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गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'स्त्री की दृष्टि, गति और लांछन'

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गरिमा श्रीवास्तव  हमारा पितृसत्तात्मक समाज आधुनिक और विकसित होने का चाहें जितना दावा कर ले, स्त्रियों को ले कर अपने पूर्वाग्रहों को वह आज भी छोड़ नहीं पाता। जाने अनजाने वह स्त्रियों पर अपने अभिभावकत्व, और उसके चलते अधिकार और अनुशासन को आयद करने का परोक्ष या प्रत्यक्ष प्रयास करता ही रहता है। लेकिन बदले हुए समय में स्त्रियों ने न केवल 'खुद की पहचान' को स्थापित किया बल्कि उसे कला के विभिन्न माध्यमों के जरिए संप्रेषित भी किया है। आलोचना के क्षेत्र में  गरिमा श्रीवास्तव की  एक प्रतिष्ठित जगह है। उन्होंने आलोचना के अपने तरीके विकसित करते हुए अपनी बातें सुस्पष्ट तरीके से रखी है। अनुराधा सिंह की एक कविता  ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ की जिस तरीके से उन्होंने तहकीकात की है वह नायाब है। अपने विस्तृत आलेख में वे लिखती हैं " अनुराधा सिंह की कविता जिस ‘अभियोग’ की बात करती है, वह क़ानूनी या औपचारिक के बजाय सांस्कृतिक है। यह वह अभियोग है जो परंपरा, स्मृति और सामूहिक नैतिकता के नाम पर स्त्री पर न जाने कब से स्वतः लगता रहा है। यहाँ कोई न्यायाधीश नहीं, कोई अदालत नहीं, कोई लिखित निय...

अनुराधा सिंह की कविताएँ

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अनुराधा सिंह युवा कवयित्री अनुराधा सिंह की कविताएँ अभी हाल ही में लमही के अप्रैल 2017 अंक में प्रकाशित हुई हैं । अनुराधा ने अपने कथ्य से ही नहीं अपितु अपनी कविताओं में शब्दों के चयन, बिम्ब और अपने शिल्प के जरिए भी ध्यान आकृष्ट किया है । इसीलिए इन कविताओं से रु-ब-रु होते हुए उस ताजगी और टटकेपन का अहसास होता है जो अब कविताओं से अब अक्सरहा नदारद दिखने लगी है। आलोचक ओम निश्चल की एक लम्बी टिप्पणी के साथ आज पहली बार पर प्रस्तुत है अनुराधा सिंह की कविताएँ।     भाषा से नहीं , कथ्य से बनती है कविता ओम निश्चल किसी भी कविता में हम क्या तलाशते हैं। क्या केवल भाषा ? क्या केवल कथ्य ? क्या केवल सरोकार ? क्या कवि का अपना अंदाजेबयां जो औरों से जुदा हो ? क्या चाहते हैं हम कविता से ? कविता क्या गद्य की उस अविजित सत्ता में होती है जो इन दिनों उस पर आच्छादित है ? क्या वह उस द्रवणशील संवेदनशील कवि की चेतना में है जो आंखों के आंसू , कंठ में फँसे हुए कौर , कबूतरों से छिनते अरण्य , प्रकृति से ओझल होती नदी , चिड़ियों से छिनते घोंसले , कविता से रूठती भाषा और स्त्री से छिनते उस...