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ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'एस. के. सिंह रिटायर हो गए हैं'

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  ललन चतुर्वेदी  जीवन का एक समय ऐसा भी होता है जब नौकरी करना जरूरत या कहें मजबूरी होती है। अलग बात है कि यह जरूरत जीवन बदल कर रख देती है। नौकरी करने वाला चाहें जिस महकमें में जिस पद पर आसीन हो, उसमें साहबियत की बू आ ही जाती है। वह उन लोगों से ही बचने की कोशिश करने लगता है जिनके बीच से वह खुद आया होता है। और उसे अपने रोब दाब भी तो दिखाना यानी कि प्रदर्शन करना ही होता है। बहरहाल, एक दिन ऐसा भी आता है जब वह नौकरी से रिटायर हो जाता है और तब जीवन की असलियत उसके सामने आने लगती है। जीवन भर आम लोगों से दूर रहने वाला अब आम लोगों से बात करने के लिए तरस जाता है। लेकिन चाकरी तो चाकरी ही होती है। रिटायर व्यक्ति के निगरानी की जिम्मेदारी अब उसकी पत्नी सम्भाल लेती है। यानी कि अब पत्नी ही उसकी साहेब की भूमिका सम्भाल लेती है। कहीं भी आने जाने, रहने खाने का हिसाब प्रति सेकेंड की दर से उसे रोजाना देना होता है। ऐसे में उस व्यक्ति को अपने नौकरी के दिन याद आते हैं जब तरह तरह की छुट्टियों के लिए उसे अर्जी लगानी पड़ती थी। ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य इस विडम्बना को करीने से उद्घाटित करता है। आइए आज पहली ब...

प्रज्ञा की कहानी 'गर्दिश में हों तारे..'

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  प्रज्ञा आज की दुनिया बहुत हद तक व्यावसायिक होती जा रही है। इस व्यावसायिकता में आगे निकलने के लिए नैतिकता को सामान्यतया ताक पर रख दिया जाता है। तमाम ऐसे हथकंडे अपनाए जाते हैं जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। आदर्श भले ही सुनने में अच्छे लगते हैं लेकिन हमारे यहां इसे सुनाने की परंपरा ही ज्यादा रही है। अब तो छोटे कस्बों और नगरों तक में लकदक  मॉल्स  खुल गए हैं। इन मॉल्स ने छोटे दुकानदारों और रेहड़ी वाले दुकानदारों के लिए भीषण दिक्कतें पैदा कर दी है। इनके सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। पूंजीवाद की विसंगतियों का सामना सामान्य तरीके से नहीं किया जा सकता।  बहरहाल इस व्यावसायिकता की जटिलताओं को केन्द्र में रख कर प्रज्ञा ने एक उम्दा कहानी लिखी है। आइए पहली बार पर आज हम पढ़ते हैं  प्रज्ञा की कहानी 'गर्दिश में हों तारे..'। यह कहानी ज्ञानोदय के हालिया अंक से साभार ली गई है। कहानी 'गर्दिश में हों तारे..' प्रज्ञा आगरा के मदन मोहन दरवाजे के बाहर जाती सड़क के दूसरी तरफ ही शर्मा हलवाई की बरसों पुरानी दुकान है। कितनी दुकानें बनी-मिटी पर शर्मा की दुकान टस से मस न हुई। आज ...

अंकित नरवाल का आलेख 'विश्वनाथ त्रिपाठी : सामाजिक दायित्व निर्वहन का आलोचक'

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  विश्वनाथ त्रिपाठी  विश्वनाथ त्रिपाठी हमारे समय के शीर्ष आलोचक हैं। वे उन आलोचकों में से एक हैं जिन्होंने अपनी एक अलहदा आलोचना पद्धति न केवल ईजाद की बल्कि उसे आलोचना की दुनिया में स्थापित भी किया।  त्रिपाठी जी का मानना है कि आलोचना का एक सामाजिक दायित्व भी होता है और उसे इस दायित्व का निर्वहन करना पड़ता है। सामाजिकता के बिना आलोचना जैसे आत्महीन सी हो जाती है। उनकी आलोचना उस तार्किकता की पक्षधर है जिसका विकास वैज्ञानिक चेतना से होता है। युवा आलोचक अंकित नरवाल त्रिपाठी जी के आलोचना की तहकीकात करते हुए लिखते हैं "त्रिपाठी जी विचारधारा के बड़े होने को उतना महत्त्वपूर्ण नहीं मानते, जितना महत्त्वपूर्ण यह है कि वह किसी व्यक्ति को भी बड़ा बना रही है या नहीं। वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के क़ायल हैं। ‘हिन्दी’ भाषा के संबंध में पनपने वाली विभिन्न बहसों पर की गई उनकी टिप्पणियाँ यह सिद्ध कर देती हैं कि उनके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण किस हद तक महत्त्वपूर्ण है और भाषा के संबंध में उसको प्रयुक्त करने वाले व्यक्ति की नीयत भी।" पाखी का हालिया अंक विश्वनाथ त्रिपाठी पर ही केन्द्रित है। अंकित नरवा...