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राजेश्वर वशिष्ठ द्वारा की गई समीक्षा 'मैं कृतज्ञ हूँ – अर्थवान जीवन का मूलमंत्र'

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  मनुष्य के जीवन में सामूहिकता की अपनी एक विशिष्ट भूमिका रही है। वह अपनी वरिष्ठ पीढ़ी से हमेशा कुछ न कुछ सीखता रहा है। इन संचित अनुभवों ने ही मनुष्य को सभी प्राणियो में विशिष्ट बना दिया है। सभी मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी के प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हैं।  इस क्रम में सतीश आर्य और अशोक वर्मा के सम्पादन में एक जरूरी किताब प्रकाशित हुई है 'आई एम ग्रेटफुल' यानी 'मैं कृतज्ञ हूं'। सम्पादक द्वय इस किताब की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए अपनी भूमिका में लिखते हैं : "  ‘आई एम ग्रेटफुल’ में 151 चुनी हुई वास्तविक जीवन की कहानियाँ हैं, जिनमें लोग भावनाओं को व्यक्त करने की अपनी आंतरिक इच्छा के आगे नतमस्तक होते हैं। चाहे युवा किशोर हों या अस्सी वर्ष से अधिक उम्र के, वे सभी आम लोग हैं; वे भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों से हैं और वे दुनिया के विभिन्न हिस्सों से भी हैं। इस तरह, ये कहानियाँ हमें मानवीय भावनाओं के शानदार रंगमंच के भीतर झाँकने का मौका देती हैं और यादों के खजाने में डुबकी लगाने और कृतज्ञता के रत्नों को बाहर निकालने की सार्वभौमिक इच्छा को प्रकट करती हैं।" कवित...

विनोद शाही के उपन्यास 'ईश्वर के बीज' पर डा. सतीश आर्य की समीक्षा।

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                                                                विनोद शाही     विनोद शाही जाने माने आलोचक हैं। लेकिन कम लोग इस बात से वाकिफ होंगे कि विनोद जी एक बेहतरीन कहानीकार भी हैं। विनोद जी ने 1975 से कहानियां लिखना आरम्भ किया। उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिका धर्मयुग में उनकी दस से अधिक कहानियां प्रकाशित हुईं। इसके अतिरिक्त सारिका , कहानी , हंस और कथा देश जैसी पत्रिकाओं में भी उनकी अनेक कहानियां प्रकाशित हुई। सन   1990 के बाद से उनके कहानी लेखन का सिलसिला थम सा गया। हाल ही में उनका एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास ' ईश्वर के बीज ' प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास की एक समीक्षा लिखी है डा . सतीश आर्य ने। उल्लेखनीय है कि डा . सतीश आर्य अंग्रेज़ी के आलोचक ...