अखिलेश कुमार शंखधर का आलेख 'मणिपुर की ‘महिप पत्रिका’ का साहित्यिक अवदान'




किसी भी साहित्यिक पत्रिका का मुख्य उद्देश्य साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं को प्रकाशित करने के साथ साथ स्थानीय रचनाशीलता को बढ़ावा देना भी होता है। गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका निकलना तमाम चुनौतियों से भरा होता है। लेकिन कुछ पत्रिकाओं ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेहतर उदाहरण प्रस्तुत किया है। महिप ऐसी ही पत्रिका है जिसका प्रकाशन मणिपुर की प्रतिष्ठित स्वैच्छिक हिंदी संस्था ‘मणिपुर हिंदी परिषद्’ द्वारा किया जाता है। अखिलेश शंखधर लिखते हैं - " ‘महिप पत्रिका’ ने हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवियों और रचनाकारों पर बेहतरीन सामग्री तो प्रस्तुत की ही है, साथ ही इस पत्रिका ने अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य से हिंदी के पाठकों को परिचित कराने के उद्देश्य से ही मणिपुरी के अनेक रचनाकारों पर केंद्रित अंक निकाले हैं। साथ ही साथ मणिपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं के विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं को भी पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। महिप पत्रिका ने आरंभ से ही मणिपुरी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य को अनुवाद के माध्यम से व्यापक पाठक जगत् के समक्ष प्रस्तुत करने का सराहनीय उद्यम किया है। अनूदित रचनाओं को प्रकाशित कर इस पत्रिका ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भी अपना अहम योगदान दिया है।" अखिलेश शंखधर ने इस पत्रिका पर एक महत्त्वपूर्ण शोध आलेख लिखा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अखिलेश कुमार शंखधर का आलेख 'मणिपुर की ‘महिप पत्रिका’ का साहित्यिक अवदान'।


'मणिपुर की ‘महिप पत्रिका’ का साहित्यिक अवदान'


खिलेश कुमार शंखधर


मणिपुर की हिंदी पत्रकारिता का सुदीर्घ और समृद्ध इतिहास रहा है। हिंदीत्तरभाषी इस राज्य में हिंदी पत्रकारिता के संवर्धन और विकास में जिन पत्रिकाओं ने सार्थक और महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया, उनमें ‘महिप पत्रिका’ अग्रगण्य है। मणिपुर की प्रतिष्ठित स्वैच्छिक हिंदी संस्था ‘मणिपुर हिंदी परिषद्’ द्वारा इस पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है। ‘महिप’ अभिधान वस्तुतः मणिपुर हिंदी परिषद् का ही संक्षिप्त रूप है। इस पत्रिका का प्रवेशांक 14 सितंबर, सन् 1985 को प्रकाशित हुआ। आरंभ में इसका नाम ‘मणिपुर हिंदी परिषद् पत्रिका’ रखा गया। इसके पहले संपादक आचार्य राधागोविंद थोङाम बनाए गए। शुरुआत में अनेक वर्षों तक यह पत्रिका मासिक रूप में प्रकाशित होती रही, अनंतर सन् 1991 से इसे ‘महिप पत्रिका’ शीर्षक से त्रैमासिक रूप में प्रकाशित किया जाने लगा। इस पत्रिका का कलेवर प्रायः लघु ही रहा है, तथापि हिंदी और मणिपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के उन्नयन में इसका अवदान विराट् और विशिष्ट रहा है। मणिपुर हिंदी परिषद्, इंफाल की स्थापना जिन विशिष्ट उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की अभिपूर्ति के लिए की गई थी उनमें से एक प्रमुख उद्देश्य यह भी था कि हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बीच प्रगाढ़ संबंध स्थापित किया जा सके। ‘महिप पत्रिका’ के प्रकाशन के पीछे भी उद्देश्य यही था कि किस प्रकार न केवल हिंदी का प्रचार हो वरन् उसके साहित्यिक विकास को भी समझा जाए। इस पत्रिका को प्रकाशित करने के पीछे यह भी एक सर्वप्रमुख लक्ष्य था कि मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता की संभावनाओं की तलाश की जाए और उसकी सीमाओं को समझा जाए। आरंभिक दौर में यह पत्रिका परिषद् के साहित्य विभाग के अंतर्गत प्रकाशित होती थी, किंतु बाद में इसका प्रकाशन पत्रिका प्रकाशन विभाग द्वारा किया जाने लगा। आचार्य राधागोविंद थोङाम, प्रो. देवराज, प्रो. सगोलसेम लनचेनबा मीतै और प्रो. इबोहल सिंह काङ्जम क्रमशः इसके संपादक रहे।



