गीताश्री की कहानी 'ट्रायल'


गीताश्री

हमारा समाज आधुनिक होने का चाहें जितना दावा कर ले, बहुत मामलों में वह आज भी पारम्परिक और पितृसत्तात्मक है। हमारे समाज में आज भी लड़कियों की शादी का दायित्व उस घर का पुरुष ही उठाता है। लड़की से उम्मीद की जाती है कि बिना ना नुकुर किए वह अपने घर के पुरुष सदस्यों के निर्णय को स्वीकार करे। अगर उसने ना कहा तो तुरन्त ही उस पर मनबढ़ होने का आरोप चस्पा कर दिया जाता है। लड़की कैसे रहे, क्या पहने, कैसा काम करे सब तय करने का अधिकार पुरुषों ने जबरन अपने हाथों में ले रखा है। शादी के बाद नव ब्याहता से अपेक्षा की जाती है कि वह घर परिवार की मर्यादा का ध्यान रखे और उसी के अनुसार काम करे। सिर झुका कर पति के साथ साथ सास ससुर, जेठ और देवर का आदेश माने और उनका हुकुम जगाएं। इस तरह शादी करने के बाद लड़की प्रायः अपना अस्तित्व ही खो बैठती है। लेकिन समय बड़ी तेजी से बदल रहा है। लड़कियों की सोच बदल रही है। वे आर्थिक मामलों में ही आत्मनिर्भरता नहीं चाहतीं बल्कि खुद अपने जीवन का निर्णय करना चाहती हैं। माहिया ऐसी ही लड़की है जो पारम्परिक ढाँचे में बंधने की बजाए शादी अपने मन के अनुकूल उस लड़के से करने की हिमायती है जिसे वह अच्छी तरह जानती समझती हो। इसीलिए वह अपने ऑफिस के एक लड़के आशीष से लिव इन के लिए प्रस्ताव रखती है। आशीष खुले विचारों वाला लड़का है। वह इस बात का समर्थक है कि शादी प्रेम का बायस बने न कि घुटन का पर्याय। गीताश्री की कहानी ट्रायल हमारे समय के उस सच को बयां करती है जिसे हम आमतौर पर बचने की कोशिश करते हैं। गीताश्री की कहानी पर अपनी टिप्पणी में वरिष्ठ कथाकार महेश दर्पण लिखते हैं : 'अन्विति' के कहानी विशेषांक में गीताश्री की कहानी ' ट्रायल' नये समय की कहानी है। भले ही अब तक संस्कारों की पोटली लड़कियां ढोती रही हों, अब वे उस मुक्त होना चाहती हैं। वे नहीं चाहतीं कि शादी का अर्थ उनके लिए ऐसी बंदिश बन जाए जो उनकी इच्छाओं का दमन साबित होने लगे। महज़ आज्ञापालन और आशंकाओं से ग्रस्त जीवन अब नई पीढी को स्वीकार नहीं। माहिया इस पीढी की प्रतिनिधि पात्र है। इसीलिए वह विवाह का ट्रायल चाहती है। आशीष एक धैर्यवान पुरुष चरित्र है जो न सिर्फ अपनी शंकाएं सम्मुख करता है बल्कि माहिया की बात के मर्म को भी समझता है कि विवाह दोनों में से किसी की भी कुर्बानी का सबब न बने। वह एक सहज और साझा संबंध बने। जिसकी नींव में प्रेम का आधार हो। ढोंग, दिखावे और चालबाजियों से अधिक समर्थ होता है स्पष्टवादिता, अभय और आत्मनिर्भरता का रास्ता। यही परम्परा से हट कर सोचने वाले स्त्री - पुरुष की पहचान कराता है। यहाँ दूसरे को समझने की कोशिश के साथ - साथ आत्मावलोकन का माद्दा भी कहानी को एक खूबसूरत मोड़ तक पहुंचाता है। इसी मोड़ से नज़र आता है नये बन रहे समाज का रास्ता।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं गीताश्री की कहानी 'ट्रायल'।


कहानी

'ट्रायल' 


गीताश्री


दो व्यक्तियों की मुलाकात, दो रसायनिक पदार्थों की तरह होती है, कोई भी प्रतिक्रिया दोनों को परिवर्तित करती है- कार्ल युंग


“देर मत करो, कब तक अकेली रहोगी। एक समय ऐसा आएगा जब तुम्हें अफसोस होगा। साथी की जरुरत खास उम्र में बहुत महसूस होती है।”

बरिस्ता में बैठ कर कॉफी का घूँट भरते हुए धानी ने माहिया से पूछा था। 

“क्या हम आज इस रोमांटिक शाम रिलेशनशिप पर बात करने आए हैं। देखो न, कितना अच्छा माहौल है। मैं अपनी फेवरेट जगह पर बैठी हूं। इतनी अप्रिय बातें तो मत ही करो यार...?”

“इसमें अप्रिय क्या है”

“सुनो डियर, तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें अब कोई तो चाहिए?

