सुरेन्द्र प्रजापति की कहानी 'टूटती शाखा'
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| सुरेन्द्र प्रजापति |
स्थानीय विभाजन के बावजूद दुनिया भर के समाज में मुख्य रूप से दो वर्ग होते हैं। पहला शोषक वर्ग है होता है जबकि दूसरा शोषित वर्ग। आभिजात्य वर्ग का चरित्र शोषक का होता है जबकि कामकाजी वर्ग का चरित्र शोषक का होता है। सामान्यतया शोषित वर्ग अपने रोजी रोजगार के लिए इस आभिजात्य वर्ग पर ही निर्भर रहता है। इस निर्भरता की वजह से उसे तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दोनों वर्गों के बीच व्यवहारगत दिक्कतें भी दिखाई पड़ती हैं। इन व्यवहारगत दिक्कतों को सुरेन्द्र प्रजापति ने अपनी कहानी 'टूटती शाखा' में करीने से व्यक्त किया है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सुरेन्द्र प्रजापति की कहानी 'टूटती शाखा'।
'टूटती शाखा'
सुरेन्द्र प्रजापति
सड़ाक! सड़ाक!!' सात वर्षीय छोटू पर जाह्नवी ने खजूर की छड़ी चलाई तो वह लड़का ऐसे चीखा जैसे जंगल की सूखी हुई लकड़ी चरमराई हो। वह चुड़ैल सी दिखने वाली औरत हाँफने लगी। उसके चेहरे पर नफ़रत और अवसाद के भाव थे जबकि छोटू बिल्कुल शांत था।
पीटने के बावजूद भी छोटू को गुस्सा नहीं आया बल्कि जाह्नवी के चेहरे पर छलछला आए पसीने को देख कर दया आई। ओ... हो... हमें दण्डित करने के लिए कितना मशक्कत करना पड़ा मानू की माँ को - "माई रे! हमें मार क्यों रही हो। मेरा कसूर क्या है?"
"तुमने मानू को चोट पहुँचाया है। पत्थर फेंक कर मारा है उसे। माथे पर चोट लगी है और माथे से खुन बह रहा है, हरामी के जने...!" जाह्नवी आग बबूला होती हुई बोली।
छोटू सपाट नजरों से जाह्नवी को ऐसे घूरा जैसे पूछ रहा हो - 'मै हरामी के जने हूँ तो तुम क्या हो?' लेकिन नहीं बोला। वह जानता है कि चाहे मुझे कितनी ही सजा दे दे, है तो मानू की माँ ही और मेरी माँ भी इनका कितना ख्याल रखती है। इनका हर आदेश उनके लिए पूजा होती है लेकिन फिर भी ये खरी-खोटी सुनाती रहती हैं। आपको हर सजा देने का अधिकार है तो मुझे भी हर दंड स्वीकार है।
जाह्नवी मारे क्रोध के जल भून कर रह गई। उसे अचरज हो रहा था की इतनी मार के बाद भी यह लड़का इतना ढीठ क्यों है। चिढ़ कर बोली - "बोल... क्यों मारा मानू को, नहीं तो खाल खींच लूँगी?
छोटू बड़ा ज़िद्दी है। छोटू बड़ा हट्ठी है। छोटू के जिद्द को मोहल्ले के सभी लोग जानते हैं। अपनी बिरादरी में, अपने मुहल्ले में अपनी जिद्द से, या अपनी तर्कसंगत बातों से किसी को पार पाने नहीं देता। वह किसी का आरोप अपने पास उधार रखना नहीं चाहता। वह तर्क देता है_ किसी की बात सिर्फ सुनने से क्या लाभ जिसमें कोई संवाद न हो। उस पिटाई का मतलब ही क्या जिसमें कोई प्रतिरोध न हो।
"कौन कहता है रे... माई! बुला उसे" छोटू गुस्से और मार से तिलमिलाते हुए बोला। गुस्से में वह और भी वाचाल हो जाता।
"मुआं माल भी खाता है और गाल भी नोंचता है। सचे-सचे बताओ, क्यों मारा मानू को?" जाह्नवी विफरते हुए बोली।
"मैने मानू को नहीं मारा...!" छोटू फिर गला फाड़ कर चिल्लाया।
"फिर झूठ...!" जाह्नवी जल-भुन कर रह गई।
"मै क्यों झूठ बोलूँ? झूठ बोलने का मै क्या ठिका ले रखा हूँ?"
