गरिमा श्रीवास्तव का आलेख 'स्त्री की दृष्टि, गति और लांछन'
गरिमा श्रीवास्तव हमारा पितृसत्तात्मक समाज आधुनिक और विकसित होने का चाहें जितना दावा कर ले, स्त्रियों को ले कर अपने पूर्वाग्रहों को वह आज भी छोड़ नहीं पाता। जाने अनजाने वह स्त्रियों पर अपने अभिभावकत्व, और उसके चलते अधिकार और अनुशासन को आयद करने का परोक्ष या प्रत्यक्ष प्रयास करता ही रहता है। लेकिन बदले हुए समय में स्त्रियों ने न केवल 'खुद की पहचान' को स्थापित किया बल्कि उसे कला के विभिन्न माध्यमों के जरिए संप्रेषित भी किया है। आलोचना के क्षेत्र में गरिमा श्रीवास्तव की एक प्रतिष्ठित जगह है। उन्होंने आलोचना के अपने तरीके विकसित करते हुए अपनी बातें सुस्पष्ट तरीके से रखी है। अनुराधा सिंह की एक कविता ‘मुड़ कर न देखने का अभियोग’ की जिस तरीके से उन्होंने तहकीकात की है वह नायाब है। अपने विस्तृत आलेख में वे लिखती हैं " अनुराधा सिंह की कविता जिस ‘अभियोग’ की बात करती है, वह क़ानूनी या औपचारिक के बजाय सांस्कृतिक है। यह वह अभियोग है जो परंपरा, स्मृति और सामूहिक नैतिकता के नाम पर स्त्री पर न जाने कब से स्वतः लगता रहा है। यहाँ कोई न्यायाधीश नहीं, कोई अदालत नहीं, कोई लिखित निय...