”चाहिए तो, मगर कौन? कौन होगा जो हम जैसी लड़कियों को बाँधने की हिम्मत कर पाए?” माहिया ने अपनी कॉफी में चीनी मिलाते हुए धानी की तरफ मफिन बढ़ाया।

“हां, ये तो है, तुम जैसी लड़कियों से निर्वाह के लिए कोई "लायन हर्टेड" लड़का चाहिए।“

धानी के इतना कहते ही दोनों सखियां खिलखिला पड़ीं। 

आज दोनों सहेलियां कई दिनों के बाद बरिस्ता आई थीं। वैसे तो माहिया को कॉफी पीना कुछ ख़ास पसंद नहीं था, मगर बरिस्ता आना पसंद था। बरिस्ता उसे सपने जैसा लगता था। एक सपनीली जगह, कॉफी की गंध से भरी हुई। यहाँ आ कर उसे लगता कि उसका मिडल क्लास वाला टैबू कहीं झड़ गया है। बरिस्ता में उसे कॉफी और केक खाना खुद को अपग्रेड करने की एक प्रक्रिया लगती थी। हालांकि उसे डिफेन्स कॉलोनी का फोर सीजन बार भी पसंद था जहां वह अक्सर शामें गुजारती थी। दो ठिकानो पर अपनी मीटिंग रखती थी। बरिस्ता या फोर सीजन बार। दोनों पसंदीदा ठिकाने। इन जगहों पर वह अकेली भी देर तक बैठी रह सकती है। किसी के साथ की जरुरत नहीं महसूस होती। उसे अपनी कंपनी से बोरियत नहीं होती। अपना साथ उसे सबसे अधिक पसंद था। कोई पुरुष साथी मिल जाए तो कुछ देर बैठ लेती थी। उसकी शामें अपनी थीं। 


कुछ सोच रही हो क्या तुम?” धानी ने उसे हाथ मारा!

नहीं तो!” माहिया चौंक गई।  

“तो फिर, अब कोई तो खोजो और आगे बढ़ो यार!”

धानी ने उसे बड़े-बुजुर्गो की तरह समझाने की कोशिश की।  

अरे यार, अब तुम बताओ किससे साथ आगे बढ़ें, साला, जब किसी को गर्लफ्रेंड चाहिए होती है तो, तो वह सारे नखरे उठाने के लिए तैयार! किसी के साथ लिव-इन में रहने की बात तो तो वो भी तैयार, मगर जब बीवी की बात आए...”

“बीवी की बात आए तो?” धानी को समझ नहीं आ रहा था। उसे ऐसी समस्या से नहीं जूझना पड़ा था।  


वह और माहिया एक ही कॉल सेंटर में तीन साल से साथ काम कर रही थीं। धानी को कभी नाईट शिफ्ट नहीं भायी, और उसने अपने प्रमोशन आदि की परवाह न करते हुए केवल दिन की ही शिफ्ट ली। वह बुलंदशहर से आते हुए संस्कारों की भी एक पोटली अपने साथ लाई थी। हालांकि लाई तो माहिया भी थी, मगर उसने संस्कार को अपने हिसाब से अपने अनुरुप कर लिए थे। संस्कारों की पोटली लड़कियां ही ढोती हैं। हर समय अदृश्य रुप में उनके साथ वह पोटली लटकी रहती है। कुछ तो पीछा छुड़ा लेती हैं, कुछ उसे ढोती रहती हैं। 


धानी जहां शादी करके सेटल हो गयी थी, वहीं माहिया अभी भी शादी से दूर भाग रही थी। उसे शादी से डर लगता था। उसे एक आज़ाद ज़िन्दगी की आदत पड़ चुकी थी। जब मन आए तब उठो, जब मन आए तब सो जाओ, मन का खाओ, मन का पहनो, कोई टोकने वाला नहीं। और सबसे बड़ी बात कोई उस पर अधिकार जताने वाला नहीं। उसे प्यार तो चाहिए, इसके लिए एक पुरुष चाहिए मगर जैसे ही वह शादी के बारे में सोचती है, उसके सामने कई वे लडकियां आ कर खड़ी हो जाती हैं, जिनकी अभी हाल फिलहाल में ही शादी हुई है, मैली कुचैली नाइटी पहनी हुई, रसोई तक सिमटी। नाइट शिफ्ट वाली रंगोली ने तो नौकरी ही छोड़ दी। वह आज़ाद ख्याल लड़की अब घर की चारदीवारी में बंद है। जो लड़की खुल कर वाइन पीती थी, वह घर की चाय तक सिमट कर रह गयी है।  

ये सब सोच कर ही माहिया घबरा जाती थी। 

“सुन!”

