संदेश

राजेन्द्र कुमार लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राजेन्द्र कुमार का आलेख 'गोदान की रचना-दृष्टि'

चित्र
  राजेन्द्र कुमार  प्रेमचंद गहन संवेदना के रचनाकार थे। उन्होंने निरन्तर अपने लेखन को बदलते समय के साथ परिमार्जित किया। वे जानते थे कि केवल अतीत पर गर्व करने से कुछ भी बदलने वाला नहीं है। प्रेमचंद स्पष्ट कहते हैं कि 'भूत हमारे भविष्य का रहबर नहीं बन सकता।' प्रेमचंद की सूक्ष्म संवेदना उन छल छद्मों को बेहतर तरीके से पहचानती थी जो महज दिखावे के लिए आंदोलनधर्मी हो रहे थे। राजेन्द्र कुमार अपने एक आलेख में इसे रेखांकित करते हुए लिखते हैं ' राजनीतिक दृष्टिकोण के तहत प्रेमचंद को यह बहुत साफ दिखने लगा था कि तत्कालीन भारत के ताल्लुकेदार और सामन्त राष्ट्र हित के नाम पर अंग्रेजी हुकूमत के प्रति जिस आक्रोश की मुद्रा अपना रहे थे, उसकी असली प्रकृति साम्राज्यवाद विरोधी होने से कहीं ज्यादा जन-विरोधी थी। क्योंकि उसका हर कदम बड़े पूंजीपतियों में सांठ-गाँठ करके दरअसल अँग्रेजों से सत्ता खुद हथिया लेने की तैयारी मात्र था।' प्रेमचंद हमेशा बदलाव के पक्षधर रहे। 'गोदान' के प्रकाशन से लगभग सात वर्ष पूर्व, जब हिन्दी के कई लेखकों की औपन्यासिक कृतियाँ ('परख', 'गढ़-कुंडार', ...

गोविन्द निषाद का संस्मरण 'स्मृतियों में राजेन्द्र कुमार'

चित्र
राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र कुमार जी की एक तरफ जहां वरिष्ठ लोगों से जुड़े हुए थे वहीं दूसरी तरफ वे बिल्कुल नए रचनाकारों से भी बिना किसी हिचक के शीघ्र ही जुड़ जाते थे। यही वजह है कि उनके चाहने वालों में एक बड़ा वर्ग उन युवाओं का रहा, जिन्हें उन्होंने कभी पढ़ाया नहीं, या कभी अपनी पत्रिका में प्रकाशित नहीं किया। इन युवाओं का जुड़ाव उनकी सरलता सहजता की वजह से हुआ। इन युवाओं का जुड़ाव उनकी विद्वता की वजह से हुआ। गोविन्द निषाद इलाहाबाद के उभरते हुए कवि कहानीकार हैं। उनका गद्य सरस, सहज और आकर्षक होता है। गोविन्द हालांकि राजेन्द्र कुमार जी से कभी मिल नहीं पाए। मिले भी तो मृत्यु की सूचना के पश्चात। लेकिन उनके पास राजेन्द्र कुमार जी से जुड़ा एक आत्मीय संस्मरण है। अपने संस्मरण में गोविन्द लिखते हैं 'अभी मेरी एक कहानी प्रकाशित हुई है तद्भव में, "तो आ रही है मिस काजल" जिसका शीर्षक है। सर ने उसको पढ़ा। इस समय तक वो पढ़ रहे थे कि 'तद्भव' में क्या लिखा जा रहा है? उस कहानी को उन्होंने पढ़ा और मेरा उस पर पता लिखा हुआ था कि मैं इलाहाबाद में रहता हूँ। मुझे यह बात तब पता चली जब किसी ने ...

मनीष चौरसिया की रपट "हम हरदम रहेंगे दुनिया में"

चित्र
किसी भी व्यक्ति की लोकप्रियता का आंकलन करना हो तो देखना चाहिए कि उसके जीवन के उपरान्त वह लोगों की स्मृतियों में किस तरह जिंदा है। 16 जनवरी 2026 को राजेन्द्र कुमार का देहावसान हुआ। उनकी अनुपस्थिति से  इलाहाबाद में वह सन्नाटा पैदा हो गया है जिसकी भरपाई सम्भव नहीं है।  8 फरवरी 2026 को राजेन्द्र कुमार की स्मृति में एक सभा का आयोजन इलाहाबाद के सभी संगठनों की तरफ से किया गया। किसी भी लेखक की स्मृति में एक साथ इतने दिग्गजों का जुटान मैने नहीं देखा। यह राजेन्द्र कुमार के व्यक्तित्व का चुम्बकीय आकर्षण था कि सब अपने प्रिय शिक्षक, कवि, आलोचक को श्रद्धांजलि देने के लिए स्वतः स्फूर्त ढंग से आए। रांची से रणेंद्र, रविभूषण, बनारस से सदानंद साही, कृष्ण मोहन सिंह, विंध्याचल यादव, देहरादून से धीरेन्द्र तिवारी, उत्तराखंड से ही शैलेय, दिल्ली से सन्ध्या नवोदिता और मृत्युञ्जय, लखनऊ से कौशल किशोर के साथ साथ इलाहाबाद से सुधांशु मालवीय, अजामिल, हरीश चन्द्र पाण्डे, अली अहमद फातमी, अजामिल, अनीता गोपेश, सन्तोष भदौरिया, प्रणय कृष्ण, लालसा यादव, विवेक निराला, बसंत त्रिपाठी, शिवानन्द मिश्र, संगम लाल, अवनीश य...