संदेश

अज़रा अब्बास लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यादवेन्द्र का आलेख 'मेरे हाथ खोल दिए जाएँ'

चित्र
  यादवेन्द्र सभ्य बनने की कोशिश में हम सामान्यतया उन हरकतों से बचने की कोशिश करते हैं जो प्राकृतिक तौर पर सहज ही हमारे साथ घटित हो जाती हैं। मसलन हम सार्वजनिक जगह पर छींकने से बचना चाहते हैं। लेकिन यह ऐसी प्रक्रिया है जिसे हम चाह कर भी उपेक्षित नहीं कर पाते और सबकी नजरों में आ जाते हैं। पुरुषों की ये हरकतें तो तब भी लोग अनदेखा कर देते हैं लेकिन एक स्त्री के साथ जब यह घटित होता है, तब यह पुरुषवादी सोच के अन्तर्गत अश्लील मान लिया जाता है। अज़रा अब्बास की एक उम्दा कहानी "ख़ारिश" इस पुरुषवादी सोच की तह को उधेड़ने की कोशिश करती है। आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी महत्त्वपूर्ण रचना को आधार बना कर अपनी बेलाग बातें करते हैं। कॉलम के अंतर्गत यह आठवीं प्रस्तुति है। इस बार अपने कॉलम के अन्तर्गत यादवेन्द्र ने अज़रा अब्बास की एक उम्दा कहानी "ख़ारिश" के बहाने स्त्रियों की उस विडम्बना पर बात किया है, जो हालांकि उनकी जरूरत है, फिर भी उसे पूरा करने से यथासम्भव बचती हैं। बल्कि...