित नहीं थीं बल्कि जनविधा के रूप में नाटक को भी अपना रही थीं। मैरी सिडनी के The Tragedy of Antonie and Jane तथा एलिज़ाबेथ कवेंडिश के लिखे नाटक The Concealed Fancies को उदाहरणस्वरुप देखा जाना चाहिए। सिडनी के संवादों का गठन, एलिजाबेथके पात्रों के चरित्र-गठन पर शेक्सपीयर और मरलोव का प्रभाव दीखता है, साथ ही यह भी कि वे लगभग सभी विधाओं पर हाथ आजमा रही थीं। डोरीच द्वारा कविता में ही नाटकीय संवादों का आयोजन किया जाना हमें बताता है कि वह संवाद द्वारा जनता तक अपनी बात पहुँचाने का प्रयास कर रही थी, क्योंकि नाटक सर्वाधिक लोकप्रिय विधा के रूप में स्थापित थी।
यह तथ्य रेखांकित करने योग्य है कि ये स्त्रियाँ अपनी यौनिकता को ले कर बहुत सचेत हैं और यही सचेतनता इन्हें आधुनिक बनाती है. मसलन लान्येर ने Slave Deus Rex Judaeorum में चर्च की धार्मिक और दकियानूसी सोच को चुनौती देते हुए लिखा कि मर्यादा का पतन पुरुष के द्वारा होता है, स्त्री द्वारा नहीं : “Her fault, though great, yet he was most to blame” इसी तरह राशेल और एनी ब्रोडस्ट्रीट स्त्रियों को अमर्यादित कहने वालों को कोसती हैं और कहती हैं कि पुरुष ही स्त्री को पथभ्रष्ट करता है, उसकी उपलब्धियों में बाधक बनता है।Joseph Swetnam जिसने ‘The Arraignment of women’ में स्त्रियों को अविश्वस्त और रहस्यमयी कहा था, स्त्री-निंदा के उसके एजेंडे पर टिप्पणी करते हुए ‘Mortality Memorendum’ में स्पीघटने जोसेफ के बारे लिखा “As a Monster or a devil (who) on Eve’s sex… foamed filthy froth” प्रिमरोज़, रोथ और कवेंडिशने रचनाओं में सदियों से प्रचलित स्त्री के कुमारित्व की रक्षा या उसके न होने की स्थिति में उसे चरित्रहीन मानने को उलट दिया और कहा कि प्रत्येक बार पुरुष ही इतना मासूम नहीं होता कि वह स्त्री के बनाये जाल में उलझ जाए,या अपना जीवन नष्ट कर दे। डायना प्रिमरोज़ ‘A chain of Pearl’ में इस बारे में लिखा : “Siren Blandishments/ which are attended with no foul events” (Temperance, lines 5-6) अपने सानेट ‘Pamphilia to Amphilanthus’ में मैरी रोथ ने स्त्री को स्थिर मति और पुरुष को अस्थिर मति कहा है। एलिज़ाबेथ प्रथम की कवितायेँ, एनी सेसिल की शोकगीतियाँ, मैरी सिडनी की प्रारंभिक कवितायेँ स्त्री की यौनिकता का सम्मान करने का भाव व्यक्त करती हैं। इनमें से सिर्फ व्हिटनी ने ‘A Communication’ की सातवीं पंक्ति में स्त्री को मूर्खा कहती है, लेकिन यह तय है कि ये सभी रचनाकार समाज में स्त्रियों के प्रति परंपरागत सोच को बदलने के लिए प्रयासरत थीं।
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| ऐनी ब्रैडस्ट्रीट |
प्राक-आधुनिक और आधुनिक स्त्री रचनाकारों के विषय में जानकारी एकत्र करना, उनके लिखे हुए को सम्पादित कर के प्रकाशित करना इतिहास में स्त्री-रचनात्मकता की अप्राप्य और उपेक्षित धारा की विलुप्त कड़ियों को जोड़ना है। भारत और पश्चिम में स्त्री के लिखे हुए की उपेक्षा के सन्दर्भ में आश्चर्यजनक समानता लक्षित होती है। यूरोप के पुनर्जागरण और भारत के नवजागरण में स्त्री के मुद्दों पर ढेर सारी समानताओं के बिंदु मिलते हैं। स्त्रियों के लिखे के विषय में जानकारी हो या उनकी रचनाओं के संकलन हों, तब इनकी खोज और विश्लेषण इतिहास और शोध की दिशा में नई संभावनाओं के द्वार खोलने में मददगार हो सकता है। यद्यपि पिछले बीस वर्षों में स्त्री-अध्ययन और लैंगिक अध्ययन केन्द्रों द्वारा ऐसी बहुत-सी पुस्तकों और पांडुलिपियों की खोज की गयी है जिससे इतिहास की दरारों को भरने में मदद मिली है और विशेषकर स्त्री रचनात्मकता का मुकम्मल इतिहास लिखने की दिशा में प्रयास हुए हैं, फिर भी स्त्री रचनात्मकता के बहुत से पहलू अभी भी उपेक्षित और अनछुए ही रह गए हैं। इस तकलीफ और आकांक्षा की अभिव्यक्ति ‘sighs’ शीर्षक कविता में एनी ब्रोडस्ट्रीट ने की है –
‘And if chance to thire eyes shall
bring this vouse
With some sad sighs honourmy
Absent hearer’
(Before the Birth of one of her Children, lines 25-26)
