संदेश

उद्भ्रान्त लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

उद्भ्रान्त की कविताएँ

चित्र
उद्भ्रान्त मनुष्य ऐसा प्राणी है जो हँस सकता है। आमतौर पर यह हँसना खुशी की स्थिति में होती है। एक दूसरे से मिलते समय भी हम अपनी खुशी का इज़हार करते हैं। कभी कभी दुःख के क्षणों में भी व्यंग्य के तौर पर मनुष्य हँसता है। हँसी प्रतिरोध का सशक्त माध्यम है इसीलिए निरंकुश लोगों के लिए यह दिक्कततलब होती है। बलबन जैसे शासक के दरबार में कोई भी हँसने का साहस नहीं कर पाता था। किसी को रुलाना बहुत आसान होता है लेकिन किसी के चेहरे पर हँसी ला पाना कठिन होता है। अपनी कविता हँसी में उद्भ्रान्त जी लिखते हैं 'रुदन का नहीं/ हँसी का विस्फोट/ जिससे प्रथम सहमा/ फिर काँपा दिग्मंडल।' आज उद्भ्रान्त जी ने अपने उम्र का 78वाँ पड़ाव पूरा कर लिया है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं उद्भ्रान्त की कविताएँ। उद्भ्रान्त की कविताएँ  स्त्री की जगह एक स्त्री की जगह  कितनी है इस विराट सृष्टि में  जिसे बचाने ताज़िंदगी वह करती संघर्ष  प्रकृति से,  समाज से,  समाज के बेहतर कहे जाने वाले हिस्से से  और- अपने आप से भी? जरूर वह जगह  बहुत बड़ी होगी  या फिर...

उद्भ्रान्त की आत्मकथा के तीसरे खंड "मैंने जो जिया- 3 : काली रात का मुसाफ़िर" की मिथिलेश श्रीवास्तव द्वारा की गई समीक्षा

चित्र
आत्मकथा लिखना जितना आसान लगता है उतना यह आमतौर पर होता नहीं। यह कांटों पर चलने सरीखा होता है।  आत्मकथा  में लेखक से सच्चाई की अपेक्षा की जाती है न कि कथा कहानी गढ़ने की। गांधी जी की आत्मकथा 'माई एक्सपेरिमेंट विद ट्रुथ' इसीलिए एक बेहतरीन आत्मकथा मानी जाती है कि इसमें गांधी जी ने बेबाकी से अपनी गलतियों के बारे में भी लिखा। आत्मकथा लिखते समय  लेखक अगर तटस्थ नहीं हो पाता तो ये दिक्कत सामने आती है।  आत्मकथा कई खण्डों में भी लिखने की परम्परा है।  हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा चार खंडों 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' (1969), ' नीड़ का निर्माण फिर' (1970), ' बसेरे से दूर' (1977), ' दशद्वार से सोपान तक' (1985) लिखी। रमाकांत शर्मा उद्भ्रान्त का भी लिखने के मामले में कोई जवाब नहीं। अब जब लोग महाकाव्य लिखने को बीते जमाने की बात मानने लगे हैं, उद्भ्रान्त ने कई महाकाव्य लिख डाले हैं। इन दिनों वे भी अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं। इस आत्मकथा का तीसरा खंड "मैंने जो जिया- 3 : काली रात का मुसाफ़िर" हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस खंड में उद्भ्रांत ने अपने जीवन के...

उद्भ्रांत की आत्मकथा 'काली रात का मुसाफ़िर' की अरुण आदित्य द्वारा की गई समीक्षा 'काली रात और जगमगाते जुगनुओं की बात'

चित्र
जब अन्य रचनाकार अपना कविता संग्रह लाने की फिक्र में पड़े होते हैं उद्भ्रांत जी उस समय 'रुद्रावतार' और 'स्वयंप्रभा' जैसे महाकाव्यों का सृजन कर रहे होते हैं। उनकी खासियत यह है कि वे हार नहीं मानते और लगातार अपनी तरह से अपनी राह पर आगे बढ़ते रहते हैं। आजकल उद्भ्रांत जी अपनी आत्मकथा 'मैंने जो जिया' लिख रहे हैं। इसमें वे अपने जीवन संघर्षों के साथ साथ रचनात्मक यात्रा और रचनात्मक अनुभवों को शिद्दत के साथ लेखनीबद्ध कर रहे हैं। हाल ही में उनकी आत्मकथा का तीसरा खण्ड 'काली रात का मुसाफ़िर' प्रकाशित हुआ है। इसकी समीक्षा करते हुए कवि अरुण आदित्य लिखते हैं "विडंबना देखिए कि साहित्य में जहाँ वे तेजी से कदम बढ़ा रहे थे, वहीं नौकरी के क्षेत्र में लगातार अवरोधों और टकराहटों का सामना करना पड़ रहा था। लेखक के लिए इन टकराहटों का रचनात्मक योगदान भी रहा। इन्हीं की वजह से पाठक को प्रसार भारती के भीतर की राजनीति, उठापटक और प्रशानिक कार्यशैली का असल चेहरा देखने को मिलता है। कश्मकश और उठापटक के बीच वे साहित्य के लिए हर संभव प्रयास करने के लिए तत्पर रहते थे।" आइए आज पहली ...

उद्भ्रान्त का आलेख 'सीमित संसाधन, संघर्षधर्मी वैचारिकता का लघु पत्रिका आंदोलन'

चित्र
  उद्भ्रान्त  'लघु पत्रिका' सामान्य तौर पर उसे माना जाता है जिसे निजी या अत्यल्प साधनों द्वारा प्रकाशित किया जाता हो। जिसके प्रकाशन में किसी महत्त्वपूर्ण प्रतिष्तोठान का हाथ न हो। आजादी के पहले अनेक ऐसी पत्रिकाएं प्रकाशित हुईं, जिन्होंने अंग्रेजी सरकार को परेशान कर दिया। आजादी के बाद भी ऐसी पत्रिकाओं का प्रकाशन जारी रहा जिन्होंने समय समय पर सरकारों को उनके दायित्व बोध से अवगत कराने का कार्य किया। बदली परिस्थितियों में लघु पत्रिका आन्दोलन के समक्ष नई चुनौतियां हैं। युवा जैसी पत्रिका के सम्पादक उद्भ्रान्त इन चुनौतियों की तरफ इशारा करते हुए उचित ही लिखते हैं 'अब स्थितियां-परिस्थियां बदल चुकी हैं। पत्रिकाओं के संदर्भ में ही नहीं, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो राजनीतिक आकाश में भी घना कोहरा छाया है। नई पीढ़ी उस तरह संघर्ष करने में विश्वास नहीं करती। उसे पठन-पाठन में भी रुचि नहीं। प्रौद्योगिकी बहुत आगे बढ़ गई है। बाजार ने विश्व पर आधिपत्य स्थापित कर लिया है। हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्ट फोन है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आपको हर मामले में सलाह देने और निर्देशित करने को...