तब तक बिन्नी आ गई। वह जाह्नवी का मान करते हुए बोली -"ऐ छोटू...! तुमने ही तो पत्थर चलाया था, और मानू को चटाक से लग गया सिर पर।"
छोटू गुस्से से बिन्नी को ताकने लगा। बिन्नी सहम कर दूसरी तरफ देखने लगी।
जाह्नवी भभकते हुए बोली- "अब बताओ! अब झूठ काहे को बोलता है।"
"मै बोला न, मैने नहीं मारा है। चाहो तो अपनी छोकरी से पूछ लो। पूरी तरह से लापरवाह छोटू ऐसे बोला, जैसे अदालत में खड़ा अपनी बेगुनाही का बयान दे रहा हो। प्रत्यक्षतः वह उबल पड़ा - "तुम लोग सिर्फ दंड देना जानती हो। कभी खुद के देह पर पड़ा न, तब फिर देखना कैसे बकरी की तरह मिमियाती हो। और सच्चाई का तुम्हारे पास कोई तमगा है क्या?" फिर वह बिन्नी से पूछा- "सच्च बोल कर नजरें क्यों चुराती हो, माई को बता न कि तुमने क्या देखा। तुम्हारे देखने से क्या सच झूठ में बदल जाएगा।
बिन्नी क्या बोलती जो बोलना था पहले ही बोल दी। जाह्नवी को भी अटपटा सा लगा। बिन्नी आँखे क्यों चुरा रही है।
शोर की आवाज सुन कर मानू आ गई। घर के और भी नौकर-चाकर इकठ्ठे हो गए। मानू गुस्से में तमतमाई अपनी माँ की हाथ में छड़ी देखी तो वह भी सकपका गई। उसे हिम्मत नहीं हो रहा था कि अपनी माँ से कुछ कहे। छोटू के बचाव के लिए अपनी उसकी बेगुनाही का सफाई दे। वह अपनी माँ के स्वभाव को खूब अच्छी तरह जानती है।
छोटू और बच्चों से ज्यादा होशियार है। वह हिम्मती है, तर्क करना जानता है, और उसका यही गुण मानू को लुभाता है। लेकिन कभी-कभी छोटू उदंडता भी हद तक दिखाता है। वह मानू की माँ को माई कह कर पुकारता है।
छोटू के नंगे शरीर पर छड़ी के मार का निशान उभर आया था। मानू के दिल में छोटू के लिए तड़प की एक बारीक रेखा खींच आई। उसे ग्लानि भी हुई और पीड़ा भी। ग्लानि इस बात पर की छोटू उसे हरदम कोसेगा कि तुम्हारी महतारी के करेजा में जरा भी ममता दया नहीं है हम गरीबों के लिए। तुम अमीर लोगों के लिए हम सब कठपुतली हैं। तुम्हार अत्याचार ही हमारे भाग्य में है। पीड़ा इसलिए कि छोटू पर जब भी मार पड़ता तो उसे महसूस होता कि मार उसके शरीर पर पड़ रही है। क्यों ऐसा लगता है मानू को, क्यों छोटू की पीड़ा उसे विचलित करती है। मानू स्वयं भी नहीं जानती है।
"मम्मी इसे क्यों मार रही हो?" मानू के कंठ से न चाहते हुए भी आवाज निकल ही पड़ा। उसका बाल सुलभ मन मचल पड़ा था। अपनी माँ का डर और छोटू के नंगे शरीर पर छड़ी के प्रहार से बना निशान उसे बेचैन कर रहा था। पता नहीं उसकी माँ किस काठ से बनी है। पछता रही थी कि आज फिर उसके चलते छोटू मार खा रहा है।
"तुम फिर बीच में आ गई।" जाह्नवी गुस्से में फिर चीखी. कुछ विचलित भी हुई। उसे मानू के मासूम चेहरे पर ग्लानि और पछतावे के भाव दिखे, लेकिन क्यों? क्यों मानू को इस लड़के से इतना लगाव है और क्यों?