‘महिप पत्रिका’ का भाषाई और साहित्यिक प्रदेय इस दृष्टि से असंदिग्ध है कि रचनाओं के चयन एवं प्रकाशन में इस पत्रिका ने उदार और सर्वसमावेशी दृष्टि अपनाई। हिंदी के साथ-साथ मणिपुरी सहित अन्य भारतीय भाषाओं की रचनाएँ भी अनूदित रूप में इस पत्रिका में प्रकाशित हुईं। लघु कलेवर रखते हुए भी ऐसे उदाहरण भी देखने को मिले जहाँ संपूर्ण कविता संग्रह ही इस पत्रिका ने अपने एक अंक में प्रकाशित किया। ‘महिप पत्रिका’ में केवल भाषा और साहित्य संबंधी रचनाएँ ही प्रकाशित नहीं हुईं वरन् समाज और संस्कृति संबंधी रचनाएँ प्रकाशित करके इस पत्रिका ने यह सिद्ध किया कि साहित्य का व्यापक उद्देश्य जन सरोकारों की अभिव्यक्ति भी है। दूसरे शब्दों में कहें तो कह सकते हैं कि साहित्य और समाज को अभिन्न मानते हुए इस पत्रिका ने साहित्यिक रचनाओं के समांतर ही सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों से संबंधित रचनाएँ भी प्रकाशित कीं। ‘महिप पत्रिका’ की एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि इसने सर्जनात्मक लेखन और आलोचनात्मक लेखन दोनों को समान महत्त्व दिया। कहने का आशय यह कि विभिन्न साहित्यिक विधाओं पर रचनात्मक लेखन को प्रकाशित करने के साथ ही इसने आलोचनात्मक लेखन को भी अपने यहाँ प्रकाशित किया है।

