राजेन्द्र दानी की कहानी 'मेलाटोनिन और उल्टी गिनती'


राजेन्द्र दानी


एक एक मनुष्य के जिन्दगी के अनुभव का संसार व्यापक होता है। यह मनुष्य की विशिष्टता है कि वह अपना अनुभव और लोगों से साझा करता है। इस तरह मनुष्य समवेत रूप से अपने समक्ष प्रस्तुत समस्याओं का निदान निकालने की कोशिश करता है। किसी भी रचना की आत्मा होती है उसका मनोवैज्ञानिक पक्ष। मनुष्य इस मनोवैज्ञानिकता से जीवन भर  जूझता रहता है। अवसाद या हेल्यूसिनेशन इस मनोवैज्ञानिकता से ही जुड़ा हुआ है। राजेन्द्र दानी इसी की पड़ताल करते हुए अपनी कहानी में लिखते हैं 'अवसाद या हेल्यूसिनेशन की शिकायत मैं ही उनसे करता रहा हूं। हेल्यूसिनेशन तो मुझे तब महसूस होना शुरू हुआ जब पत्नी न रही। बताना चाहूंगा कि उसके न रहने के बाद के करीबी दिनों में मैं महसूस करता था कि उसने अभी पुकारा, या तभी पुकारा। या मैं कभी अकेला रात, सोने के लिए बिस्तर पर पहुंचा तो महसूस हुआ कि थोड़ी देर में वह पलंग पर आ कर बैठी और अपने बालों को बांधते हुए लुढकने को तैयार हो रही है। यह सब दिखता नहीं था, आहटों में महसूस होता था।' कहानी का पात्र नींद के लिए मेलाटोनिन लेता है। लेकिन दवा जब आदत बन जाती है तो रोग के लिए मुफीद नहीं रह जाती। पात्र ऐसा महसूस करता है कि 'मेरे लिए मेलाटोनिन लेने के बाद भी नींद का न आना कोई असहज बात नहीं है। पर विचित्र बात यह है कि मैं उस समय मेलाटोनिन पर ही सोचते हुए सो नहीं पा रहा था।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राजेन्द्र दानी की कहानी 'मेलाटोनिन और उल्टी गिनती'।


'मेलाटोनिन और उल्टी गिनती'


राजेन्द्र दानी


रोज रात मेलाटोनिन लेता हूं क्योंकि नींद चाहता हूं। हालांकि जानता हूं कि चाहने भर से हो नहीं जाता है, करना पड़ता है।


कोई गुंजाइश अब नहीं बची है तो "करना पड़ता है" की तर्ज पर इसे लेता हूं। नहीं नहीं डाक्टर के कहने पर ही लेता हूं। यह नींद की गोली है।


एक बात बताना चाहूंगा कि मेरे भीतर कुछ वर्षों से एक अराजक जागरण घर कर गया है। यह मेरे सोने और जागने के चक्र को अनियंत्रित करता रहता है। बायोलाजी कभी मेरा विषय थी पर मैं बैंक बेन्चर था तो शिक्षक कभी नहीं पूछते थे कि "समझे या नहीं।"


यह सुभीता गजब की खुशी देता रहता था। आप आश्चर्य करेंगे कि इसे ले कर आज भी खुश होता हूं। पर जान लें कि खुशी के पास नींद नहीं होती। तो उससे काम चलता नहीं। पर, झूठा सच, जो भी है, गूगल एक सहारा है। उसी ने बताया कि मेलाटोनिन "नींद का हार्मोन है।" अभी गूगल से जो अर्थ ग्रहण हो रहा है वह यह है कि हार्मोन शरीर के अंगों और कोशिकाओं के बीच रासायनिक संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं।


गूगल के मकड़जाल में मैं बहुत दूर तक जा न पाऊंगा, आप अब जान गये हैं कि मैं बैंक बेन्चर रहा हूं, एक बात कि अत्यधिक मुसीबतों में घिरा रहने के बावजूद खुश रहना चाहता हूं। पर खुशी का प्रबंधन भी आसान नहीं है।


कल रात गूगल की संक्षिप्त जानकारियों के साथ मैंने मेलोटोनिन सोने के पहले खाई फिर बत्तियां बुझा के सोने की कोशिश करने लगा।


