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निशांत

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प्रेम-और बेरोजगारी के कवि के रूप में काफी लोकप्रिय हुए थे। सत्ताईस साल की उम्र में  कविता पर उन्हें प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। उनकी कविता की एक किताब जवान होते हुए लड़के का कुबुलनामा भारतीय ज्ञानपीठ से पिछले साल छप कर आयी है। निशांत की लंबी कविताओं का एक संग्रह   जी हां, लिख रहा हूं राजकमल प्रकाशन से  अभी-अभी छप कर आया है। निशांत प्रेम के कवि हैं। वह प्रेम जो किसी की परवाह नहीं करता और जो सदा अपनी खूबसूरती बरकरार रखता है। यह कवि अपने होने के अस्तित्व को समर्पित करता  है – चाँद के दाग को।  उस चाँद को जिसके पास  सबसे खूबसूरत है उसके अपने गलत होने के निशान। यह कवि जीता है उस निशान के साथ ही जो उसके  दांतों और होठो के स्वप्न में धड़कते हैं। पहली बार पर प्रस्तुत है निशांत की कुछ नवीनतम कवितायें।     घोड़ा और तांगेवाला मेरे पास दुःख है और मेरे पास क्या है? पैरों में लग गए हैं चक्के छोटी हो गयी है पृथ्वी मेरा सुख तुम्हारे पास दुःख बन पहुँचता है मैं एक फूल छूता हूँ वह बाजार में बदल जाता है. ...

सुनील गंगोपाध्याय

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बांग्ला के सुप्रसिद्ध कवि और कथाकार सुनील गंगोपाध्याय का विगत २३ अक्टूबर को निधन हो गया. उनकी स्मृति को याद करते हुए हम प्रस्तुत कर रहे हैं उनकी अंतिम लिखी-प्रकाशित कविता ‘बकुल गंध सरीखा.’ जो मूल रूप से बांग्ला में छपी है. इस कविता का हमारे लिए हिन्दी अनुवाद किया है युवा कवि निशांत ने. कविता के साथ निशांत की एक टिप्पणी भी प्रस्तुत है.     बकुल गंध सरीखा (बकुल पीले रंग का सुगन्धित फूल है, जो बंधुत्व का प्रतीक है ) सुनील गंगोपाध्याय खडा हूँ मैं पर्वत शिखर पर अकेले वृक्ष की तरह सभी दूर खड़े हैं यह गोधूली, मेघ, उदास सूर्यास्त. मैं जानता हूँ- कोई मुझे नहीं बुलाएगा. पृथ्वी की सारी हवा जूठन की तरह मुझे महसूस होती है. इस दृश्य के सारे देवता असहाय हो खड़े हैं. बस स्टाप पर मैं अकेला खड़ा हूँ जैसे पर्वत शिखर हो दिवंगत दोस्तों का चेहरा बीच-बीच में बहुत याद आता है जैसे मैं कभी वादा नहीं निभा पाया हूँ उनका. ढेर सारी किश्तें उधार की नहीं चुका पाया हूँ उनका 'हम लोग पृथ्वी की सारी देनदारियां चुका आये हैं भाई’ उन्होंने कहा   ‘यहाँ तक ...