तभी धानी ने उसे फिर टोका।

अब मुझे लग रहा है कि तुम्हारी भटकने वाली उम्र जल्दी ख़त्म हो जाएगी। बहुत हुआ नैनोशिप, माइक्रोशिप, सिचुएशनशिप...। बंद कर ना यार। तू जेन जी की तरह मत कर। तू मिलेनियल्स है। थोड़ा स्थिर मति हो कर सोच। लड़को पर प्रयोग करना बंद कर। थकी नही तुम। 

धानी ने हँस कर माहौल को हल्का किया।  

देख लो, मेरी ताकत!” माहिया ने भी आँखें नचाईं।


अब बरिस्ता में शाम का धुंधलके के साथ लोग आने लगे थे। कई लडकियां जिन्हें अपने बॉयफ्रेंड के साथ समय बिताने को कहीं जगह नहीं मिलती थी, वे कॉफी पर अपने दिल की बात करने आ जाती थीं। कोने भरने लगे थे। माहिया को लगा कि उन्हें भी अब चलना चाहिए। और जल्द से जल्द किसी लड़के पर तो उंगली रखनी चाहिए, मगर किस पर? वह सोच में पड़े पड़े बिल पे कर के घर को आ गयी। मेट्रो में भी बैठी बैठी यही सोचती रही। धानी के हिसाब से तो आशीष और नीलाब दोनों ही उसे पसंद करते हैं। अभी तक जो भी लड़के मिले हैं, वे सब बॉयफ्रेंड तक तो ठीक, मगर जैसे ही शादी की बात आए, वैसे ही नाइटशिफ्ट छोड़ने की रट लगाने लगते हैं। माहिया को लगता है कि वह पति के साथ सुखी नही रह पाएगी। आखिर इंसान शादी करता ही क्यों है? घर के लिए! टिपिकल पति होगा तो शाम होते ही बीवी घर में चाहिए, सजी-धजी, उसका इंतजार करती हुई। पति को उसकी रातें चाहिए होंगी और वह बहुत मेहनत से इस जगह पहुँची है, अब वह नौकरी छोड़ नहीं सकती है! माहिया को इस नौकरी में अपना सुनहरा भविष्य झांकता-सा दिख रहा है। 

“हम्म” 

उसे याद आया निशा का चेहरा। शादी की शर्त्त यही थी कि नाइट शिफ्ट छोड़ना होगा। रोती हुई निशा ने नौकरी को अलविदा कहा और चली गई। उसके बाद वह फिर कभी कहीं नहीं दिखी। 

इस हश्र से वह डरती है। शुरु में कोई शर्त्त ना भी रखे, शादी के बाद तमाशे शुरु होते हैं। कई लड़कियों का रोना-धोना सुन कर दिल बैठने लगता है। शादी के बाद लड़कियों की शामें गुलाम हो जाती हैं। दफ्तर से छूटो तो सीधे घर भागो। देर हुई तो घर में सौ सवालों का सामना करो। कहीं बाहर जाना हो, यात्रा का मन हो तो घर वालों से आज्ञा लो। इतनी-इतनी आशंकाएं माहिया को डराती रहती रहती थीं। जितना सुनती, वह शादी के नाम से दूर होती जाती। शादीशुदा लड़कियों की कथाएं उसे किसी हॉरर फिल्म की तरह लगती थीं। उनमें से अधितकर लड़कियां स्त्रीवादी हो गई थीं। उनके मुंह से अक्सर बहसों में स्त्री अधिकारों का भाषण निकलने लगता था। उनके दुखों का एकमात्र कारण उनका स्त्री होना और समाज, परिवार का स्त्री विरोधी होना था। 

इस माहौल में माहिया खुद को भाग्यशाली मानती थी। किसी के प्रति जवाबदेह तो न थी। कहीं गैरबराबरी का सामना तो नहीं करना पड़ता था। अपने मन की मालिक थी। लेकिन धानी उसके पीछे पड़ी थी। उसका अनुभव बहुत अच्छा था। वह रोमांस में डूबी हुई थी। वह माहिया को अपना उदाहरण दे कर शादी के लिए उकसाती रहती थी। 

एक बार फिर वह उससे कोई नाम पूछ रही थी, कोई लड़का जो उसे पसंद हो। 

धानी ने उसे सुझाया- “शादी मत करो, पहले लिव इन में रह कर उसे परखो, छह महीने, साल भर। जब ठीक लगे तो शादी के बारे में सोचना। 

माहिया को यह सुझाव कुछ हद तक ठीक लगा। हालांकि अपना एकांत भंग होने का भय भी उसे सताने लगा था। किस नाम पर गौर करे। कई नाम थे। कई लड़को से दोस्ती थी। उनमें से किसी के साथ कभी रोमांस के बारे में सोचा ही नहीं था। 



एक चेहरा याद आया। आशीष कुछ ख़ास है। उसे पसंद भी है। 

दो साल से उसे देख रही है। उसे देख कर आत्मीय ढंग से मुस्कुरा देता है। कभी भी जबरन पास आने की कोशिश नहीं। नाईट शिफ्ट में भी उसके साथ उसने कई शिफ्ट की हैं। लड़का सही है! भरोसा करने लायक! वह कर सकती है भरोसा! और क्या पता आशीष के दिल में ही ऐसी कोई बात होगी। कहीं उसने धानी से तो बात नहीं की। अचानक धानी उसके पीछे क्यों पड़ गई है। कुछ तो राज है। वैसे भी धानी तो शादी के बाद एकदम पंडित टाइप की हो गयी है, सबके बीच मैच मेकिंग कराती रहती है। धानी खुल कर बताती क्यों नहीं। वह अचानक आशीष के बारे में क्यों सोचने लगी। कहीं उसके दिल में कोई बात...

