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कुमार मंगलम का आलेख 'आलोचना का स्वधर्म और उसके सांस्कृतिक महत्व की प्रतिष्ठा'

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  पुरुषोत्तम अग्रवाल  वरिष्ठ आलोचक  पुरुषोत्तम अग्रवाल की ख्याति आमतौर पर मध्यकालीन चिन्तक के तौर पर रही है। लेकिन उनके नाम एक श्रेय और भी है। उन्होंने शिवदान सिंह चौहान की आलोचना की तरफ पहली बार साहित्यिक दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया। इसी क्रम में उन्होंने साहित्य अकादमी के लिए  भारतीय साहित्य के निर्माता के तहत शिवदान सिंह चौहान पर एक महत्त्वपूर्ण विनिबंध लिखा है। कुमार मंगलम ने पुरुषोत्तम अग्रवाल की आलोचकीय निर्मिति को उनके इसी विनिबंध शिवदान सिंह चौहान के द्वारा समझने की एक कोशिश की है। आज पुरुषोत्तम अग्रवाल का जन्मदिन है। उन्हें पहली बार की तरफ से जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। इस अवसर पर हम युवा कवि आलोचक कुमार मंगलम का एक आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  कुमार मंगलम का आलेख 'आलोचना का स्वधर्म और उसके सांस्कृतिक महत्व की प्रतिष्ठा'। 'आलोचना का स्वधर्म और उसके सांस्कृतिक महत्व की प्रतिष्ठा' (पुरुषोत्तम अग्रवाल की दृष्टि में शिवदान सिंह चौहान) कुमार मंगलम शिवदान सिंह चौहान हिंदी के ऐसे अकेले आलोचक हैं जिन पर पुरुषोत्तम ...

कुमार मंगलम की कविताएं

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  कुमार मंगलम  सत्ता का मूल कार्य होता है जनता का कल्याण। क्योंकि सत्ता जनता से ही उद्भूत होती है। लेकिन सत्ता के साथ एक बड़ी त्रासदी यह होती है कि उसके पास अकूत अधिकार जमा हो जाता है। यह अधिकार आखिरकार अहंकार को जन्म देता है। तुलसीदास ने भी कहा है 'प्रभुता पाई काहिं मद नाहीं।' अधिकार पा कर विनम्र बने रहने की कला के उदाहरण विरल ही मिलते हैं। युवा कवि कुमार मंगलम अपनी कविता सत्ता में लिखते हैं 'सत्ता का चाबुक/ धीरे-धीरे पर अनवरत चलता है... / या तो तुम टूट जाओगे/ या तुम क्रूर हो जाओगे।' वैसे लोकतन्त्र की रीढ़ होती है अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता। लेकिन सत्ता यही तो नहीं चाहती। उसे अपने मन के अनुकूल काम करने की आदत पड़ जाती है। प्रतिकूल उसे कुछ भाता ही नहीं। यही नहीं वह बीच का रास्ता भी नहीं छोड़ती। कुमार मंगलम ने कुछ इसी आस्वाद की कविताएं लिखी हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुमार मंगलम की कविताएं। कुमार मंगलम की कविताएं समय की संभावना  एक सिरा पकड़ते ही दूसरा छूटने लगता है कितना भी समेटने का जतन करूं समेटते-समेटते धागा अचानक टूट जाता है जब भी संभलता हूं एक भारी पत्थर अ...

कुमार मंगलम का आलेख मैं अपनी अनास्था में अधिक सहिष्णु हूँ।

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  एक कवि में उसका समय शिद्दत से समाहित होता है। लेकिन कई अर्थों में यह समय एक नहीं, बल्कि अनेक होता है। कुंवर नारायण ऐसे ही कवि रहे हैं जिनमें कई समय एक साथ दिख जाते हैं। जहां एक तरफ वे अपने समकाल को रेखांकित करते हैं वहीं वे मिथकों को पुनर्जीवित करने का काम भी बखूबी करते हैं। हालांकि इन सबके मूल में मनुष्यता है। बीते 19 सितंबर 2022 को कुंवर जी का जन्म दिन था। युवा कवि कुमार मंगलम ने कुंवर जी पर केन्द्रित एक आलेख लिखा है। कुंवर जी की स्मृति को नमन करते हुए आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं कुमार मंगलम का आलेख 'मैं अपनी अनास्था में अधिक सहिष्णु हूँ'। मैं अपनी अनास्था में अधिक सहिष्णु हूँ। कुमार मंगलम स्वप्नान्नं जागरितांत चोभौ येनानुपश्यति। महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति।। (बृहदारण्यक उपनिषद्) भारतीय दर्शन , साहित्य , कला एवं विचार में “सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव अजायते पुनः” का भाव एक कलात्मक दृष्टिकोण के रूप में ही नहीं वरन एक बुनियादी जीवन-दर्शन एवं विवेक के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। जो सृजन भी है सृजनकर्त्ता भी , स्वप्न भी और स्वप्न द्रष्टा भी। भारत...