बिस्तर में अकेला था। पत्नी परलोकगमन कर चुकी है बहुत पहले। मरने वाले के साथ बिना आत्महत्या किए कोई मर नहीं सकता इसलिए जीवित हूं और इसे सभी जानते ही होंगे क्यों कि दुनियादारी में यह कोई जटिल बात तो है नहीं। हालांकि मेरे अन्दर अक्सर कोई गुनगुनाता ही रहता है कि "जिन्दगी से बड़ी सजा ही नहीं, और क्या जुर्म है पता ही नहीं।" यह 'नूर' की गजल का टुकड़ा है जिसकी मेरे अंदर बैबस्तगी को बहुत चाह कर भी मैं निकाल न पाया हूं। मैं इत्ता बड़ा तो नहीं हूं पर जीवन भर बैंक बेन्चर रहने के बावजूद अतिशय विनम्रता से कहना चाहूंगा कि, बुढ़ापे में समझ किंचित परिष्कृत हो ही गई है। जब कि मैं जानता हूं कि नूर आगे कहते हैं "चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो, आईना झूठ बोलता ही नहीं।"


बात पूरी कहने के पहले ही कोई विचार आ जाए और उसे कहने लगो तो उसे विचलन कहते हैं। यह मेरे भीतर भरपूर है पर इसके होते हुए भी मैं सम्हल कर बड़ी शाइस्तगी से अपने कहने पर आ जाता हूं।


मेरे लिए मेलाटोनिन लेने के बाद भी नींद का न आना कोई असहज बात नहीं है। पर विचित्र बात यह है कि मैं उस समय मेलाटोनिन पर ही सोचते हुए सो नहीं पा रहा था। सोच का निष्कर्ष पाने के लिए सोचा कि अपने अभिन्न डाक्टर मित्र को फोन करके पूछ लूं। भाई उसी ने तो मेलाटोनिन लेने की सलाह दी थी आखिरकार। देखिए ये विचलन बिल्कुल नहीं है कि मैंने सोचा डाक्टर नींद में होगा, उसे जगाना असभ्यता होगी? मैं इस जटिलता का अयोग करने में भी उस समय सक्षम न हो सका। देखिए सोचना अब यहां आ कर खड़ा हो गया।




नींद तो थी नहीं तो मैंने स्थगित कर दिया कि कुछ और विचार करूं। एक कोशिश शुरू की जिसे नींद लाने के लिए पत्नी ने बताया था। वह करने के पहले मैंने नींद लाने की कोशिश में बंद आखों को एक बार खोला। मैं अपनी विचित्रताओं से सहमत नहीं पर जाने क्यों अचानक सहम गया। खुली आंखों से इर्द-गिर्द गहरा धूसर दिख रहा था जब कि मेरा नाइट लैम्प नीली रोशनी वाला है। घर से एक किलोमीटर दूर रेलवे का एक समतल पारण है, वहां से शायद कोई फास्ट ट्रेन गुजर रही थी। उसकी तीव्र गड़गड़ाहट छन कर ध्वनित हो रही थी। मैंने महसूस किया कि यह ध्वनि आंखें खोलते ही सुनाई पड़ी, उसके पहले नींद? तो क्या आंखें खोलने के पहले मैं सो रहा था?


है न अजीब या भयावह... जो हो। कोई स्नायु दौर्बल्य की कोई सूचना किसी डाक्टर ने किसी भी जांच के वक्त मुझे नहीं दी अलबत्ता अवसाद या हेल्यूसिनेशन की शिकायत मैं ही उनसे करता रहा हूं। हेल्यूसिनेशन तो मुझे तब महसूस होना शुरू हुआ जब पत्नी न रही। बताना चाहूंगा कि उसके न रहने के बाद के करीबी दिनों में मैं महसूस करता था कि उसने अभी पुकारा, या तभी पुकारा। या मैं कभी अकेला रात, सोने के लिए बिस्तर पर पहुंचा तो महसूस हुआ कि थोड़ी देर में वह पलंग पर आ कर बैठी और अपने बालों को बांधते हुए लुढकने को तैयार हो रही है। यह सब दिखता नहीं था, आहटों में महसूस होता था। वह मुझे किसी नाम से सम्बोधित नहीं करती थी, कुछ कहता हो तो उसका 'सुनो' कहना ही मेरा नाम होता था। हेल्यूसिनेशन शायद इसी सुनो से शुरू हुआ था। इसको मैंने स्वाभाविक मान कर इसलिए अजीब नहीं माना क्योंकि पत्नी के साथ चालीस साल कटे थे, जो मामूली तो कतई नहीं थे। यह इतने वर्षों में निरन्तर एक जैसी आदतों को सुनते रहने का आभास जैसा कुछ अवश्य हो सकता है।


