चन्द्रेश्वर का आलेख 'सत्ता के ख़िलाफ खड़े कबीर'
भारतीय साहित्य के सार्वकालिक रचनाकारों में कबीर का नाम शीर्षस्थ रचनाकारों में शामिल है। सही मायनों में कहा जाए तो कबीर ऐसे पहले रचनाकार के रूप में दिखाई पड़ते हैं जो प्रतिरोध का मार्ग चुनते हैं। प्रतिरोध का यह मार्ग उन्होंने खुद चुना था। लेखन वह व्यवहार है जो संवेदनाओं से उपजता है। इसे जबरन नहीं किया जा सकता। सत्ता के खिलाफ खड़ा होना कभी भी आसान नहीं होता। सत्ता किसी भी तरह अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहती है। वह इसके लिए हर समय सारे जतन करती रहती है। वह इसके लिए पाखण्ड रचती रहती है। कबीर इस जतन और पाखण्ड की रूढ़िगत सत्ता के ही खिलाफ आजीवन खड़े रहे। उनके लिए जीवन मूल्य सबसे ऊपर था। वह ढाई आखर वाले प्रेम के पक्षधर थे। प्रेम का पथ कंटकाकीर्ण होता है। कबीर को पता है कि सब इस पथ पर नहीं चल पाते। बल्कि इसके लिए शीश को उतार कर भुई पर धरने का साहस रखना होता है। वे उस जीवन व्यवहार के समर्थक थे जहां 'थोथा को उड़ा' कर 'सार सार को गह' लिया जाता है। आज जब अपने पास सब कुछ बटोर लेने की होड़ पागलपन की हद तक मची हुई है, कबीर बस उतने की ही कामना करते हैं जिसमें 'कुटुम समा जाए' और ...