रेनेसां ने बहुत सी गीतकारों, कवयित्रियों और संवेदनशील कलाप्रेमियों को रचनात्मकता की अनुकूल मनोभूमि और प्रेरणा प्रदान की। यह समय स्पेंसर और शेक्सपीयर जैसे प्रतिभाशालियों का था, लेकिन इन्हीं के समानांतर स्त्रियाँ छंदबद्ध काव्य भी रच रही थीं, ठीक भारत की तरह जहाँ ब्रजभाषा समेत कई लोकभाषाओं में स्त्रियाँ पुरुषों की तर्ज़ पर छंदबद्ध रचनाएँ लिख रही थीं। भारतेंदु युगीन कवयित्रियों की रचनात्मक बानगी काबिलेगौर है। इनकी उपेक्षा या तो पूर्वग्रहवश की गई, या इन्हें इस योग्य नहीं ही नहीं समझा गया कि इनके लिखे को प्रकाशित और पुरस्कृत किया जाता। इस दौर में जो स्त्रियाँ रचनाएँ कर रही थीं उनमें अधिसंख्य उच्च वर्गीय, राजघरानों से संबद्ध थीं, जिसका अर्थ यह है कि निर्धन या निम्नवर्गीय स्त्रियाँ या तो साक्षर नहीं थीं, या रचनात्मक अभिव्यक्ति के दरवाज़े उनके लिए बंद थे। जैसा कि अक्सर होता है कि कोई भी साहित्यिक प्रवृत्ति अपनी पूर्ववर्ती प्रवृत्तियों से पूर्णतः विच्छिन्न नहीं होती, आधुनिकता के साथ साथ उसमें पूर्व के कालखंड की गूंज अवश्य रहती है। भारतेंदु की समकालीन स्त्री रचनाकार भी इस प्रवृत्ति से नितांत अलग नहीं थीं, वे अपने पूर्ववर्ती कवियों के प्रभाव से नितांत अप्रभावित नहीं थीं इसलिए वे भक्ति, श्रृंगार और नीति संबंधी रचनाएँ भी लिख रही थीं, इन कवयित्रियों में प्रताप बाला, बाघेली विष्णुप्रसाद कुंवरी, कमलकुमारी जुगलप्रिया, चंद्रकला बाई, सरस्वती देवी और प्रतापकुंवरी को देखा जा सकता है। इन कवयित्रियों को राम की अपेक्षा कृष्ण के चरित्र ने अधिक प्रभावित किया, कृष्ण की बाल-लीला, प्रेम-केलियों ने कवयित्रियों के हृदय में मधुर एवं रागात्मक भाव जगाए। ऐसा नहीं है कि राम के मर्यादित चरित्र ने इन्हें रचनात्मक प्रेरणा नहीं दी बल्कि कुछ रचनाएँ राम के चरित्र को आलम्बन मानकर भी लिखी गईं, फिर भी ये देखने में आता है कि भक्ति और प्रेम के आलम्बन के तौर पर अधिकांश ने कृष्ण चरित्र को ही ग्रहण किया। मारवाड़ के महाराजा मान सिंह की तीसरी भाटी रानी प्रताप कुंवरी बाई ने कृष्ण भक्ति के बजाए राम की भक्ति की। उन्होंने रामानुज सिंह संप्रदाय की भक्ति पद्धति का अनुकरण किया और ‘ज्ञान सागर’, ‘ज्ञानप्रकाश, प्रताप’, ‘प्रेम सागर’, ‘रामचन्द्र नाम महिमा’, ‘रघुवर स्नेहलीला’, ‘रामप्रेम सुख सागर,’ ‘राम सुजस पच्चीसी’, ‘श्री राम चन्द्र विनय’, ‘हरिजस गायन’ की रचना की। उनकी एक कविता है -
अवधपुरी घुमड़ी घटा रही छाय।
चलत समुंद पवन पुरवाई नव घनघोर मचाय
दादुर मोर पपीहा बोलत दामिनि दमकि दुराय
भूमि निकुंज सघन तरुवर में लता रही लिपटाय
सरजू उमगत लेत हिलौरें निरखत सिय रघुराय
क़हत प्रतापकुंवरि हरि ऊपर बार बार बलि जाय।
उधर विष्णुप्रसाद कुँवरि ने ‘कृष्ण विलास’ नामक ग्रन्थ लिखा और कृष्णभक्ति को आधार बनाकर काव्य रचना की-
‘अब ही आए श्याम रे
मोह मन सब वाय प्यारी हो गई बिन काम रे
बोल वंशी हरत मन है बार बार मुदाम रे।
बैठ अधरा पै गबीली लसत अनुपम वाम रे।
श्याम के मुख सुभग सोभित विष्णु तन है छाम रे।’
प्रतापबाला जो महाराज तखत सिंह की रानी थीं उन्होंने भगवद्विषयक रचनायें कीं। उनके कृष्णभक्ति के पद ‘प्रतापकुंवरि-रत्नावली’ शीर्षक पुस्तक में संकलित हैं, प्रताप बाला लिखती हैं –
‘भजु मन नन्दनन्दन गिरिधारी
सुख-सागर करुणा को आगर भक्तवछल बनवारी।
मीरा करमा कुबरी सबरी तारी गौतमनारी।
वेद पुरानन में जस गायो ध्याये होवत प्यारी
जामसुता को स्याम चतुरभुज लेजा ख़बरि हमारी।’
इसी तरह हेमंतकुमारी चौधरानी, कमल कुमारी जुगलप्रिया, चंद्रकला बाई की रचनाओं को देखा जा सकता है। चंद्रकला बाई का चित्त श्रृंगार के वर्णन में अधिक लगता है वे नख-शिख वर्णन में लिखती हैं -
‘नख तें सिख लौं सब साजि सिंगार
छटा छवि की कहि जात नहीं।
तलफि तलफि यों ही निसि बीतति नीर बिना मछुरी।’
‘बाघेली विष्णुप्रसाद कुंवरि’ ने भी श्रृंगार विषयक कुछ पदों की रचना की, इनके श्रृंगारिक पदों में प्रेम की वेदना की अभिव्यक्ति हुई है। उदाहरणार्थ -
‘निरमोही कैसो जिय तरसावै।
पहले झलक दिखाय हमै कूँ अब क्यों वेग न आवै
कब सों तलफत मैं री सजनी वाको दरद न आवै
विष्णुकुंवरि दिल में आ कर के ऐसो पीर मिटावै’।
प्रताप कुंवरि बाई ने भी श्रृंगार के वियोग पक्ष को रचनाओं में प्रस्तुत किया। दरअसल अधिकांश कवयित्रियों का मन श्रृंगार चित्रण में ही रमा है, भले वियोग हो या संयोग। प्रतापकुंवरि बाई लिखती हैं –
‘पति वियोग दुख बायो अपारा, हुआ सकल सूना संसारा
कछु न सुहाय नैन बह नीरा,पति बिन कौन बँधावे धीरा