मणिपुर की भाषा, साहित्य और संस्कृति को केंद्र में रखते हुए ‘महिप पत्रिका’ ने लगातार स्तरीय सामग्री का प्रकाशन किया है। मणिपुरी भाषा के विभिन्न रचनाकारों पर केंद्रित इस पत्रिका के अनेक विशेषांक चर्चित रहे। इन विशेषांकों में ‘डॉ. कमल विशेषांक’ (वर्ष 3, अंक-4, 5, 6, दिसंबर 1987-फरवरी 1988), ‘महाकवि अङाङ्हल विशेषांक’ (वर्ष 7, अंक 67, मई 1993) और ‘कवि चाओबा’ (वर्ष 11, अंक 79, सितंबर 1996) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके साथ ही मणिपुर हिंदी परिषद के विभिन्न उन्नायकों पर केंद्रित ‘संकल्प और साधना का उत्कर्ष विशेषांक’ (वर्ष 13, अंक 85, मार्च-जून 1998) अंक ने भी लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इस पत्रिका के ‘मणिपुरी भाषा माँग विशेषांक’ (वर्ष 6, अक्टूबर-नवंबर 1990) की महत्ता असंदिग्ध है। इस अंक के संदर्भ में प्रो. देवराज की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं “महिप ने तीसरा कार्य, भाषा मांग आंदोलन और मणिपुरी भाषा की समृद्धि की जानकारी सारे भारत के लोगों के सामने रखने का किया। इस लक्ष्य के अंतर्गत महिप-पत्रिका का अक्टूबर-नवंबर 1990 का संयुक्तांक “मणिपुरी भाषा माँग विशेषांक” के रूप में प्रकाशित किया। इस विशेषांक की सामग्री का एक बड़ा भाग मणिपुरी भाषा व साहित्य की ऐतिहासिक जानकारी से भरपूर था, जिससे यह सिद्ध होता था कि यह भाषा अन्य भारतीय भाषाओं की भांति ही समृद्ध, प्राचीन तथा प्रगतिशील है। इस भाग में वे तर्क भी दिए गए थे, जो मणिपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची का अंग बनाने का ठोस आधार प्रस्तुत करते थे। विशेषांक की सामग्री के दूसरे भाग में अनेक संस्थाओं के प्रस्ताव तथा विशिष्ट व्यक्तियों के विचार थे, जिनमें केंद्रीय सरकार से मांग की गई थी कि वह मणिपुरी भाषा को उसका लोकतांत्रिक अधिकार प्रदान करे।”1 इस प्रकार यह स्पष्ट है कि महिप पत्रिका ने अपने सामाजिक दायित्व के निर्वहन में भी कोई कोताही न बरती। महिप पत्रिका ने अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य से हिंदी के पाठकों को परिचित कराने के उद्देश्य से ही मणिपुरी के अनेक रचनाकारों पर केंद्रित अंक तो निकाले ही, साथ ही साथ मणिपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं के विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं को भी पत्रिका में प्रकाशित किया। डॉ. कमल विशेषांक के ‘हिंदी और भारतीय भाषाएँ’ शीर्षक संपादकीय की पंक्तियाँ देखने योग्य हैं “भारत की आजादी के बाद, विशेषकर आजादी के दो दशक बाद से तो मणिपुरी साहित्य-भाषा के जीतने सेवक-सृजक उत्पन्न हुई हैं, उनमें जानने वालों की संख्या करीब पचास प्रतिशत है ये साहित्य सृजक मणिपुर की निर्धनतम घर-परिवार-जमीन से अपने अथक परिश्रम से आगे बढ़े हैं एवं आज समाज-साहित्य के कंगूरों पर पहुँचे हैं। इन सबका अब यह भी मकसद बन गया है कि हिंदी के माध्यम से मणिपुरी भाषा-साहित्य-संस्कृति को देश के समक्ष रखा जाए। इसी भावात्मक कड़ी का एक अंग यह ‘कवि कमल विशेषांक’ भी है।”2 स्पष्ट है कि महिप पत्रिका ने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के संबंध को सदा ही प्रगाढ़ बनाने का कार्य किया। इस पत्रिका ने अपने ‘संकल्प और साधना का उत्कर्ष’ अंक में उन हिंदीसेवियों और हिंदी प्रचारकों का विस्तारपूर्वक परिचय प्रस्तुत किया है जिन्होंने न केवल मणिपुर हिंदी परिषद् के उन्नयन में महती भूमिका निभाई वरन् मणिपुर जैसे हिंदीतर राज्य में हिंदी भाषा का प्रचार और प्रसार किया। ललिता माधव शर्मा, द्विजमणि देव शर्मा, अरिबम पंडित राधामोहन शर्मा, लाइपुबम भागवत देव शर्मा, हिजम विजय सिंह, आचार्यमयुम गुणाधार शर्मा, अयेकपम चंद्रमणि सिंह, फुराइलात्पम पंडित जगदीश शर्मा, लाइमयुम नारायण शर्मा, सिजगुरुमयुम नीलवीर शर्मा शास्त्री, अनौबम विनोद चंद्र शर्मा, इरेङ्बम इबोतोन सिंह, अरिबम घनश्याम शर्मा, वाहेङ्बम नवीनचाँद, येङ्खोम लावण्य सिंह, रामनाथ प्रसाद, डॉ. तखेलम्बम कुंज किशोर सिंह, राजकुमार खिदिरचाँद सिंह, ङाङोम नवकुमार सिंह, खोमद्राम बुद्धिचंद्र सिंह, सिद्धनाथ प्रसाद, राधागोविंद थोङाम, खुलेम चंद्रशेखर सिंह, अरिबम कृष्णमोहन शर्मा, हीरा लाल गुप्त, इबोहल सिंह काङ्जम, सापम तोम्बा सिंह, एलाङ्बम दीनमणि सिंह, अरिबम ब्रजकुमार शर्मा, लैमपोकपम मेनजोर सिंह, सगोलसेम लनचेनबा मीतै सदृश हिंदी प्रचारकों का विस्तृत परिचय पत्रिका के इस अंक में दिया गया है। इसके साथ ही इस अंक में उस समय के चर्चित युवा कवि लनचेनबा मीतै की संपूर्ण काव्यकृति ‘येङ्लु येङ्लुबदा’ का अनुवाद ‘जित देखूँ’ भी दिया गया है।



