ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य 'एस. के. सिंह रिटायर हो गए हैं'
ललन चतुर्वेदी जीवन का एक समय ऐसा भी होता है जब नौकरी करना जरूरत या कहें मजबूरी होती है। अलग बात है कि यह जरूरत जीवन बदल कर रख देती है। नौकरी करने वाला चाहें जिस महकमें में जिस पद पर आसीन हो, उसमें साहबियत की बू आ ही जाती है। वह उन लोगों से ही बचने की कोशिश करने लगता है जिनके बीच से वह खुद आया होता है। और उसे अपने रोब दाब भी तो दिखाना यानी कि प्रदर्शन करना ही होता है। बहरहाल, एक दिन ऐसा भी आता है जब वह नौकरी से रिटायर हो जाता है और तब जीवन की असलियत उसके सामने आने लगती है। जीवन भर आम लोगों से दूर रहने वाला अब आम लोगों से बात करने के लिए तरस जाता है। लेकिन चाकरी तो चाकरी ही होती है। रिटायर व्यक्ति के निगरानी की जिम्मेदारी अब उसकी पत्नी सम्भाल लेती है। यानी कि अब पत्नी ही उसकी साहेब की भूमिका सम्भाल लेती है। कहीं भी आने जाने, रहने खाने का हिसाब प्रति सेकेंड की दर से उसे रोजाना देना होता है। ऐसे में उस व्यक्ति को अपने नौकरी के दिन याद आते हैं जब तरह तरह की छुट्टियों के लिए उसे अर्जी लगानी पड़ती थी। ललन चतुर्वेदी का व्यंग्य इस विडम्बना को करीने से उद्घाटित करता है। आइए आज पहली ब...