विकल भयो टेन बचन न आए, हरे राम!दुख कौन गिराये
असन,बसन लागत दुखदाई,इक दिन एक बरस सम जाई
यह दुख करत गए दिन केते, जाने झूठ जगत सुख जेते।’
भारतेंदु युग में स्त्री यौनिकता पर नियंत्रण करने और उन्हें आचरण सिखाने के लिए कई पुस्तकें प्रचलित थीं। स्त्रियों को आचरण सिखाने के मसले पर हिंदू-मुसलमान में कोई भेदभाव नहीं था। दरअसल भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था ने एक नव्य-पितृसत्तात्मक व्यवस्था को जन्म दिया था। इस व्यवस्था ने शिक्षा द्वारा नयी स्त्री-छवि का आदर्श सामने रखा. पार्थ चटर्जी ने नयी स्त्री को बदलती जीवन-पद्धति के अनुरूप कहा, क्योंकि बंगाली भद्रलोक की भूमिका सार्वजनिक जीवन में नगण्य हो जाने के कारण, ऊँचे पद और सत्ता उनके हाथ से चली गयी थी। ऐसे में घर के भीतरी दायरे में आदर्श स्त्री-छवि के संदर्भ में हिंदू और मुसलमान लेखकों में आश्चर्यजनक वैचारिक समानता देखना दिलचस्प है। हिंदू और मुसलमान दोनों का यह मानना था कि स्त्रियों की स्थिति में पतन का कारण अशिक्षा है। ‘स्त्री उपदेश’ शीर्षक पुस्तक में देवा स्कूल जाती है और सुखवंती को जाने का उपदेश देती है। देवा का कहना है हिंदू देवियों गौरी, पार्वती और रामचरितमानस के सीता और मंदोदरी सरीखे चरित्रों, राजा भोज की पत्नी और लीलावती के आदर्श की कहानियाँ बताते हुए समरकंद की आयशा (जो कवयित्री थी और कई स्त्रियों को उसने पढ़ना-लिखना सिखाया) और किरमान मुल्क की राजकुमारी लाला ख़ातून तक पहुँचती है और तर्क-सिद्ध करती है कि शिक्षा के मामले में भारत की औरतों को अंग्रेज़ औरतों के पदचिह्नों पर चलना चाहिए जो पति की अनुपस्थिति में भी तमाम काम कर पाने में सक्षम हैं। पुस्तक में दो बातें विशिष्ट हैं- एक तो विधवा-विवाह का समर्थन और हिंदू और मुसलमान- दोनों सम्प्रदायों की औरतों के प्रति समान नज़रिया। लेखक हिंदू और मुसलमान स्त्रियों को सुबह उठ कर पूजा-नमाज़ करने का उपदेश देने के साथ घर की सार-सँभाल, नम्र व्यवहार, स्वच्छता, मेहमानों की आवभगत, क्रोध और आवेश के दुष्परिणाम, सद्व्यवहार के लाभ, स्त्रियोचित गुणों— कोमलता, लज्जा आदि का बखान करता है। लेखक की दृष्टि में लड़कियों को खेलने-कूदने में समय नहीं नष्ट करना चाहिए. देवा सुखवंती को बताती है कि औरत को कभी ज़िद्दी और अड़ियल नहीं रहना चाहिए, ऐसियों को कोई पसंद नहीं करता। लड़कियों को दिन में सो कर समय नहीं नष्ट करना चाहिए। इससे आलस्य आता है और आगे चल कर ससुराल के लोगों की बातें सुननी पड़ती हैं। भोजन करते समय बोलना नहीं चाहिए। कम बोलना, मेहमानों को पहले भोजन परोसना, हँसने की जगह मुस्कुराना अच्छी स्त्रियों के लक्षण हैं। डिप्टी नज़ीर अहमद ने भी ‘मिरात-उल-उरूस’ में कम ख़र्च में घर चलाने वाली, संतोषी, और हर हाल में पति को प्रसन्न रखने वाली स्त्री को आदर्श माना जबकि अपनी इच्छाओं को अभिव्यक्त करने वाली, पति से बहस लड़ाने, पति के धन को व्यर्थ उड़ाने, धोखेबाज़ और पति की मुश्किलों में उसका साथ न देने वाली को बुरी स्त्री के खाते में डाल दिया। मुंशी अहमद हुसैन ने अन्य आचरण-लेखकों की तर्ज़ पर शिक्षा को संपत्ति माना और कई ऐसे प्रसंगों का ज़िक्र किया है, जहाँ हिंदू और मुसलमान औरतें शिक्षा के अभाव में धन-संपत्ति से हाथ धो बैठती हैं, या विधवा होने पर धनहीन रह जाती हैं। बंगाल में धीरेंद्र नाथ पाल, ताराकांत विश्वास, नागेंद्र बाला दासी, नवीनकाली दासी, जयकृष्ण मित्र, सत्यचरण मित्र, गिरिजाप्रसन्न रायचौधरी जैसे लेखक आचरण-पुस्तकों के कारण विख्यात हुए. इसके अतिरिक्त बामाबोधिनी और अंत:पुर जैसी पत्रिकाएँ स्त्री-आचरण-उपदेश संबंधी लेख छापती थीं. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में स्त्री-शिक्षा को मद्देनज़र रखकर जो आचरण-पुस्तकें लिखी गयीं उन्हें तीन वर्गों में बाँट कर देखा जा सकता है-
पहली वे, जो अतिरिक्त रूप से सचेतन, बाबू वर्ग के हितों के अनुरूप पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पुराने ढाँचे में थोड़ी तब्दीली के साथ स्त्री की नयी छवि गढ़ने का प्रयास कर रही थीं। इनमें धीरेंद्र नाथ पॉल की 'रमणीर कर्तव्य', बंगाली बहू, गिरिजाप्रसन्न रायचौधरी की गृहलक्ष्मी, तारकनाथ विश्वास की बंगीय महिला, जयकृष्ण मित्र की रमणीर कर्तव्य और भूदेव मुखोपाध्याय के पारिवारिक प्रबंध को रखा जा सकता है.