‘महिप पत्रिका’ ने आरंभ से ही मणिपुरी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में रचित साहित्य को अनुवाद के माध्यम से व्यापक पाठक जगत् के समक्ष प्रस्तुत करने का सराहनीय उद्यम किया है। अनूदित रचनाओं को प्रकाशित करके इस पत्रिका ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भी अपना योगदान दिया है। पत्रिका के लगभग प्रत्येक अंक में पढ़ने के अवश्य ही कोई न कोई अनूदित सामग्री होती है इस पत्रिका के यशस्वी संपादक प्रो. इबोहल सिंह काङ्जम ने जून 2014 अंक को ‘अनुवाद अंक’ के रूप में प्रकाशित किया। अनुवाद को वे कितना महत्त्व देते हैं और इस संदर्भ में उनकी दृष्टि क्या है, इसे उनकी निम्नांकित पंक्तियों से समझा जा सकता है “अनुवाद के द्वारा दो भाषाओं को नजदीक लाया जाता है। अनुवाद कार्य करते समय स्रोत भाषा एवं लक्ष्य भाषा का अपने आप तुलनात्मक एवं व्यतिरेकी अध्ययन हो जाता है। इससे सजातीय और विजातीय भाषाओं में पाई जाने वाली समानताओं और असमानताओं की जानकारी भी होती है। साथ में, दूसरी भाषा के प्रति लगाव और रुचि पैदा हो जाती है। अच्छी अनूदित रचना पढ़ने के बाद कभी-कभी पाठक इतने प्रभावित हो जाते हैं वे स्रोत भाषा की मौलिक रचना को पढ़ना चाहते हैं।”3 अनुवाद केंद्रित पत्रिका का यह अंक विविधता से युक्त और संग्रहणीय है। इस अंक में अनुवाद के महत्त्व को रेखांकित करता हुआ एक आलेख, हिंदी में अनूदित चार मणिपुरी कहानियाँ एक तेलुगु कविता और दो मणिपुरी कविताएँ प्रकाशित हैं।

‘महिप पत्रिका’ का विशिष्ट अवदान यह भी है कि यहाँ तुलनात्मक अध्ययन को प्राथमिकता दी गई इस पत्रिका ने आरंभ से ले कर अद्यावधि किन्हीं दो रचनाकारों अथवा प्रवृत्तियों को ले कर किए गए अध्ययन को अपने यहाँ प्रमुखता से प्रकाशित किया है। हिंदी और मणिपुरी भाषा के विभिन्न रचनाकारों के तुलनात्मक अध्ययन से संबंधित अनेक आलेख पत्रिका के विभिन्न अंकों में प्रकाशित हुए। पत्रिका में प्रकाशित तुलनात्मक अध्ययन से संबंधित कुछ आलेख उल्लेखनीय हैं – निराला और जी शंकर कुरुप, नंदकिशोर नवल, वर्ष 20, अंक 99/100 दिसंबर 2003, मार्च 2004, हिंदी तथा मणिपुरी (साम्य-वैषम्य), डॉ. कु. कि. 88सिंह, वर्ष 20, अंक 99/100, दिसंबर 2003-मार्च 2004, हिंदी-मणिपुरी भाषाई और साहित्यिक विकास की संभावनाएँ, इबोहल सिंह काङ्जम, वर्ष 22, अंक 110, सितंबर 2006, मणिपुरी तथा हिंदी सर्वनामों की शैलीपरक व्यवस्था, इबोहल सिंह काङ्जम, वर्ष 27, अंक 131 दिसंबर 2011, ‘नवजागरणकालीन हिंदी उपन्यास ‘देवरानी जेठानी की कहानी’ एवं मणिपुरी उपन्यास ‘माधवी’ में चित्रित नारी: तुलनात्मक अध्ययन, रामेश्वरी देवी, वर्ष 29, अंक 137 जून, 2013, सांस्कृतिक संवाद में जुड़ी भाषाएँ: हिंदी-मणिपुरी, देवराज, वर्ष 29 अंक 138, सितंबर 2013

