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विष्णु प्रभाकर की डायरी

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विष्णु प्रभाकर पत्रकारिता का पेशा अपने आप में बड़ा चुनौतीपूर्ण होने के बावजूद युवाओं को कैरियर के रूप में अपनी तरफ अधिकाधिक आकर्षित करता रहा है । लेकिन यहाँ के अंदरखाने की हकीकत बहुत ही त्रासदीपूर्ण है। जब युवा इस हकीकत से रु-ब-रु होता है तो उसका मोह-भंग हो जाता है। दुर्भाग्यवश आज मीडिया उस पालतू तोते की बोलने लगा है जो धीरे-धीरे अपनी असली आवाज भी भूल जाता है। विष्णु प्रभाकर युवा रचनाकार हैं। उन्होंने अपनी डायरी के पन्नों में एक युवा के पत्रकारिता प्रेम और उसके मोह-भंग की स्थिति को चित्रित करने का सफल प्रयास किया है । यह कहानी केवल विष्णु प्रभाकर ही नहीं देश के अन्य युवाओं की भी कहानी है । तो आइए आज पढ़ते हैं विष्णु प्रभाकर की डायरी का यह पन्ना।     डायरी के पन्ने से      विष्णु प्रभाकर खबर मिलते ही मैंने जाने की तैयारी शुरू कर दी। पहले से इसका इंतजार था। लेकिन खुश होने जैसा कुछ था नहीं चार महीने तक अखबारों के दफ्तरों के चक्कर लगाते लगाते थक चुका था तब जा कर ये नौकरी मिली थी। और नौकरी भी मिली तो शहर से अस्सी किलोमीटर दू...