दूसरे वर्ग में वे आचरण-पुस्तकें आती हैं जो परम्परागत पितृसत्तात्मक ढाँचे को ही और अधिक बलशाली और सशक्त बनाने के लिए स्त्री-शिक्षा की वक़ालत कर रही थी। इनमें नागेंद्रबाला दासी की ‘नारी धर्म’ और नवीनकाली दासी की ‘कुमारी शिक्षा’ को देखा जा सकता है। इस तरह की आचरण पुस्तकों और लेखों को भारतेंदु युग में देखा जा सकता है, जिनसे स्त्री रचनाकार प्रभावित या प्रेरित न होतीं ऐसा असंभव था। अधिकांश स्त्रियां कमोबेश पुरुष रचनाकारों की सम्मति से प्रभावित थीं। इसलिए ‘आचरण और उपदेशात्मक कविताओं की एक पूरी परंपरा हमें दिखाई देती है। भारतेंदु युग की ही एक कवयित्री सरस्वती देवी हुईं जिन्होंने ‘सुंदरी-सुपंथ', ‘नीति निचोड़', 'शारदा शतक' जैसी पुस्तकें लिखीं। ‘सुंदरी-सुपंथ' में उन्होंने स्त्रियों को अर्थनीति सिखाते हुए लिखा -
“जो रुपया पैसा तुम्हें, मिलै सुखर्चन अर्थ
राखहु ताही संभारि कै फेकहु नाहिं अनर्थ।”
वे स्त्रियों के आभूषण प्रेम की आलोचना करते हुए पतिव्रत-धर्म पालन पर बल देती हैं –
‘भूषण डगर एक बार एक ठौर पैन्ह,
पैन्हहु सुजानि या मैं हानि अति भारी है
घूँघरू औ झाँझ आदि वजनी विशेष छड़े
छमा छम शब्द जासो सब गुन जारी है’
सरस्वती देवी की कविता स्त्रियों के लिए पतिव्रत पालन करने, पति-भक्ति या पति सेवा का संदेश देती है। इसी तर्ज पर प्रताप कुंवरि बाई ने भी पति के प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम से वशीभूत होकर कविताएँ लिखीं –
‘ईस-स्वरूप जानि पति साँचा, सेवा किन्ही मनसा वाचा।
पति समान नहि दूजा देवा। तातें पति की कीजे सेवा.
पति परमातम एक समाना, गावै सब ही वेद पुराना.
धरम अनेक कहे जग माहीं, तिय के पतिब्रत सम कछु नाहीं।’
देवहुति,अनुसुइया नारी, पतिब्रत ते हरि सुत अवतारी
ताते मैं पति सब समझाईं, पति-सुमूर्ति हिरदै पधराई।’
इन रचनाकारों से आगे की पीढ़ी आधुनिक चेतना के साथ उपस्थित हुई जिनमें राजरानी देवी का नाम प्रमुख है, जिनकी रचनाओं में स्वराज-चेतना, राष्ट्र प्रेम और स्त्री चेतना जैसे मुद्दे उठाए उठाए गए, इसके बावजूद राजरानी देवी ने भी स्त्रियों के पतिव्रत-धर्म-पालन को भी कविता का विषय बनाया –
“सुखद पतिव्रत धर्म-रथ पर तुम चढ़ो
बुद्धि ही चंचल अनूप तुरंग हो।”
जिस अतीत को ये पीछे छोड़ आई थीं वही अतीत इनके शब्दों में यों था –
‘ललित ललनायें बनी सुकुमार थीं,
अंग पर आभूषणों का भार था।
रत्न-हारों पर समुद बलिहार थीं
सेज ही संसार का सब सार था।
नेत्र लड़ना ही सुखद रण-रंग था,
चारु चितवन ही अनोखा तीर था।
राजरानी वे रचनाकार हैं जो शृंगार और भक्ति के साथ राष्ट्रीय चेतना की कविता लिखती हैं –
“अब नृशंसों के महा उत्पात पर?
क्या न अब कुछ देश का अभिमान है?
खो गई सुखमय सभी स्वाधीनता
हो रहा कितना अधिक अपमान है?”
इसी तर्ज पर ही आगे चल कर तोरन देवी शुक्ल ‘लली’, बुंदेलबाला ने आधुनिक भाव बोध की रचनाएँ कीं, तोरन देवी शुक्ल ने राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत कविताएँ लिखीं, जिनकी चेतना इनके पिता ने इनके भीतर जगाई थी। 'जय स्वदेश’ शीर्षक कविता में वे लिखती हैं -
“जय जय भारत जय जय स्वदेश
जय शोभित सुंदर तिलक भाल,
अतिभव्य मूर्ति लोचन विशाल
अतुलित बलधारी अतिदयाल
जय जगत -शिरोमणि वीर वेश।
पूरित सुंदर षड् ऋतु अनूप
रक्षक पयोधि हिय शैल भूप।
जय सत्य न्याय अरु धर्मरूप’
आगे चल कर वे ‘खूब हुआ’ जैसी कविताएँ भी लिखती हैं, जिसमें वे गांधी के लिए कहती हैं कि –“कर्मवीर गांधी से होंगे भारत के पथ प्रदर्शक आज”।
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| हेमंत कुमारी चौधरानी |
इसी दौर में हेमंत कुमारी और हरदेवी सरीखी संपादक भी हुईं। हेमंत कुमारी चौधरानी ब्राह्मो समाज से संबद्ध थीं और स्त्रियों के शिक्षित होने के पक्ष में थीं। 'माता और कन्या’, 'नारी पुष्पावली’, 'नवीन शिल्प माला' और ‘आदर्श माता’ जैसी पुस्तकें इन्होंने स्त्री शिक्षा के उद्देश्य से लिखीं। 'हिंदी बांग्ला प्रथम शिक्षा’ जैसी प्राथमिक स्तर की पुस्तक में इन्होंने हिंदी-बंगला भाषा की प्रकृति का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया। हेमंत कुमारी ने रतलाम से ‘सुगृहिणी’ शीर्षक पत्रिका 1888 में प्रकाशित की। वे भारत की पहली स्त्री पत्रकार थीं। उन्होंने पत्रिका के पहले अंक में ही लिखा –“हे प्यारी बहनों! द्वार खोल देखो, तुम्हारे यहाँ कौन आई? तुम लोग क्या इसे पहचानती हो? यह भी तुम्हारी एक भगिनी है। इसका नाम 'सुगृहिणी' है। तुम्हारे दुखों को देख कर तुम्हारी बहन तुम्हारे द्वार पर आई है।’ इस पत्रिका के समानांतर ही भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘बालाबोधिनी’ का प्रकाशन किया लेकिन स्त्री-केंद्रित पत्रिका होने के बावजूद ‘बालाबोधिनी’ में किसी स्त्री द्वारा लिखा कोई लेख नहीं छपा, वहीं ‘सुगृहिणी’ में स्त्रियों के काम की सामग्री के साथ स्त्री रचनाकारों की रचनाओं को पर्याप्त सम्मान दिया जाता था। ‘सुगृहणी’ ऐसी पत्रिका थी जिसके लेखों और फीचर्स से स्त्रियों को शिक्षित होने की प्रेरणा मिला करती, उनके द्वारा किए गए कार्यों की तारीफ़ हुआ करती, इसमें स्त्री के परंपरागत भार्या रूप से अधिक उसके सामाजिक-राष्ट्रीय योगदान, साहस और धैर्य से संबंधित समाचारों को स्थान दिया जाता था। हेमन्तकुमारी देवी के अतिरिक्त श्रीमती हरदेवी रोशनलाल जो लाहौर की रहने वाली थीं वे भी ‘भारत भगिनी’ पत्रिका के संपादन से जुड़ी रहीं। उन्होंने ‘लंदन यात्रा’ और ‘लंदन जुबली’ शीर्षक यात्रा वृत्तांत लिखे। ‘भारत भगिनी’ का उद्देश्य स्त्रियों में चेतना जगाना था, यही काम हरदेवी अपनी रचनाओं के माध्यम से भी कर रही थीं, उन्होंने ‘स्त्रियों पै सामाजिक अन्याय' शीर्षक निबंध में अपने देश की स्त्रियों के पतन के मूल में अशिक्षा को रेखांकित किया, उनके आभूषण-प्रेम की आलोचना की। बाद के शोध से यह साबित हो गया कि ‘सीमन्तनी उपदेश’ (1882) की लेखिका श्रीमती हरदेवी ही हैं। ‘स्त्रियों पै सामाजिक अन्याय’ शीर्षक निबंध के प्रारंभ में ही वे लिखती हैं –
“न्यायशील देश हितैषी सज्जनपुरुषों के अवश्य ध्यान योग्य दोहा –
अबला तो निबला भईं तुम्हें सबल प्रभु कीन।
बनो सहायक निबल के परमधर्म्म निज चीन।
जीवन तन मन प्राण धन तुम सुख हेत बिहाय
नहीं उचित सज्जन गणों तिनके संग अन्याय।”
हरदेवी एक विद्याबुद्धि संपन्न स्त्री थीं। “हरदेवी उत्तर भारत के पुरुष प्रधान समाज में उन चंद स्त्री बुद्धिजीवियों में थीं जिन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में समाज-सुधार और स्त्री शिक्षा के मामलों को ज़ोर-शोर से उठाया लेकिन उनका उल्लेख बंगाल-नवजागरण केंद्रित आधुनिक भारत के इतिहास लेखन में कहीं नहीं मिलता।”
जब हम कहते हैं कि स्त्री के अपने मुहावरे होते हैं और उसकी अपनी भाषा होती है, तो दरअसल हम स्त्री की विशिष्ट अभिव्यक्ति की शिनाख्त कर रहे होते हैं। हम सब इस बात से वाकिफ हैं कि इतिहास हमेशा वर्चस्ववादी ताकतों, विशेषकर पुरुष-वर्चस्व का रहा है और स्त्रियों को इतिहास में नेतृत्वकारी भूमिकाओं से दूर रखा गया है। 'द जेंडर बाइंड : वूमन एंड डिसिलिंस’ में नैन्सी आर्मस्ट्रांग ने बताया है कि कैसे साहित्येतिहास में, पूरे विश्व में स्त्री स्वरों को उपेक्षित किया गया है। हेलेन सिक्साउस ने स्त्री की ‘अन्या’ स्थिति को रेखांकित करते हुए स्त्री के बोलने पर बल दिया था क्योंकि समाज और साहित्य इतना फेलोसेंट्रिक और प्रभुत्वशाली होता है कि स्त्री ‘अन्या’ ही बनी रह जाती है। ऐसी स्थिति में स्त्रियों का लिखना भले ही वह किसी भी विधा में हो, ‘साहित्य के फेलोसेंट्रिक गढ़ को तोड़ना है'। स्त्रियों ने लिख कर ही वर्चस्ववादी शक्तियों से मुठभेड़ की और वास्तविक संसार में स्त्री और पुरुष के भेद को भी उजागर किया। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक आते आते ‘नई स्त्री’ के निर्माण की चिंता पूरे राष्ट्रवादी विमर्श के केंद्र में आ गयी थी।यह वही समय था जब भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति एक राजनीतिक मुद्दा और विवादों का केंद्र बन गयी थी। ब्रिटिश प्रभुओं की दृष्टि में स्त्री की स्थिति ‘आधुनिकता’ का पैमाना थी। स्वशासन के लिए उत्सुक भारतीयों के सामने वे स्त्रियों की गर्हित स्थिति दिखा कर उन्हें बताने में कामयाब हो गए थे कि भारतीय इतने पिछड़े हुए हैं कि वे अपने समाज, अपने नागरिकों को स्वयं नहीं संभाल सकते। सती प्रथा, बहुविवाह, कन्या भ्रूण हत्या, पर्दा और बाल-विवाह अंगरेजों की आलोचना का मुद्दा था। जबकि भारतीय समाज सुधारकों में से अधिकांश की दृष्टि में पाश्चात्य संस्कृति की अपेक्षा भारतीय संस्कृति उत्कृष्ट था, लेकिन इसके साथ ही इस बात की भी आवश्यकता महसूस की गयी कि पश्चिमी प्रभुओं की आलोचना से बचने के लिए हिन्दू संस्कृति में कुछ सुधार और बदलाव किये जाएँ। पश्चिमी उदारवाद और मानववाद को इस ढंग से प्रतिस्थापित किया जाए कि अंग्रेज़ भारत को हेय दृष्टि से देखना छोड़ दें। पश्चिमी सभ्यता में नई तकनीक, विज्ञान और तर्क का प्राधान्य था तो उसकी तुलना में भारतीयों के पास आध्यात्मिक उच्चता थी, आध्यात्मिकता को भारतीयों की वास्तविक पहचान के तौर पर देखा