‘महिप पत्रिका’ ने न केवल हिंदी भाषा और साहित्य से संबंधित सामग्री का प्रकाशन किया वरन् हिंदी शिक्षण के स्वरूप एवं उसके विभिन्न आयामों पर भी महत्त्वपूर्ण सामग्री इसके अंकों में देखी जा सकती है। इस पत्रिका का ‘हिंदी शिक्षण विशेषांक’ (वर्ष 25, अंक 122, सितंबर 2009) भी पर्याप्त चर्चित रहा। विशेषांक से इतर भी पत्रिका ने अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण से संबंधित यथेष्ठ सामग्री का प्रकाशन अपने अलग-अलग अंकों में किया इस संदर्भ में पत्रिका में प्रकाशित कुछ आलेखों की चर्चा की जा सकती है – ‘अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण की समस्याएँ एवं समाधान’ (मणिपुर के संदर्भ में), डॉ. क्षेत्रिमयुम प्रमिला देवी (वर्ष 26, अंक 126), ‘हिंदी अध्ययन: समस्याएँ एवं निराकरण की संभावनाएँ’, थुन्बुइ (वर्ष 30, अंक 142), ‘मणिपुर में हिंदी का पठन-पाठन’, इबोहल सिंह काङ्जम (वर्ष 26, अंक 126) | डॉ. क्षेत्रिमयुम प्रमिला देवी ने हिंदी शिक्षण के संदर्भ में उचित ही लिखा है “हिंदी-शिक्षण की वर्तमान समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में इसे अत्याधुनिक संसाधनों से जोड़ना आवश्यक है। आज इंटरनेट के युग में रोजगारोन्मुख विषयों की शिक्षा पद्धति नवीनीकरण की दिशा में जहाँ निरंतर द्रुतगामी है वहाँ हिंदी शिक्षण की पद्धति बैलगाड़ी की सवारी है। आज हिंदी भाषा एवं साहित्य शिक्षण को भी यांत्रिक गति का सामना करना है। अतः विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में भाषा-प्रयोगशालाओं का होना अति आवश्यक है, जहाँ छात्र शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कर सकें। भाषा-प्रयोगशालाओं के जरिए श्रव्य एवं दृश्य-श्रव्य (ऑडियो एवं वीडियो) कैसेट जैसे उपकरणों का प्रयोग विचारणीय है क्योंकि हिंदी शिक्षण को अधिकाधिक संप्रेषणीय एवं रोचक बना कर ही आज हम हिंदी आसानी से सीख सकेंगे।”4 अतः यह कहा जा सकता है कि ‘महिप पत्रिका’ ने वर्तमान की जरूरतों को समझते हुए हिंदी शिक्षण की सीमाओं और संभावनाओ पर अनेक अंकों में महत्त्वपूर्ण सामग्री को प्रकाशित कर शिक्षण अधिगम के एक महत्त्वपूर्ण उपागम में अपना योगदान दिया। निस्संदेह किसी भी हिंदी पत्रिका द्वारा इस तरह का उद्यम सराहनीय है और हिंदी की अन्य पत्रिकाओं को भी इसका अनुकरण करना चाहिए। प्रायः परंपरागत और साहित्यिक विषयों पर प्रकाशन सामग्री की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में रहती है, किंतु हिंदी में अधुनातन ज्ञान, प्रविधि और तकनीकी पर सामग्री की उपलब्धता अल्प है।