मानू अपनी माँ का तेवर देख कर सहम गई। उसके चेहरे पर डर की छायाएँ गर्दिश कर रही थी। फिर पता नहीं किस भावना से प्रेरित हो कर धीरे से बोली -"इसे छोड़ दो। इसने मुझे पत्थर नहीं मारा।"
"तुम फिर इसका वकालत करने लगी। सभी ने देखा कि इसने तुम्हें चोट पहुँचाया है।" जाह्नवी हाथ नचाते हुए बोली।
अब तक मानू सहज हो चुकी थी। वह अपनी माँ के स्वभाव को जानती थी। वह वाकपटुता में कुशल थी, और खास कर अपनी माँ के लिए. वह जानती थी कि माँ को किस तरह अपनी बात मनवाना है।
"नहीं माँ...! ये मेरी गलती है। मैं बदहवास दौड़ी चली आ रही थी और अचानक दीवार से टकरा कर गिर गई और सिर पर चोट लगी। इसमें भला छोटू की क्या गलती है और इसकी भी क्या मजाल की यह हमें चोट पहुँचाए।" वह माँ के सामने छोटू को उपेक्षा से देखती हुई बोली. असल में इस समय उसे रोने का मन कर रहा था। लेकिन रोई नहीं बेचैन जरूर थी।
जाह्नवी निरुतर हो गई। उसे मानू पर भरोसा था। वह जानती है कि उसकी बेटी उससे झूठ नहीं बोलती। लेकिन उसकी आँखों में अभी भी छोटू के लिए नफ़रत और गुस्सा था जिसे कम से कम मानू समझ गई थी। जाह्नवी छोटू को नफ़रत से ताक रही थी जबकि छोटू उदंडता से हँस रहा था।
"तुम बदमाश, हरामी के जने मार खा कर भी हँस रहे हो। जाओ भागो यहाँ से।" जाह्नवी फटकारते हुए बोली।
तब तक छोटू की माँ आ गई। उसके चेहरे पर दुःख और डर के काले बादल थे। वह डरी सहमी अपने बेटे को खींचती हुई वहाँ से ले जा रही थी। मानू अपराधी भाव से जाते हुए छोटू को देख रही थी। उसकी उदंडता से भरे निर्दोष चेहरे को देख रही थी। उसकी आँखों में भरे निश्चिंतता को देख रही थी।
छोटू विधवा मुन्नी का बेटा है। उसका बाप माधव मुन्नी के ख्यालों के विपरीत एक नंबर का आलसी और कामचोर था। उसे जहाँ भी कोई काम में लगा दो दिन-भर दुनिया-जहान की बातें करने में ही अपना समय बिताता था। बेफिक्री और लापरवाही उसका प्रिय बिनोद था। शाम को कहीं न कहीं से दो पैसे हाथ मार कर भी शराब पीने बैठ जाता। वह पीने लगता तो खूब छक कर पीता। शराब पी लेने के बाद घर परिवार की चिंता फिकिर पूरी तरह भूल जाता।
"मैंने कुछ नहीं किया माई।" छोटू अपनी माँ के आँखों में लुढ़क आए आँसू को देखते हुए बोला।
डरी सहमी मुन्नी कुछ न बोली। उसे पास में बैठा कर देखती रही फिर बोली "कितना रुलाओगे मुझे, तुम्हें अच्छा लगता है, रे...।"
"माई...!"