“धत्त...” खुद ही झेंप गई माहिया। 

बड़े से दफ्तर में सिर्फ आशीष इन दिनों खासा लोकप्रिय हो रहा है। अपने मिलनसार स्वभाव की वजह से सबका चहेता बन गया है। सबका मददगार भी है। किसी को कोई परेशानी हो, कुछ तकनीकि मसला हो, तुंरत आशीष मदद के लिए हाजिर। अच्छा स्वभाव होना अलग बात है, किसी विपरीत, आजाद खयाल लड़की के साथ जीवन बिताना अलग बात। 

क्या आशीष एक नाइट शिफ्ट वाली लड़की के साथ रहेगा? क्या वो उसे नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करेगा? क्या लिवइन में रहने को तैयार होगा? 

हर लड़का बाद में अपने बूढ़े मां बाप की दुहाई दे कर पीछा छुड़ा लेता है या उसे ही शादी के लिए दबाव बनाता है। आशीष भी कस्बे का ही बंदा लगता है। उससे क्या उम्मीद करे। 

हम्म! देखना होगा! मगर उससे कहीं एकांत में मिलना होगा। उसे समझना पड़ेगा। पीजी होस्टल में तो एक कदम न धरने देगी मालकिन किसी लड़के को? तो आशीष को कहाँ बुलाए? अड्डे पर बुलाना होगा! अड्डा यानी मस्ती का ठिकाना यानी निशा का कमरा! वह अकेली छोटे-से फ्लैट में रहती है। वहां कोई रोक टोक नहीं है। दोस्तो का जमावड़ा उसके घर पर होता रहता है। 

निशा चाबी तब दे देती है जब किसी दोस्त को पार्टी करने का मन होता था। न जाने कितनी शामें वहां दोस्तों के संग महफिले जमीं थीं। उस दौरान कई लड़के करीब आए, प्रेम प्रस्ताव आए, कुछ भाए, कुछ सुहाए, कुछ को ले कर गंभीर होने का मन हुआ मगर सब विफल रहा। बात आगे बढ़ी ही नहीं। उसे भीतर से हमेशा अरुचि रही। बात आगे बढ़ती कैसे। 

उसे याद है एक लड़का, उसके घर वालों ने ही सुझाया था। दिल्ली में ही मिला था। बहुत मस्तमौला, खुले विचारो का, पार्टीबाज भी खूब। उसकी संगति में बहुत मजा आता था। बहुत भाने लगा था माहिया को। उसे भी माहिया बहुत पसंद थी। दोनों एक ही शहर के थे। दिल्ली में आते ही क्षेत्रवाद बहुत हो जाता है। वह भी इस भावुकता का शिकार हो जाती थी।  

तीन चार बार की मुलाक़ात के बाद उसने शादी की बात की थी, मगर शर्त यही कि उसे नाइट शिफ्ट छोड़नी होगी! रूटीन लाइफ जीना होगा! परिवार का खयाल रखना होगा। अकेला बेटा है तो जाहिर है उस पर उम्मीदों का बोझ ज्यादा होगा। यानी सपनों की आंच पर गृहस्थी की रोटी पकने वाली थी। जबकि उसके लिए जिंदगी के मायने बहुत अलग थे! यही सोच कर वह रुक गयी थी। इस तरह के प्रस्तावो को गंभीरता से लेना छोड़ दिया था। 

उसने सोच लिया था, शादी से कोसों दूर रहना है। मगर मम्मी का क्या करे? जो उसकी सहेली धानी को रोज़ फोन करके शादी-शादी की रट लगाए रहती हैं। धानी भी मम्मी के कहने पर रोज़ नए प्रस्ताव ले आती है। 

माहिया ने अपने मन को समझाया और एक बार फिर से दिल का दांव लगाने को तैयार हो गई। यह अंतिम कोशिश थी। धानी ने भी हाथ जोड़ लिया था कि इसके बाद कुछ नहीं कहेगी। बस एक बार और जिंदगी को मौका दे कर देखे तो सही। 

तो... क्यों न आशीष को आजमाया जाए। किसी अनजान लड़के को आजमाने से बेहतर है कि कोई जान पहचान का हो, हमपेशा हो तो और बेहतर। उसकी नौकरी के मिजाज को समझ सकेगा। 

उसने तुरंत ही निशा को फोन किया और दो दिन बाद आशीष के साथ वह निशा के कमरे पर थी। उसे यकीन न हुआ कि इतनी जल्दी आशीष उससे एकांत वार्ता के लिए तैयार हो जाएगा। 

आशीष ने जिस तरह झट से प्रस्ताव स्वीकार किया था, माहिया समझ गई कि धानी ने कुछ खिचड़ी पकाई है। 

आशीष हर तरह से स्मार्ट निकला था। बड़े ही सहज भाव से दोनों उस एकांत में मिले थे। 

वाइन के गिलास के साथ दोनों सोफे पर बैठे और इशारों में चियर्स किया। माहिया सोच रही थी कि बात कैसे शुरु करे। पहले क्या कहे, क्या पूछे... कहीं इंकार कर के, नाराज हो कर या अपमानित करके भाग निकला तो...?