‘महिप पत्रिका’ ने मणिपुर के अलावा पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों यथा असम, अरुणाचल, नागालैंड आदि के साहित्य, संस्कृति और वहाँ की भाषाओं पर समय समय पर आलेखों का प्रकाशन किया है। कहना यह है कि इस पत्रिका ने पूर्वोत्तर समेत देश के अन्य हिंदीतर राज्यों के साहित्य और वहाँ की भाषाओं पर भी ध्यान केंद्रित किया है। इसके साथ ही ‘महिप पत्रिका’ के अंकों में हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवियों और रचनाकारों से संबंधित सामग्री देखी जा सकती है। ‘महिप पत्रिका’ के गोस्वामी तुलसीदास और मैथिलीशरण गुप्त पर केंद्रित अंक पर्याप्त चर्चित रहे। अज्ञेय, धर्मवीर भारती, गिरिजा कुमार माथुर और डॉ. नगेंद्र आदि हिंदी रचनाकारों पर पत्रिका में प्रकाशित आलेखों ने व्यापक पाठक जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कराया। ‘महिप पत्रिका’ के संदर्भ में उचित ही लिखा गया है “मणिपुर हिंदी परिषद पत्रिका’ ने हिंदी प्रचार के साथ-साथ हिंदी और मणिपुरी भाषाओं के साहित्य की उन्नति को अपना मूल उद्देश्य बनाया। इस पत्रिका में पर्याप्त मात्रा में मणिपुरी से हिंदी में अनूदित सामग्री प्रकाशित होने लगी।कभी-कभी कविताओं का अनुवाद मूल के साथ (नागरी लिपि में) भी छापा गया। इस पत्रिका ने हिंदी और मणिपुरी के रचनाकारों पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित किए, जो पाठकों में चर्चित हुए। हिंदी में मैथिलीशरण गुप्त और तुलसी दास तथा मणिपुरी के लमाबम कमल, नीलवीर शास्त्री, हिजम अङाङहल, कवि चाओबा आदि पर केंद्रित अंक ऐसे ही हैं। इसके माध्यम से हिंदी और मणिपुरी भाषाओं का परिचय बढ़ा और साहित्यिक आदान-प्रदान को गति मिली।रचनाकारों पर केंद्रित विशेषांकों के अतिरिक्त यह पत्रिका विभिन्न रचनाकारों के साक्षात्कार और उनकी रचनाएँ भी प्रकाशित करती रहती है।”5 इस प्रकार इस पत्रिका ने हिंदी और मणिपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विविध आयामों को प्रकाशित करने का सराहनीय प्रयास किया।

मणिपुर की हिंदी पत्रकारिता में ‘महिप पत्रिका’ अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक भूमिका के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस पत्रिका ने यह सिद्ध किया है कि मानवीय मूल्यों, आदर्शों और संस्कारों का संरक्षण साहित्य का वृहत्तर लक्ष्य है। मणिपुरी समाज की विशिष्टता और उसके सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को उजागर करने में भी इस पत्रिका ने अपना योगदान दिया है। पत्रिका के संपादकों की यशस्वी परंपरा रही है जिन्होंने पूर्वग्रहरहित होते हुए सामासिक संस्कृति को प्रकट करने का उपक्रम किया। तुलनात्मक साहित्य, अनुवाद और हिंदी शिक्षण पर स्तरीय सामग्री के प्रकाशन से इस पत्रिका ने अपना अलग स्थान बनाया। मणिपुर के विभिन्न हिंदी प्रचारकों के योगदान को दृष्टिगत रखते हुए इस पत्रिका ने जिस प्रकार उन्हें सम्मान प्रदान किया वह स्तुत्य और अनुकरणीय है। विभिन्न युवा रचनाकारों और शोधार्थी को भी इस पत्रिका ने मंच प्रदान किया। सीमित आर्थिक संसाधनों के होते हुए भी इस पत्रिका ने जिस प्रकार लगातार अंकों का प्रकाशन किया है, वह प्रेरक और सराहनीय है। निश्चय ही मणिपुर की हिंदी पत्रकारिता के मानचित्र पर ‘महिप पत्रिका’ का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा।


संदर्भ

देवराज, संकल्प और साधना, मणिपुर हिंदी परिषद, इंफाल, प्रथम संस्करण 1998 ई., पृष्ठ 9-10

आचार्य राधागोविंद थोङाम (सं.), ‘मणिपुर हिंदी परिषद पत्रिका’, डॉ.कमल विशेषांक, वर्ष 3, अंक 4,5,6, दिसंबर 87-फरवरी 88, मणिपुर हिंदी परिषद्, इंफाल, पृष्ठ 4

इबोहल सिंह काङ्जम (सं.), ‘महिप पत्रिका’ वर्ष 30 अंक 141, जून 2014, मणिपुर हिंदी परिषद्, इंफाल, पृष्ठ 1-2

इबोहल सिंह कोङ्जम (सं.), ‘महिप पत्रिका’ वर्ष 26, अंक 126, सितंबर 2010 ई., मणिपुर हिंदी परिषद्, इंफाल, पृष्ठ 6

अरिबम ब्रजकुमार शर्मा, हिंदी को मणिपुरी की देन, यश पब्लिकेशंस, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2014 ई., पृष्ठ 249


अखिलेश शंखधर 


सम्पर्क 

अध्यक्ष, हिंदी विभाग,

मणिपुर विश्वविद्यालय,

कांचीपुर, इंफाल – 795003 (मणिपुर)


मोबाइल- 9612354531


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