मुन्नी जब ब्याह कर घर में आई तो घर की कुव्यवस्था और दरिद्रता देख कर काँप गई थी. लेकिन जब बिल्ली के गले में घंटी बंध जाती है तो उसे बजाना ही उचित है। वह जल्द ही समझ गई कि घर परिवार की जिम्मेवारी उसका पति निबाहने से तो रहा। उसे स्वयं ही कुछ ठोस निर्णय के साथ घर की दशा सुधारना होगा। खेतो में काम कर के उसने अपने घर की माली हालत सुधारनी चाही। लेकिन दिन भर काम करके जो भी अनाज पानी, कुछ पैसे लाती, पति महोदय के पेट का भेंट चढ़ जाता। चारो पहर चिंता में डूबी मुन्नी कभी अपने भाग्य को कोसती कभी अपने पति को। उसके निकम्मेपन और उदंडता पर खूब खरी खोटी सुनाती। लेकिन माधव को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। घर की गरीबी या दीनता उसके लिए कोई मायने नहीं रखता। घर के एक-एक कर बर्तन, अनाज तक को कच्ची शराब की भेंट चढ़ा चुका था। स्वस्थ शरीर के लिए भरपेट पौष्टिक और सुपाच्य आहार चाहिए और पौष्टिक आहार के लिए उद्योग करना पड़ता है। लेकिन यह बेचारा उद्योग करना क्या जाने।
मुन्नी को आज भी याद है। माधव को अचानक एक दिन बुखार लगा। हफ्ते दिन तक वह बुखार से तपता रहा। मुन्नी डॉक्टर को दिखलाई तो डॉक्टर बतला दिया की इसे गंभीर रोग ने आ पकड़ा। घर में खाने को लाले पड़े हुए थे। इलाज कैसे हो। मुन्नी गाँव के लोगों के आगे खूब रोइ गिड़गिड़ाई। वापसी का कोई आशा न रखते हुए भी कुछ ने पैसे, कुछ ने अनाज दिए। मुन्नी पैसे लेकर घर आई कि शायद इतने के दवा-दारु से कुछ सुधार हो जाए। पैसे आले पर रख कर मुन्नी कुछ आवश्यक काम से पड़ोस में गई। इधर माधव उस पैसे को आले से उतार लाया। पैसे मिलते ही उसका हफ्तों का सुखा समाप्त हो गया।
कई दिनों से वह एक घूंट भी पिया नहीं था. लड़खड़ाते पैरों से सीधा शराब के ठेके पर पहुँच गया। बुखार की पीड़ा से अधिक शराब की तड़प और उसे पा लेने की इच्छा उस पर हावी था। ठेके का मालिक उसे देखते ही उपहास किया- "का रे माधो...! आज किधर से हाथ मार दिया. बड़ा खुश नजर आ रहा है।
"जल्दी से एक पुरी बोतल दे...!" माधव काँपते हाथों से पैसे देते हुए बोला।
"अरे... अरे... इतना जल्दी का है। कहीं जाना है का हो।" ठेके का मालिक बाज की तरह माधव के हाथ से पैसे झपटते हुए बोला।
माधव बगल के खोमचे वाले से तला हुआ चना लाया और पीने लगा। सुबह से पेट में एक निवाला नहीं गया था। खाली पेट में शराब पहुँचा तो जल्द ही अपना आधिपत्य जमा लिया। वह बडबडाने लगा- "पेट में खाने को दाने नहीं है और ससुरी इलाज करवाएगी। उ हरामखोर कलुआ बड़का डागडर बन गया है। ऐसे ही सारा पैसा हड़प जाएगा।"
