राजेन्द्र कुमार का आलेख 'गोदान की रचना-दृष्टि'
राजेन्द्र कुमार प्रेमचंद गहन संवेदना के रचनाकार थे। उन्होंने निरन्तर अपने लेखन को बदलते समय के साथ परिमार्जित किया। वे जानते थे कि केवल अतीत पर गर्व करने से कुछ भी बदलने वाला नहीं है। प्रेमचंद स्पष्ट कहते हैं कि 'भूत हमारे भविष्य का रहबर नहीं बन सकता।' प्रेमचंद की सूक्ष्म संवेदना उन छल छद्मों को बेहतर तरीके से पहचानती थी जो महज दिखावे के लिए आंदोलनधर्मी हो रहे थे। राजेन्द्र कुमार अपने एक आलेख में इसे रेखांकित करते हुए लिखते हैं ' राजनीतिक दृष्टिकोण के तहत प्रेमचंद को यह बहुत साफ दिखने लगा था कि तत्कालीन भारत के ताल्लुकेदार और सामन्त राष्ट्र हित के नाम पर अंग्रेजी हुकूमत के प्रति जिस आक्रोश की मुद्रा अपना रहे थे, उसकी असली प्रकृति साम्राज्यवाद विरोधी होने से कहीं ज्यादा जन-विरोधी थी। क्योंकि उसका हर कदम बड़े पूंजीपतियों में सांठ-गाँठ करके दरअसल अँग्रेजों से सत्ता खुद हथिया लेने की तैयारी मात्र था।' प्रेमचंद हमेशा बदलाव के पक्षधर रहे। 'गोदान' के प्रकाशन से लगभग सात वर्ष पूर्व, जब हिन्दी के कई लेखकों की औपन्यासिक कृतियाँ ('परख', 'गढ़-कुंडार', ...