गया। स्त्रियाँ इसी ‘आध्यात्मिक स्पेस’ की पहरेदार थीं। अब समाज सुधारकों और नेतृत्व करने वालों के सामने इस आध्यात्मिक स्पेस को बचाने की ज़िम्मेदारी थी। राष्ट्रवादी नेताओं ने यह महसूस किया कि आध्यात्मिक स्पेस को बाहरी संसार से जोड़ना पड़ेगा और समानता और लोकतांत्रिकता के नए मूल्यों को भारतीयता से जोड़ कर प्रस्तुत करना पड़ेगा। इस स्थिति में ‘नई स्त्री’ की संकल्पना की गयी। नई स्त्री की यह संकल्पना मध्यवर्गीय स्त्री के सन्दर्भ में ही व्याख्यायित की गयी। इस अवधारणा की सफलता स्त्री की औपचारिक शिक्षा पर निर्भर थी। शिक्षा को भारतीय स्त्री के उत्कर्ष से जोड़ कर देखना और शिक्षा के माध्यम से स्त्री द्वारा नई बाह्य स्थिति के साथ तारतम्यता बिठाने में मदद के रूप में देखा गया। शिक्षा को नई भारतीय स्त्री को घर की जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभाने में मददगार के रूप में भी देखा गया। उन्नीसवीं शती ख़ासकर भारतेंदु युग बहुत से परिवर्तनों का जीवंत साक्ष्य बना। भारत विशेषकर उत्तर भारत की ओर से बहुत कम स्त्रियाँ ऐसी थीं, जिन्होंने अपनी आँख से दुनिया देखने की ठानी और अपने उद्देश्य में सफल भी हुईं क्योंकि इससे पहले स्त्रियां आर्थिक, राजनैतिक, बौद्धिक क्षेत्रों से दूर रखी जाती थीं, फिर भी स्त्री-लेखन ने अपनी कई विधाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज की। इनमें से जिन्होंने स्त्रियों की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति को बदलने की कोशिश की, उनमें श्रीमती हरदेवी प्रमुख हैं। हरदेवी ने वैचारिक लेखों के साथ उपन्यास लिखे और उर्दू में आत्मकथा लिखी, यात्रा वृत्तांत से तो उन्हें पहचाना ही गया। यह बात और है कि आलोचकों ने उनकी उपेक्षा यथासंभव की।
साम्राज्यवादी नीतियों के प्रसार के साथ-साथ उन्नीसवीं सदी के बौद्धिक जनों का दृढ़ विश्वास था कि ज्ञान प्राप्ति सभी दोषों का रामबाण उपचार है। वे भारतीय समाज के सभी दोषों का -धार्मिक अन्धविश्वास और सामाजिक रूढ़िवादिता का भी-मूल कारण लोगों के सामान्य अज्ञान को मानते थे। इसलिए उनके सुधार के कार्यक्रम में ज्ञान के प्रसार का स्थान सर्वप्रमुख था। अंग्रेजी राज की शिक्षा नीति के उद्देश्य इन बौद्धिकों से बिलकुल भिन्न थे। भारतीय समाज सुधारक और बौद्धिक शिक्षा द्वारा भारतीय समाज में नवजीवन का संचार करना चाहते थे। वहीं औपनिवेशिक शिक्षा ऐसे भारतीय जन का निर्माण करना चाहती थी तो उनका पहला सरोकार तो यह होता था कि शिक्षा नीति किस प्रकार से प्रशासनिक आवश्यकताओं की पूर्ति सबसे अच्छे ढंग से कर सकती है, और जैसा कि डेविड काफ कहते हैं उसके विपरीत भारतीय क्लासिकी कृतियों के अध्ययन और अनुवाद की ईस्ट इंडिया की प्रारंभिक नीति किसी सांस्कृतिक नीति का हिस्सा नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक नीति का ही विस्तार थी। हरदेवी ने लिखा था –“हमारे देश की बहुत सी ऐसी स्त्री होंगी जिन के माता पिता वा स्वामी धनी हैं, वे स्त्री धन के गर्व से घर का काम और पतिसेवा संतानपालन उन को शिक्षा देनी इन सब मुख्य कामों को दास दासियों के अर्पन कर एक बड़े आलसी दारिद्री के समान पेट भर खाट पर लेट इस अमूल्य जीवनरत्न और उत्तम समय को निज हाथ से गंवाती हैं देखो अति शोक स्थान है। ...हे भारतवासिनी प्यारी भैनों तुम्हारी सेवा में प्रार्थना करती हूँ विचारना चाहिये कि (उदरपरायणता) पेट भर के खाट पर लेट दिन रात गवाना अमूल्य जीवनरत्न को वृथा हाथ से खोना स्त्री जन्म का कर्तव्य नहिं। कहा देखो तुम्हारे ही बड़े कहते हैं (धर्म्म हीन नर पशु सम जानो) मनुष्य मात्र का मुख्य उद्देश्य तो धर्म्म ही है सो धर्म्म ग्रंथों से प्रकट है पर स्त्रियों को यह नियम अवश्य ही करने चाहिये। बालपन में माता पिता से सुशिक्षा विद्या पड़नी सीना परोना (गृहचर्या) घर के काम सीखने उपरांत पति सेवा में पहुँच पति सेवा तथा आज्ञा अनुकूलता नम्रता आवभाव भक्ति आलस कपट छल का त्यागना घर के सारे काम घर का प्रबंध संतानपालन उन का शिक्षा प्रबंध कुटुंबपालन सम्बन्धियों का सत्कार करना सच और मीठा बोलना सत उपदेश सुनने सतशास्त्रों द्वारा आत्मा की शुद्धि और उन्नति करनी तथा ईश्वर आदेशों को यथा समय पालन करने में सावधान रहना, जैसे कि इस साध्वी धर्म्मरूपा के जीवनांश में पाये जाते हैं और इसी का उदाहरण तुम को उत्तम उदाहरण जानना चाहिये तुमने यह सुना होगा... देखो हमारे देश की स्त्रियों को गृहकार्य वा संतान पालन से बिना और कोई काम नहिं तिस पर भी हम ऐसी हैं कि खाना और सोना दो ही काम जानती हैं। अब सावधानी