जाम पर जाम चलने लगा। दोपहर से बैठे शाम हो गया। माधव पीता रहा। वह कभी-कभी नशे की अधिकता में बड़बड़ा भी उठता। लेकिन पूरी तरह तृप्त हो गया था माधव वह सन्तुष्ट और प्रसन्न भाव से उठा। बुखार अब उस पर हावी नहीं था। शराब की तृप्ति ने उस पर पूरी तरह विजय प्राप्त कर लिया था। वह लड़खड़ाते पैरों से सड़क पर जाता हुआ बड़बड़ा रहा था। लेकिन नशा इतना अधिक था कि उसके पैरों में अवरोध उत्पन्न कर रहा था। वह चलते हुए गिर पड़ा. सामने से कोई मनचला ड्राइवर अपनी टैक्सी लेकर आ रहा था। इजाफा ये कि वह भी नशे की अधिकता में अपना कंट्रोल भूल चुका। एक भयंकर टक़्कर हुआ। माधव दूर चारो-चित सड़क पर जा गिरा। उसका सिर तरबूज की तरह फट गया। और माधव स्वर्ग सिधार गया।
आज चार साल हो गये माधव के दुःखद अंत को बीते हुए। मुन्नी छोटू की उत्तेजना, उसकी शरारतें, उसकी हरकते देखती तो काँप जाती।. वह बड़े हसरत से छोटू को समझाती उसकी छोटी छोटी जिद्द पूरा करती लेकिन उस की हठबुद्धि से व्याकुल हो जाती। वह तमाम मुसीबतें झेल कर भी छोटू का परवरिश कर रही थी। दिन भर खेतों में हाड़तोड़ काम करती।
मुन्नी सिर्फ एक बच्चे की माँ बनी थी। लेकिन दीनता ने उसके सौंदर्य को पूरी तरह रौंद दिया था। उसके शील स्वभाव में ऐसी पात्रता न थी कि लोगों के कुदृष्टि का विरोध करे। बल्कि उसके मैले कुचैले वस्त्रों के अंदर उसका कमसिन और दबा हुआ सौंदर्य हमेशा मनचलो को आकर्षित करता था। और वे लोग गिद्ध की तरह उस पर दृष्टि गड़ाए मौके की तलाश में रहते।
"बैठ कर टपर टपर आँसू क्यों बहा रही हो, बाकी काम क्या तुम्हारा मरा हुआ पति करेगा?" मुन्नी चौंकी और सामने देख कर सकपका गई. जैसे किसी ने अचानक बीते हुए अतीत पर एक तेज चाकू से वार कर दिया हो। सामने जाह्नवी गुस्से में ताक रही थी।
भैरव सिंह उसे अपनी पत्नी की तीमारदारी के लिए रख लिया था। घर का सारा काम वह उसी मनोयोग से करती कि उनके मालिकों की रहमत उस पर बरसती रहे। मानू उसी भैरव सिंह की इकलौती बेटी थी। मुन्नी सुबह होते ही घर के काम, चूल्हा चौका में लग जाती।
साथ आया छोटू दिन भर बाहर छोटे बच्चों के साथ धम्माचौकड़ी करता। नित्य नई शरारतें किया करता। उसके मंडली में मानू, बिन्नी, शोभा साथ होती। दिन भर सभी बच्चे खेलों में मग्न रहते। उनके बालस्वभाव में किसी तरह का भेदभाव नहीं था। सभी में समानता और सहयोग की भावना थी और यह गुण उदंडता के बावजूद भी छोटू में कुछ अधिक वयस्क था।
छोटू जाह्ववी की आँखों में हमेशा खटकता था। वह छोटू के गोलमटोल बातों से हमेशा चिढ़ी हुई रहती। वह घुमा-घुमा कर बात करने में पक्का उस्ताद था। वहीं मानू को छोटू के हरेक चूहल और शरारतों में आनंद आता। वह अपनी माँ के मना करने के बावजूद भी उसी के साथ खेलती. अगर उसे आम की फलिया तोड़वानी हो, तितली पकड़वाना हो, वह छोटू को ही साधिकार बतलाती और छोटू भी उसके प्रत्येक बात को कुछ खुशामदों के बाद मान लेता। मना उसके लिए कभी नहीं करता। उसकी उम्मीदों को रिझाता, फुसलाता और अंततः उसके काम में लग जाता।