इसीलिए जरा सलीके से बात शुरु करनी पड़ेगी। जो लड़का दफ्तर में बहुत शरीफ दिखाई देता है, जरुरी नहीं, बाहर भी उतना भला हो। इंसान तो बहुरुपी होता है। लड़के सबसे ज्यादा रुप बदलते हैं। 

वह सोच में डूबी थी। कुछ सूझ नहीं रहा था। घूंट भरते हुए वह बातें भी कंठ में निगल रही थी। 

आशीष ने बाजी मार ली। 

उसने उस फ्लैट का आंखों ही आंखों में मुआयना किया और सराह उठा। छोटा-सा ड्राइंग रुम छोटे-छोटे मनीप्लांट और टेराकोटा की मूर्तियों से सजा हुआ था। छोटे-छोटे सोफे थे और कमरे के सामने एक झीना परदा टंगा था। छोटी-सी टी वी दीवार पर टंगी थी। और एक दीवार घड़ी थी, टी वी के ऊपर टंगी हुई जो उस सन्नाटे में टिक टिक कर रही थी। सोफा टेबल पर दो ग्लास, वाइन की बोतल और कुछ नमकीन रख कर ठाठ से माहिया बैठी थी। बैठते ही अप्रत्याशित ढंग से वाइन का ऑफर आया जिसे मुस्कुराते हुए आशीष ने स्वीकार कर लिया था। 

अब बेतकल्लुफ होने की बारी आशीष की थी। उसने माहिया को मौका दिए बिना पहला सवाल दागा- “तुम आखिर शादी से भाग क्यों रही हो?” माहिया इस सवाल के लिए तैयार थी। 

“ऐसा किसने कहा तुम्हें, मैंने कुछ कहा क्या। अचानक शादी पर बात क्यों...?”

वह असहज हो उठी थी। 

“तुम्हारे बारे में सभी जानते हैं कि तुम शादी से चिढ़ती हो। तुम्हें संबंधों से इतनी नफरत है, आज तक सिंगल हो। 

“हूं तो... किसी का क्या बिगाड़ती हूं। मेरा जीवन है... मैंने ऐसे ही जीने का तय किया है, जाने लोग क्यों इतने चिंतित रहते हैं। अच्छा होता, लोग मेरी रोजी-रोटी भी चला देते। 

“बहुत तल्ख हो रही हो, मैंने ऐसा क्या पूछ दिया?  तुम्हें बात करनी थी, तुमने बुलाया, तुमने बात शुरु नहीं की, हमने पूछ लिया, सहज सवाल..। यह निजी मामला है, जवाब देने की बाध्यता नहीं है... कूल यार...।”

माहिया ने वाइन का घूँट भरा- “मैं रुटीन लाइफ नहीं जी सकती। मुझे जीवन में रोमांच पसंद है। मुझे अपनी प्राइवेसी पसंद है। 

आशीष ने देखा, माहिया का वाइन पीने का तरीका आभिजात्य किस्म का था। लड़कियां वाइन जरा अदा से पीती हैं। हरेक पार्टी में उसने ये गौर किया है। उसे यह भी अहसास हो चला था कि उसका पाला किसी शहरी रंग-ढंग में ढ़ली हुई लड़की से पड़ा है जिसका जीवन को लेकर, संबंधों को ले कर अलग नजरिया है। 

माहिया के सामने उसने अपने को और स्पष्ट किया- “सुनो, मुझे रोमांस पसंद है। मैं शेयरिंग पसंद करता हूं। मगर कोई स्पेस चाहता है तो उसे भरपूर स्पेस देने की कोशिश करता हूं।“ 

आशीष के चेहरे पर गहरी मुस्कान उभरी। 

माहिया ने उसे सुखद आश्चर्य से भर कर निहारा। वाइन की ग्लास उसने टेबल पर रख दिया। अब वह खुद को वार्ता के लिए तैयार कर रही थी। उसे आशीष की बातों की गहराई और उसकी सोच की एक झलक मिल चुकी थी।



“किसी की निजता में दखल मुझे भी पसंद नहीं। जब तक दूसरा शामिल करना न चाहे।

आशीष ने थोड़ा रुक कर फिर अपनी बात कही।

माहिया ने उसे टोका- “शादी के बाद तो लड़के यानी पति तो पत्नियों को स्पेस देने में यकीन नहीं रखते। उनकी सारी आजादी, सारे सपने हड़प लेते हैं। 

कड़वाहट घुल रही थी उसकी आवाज में।

"विवाह के बाद लड़को में स्वामित्व का जो भाव आ जाता है और पत्नी को अपना उपनिवेश समझने लगते हैं, मुझे उससे सख्त ऐतराज है।" 

आशीष जोर से हंसा।    

“मैंने कोई चुटकुला सुनाया...?” माहिया चिढ़ गई। 

“यार, तुम इतनी गंभीर क्यों हो जाती हो हर बात पर। मैं जानता हूं, शादी-विवाह, स्त्री-पुरुष संबंध बहुत गहरे मसले हैं। इन पर हड़बड़ी में फैसले नहीं किए जाने चाहिए और न ही ये संबंध किसी भी पक्ष पर थोपा जाना चाहिए। हम दोनों की शादी की उम्र निकल रही है। मुझे भी फैसला करना है, तुम्हें भी। देख लो, सोच लो। आजमाना चाहो, आजमा लो, फिर ठंडे दिमाग से फैसला लेना। मैं अपनी बात कहना चाहता हूं कि मुझे बहुत देर नहीं करना है। अब तुम अपनी बात कहो...”


