उद्भ्रान्त की कविताएँ
उद्भ्रान्त मनुष्य ऐसा प्राणी है जो हँस सकता है। आमतौर पर यह हँसना खुशी की स्थिति में होती है। एक दूसरे से मिलते समय भी हम अपनी खुशी का इज़हार करते हैं। कभी कभी दुःख के क्षणों में भी व्यंग्य के तौर पर मनुष्य हँसता है। हँसी प्रतिरोध का सशक्त माध्यम है इसीलिए निरंकुश लोगों के लिए यह दिक्कततलब होती है। बलबन जैसे शासक के दरबार में कोई भी हँसने का साहस नहीं कर पाता था। किसी को रुलाना बहुत आसान होता है लेकिन किसी के चेहरे पर हँसी ला पाना कठिन होता है। अपनी कविता हँसी में उद्भ्रान्त जी लिखते हैं 'रुदन का नहीं/ हँसी का विस्फोट/ जिससे प्रथम सहमा/ फिर काँपा दिग्मंडल।' आज उद्भ्रान्त जी ने अपने उम्र का 78वाँ पड़ाव पूरा कर लिया है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं उद्भ्रान्त की कविताएँ। उद्भ्रान्त की कविताएँ स्त्री की जगह एक स्त्री की जगह कितनी है इस विराट सृष्टि में जिसे बचाने ताज़िंदगी वह करती संघर्ष प्रकृति से, समाज से, समाज के बेहतर कहे जाने वाले हिस्से से और- अपने आप से भी? जरूर वह जगह बहुत बड़ी होगी या फिर...