से मेरी प्रार्थना सफल करें और धर्मोन्नति की ओर दृष्टि दे कर भारतवर्ष की उन्नति करनी भी हमारा परम धर्म्म है। तुमको वही नियम धारण करने चाहिये जो देशोन्नति के मूल कारण हैं। जब ऐसे सुराज्य में उन्नति न हुई तो कब होगी जिस में अनेक भाषाओँ से शिक्षा हो सकती है और उस का प्रबंध भी राज्य की ओर से उत्तम रीति द्वारा किया जाता है। केवल हमारा ही आलस प्रतिबंधक हो रहा है इस का त्याग ही करना उचित है।” अपने टेक्स्ट में बतौर स्त्री वह ऐसे पूर्वग्रह-जिनमें परिवार के सुरक्षित दायरे से निकलने पर बाहरी संसार की चुनौतियाँ शामिल हैं -उन्हें अपनी बहादुरी और स्वतंत्रचेता व्यक्तित्व का अहसास कराती हैं। इसके साथ ही वह सिर्फ स्थानीय स्त्रियों की स्थिति और उनकी प्रकृति के बारे में नहीं बताती बल्कि भारतीय स्त्री से तुलना भी करती हैं। इस तरह वह स्त्री की एक आधुनिक छवि गढ़ती चलती है। ध्यान देने की बात है कि यह छवि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के वर्षों में राष्ट्रवाद और समाज सुधार के अलगाव शुरू होने के दौर की छवि है, भारत में उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में निरंतर इस पर बहस हो रही थी, जिसमें समाज सुधार तथा राजनीति को पुनर्परिभाषित किया जा रहा था। समाज सुधारकों का एक वर्ग यह मानता था कि राजनीति का परित्याग कर दिया जाना चाहिए, वहीँ दूसरी ओर अनेक लोगों का यह भी मानना था कि सुधार के बावज़ूद सामाजिक तथा राजनीतिक-दोनों क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं तथा इन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता”। श्रीमती हरदेवी राजनीति से समाज सुधार को अलग करके देखने के पक्ष में नहीं थीं। राधा कुमार ने अपनी पुस्तक में यह दर्ज़ किया है कि ‘सन 1892 में संपन्न हुए छठे राष्ट्रीय सामाजिक सम्मलेन में ‘भारत-भगिनी’ की संपादक श्रीमती हरदेवी रोशनलाल ने दृढ़तापूर्वक कहा कि राष्ट्रीय, सामाजिक, सम्मलेन कांग्रेस से अधिक महत्वपूर्ण संगठन है क्योंकि यह इस बात पर जोर देता है कि –
स्त्रियों का सरोकार पुरुषों के समान ही है।
साथ -साथ दोनों उठते या गिरते हैं
वामन या ईश्वर की तरह
बंधनमुक्त या उन्मुक्त”
हरदेवी सत्ता में स्त्री की भागीदारी की ज़रूरत महसूस करती हैं। वे दर्ज़ करती हैं कि अधिकांश स्त्रियों को उनके जीवन का उद्देश्य ही मालूम नहीं है। इसलिए अक्सर परिवारों में वे मूलभूत अधिकारों से वंचित रहती हैं। हरदेवी स्त्रियों को अपने भीतर से अहसास-ए-कमतरी की भावना को ख़ारिज करने के लिए प्रेरित करती हैं और कहती हैं कि वे पढ़ी-लिखी हैं और अपने ज्ञान को दूसरों के साथ बांटने को तत्पर रहती हैं जिसे एडवर्ड सईद ‘सेकेंड-आर्डर नॉलेज' कहते हैं, वह इस तरह वह शिक्षा और ज्ञान की परंपरा में आदान-प्रदान की प्रवृत्ति को आगे बढ़ाती हैं और उनके लिखने का ढंग ऐसा है ज्यों वे संबोधित करती हों यात्रा-वृत्तान्त की शुरुआत करते हुए अधिकारों से वंचित रहती हैं . हरदेवी स्त्रियों को अपने भीतर से अहसास-ए-कमतरी की भावना को ख़ारिज करने के लिए प्रेरित करती हैं और कहती हैं कि वे पढ़ी-लिखी हैं और अपने ज्ञान को दूसरों के साथ बांटने को तत्पर रहती हैं जिसे एडवर्ड सईद ‘सेकेंड-आर्डर नॉलेज' कहते हैं, वह इस तरह वह शिक्षा और ज्ञान की परंपरा में आदान-प्रदान की प्रवृत्ति को आगे बढ़ाती हैं और उनके लिखने का ढंग ऐसा है ज्यों वे संबोधित करती हों यात्रा-वृत्तान्त की शुरुआत करते हुए वे लिखती हैं – “प्यारी पाठिकाओं, आज मैं अपनी यात्रा का ब्रतांत ले कर तुमहारी सेवा में उपस्थित हुई हूँ, परदेश में फिरने और वहां की नई-नई चीजों के देखने से जो कुछ भला और बुरा विचार उन के प्रति मेरे मन में उपजा है और दूसरी जात के आचार विव्हार धर्म मरयादा रीतियें जो कुछ देखी और सुनी उन सब ने मुझको उद्धित किया है कि तुमहारी ख़ुशी के लिये उन सब को तुमहारी सेवा में निवेदन करूँ, और विद्वानों ने भी विदेश भ्रमण का यही फल कहा है कि जो कुछ वहां देख सुने उसे ज़रूर अपने मित्रों के समाज में वर्णन कर दे ,और इसी में दोनों पक्षों को ख़ुशी भी होती है तथा आज कल लोगों में भी यही रीत है कि जब कोई मनुष्य परदेश से हो कर आता है तो उस के मित्र और सामाजिक लोग उस का यथोचित आदर मान कर बड़ी श्रधा के साथ उस की यात्रा का हाल सुनते हैं और सिर्फ प्रसन्न ही नहि होते कभी कभी इस्से बड़ी बड़ी शिक्षा और ज्ञान भी लाभ करते हैं परन्तु बड़े ही शोक का दिन है कि पहले तो हमारी पंजाब देशीय भगनी समाज में किसी को दूर देश में जाना ही कम मिलता है और जो कोई तीर्थ यात्रा के नाम से कहीं जाती भी हैं तो कठन परदे या और कारणों से एक दूसरी के निकट वह ख़ुशी नहीं पहुंचा सकतीं कियों कि अभी तक न उनका कोई समाज ही बना है और न सोसाइटी जहाँ भद्र घरों की स्त्रियें एकत्र होकर अपनी प्रत्यागत बैहन के मुह से दूर देश का हाल सुनकर खुश हों तो पस लाचार घर ही घर में घुट कर रह जाती है बहुतेरा जी चाहता है पर एक दूसरी के दर्शन तक नहि कर सकतीं। बताओ अब किस्से ईस की फरियाद की जाय और कोन इस बड़े भारी अभाव को दूर करे सब कोई अपने अपने सुख में सुखी हैं इस लिये इस बकत उस का कोई उपाय ना देख अपनी यात्रा ब्रतांत को पुस्तक और सरल भाषा में बनाय आज तुम्हारी सेवा में अरपन करती हूँ, यदिपि मैं तुम से बहुत दूर और अपर्चित हूँ, पर आशा है कि इस के पाठ से तुम को वही सुख मिलेगा, जैसा एक भगनी के मुख से सुन कर मिला करता है, अब विशेष यही प्रार्थना है कि दयामय ईश्वर तुमहारे चित्त को प्रसन्न कर मेरे इस परिश्रम को सफल करें।” प्राक-आधुनिक और आधुनिक स्त्री रचनाकारों के विषय में जानकारी एकत्र करना, उनके लिखे हुए को सम्पादित करके प्रकाशित करना इतिहास में स्त्री-रचनात्मकता की अप्राप्य और उपेक्षित धारा की विलुप्त कड़ियों को जोड़ना है। भारतेंदु युग अप्रतिम रचनात्मकता का युग है जिसमें भारतेंदु मंडल के भीतर और बाहर प्रायः हर विधा में समृद्ध लेखन के प्रमाण हमें मिलते हैं। जहाँ तक स्त्री रचनात्मकता का प्रश्न है भारत और पश्चिम में स्त्री के लिखे हुए की उपेक्षा के सन्दर्भ में आश्चर्यजनक समानता लक्षित होती है। यूरोप के पुनर्जागरण और भारत के नवजागरण में स्त्री के मुद्दों पर ढेर सारी समानताओं के बिंदु मिलते हैं। स्त्रियों के लिखे के विषय में जानकारी हो या उनकी रचनाओं के संकलन हों, तब इनकी खोज और विश्लेषण इतिहास और शोध की दिशा में नई संभावनाओं के द्वार खोलने में मददगार हो सकता है। यद्यपि पिछले बीस वर्षों में स्त्री-अध्ययन और लैंगिक अध्ययन केन्द्रों द्वारा ऐसी बहुत सी पुस्तकों और पांडुलिपियों की खोज की गयी है जिससे इतिहास की दरारों को भरने में मदद मिली है और विशेषकर स्त्री रचनात्मकता का मुकम्मल इतिहास लिखने की दिशा में प्रयास हुए हैं, फिर भी स्त्री रचनात्मकता के बहुत से पहलू अभी भी उपेक्षित और अनछुए ही रह गए हैं। सरला देवी चौधरानी से लेकर हरदेवी समेत कई भारतेंदुयुगीन रचनाकार हुईं, जिन्हें इतिहास ने याद रखने की ज़रूरत महसूस नहीं की। ये स्त्रियां समाज में स्त्रियों को नेतृत्वकारी और में स्त्री की सजग भागीदारी की ज़रूरत महसूस करती हैं, वे दर्ज़ करती हैं कि अधिकांश स्त्रियों को उनके जीवन का उद्देश्य ही मालूम नहीं है ,अक्सर परिवारों में वे मूलभूत अधिकारों से वंचित रहती हैं। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि ऐसा सिर्फ़ हिंदी के संदर्भ में नहीं है,शोध बताते हैं कि अन्य भारतीय भाषाओं में भी स्त्री -लेखन और उनकी साहित्यिक-सामाजिक भूमिका की उपेक्षा की गई। भारतेंदु और भारतेंदु के बाद के दौर में कई आंदोलनों के सामने आने से मौलिकता एक आलोचनात्मक पद के रूप में विकसित हुई। इतिहास को देखने और इतिहास में शामिल होने योग्य विषयों की सारवस्तु बदली। हमने मौलिकता की सामाजिक भूमिका को देखना शुरू किया, साथ ही समाज को एक आलोचनात्मक दलील (क्रिटिकल आर्गुमेंट) के रूप में देखने की कोशिश भी। निष्कर्षतः यदि हम सीमोन द बोउवार से शब्द उधार लें तो कह सकते हैं कि – “यदि किसी जाति को लगातार हीन अवस्था में रखा जाए तो सही बात है कि वह हीन ही रहेगी किन्तु मानवीय स्वतंत्रता इस सीमा को तोड़ सकती है। आप अधिकार तो दीजिए, उपयोग करना स्त्री स्वयं सीख जाएगी। सच्चाई तो यह है कि दमनकर्ता कभी भी आगे बढ़कर अकारण उदारता नहीं दिखाएगा, किन्तु कभी तो दमित के विद्रोह और कभी स्वयं सुविधा प्राप्त वर्ग के अपने विकास से नई परिस्थितियाँ जन्म लेती हैं। इन नई परिस्थितियों की अपनी मांगें होती हैं, जिनको पूरा करने के लिए पुरुष स्वयं स्त्री को आंशिक मुक्ति देने के लिए बाध्य होता है। यह औरत का कर्तव्य है कि वह विकास की दिशा में आगे बढ़ती रहे और मिलने वाली सफलताओं से उत्साहित होती रहे। इसमें कोई संदेह नहीं कि एक न एक दिन वह पुरुष के बराबर सामाजिक और आर्थिक समानता पाएगी जिसके कारण उसकी आंतरिकता में एक नया रूपांतरण घटित होगा।’
सम्पर्क
गरिमा श्रीवास्तव
प्रोफ़ेसर भारतीय भाषा केंद्र
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
दिल्ली -110067
ई मेल : drsgarima@gmail.com
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