उसने आशीष को घूरा। कभी गंभीर तो कभी खिलंदड़ लग रहा था। कितनी साफ बात कर गया जबकि वह अभी तक मुद्दे पर पहुंची ही नहीं थी। मुद्दा कुछ और था, ये तो सीधे शादी तक पहुंच गया। 

“देखो, मुझे आगे बढना है, मैं घर में बैठ कर घुट घुट कर नहीं जी सकती!” मुझे अपने करियर से बहुत लगाव है। ये मेरी पहली प्राथमिकता होगी। और हम यहां शादी फाइनल करने के लिए नहीं बैठे हैं। दरअसल बात कुछ और...।”

वह बोलते बोलते अटक गई। 

“क्या बात ?”

आशीष से उसे कुरेदा। ये लड़की क्या बात करने वाली है? उसका दिल भी जोर से एकबारगी धड़का। 

धानी ने तो शादी का प्रस्ताव दिया था। माहिया उसे भी बेइंतहा पसंद थी, हर तरह से पसंद। जीने का उसका बिंदास अंदाज उसे बहुत भाता था। मुंहफट थी और मस्तीखोर भी। जीने का एक पल भी नहीं गंवाती थी। नाइट शिफ्ट की वही क्वीन मानी जाती थी। माहिया के होते पूरा यूनिट निश्चिंत रहता। जहां दूसरी लड़कियां नाइट शिफ्ट से भागती थीं, माहिया ये शिफ्ट मांगती थी। सारी रात वैसे काम करती थी जैसे बाकी लोग दिन में करते हैं। आशीष चकित रहता था कि इतनी काबिल लड़की अब तक सिंगल है। शादी नहीं की और न ही किसी से अफेयर चलाया। नौकरी को इतनी गंभीरता से करते हुए कम ही लड़कियों को देखा था उसने। धानी ने जब उसका झुकाव देखा तो दोनों का संबंध जोड़ने का अभियान शुरु कर दिया। 


“कहां खो गए डूड?”

माहिया ने उसे आत्मीयता से टोका। वह अपने ही खयालों में गुम हो गया था। भीतर बातों का तूफान खड़ा था। अगर शादी नहीं करनी तो यहां समय खराब क्यों करना। उसे दफ्तर की किसी लड़की से फ्लर्ट तो कतई नहीं करना था। पहले ही शादी के लिए देर हो रही थी। घर वालों ने इतना दबाव बनाया कि उसे धानी के कहने पर माहिया से मिलने चला आया। घर वालों की पसंद वह खारिज करता जा रहा था। उसे कोई लड़की पसंद नहीं आ रही थी। इसी तरह मामला टलता रहा। 

घर वालों को पारंपरिक बहू चाहिए। नौकरी से कोई एतराज नहीं, मगर स्कूल में करे, या कहीं किसी नार्मल ऑफिस में। सवेरे जाए और शाम को वापस! अब पत्नी रात को बाहर काम करेगी तो घर कैसे चलेगा। 

आशीष को हैरानी होती, अपनी मम्मी की सोच पर। जिंदगी भर जिन रुढ़ियों से, अभावों से जूझती रहीं, जब सास बनने का मौका आया तो सब भूल कर उसी पारंपरिक ढ़ांचे में ढल गईं। 

आशीष उस तरह नहीं सोचता था। शायद यही वजह थी कि वह विवाह को झमेला मान कर दूर भागता रहा था। घर वालों की उम्मीदों और अपने सपनों के बीच वह उलझ कर रह गया था। उनसे पीछा छुड़ा कर भाग रहा था। किसी लड़की से रिश्ते में बंधने से डरने लगा था। उसे लगता था कि वह संभाल नहीं पाएगा इतनी उम्मीदों का बोझ। विवाह एक पुरुष के लिए दो विपरीत छोरो पर बंधी हुई रस्सी की तरह हो जाता है जिस पर चलते हुए पुरुष को संतुलन बिठाना पड़ता है। जरा-सा चूके तो सीधे खाई में। लेकिन कब तक बचेगा। या तो घर वाले दबोच कर विवाह करा देंगे या एक दिन खुद किसी के प्रेम में पड़ कर तनी हुई रस्सी पर सवार होना पड़ेगा। 

धानी के प्रस्ताव में एक राहत ये थी कि वह लड़की से प्रेम नहीं करता था, पसंद करता था।

इसलिए खुल कर सारी बातें रख सकता था। शर्तें रखी जा सकती थीं। इस समय वह इसी मूड में था लेकिन यहां लड़की विवाह से परे कोई बात करना चाहती है। विवाह से परे क्या बात हो सकती है। एक लड़की सीधे-सीधे कोई और प्रस्ताव कैसे दे सकती है। उसका कस्बाई दिमाग हिल गया। वह अपने को हर तरह के झटके के लिए तैयार कर रहा था। टेबल पर प्लेट में पीनट्स क्रेकर उठाया और हौले हौले उन्हें दांतों से चबाता रहा। 

“हम आज यहां क्यों बैठे हैं? क्या मुद्दा है? बेहतर हो तुम अब सीधे मुद्दे पर आ जाओ माहिया?”

