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चन्द्रेश्वर का आलेख 'सत्ता के ख़िलाफ खड़े कबीर'

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  भारतीय साहित्य के सार्वकालिक रचनाकारों में कबीर का नाम शीर्षस्थ रचनाकारों में शामिल है। सही मायनों में कहा जाए तो कबीर ऐसे पहले रचनाकार के रूप में दिखाई पड़ते हैं जो प्रतिरोध का मार्ग चुनते हैं। प्रतिरोध का यह मार्ग उन्होंने खुद चुना था। लेखन वह व्यवहार है जो संवेदनाओं से उपजता है। इसे जबरन नहीं किया जा सकता। सत्ता के खिलाफ खड़ा होना कभी भी आसान नहीं होता। सत्ता किसी भी तरह अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहती है। वह इसके लिए हर समय सारे जतन करती रहती है। वह इसके लिए पाखण्ड रचती रहती है। कबीर इस जतन और पाखण्ड की रूढ़िगत सत्ता के ही खिलाफ आजीवन खड़े रहे। उनके लिए जीवन मूल्य सबसे ऊपर था। वह ढाई आखर वाले प्रेम के पक्षधर थे। प्रेम का पथ कंटकाकीर्ण होता है। कबीर को पता है कि सब इस पथ पर नहीं चल पाते। बल्कि इसके लिए शीश को उतार कर भुई पर धरने का साहस रखना होता है। वे उस जीवन व्यवहार के समर्थक थे जहां 'थोथा को उड़ा' कर 'सार सार को गह' लिया जाता है। आज जब अपने पास सब कुछ बटोर लेने की होड़ पागलपन की हद तक मची हुई है, कबीर बस उतने की ही कामना करते हैं जिसमें 'कुटुम समा जाए' और ...

महेश चंद्र पुनेठा का आलेख 'तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी'

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महेश चन्द्र पुनेठा  पहली बार का आर्काइव देखते हुए कुछ ऐसी सामग्री मिली जिसका हम अपरिहार्य कारणों से तत्काल प्रकाशित नहीं कर पाए थे। आगे से हम हर महीने  आर्काइव की कोई एक सामग्री आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे। इस कड़ी की शुरुआत हम कर रहे हैं महेश चन्द्र पुनेठा की इस पोस्ट से। महेश चन्द्र पुनेठा न केवल एक बेहतर कवि हैं बल्कि वे एक बेहतर आलोचक भी हैं। इधर महेश ने कई महत्वपूर्ण आलेख लिख कर इस तथ्य को सच साबित किया है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है महेश का कबीर पर यह  सारगर्भित आलेख - तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी। जिसमें इन्होने अपने तर्कों द्वारा यह बात रखी है कि कबीर क्यों हमारे लिए आज भी जरू री  हैं।       'तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी' महेश चन्द्र पुनेठा      छः सौ साल से अधिक व्यतीत हो चुके  हैं पर आज भी कबीर  जिंदा हैं। न केवल किताबों में बल्कि लोकमन में भी। उनकी ऐेसी अनेक पंक्तियाँ हैं जो पढ़े-लिख...

कँवल भारती का आलेख 'भारतीय चिंतन परम्परा में निर्गुणवाद : बौद्ध क्रान्ति के बाद की सबसे बड़ी क्रांति'

  कबीर जयंती पर विशेष  'भारतीय चिंतन परम्परा में निर्गुणवाद :  बौद्ध क्रान्ति के बाद की सबसे बड़ी क्रांति' कँवल भारती   निर्गुणवाद न वेदों से आया और न वेदान्त से। वेदों में बहुदेववाद है और वेदांत में ब्रह्मवाद; और दोनों का कोई सम्बन्ध निर्गुणवाद से नहीं है। वेदान्त में एक ईश्वर की धारणा हो सकती है, पर उसका सम्बन्ध भी ब्राह्मण-भक्ति से होने के कारण उसे ब्रह्म माना गया है। वेदान्त का ब्रह्मवाद शास्त्रवाद में विश्वास करता है और जगत को मिथ्या मानता है। ‘ब्रह्म सत्यम जगन्मिथ्या’ शंकराचार्य ने भी कहा है और उनके दादा गुरु गौडपाद ने भी। ईशावास्योपनिषद कहता है, यह जगत ब्रह्म से बना है और वही इस जगत का पोषक है। (1,15) श्वेताश्वर उपनिषद में एक वाक्य है—‘तमेवं विदित्वाति मृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाम’ (3/18), अर्थात, परमेश्वर को जानकार लोग मृत्यु के बंधन से छूट जाते हैं। किन्तु ऐसी कोई अवधारणा निर्गुणवाद में नहीं है। हालाँकि वेदान्त वेदों के ज्ञान के विरुद्ध और ब्राह्मण-दर्शन के खंडन में क्षत्रियों का दर्शन था। लेकिन बाद में ब्राह्मणों ने इसमें घुसकर उसे भी अपने दर्शन के ...