हंगेरियन कवि इश्तवान वोरोश की कविताएँ
इश्तवान वोरोश इस दुनिया में हर चीज की एक छाया होती है। यहाँ तक कि बात, विचार और यथार्थ की भी छाया होती है। और इन छायाओं के लिए हम एक साक्षी होने के नाते खुद भी जिम्मेदार होते हैं। यह जो छाया होती है, वह भी अपनी एक चुनौती प्रस्तुत करती है। उन वास्तविकताओं के लिए जो खुद पर इतराती फिरती हैं। दरअसल यह उस स्वायत्तता की कवायद करती है जो हरेक को उसकी सीमा का बोध कराती है। हंगेरियन कवि इस्तवान वोरोश इन छायाओं की सूक्ष्मता की तस्दीक करते हैं। आज पहली बार पर प्रस्तुत है हंगेरियन कवि इस्तवान वोरोश की कविताएँ। वोरोश की कविताओं का हिन्दी में सहज अनुवाद किया है हिन्दी की चर्चित कवयित्री पंखुरी सिन्हा ने। हंगेरियन कवि इश्तवान वोरोश की कविताएँ (अनुवाद - पंखुरी सिन्हा) भीतर का कमरा आत्मा के भीतर का कमरा कोई गुसलखाना नहीं फिर भी, उसमें एक पुराना बाथ टब है! ज़ाहिर है कि कोई तरीका नहीं इस टब में कहीं से भी पानी ले जाने का लेकिन, आप बैठ सकते हैं उसमें! हर कोई आता है यहाँ अपनी दुल्हन, अपने दूल्हे के साथ! पारदर्शी हो उठता है मोटा आवरण!...