आशीष ने उसे उकसाया। 

माहिया ने महसूस किया, आशीष स्पष्टवादी है और खुला है। सीधी बात करने वाला है। उसे थोड़ी राहत महसूस हुई कि भविष्य में उससे बातचीत में समस्या न होगी। दफ्तर में सबका चहेता आशीष यहां अलग था। यहां मुखर था और दो टूक बात करने को तैयार था। वहां तो काम भर बातें , जरुरत से अधिक काम कर लेता था। अपने हिस्से का भी और दूसरे के हिस्से का भी। जैसे ही किसी के बारे में हमारी राय सकारात्मक होती है, विचार बदलते हैं, इंसान भी बदला हुआ दिखाई देता है। माहिया के साथ भी यही हो रहा था। वह आशीष के हृदय से एकदम अनजान अपने बारे में सोच रही थी। 

उसे लगा, सही वक्त है, स्पष्ट कर दे कि उसने क्यों बुलाया और क्या चाहती है उससे। घुमा फिरा कर बात करने से अच्छा है, सीधे प्रस्ताव रख दिया जाए। दोनों तरह के जवाब के लिए खुद को तैयार करते हुए उसने आखिर कह दिया - “मैं अभी विवाह के लिए तैयार नहीं हूं। विवाह का ट्रायल चाहती हूं। तुम इंकार कर सकते हो। ये बात हमारे बीच रहेगी। अगर बात बनती है तो मैं किसी से छुपाऊंगी नहीं अपने संबंधों को। नहीं बनती है तो हम चुप रहना होगा। अपने अपने रास्ते चल पड़ेंगे हम। मैं जानती हूं कि तुम्हें थोड़ा अटपटा लगेगा। तुम्हें क्या, किसी भी लड़के को अटपटा लगेगा कि एक लड़की ऐसा सोच कैसे सकती है। एकदम अनजान लड़के से। प्रेम हो तो वहां कुछ भी कहा जा सकता है। हमारे बीच प्रेम नहीं है। प्रेम घटित हो सकता है। हमें अगर लिव इन बेहतर लगा तो हमें विवाह करने की जरुरत नहीं। बाद में सोचेंगे। अभी मेरा प्रस्ताव है कि हम कुछ दिन एक दूसरे को.... समझ रहे हो.... सिचुएशनशिप।”


माहिया अचानक चुप हो गई। वह आशीष का चेहरा देखना चाहती थी। उसके चेहरे की रंगत, हाव-भाव और प्रतिक्रिया का इंतजार था। ये सब मायने रखते हैं।  

आशीष ने वाइन ग्लास उठाई और एक बार में पूरा पी गया। खाली गिलास टेबल पर रखते हुए उसने कुर्सी के पीछे सिर टिका दिया। 

“मैं इनकार कर दूं तो...?”

“कर दो, तुम मेरे गुलाम नहीं हो...”

“माहिया, संबंध कुछ ज्यादा जटिल नहीं हो जाएंगे, हर वक्त तलवार की धार पर चलो, हर वक्त खारिज किए जाने का भय...। कैसे कोई रह सकता है भला। आज हैं कल नहीं... फिर कहां जाऊंगा मैं... क्या करुंगा। कहीं के लायक नहीं रहूंगा। मेरे घरवाले मुझे अलग ठोकेंगे। 

आशीष की आवाज में थोड़ी मायूसी थी। 

“शुरु होने से पहले इतनी शंकाएं, आशंकाएं...आशु...।”

माहिया की आवाज कोमल हो गई थी। 

“एक गाना सुना है, अपने पे भरोसा है तो एक दांव लगा ले...। जब मैं तैयार हूं तो तुम्हें दिक्कत क्यों। बदनामी तो लड़कियां झेलती हैं। लड़के तो दागदार होते ही नहीं। मुझे चिंता नहीं। हां, मेरी कोशिश होगी कि रिश्ते को संभाल लूं। इसमें दोनों का सहयोग आवश्यक होगा। मैं बिल्कुल शंकित नहीं हूं।“ 

“दरअसल मैं अपनी जिंदगी में किसी अप्रिय अध्याय का दोष किसी और पर नहीं मढ़ना चाहती। सब कुछ मैं खुद से करना चाहती हूं, जो होगा, देखा जाएगा।“ 

माहिया वाइन की पूरी ग्लास गटक गई। उसने फिर ग्लास भर लिया था। आशीष को सोचने का मौका देना चाहती थी। उसका मन हल्का हो गया था। एक कोशिश कर ली। हर तरह के परिणाम के लिए तैयार थी। 

माहिया की बातें सुन कर देर तक खुद से जूझता रहा आशीष। एक तरफ यह भी तय था कि घर वाले नहीं मानेंगे तो दूसरी तरफ उसे यह भी पता था कि माहिया जैसी लड़की फिर न मिलने वाली थी। फुल ऑफ पैशन। आवेग से भरी हुई, अदृश्य पंखों वाली लड़की। 

तमाम तरह के समीकरण अपने दिल में बैठने के बाद भी कोई हल न निकलता देख कर वह माहिया से पूछ लिया- “मान ली तुम्हारी बातें। पर अब तुम ही बताओ क्या करुं। “तुम्हारे घर वाले मान जाएंगे?”

माहिया ने उसकी आँखों में सवालों के साथ झांका और उसे आश्वस्त किया - “वो तुम मुझ पर छोड़ो। तुम तो बस अपनी कहो, अपना परिवार देखो। हम छुपाएंगे नहीं किसी से। हम चोरी नहीं, प्रेम करेंगे। बस यह प्रेम जरा अलग होगा। प्रायोजित प्रेम, जब विवाह प्रायोजित हो सकता है तो प्रेम क्यों नहीं। हम तो अपने संबंधों की नींव प्रेम पर रख रहे। विवाह के नाम पर अपने अरमानों की कुर्बानी तो नहीं दे रहे। मैं किसी ऐसे शख्स के साथ जिंदगी गुजारने की सोच भी नहीं सकती जिसे मैं जानती तक नहीं। हमारा रिश्ता ऐसा होगा आशु, जिसमें सिर्फ मेरी-तुम्हारी कुर्बानी नहीं होगी। यह एक साझा रिश्ता होगा, मेरा और तुम्हारा।””

आशीष ने कहीं दूर देखते हुए कहा- “मुझे सोचने का वक्त दो माहिया।”

घड़ी की सुइयां दस बजने का संकेत दे रही थीं। बारह बजे से उसकी शिफ्ट थी। आज गाड़ी यहीं से आएगी उसे पिक करने के लिए। माहिया को तैयार भी होना था। खाना निपटा कर उसे ऑफिस के लिए निकलना था। डाइनिंग टेबल पर डिनर लगाते हुए वहीं से जवाब दिया- “सोच लो। मुझे कोई जल्दी नहीं है। तुम मुझे बहुत पसंद हो। जिंदगी और रिश्ते अपनी पसंद के, अपनी मर्जी के कम ही मिलते है। आई एम राइट। नो?”

आशीष ने प्लेट से चीज के टुकड़े उठाए और चबा गया। चीज की महक लिए वह माहिया के करीब पहुंचा। आत्मनिर्भर लड़कियों के चेहरे पर अलग तरह का तेज होता है। वे निर्भीक और स्पष्टवादी होती हैं। उन्हें प्यार किया जाना चाहिए। वे क्या मांगती हैं, बराबरी का हक और पुरुष वर्चस्व का विरोध? आशीष ने खुद को टटोला। उसके भीतर खुद से जिरह चल रही थी। 

क्या वह पारंपरिक सोच वाले पुरुषों से अलग है? क्या उसके भीतर किसी स्त्री पर शासन करने की आकांक्षा नहीं पल रही? क्या उसे टिपिकल पत्नी नहीं, दोस्त चाहिए, एक सुलझी हुई समझदार साथी, जो उसके सामने अपना मन खोले, छुपाए नहीं? क्या वह इन सबके लिए तैयार है? 

“खाना लग गया आशु...”

झीने परदे के उस पार से माहिया ने आवाज लगाई। 

आशीष को किसी ने भीतर से बाहर की तरफ खींचा। वह जवाब साथ ले कर लौटा था। वह मुस्कुराता हुआ माहिया के पास पहुंचा जो टेबल पर सलाद के टुकड़े उठा कर मुंह में रखने जा रही थी। वह टुकड़ा हाथ में ही रह गया। आशीष ने उसका चेहरा अपने हाथों में भरा। माहिया की पलके एक बार झुकीं फिर खुल गईं। बड़े गहरे नैन थे। उनमें नीला आकाश भर रहा था जिसमें पंख ही पंख उगे थे। एक परछाईं उभरी जो उन पंखों को हौले हौले सहला रहा था।


('अन्विति' के हालिया अंक से साभार।)


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


संक्षिप्त परिचय

गीताश्री

पत्रकार एवं लेखक 

अब तक नौ कहानी संग्रह, छह उपन्यास ! स्त्री विमर्श पर छह शोध किताबें प्रकाशित। कई चर्चित किताबों का संपादन-संयोजन।

वर्ष 2008-09 में पत्रकारिता का सर्वोच्च पुरस्कार रामनाथ गोयनका, बेस्ट हिंदी जर्नलिस्ट ऑफ द इयर समेत साहित्य में अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त।

1991 से 2017 तक सक्रिय पत्रकारिता के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन!


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