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सन्तोष दीक्षित के उपन्यास पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा

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  राजनीति भी अपनी तरह से अपने समय का मिथक गढ़ती रहती है। हर पार्टी और राजनीतिज्ञ जो सत्ता पर काबिज होता है, अपने राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का दावा करता है। भारतीय राजनीति में लम्बे समय तक कांग्रेस शासन में रही और अपने हिसाब से वह सत्ता को संचालित और परिभाषित करती रही। 2014 से भारतीय राजनीति में एक नए युग का आरम्भ हुआ जिसे  'न्यू इंडिया' जैसा एक चमकदार नाम दिया गया है। इस न्यू इंडिया में सब कुछ उलट पलट सा गया है। धर्म का उभार इसका एक प्रमुख अंग है। वैसे भी भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की हमेशा एक नेतृत्वकारी भूमिका रही है। आज इस जाति और धर्म का दखल कुछ ज्यादा ही बढ़ा है। सन्तोष दीक्षित ने अपने उपन्यास 'खलल' के जरिये इस न्यू इंडिया की कवायद को करीने से विश्लेषित करने की कोशिश की है। जितेन्द्र कुमार ने इस उपन्यास की एक विस्तृत पड़ताल की है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सन्तोष दीक्षित के उपन्यास 'खलल' पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा 'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद'। 'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद' जितेन्द्र कुमार  रामर...

ललन चतुर्वेदी द्वारा की गई समीक्षा 'ख़लल : समय का नग्न यथार्थ'

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  अपने अपने जीवन का युद्ध सभी को खुद अपने हथियारों से ही लड़ना पड़ता है। यह लड़ाई तब और दुरूह हो जाती है जब परिस्थितियां विपरीत हों। जब मनुष्यता को ताक पर रख कर जाति, नस्ल, धर्म, वर्ग, भाषा को वरीयता प्रदान की जाती है। हाल ही में प्रकाशित संतोष दीक्षित का उपन्यास हमारे समय की विडंबनाओं को शिद्दत से उद्घाटित करता है। कवि ललन चतुर्वेदी इसकी समीक्षा करते हुए उचित ही लिखते हैं ' ख़लल एक ऐसा उपन्यास है जिसमें अनेक पात्र है, पुरुष और स्त्री भी लेकिन यहाँ कोई नायक या नायिका नहीं सब अपने-अपने जीवन का युद्ध लड़ रहे हैं। वास्तव में इस उपन्यास का नायक मुर्गियाचक ही है। हकीकत यह है कि देश के हर शहर में ढूँढने पर अनेक मुर्गियाचक मिल जायेंगे। यह वर्तमान समय की त्रासदी  है कि हर मुर्गियाचक अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। कितने मुर्गियाचक तथाकथित विकास की आँधी में बुलडोजर की भेंट चढ़ रहे हैं। जिस प्रकार मॉल कल्चर ने छोटे दुकानदारों को निगलना शुरू कर दिया है, उसी प्रकार इको टूरिज्म के नाम पर कितने गाँव-मोहल्ले नक़्शे से मिटाए जा रहे हैं. आस्था के नए केन्द्रों की डिस्कवरी हो रही है। धर्...