मानू जब भी छोटू से किसी काम के लिए कहती तो उसकी आवाज में आदेश या एक बड़े घर की बेटी का अभिमान नहीं होता बल्कि एक सरल जिज्ञासा से भरा एक अनुरोध होता, खुशामते होती जिसे सुन कर छोटू का शरारती स्वभाव भी एक सरल रोमांस से कुलांचे भरने लगता।
छोटू का शरारती स्वभाव हमेशा अपना दोष छिपाने के लिए विकसित हो रहा था। वह जब तब अपना अपराध दूसरों के सिर मढ़ देता और ठहाका लगाता। जबकि मानू का निश्छल मन और भलमनसाहत ऐसी थी कि वह छोटू के अपराधों को अपने सिर ले लेती और स्वयं उसके दंड का स्वाद चखती। यह नहीं कि उसका ऐसा करना उसे अच्छा लगता अपितु उसे आनंद की अनुभूति होती। ऐसा क्यों महसूस होता है मानू को, वह स्वयं भी नहीं जानती है। तब उस अन्यायपूर्ण फैसले पर छोटू को अफ़सोस होता. पछताता लेकिन कभी इस बाबत वह मानू से बात नहीं करता। कभी उसे बात करने की हिम्मत भी नहीं होती। पश्चाताप की अग्नि करुणा और आपसी मेल जोल के शीतल बूँद से बुझ जाती।
चोर सिपाही खेलते हुए ऐसे कई अवसर आते जब छोटू को चोर बनाया जाता। इसके बावजूद मानू घोषणा करती हुई कहती -"नहीं यह चीटिंग हुई है, चोर मै बनी हूँ। तुम लोग छिपो मै ढूंढता हूँ।"
कभी-कभी यह रहस्य छोटू को भी अचरज में डाल देती कि मानू किस अधिकार से ऐसा करती है। उसे कभी-कभी मानू पर दया भी आती। उसका बाल-सरल स्वभाव मानू के लिए सम्मान और पछतावे से भर जाता और वह मानू के लिए कुछ अतिरिक्त स्नेह करता। कभी वही शरारत भरी चपलता, मानू की तथाकथित झूठ पर मंद-मंद मुस्कुराता।
"ये छड़ी का निशान तुम्हे दुखता नहीं...! बैठो तुम्हे बाम लगा देती हूँ" सभी की नजरों से बचते बचाते मानू छोटू को एकांत में बुला कर बैठाते हुए बोली।
"नहीं...नहीं लगाऊँगा ये बाम-फाम।" छोटू झल्लाते हुए बोला।
"अरे लाओ न लगा देती हूँ।"
"क्या होगा उससे...! और मेरा शरीर छुओगी तो क्या होगा? जानती हो, तुम्हारी माँ पिटेगी तुम्हे।"
"तुम्हे दुखता नहीं है छड़ी का मार।" मानू अचरज से खुशामद करती हुई बोली।
"नहीं...!" छोटू हँस पड़ा - "ऐसे छड़ी से तो मै हजारों बार पीट चुका हूँ। कुछ भी तो नहीं होता है और जानती हो मुझे तो और आनंद आता है. पीटते-पीटते पूरा शरीर भोथरा गया है।"
मानू छोटू को अचरज से देखती हुई बोली -"तुम्हे कुछ नहीं होता। मै तो मर ही जाऊँगी रोते-रोते।"
"अरे तुम अमीरों के पास दिल ही कितना बड़ा होता है, एकदम छोटा सा, छुईमुई घास की तरह, और घमंड तार भर का।" छोटू लापरवाही में व्यंग करते हुए बोला।
"तुम फिर शरारत करने लगा।" मानू कसैला सा मुंह बनाती हुई बोली।
"हाँ करूँगा। अबकी बार तुम अपने बाप से कह देना।"
"तुमने आज फिर झूठ क्यों बोला?" मानू के स्वर मे शिकायत थी।
"कैसा झूठ?"