नींद लाने के लिए पत्नी के बताए नुस्खे की तरफ मैं लौटा अपने स्वाभाविक विचलन के बाद। पत्नी ने बताया था कि आंखें बंद करके मन ही मन सौ से ले कर एक तक उल्टी गिनती गिनों और बीच में गल्ती कर दो तो फिर से शुरू करो। गल्ती नहीं होती तब भी गिनते रहो। देखो किसी वक्त जा कर नींद आ ही जायेगी।


पत्नी ने नुस्खा बताया था तो सही होगा, सोचते हुए मैं लगातार गिनता गया। शायद मैं अठारहवीं बार गिन रहा था तो कोई हल्की सी ब्लर वह हँसी सी सुनाई पड़ी।


हो गया था। मैं चौंक गया तो गिनती रूक गई। हँसी भी रूक गई। जो वह चाहती थी वो शायद।


देखिए कितनी अजीब बात है कि सम्भवतः मैं किसी छोटी सी तन्द्रा में गिनती की सहायता से पहुंच गया होऊंगा तो उसी में पूछ बैठा "ये कौन हँस रहा है?" नई भाषा में कहें तो ब्लर सी हँसी थी।


ब्लर में हँसी फिर उठी और ब्लर में ही आवाज आई "पहचान लो मैं मेलोटोनिन हूं।" मेरी तन्द्रा उसके लिए चुनौती रही होगी तो उसने कुछ। मैं जवाब देने ही वाला था कि उसने फिर कहा "मेरे बिना काम नहीं चलेगा।" ठिठक-ठिठक कर उसकी हँसी जारी थी। पर इस हँसी में कुछ कुछ आशंका की भी ध्वनि थी शायद।


मैं जैविक था तो समझ गया था, पर वह नहीं था तो वह नहीं समझ पाया होगा कि मैं समझ गया हूं।



उसके बिना मेरा काम नहीं चलेगा, सुन कर मैं गुस्से में आवाज और इच्छा हुई कि उसे "अभी तुम कहां हो?".... मेरे भीतर या बाहर?" कुचल दूं। इसी भाव में उससे प्रश्न किया


उसका अपुष्ट सा जवाब था "मैं वैसे तो तुम्हारे भीतर हूं पर कुछ-कुछ बाहर भी।


हूं।"


"मेरे लिए तुम क्या कर सकते हो?" मेरा गुस्सा जारी था ।


"जितना कर सकता हूं उतना तो कर ही रहा हूं।" उसने सहज ही जवाब दिया।


पर मैं पीछे पड़ा था उसके तो तुरन्त पूछा "और क्या कर सकते हो मेरे लिए?"


इस प्रश्न पर वह कुछ अनमना सा हो गया, फिर कहा "तुम बताओ क्या करना है, यदि कर सका तो जरूर करूंगा!" उसका जवाब था।


मैंने विस्तार से कहना शुरू किया "देखो तुम मेरे भीतर बाहर जहां भी हो पर मेरे चाहने पर ही हो। मैं अपने जीते-जी बहुत कुछ करना चाहता हूं, वह जो मेरे लिए नहीं, सभी के लिए हो। पर मेरे पास, मुझे लगता है अब ज्यादा जीवन नहीं बचा। उतने में मैं जो चाहता हूं वह कर नहीं पाऊंगा, मेरी मृत्यु बहुत पास आ चुकी है।..... क्या तुम मेरी सन्निकट मृत्यु से मेरे लिए और समय ले सकते हो?"


वह जोर से हँसा। यह हँसी ब्लर नहीं थी। फिर उसने मेरे अंदाज में कहना शुरू कया "यार तुम भी बेहद अजीब हो, तुम ही कह रहे हो कि मैं तुम्हारे चाहने से हूं और मुझी से पूछ रहे हो? तुम भीतर क्यों नहीं जाते अपने तुम्हारा चाहना तुम्हारे भीतर से है तो मैं कौन हूं ? बाहर से ही हूं न। अपने भीतर जाओ और वही करो जो मेरे आने से पहले कर रहे थे।


पता ही न चला कि जैसे मैं पहले तन्द्रा में पहुंच गया था, शायद इस बार भी उसके मेरे संवादों के बीच पहुंच गया होऊंगा।


एक झटका सा लगा मेरे पूरे शरीर को और मेरी आँख मैंने फिर खोली धूसरता की जगह अब नीली रोशनी ही थी।


नींद के लिए मैंने फिर से उल्टी गिनती शुरू कर दी थी।



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


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