"यही कि तुमने मुझे चोट नहीं पहुंचाया था।"
"तुम भी तो अपने से कबूल की थी कि नहीं, कि मैने तुम्हे चोट नहीं पहुंचाया। तुम आप ही दौड़ते हुए दिवाल से टकराई और गिर पड़ी। फिर तुम भी तो झूठ बोली।" मोनू निरुतर हो गई फिर कुछ सोच कर बोली -"अगर झूठ नहीं बोलती तो तुम और पीटते और मुझे तुम्हे पीटता देखना अच्छा नहीं लगता।"
"अच्छा...वो क्यों भला...! जब मै पीटता हूँ तो तुम बचाने काहे आती हो? छिप क्यों नहीं जाती हो" छोटू शरारत करते हुए बोला जबकि मोनू झल्लाते हुए बोली "फिर शरारत करने लगे तुम।"
शाम का वक्त था। हवा धीरे धीरे चल रही थी. वातावरण एक प्रसन्न मुस्कान के साथ धरती को पुलकित कर रही थी। मन में एक अजीब किस्म का उन्माद तरंगित हो रहा था। मुन्नी जाह्ववी के कपड़े धो रही थी। छोटू अन्य बच्चों के साथ खेलने में मशगूल था। मानू छोटू के पास पहुँच कर उससे जिद्द करने लगी कि वह पेड़ पर चढ़ कर उसके लिए अमरुद तोड़ दे।
खेलने में मग्न छोटू मानू की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दे रहा था। मानू गुस्से और खीझ से उबल पड़ी "तुम्हे सुनाई नहीं देता क्या? बहरे हो!"
"नहीं जी आँखें हैं। अब आगे बोलो...!"
"कब से चिल्लाए जा रही हूँ कि पके हुए अमरुद तोड़ दो। और तुम हो कि खेलने मे ही मगन हो।. बड़े आए खेलने वाले!" मानू मुंह बिचकाते हुए बोली।
"अरे वही तो देख रहा हूँ। अबकी बेर अंधा नहीं बोलना...!" छोटू खिलखिलाकर हंस पड़ा।
"देखो छोटू आज कोई शरारत नहीं। चुपचाप अमरुद तोड़ दो। नहीं तो सचमुच आज तुम्हारी शिकायत पिता जी से कर दूँगी।" मानू साफ चेतावनी दे दी।
"बोलो तो जानूं कैसी शिकायत करोगी। "छोटू फिर मानू को चिढ़ाते हुए बोला।
"यही की रामदिन काका का लाठी तुमने फिर चुपके से उठा कर नाली में फेंक दिया है। सही बात है कि नहीं।" मानू धीरे से बोली, कुछ ऐसे कि कोई तीसरा सुन न ले। छोटू सकपका गया. चकित भी हुआ कि रामदीन काका की लाठी नाली में फेकने वाली बात मानू कैसे जानती है। अपने उपर कोफ्त भी हुई। सहमा सिमटा सा वह अपने खेल को विराम दे कर मानू को ताकने लगा। आज सचमुच वह रामदीन काका को बमकाने के ख्याल से शरारत किया था। झूठ बोल कर उनसे लाठी ले लिया था कि बहुत सारे बंदर आम के पेड़ पर चढ़े हुए हैं, उसे भगाए देता हूँ। लाठी ले कर उसने नाली में फेंक दिया था।
सहमा सकपकाया छोटू अचानक उठा और लपकते हुए पेड़ पर चढ़ गया। बड़े इत्मीनान से पेड़ की शाखा पर बैठ कर अमरुद तोड़ा और मानू को ललचाते हुए खाने लगा। मानू जब भी हाथ पसार कर मांगती छोटू पके हुए अमरुद लेकर चिल्लाता -"लो लो मानू अमरुद, लपको जमीन पर गिरने न पाए।"
मानू लालायित नजरों से हाथ पसारती और छोटू चूहल करते हुए हाथ खींच कर खाने लगता. चिढ़ाता, भवे मटकाता, खिलखिलाता। मानू पहले ललचाती फिर अमरुद नहीं मिलने पर कुढ़ती हुई छोटू को कोसने लगती। उसका चेहरा रोने रोने को हो जाता और छोटू विजयी भाव से मुस्कुरा देता।
"ले लो मानू... अबकी बार कोई शरारत नहीं।"
मानू फिर उम्मीद के साथ ललचाई दृष्टि से छोटू को देखती और हाथ फैलाती। छोटू पुनः हाथ खींच कर अमरुद खाने लगता। मानू को छोटू पर क्रोध भी आता और एक रोमांच भी हो आता. फिर ठगे जाने पर ग्लानि भी होती। यह कौतुक छोटू के लिए आकर्षक विनोद बन गया था। उसे इस खेल में मजा आने लगा था जबकि मानू बेहद चिढ गई थी। उसे छोटू के बार-बार इस हरकत से गुस्सा आने लगा। वह स्वयं को अपमानित महसूस करने लगी। उसके बाल सुलभ मन में अपने माता पिता की तरह सम्मान की महत्वाकांक्षा बिल्कुल भी न थी। लेकिन आए दिन छोटू की बढ़ती हुई हरकतें, उसकी शरारतें, और उसके उदंडतापूर्ण बातों से वह बहुत ज्यादा चिढ गई थी। अपने मित्र मण्डली में जो उसकी हिम्मत थी, जो साहस की गरिमा थी, जो विवेकपूर्ण स्वाभिमान का गौरव था वो यहाँ छोटू के सामने चूर-चूर हो रहा था। अपना एकाधिकार उसे टूटता हुआ महसूस होने लगा। वह मारे क्रोध, ग्लानि और उपेक्षा से काँपने लगी।
"तुम्हारी ये मजाल कि हमें ही उल्लू बना रहे हो।"
जिसकी माँ रात दिन रात हमारे ही घर में एक दासी बनी, एक-एक इशारे पर नाचती फिरती है. वह जानती थी लेकिन प्रत्यक्षः कह नहीं पाई. उसके आँखों में आँसू तैरने लगे। वह पैर पटकती हुई वहाँ से जाने लगी। विषमता ने उसे याचना का भी अवसर न दिया था।
"अच्छा लो मानू...। सच, अबकी बार कोई शरारत नहीं करूँगा, लो कान पकड़ता हूँ। अपनी माई कसम।"
"तुम चांडाल हो। जैसी नियत वैसी बरकत है. तुम रहा पेटू का पेटू। अपने खाओ अमरुद मुझे नहीं चाहिए।"
दीनता के साथ यदि उपहास और शरारत का तत्व मिला हुआ हो तो उसपर किया गया प्रत्येक कड़वे शब्दों का प्रहार उसे परास्त कर देता है और शरारत घुल कर विनयशीलता में बदल जाती है।
छोटू का शरारती मन कुढ़ने लगा। पछताने लगा कि जो उसके बचाव के लिए हरदम प्रस्तुत रहती है और उसके सारे इल्जाम अपने सिर पर ले लेती है, उसके साथ ही यह उपहास।
"ओ मानू लो...! फिर से माई कसम खाता हूँ. अबकी बार कोई बदमाशी नहीं करूँगा. सचमुच।"
लेकिन मानू नहीं लौटी। वह धीरे-धीरे बढ़ती जाती थी और सुबकती जाती थी।
तब तक वहाँ रामदीन आ पहुँचा। वह छोटू को देखा तो आगबबूला हो गया। वह छोटू के शरारतों से तंग आ चुका था। वह तमतमाए लाठी पटकता हुआ गरजने लगा। रामदीन की आवाज को सुन कर पड़ोस के बच्चे भी वहाँ उपस्थित हो गए। छोटू सहमा हुआ पेड़ की शाखा से चिपका हुआ था।
"चल उतर चोर कही का...!" रामदीन डंडा घुमाने लगा।
अकस्मात आए संकट से छोटू अपना विवेक खो बैठा। उसके मन की चंचलता का जैसे पतन हो गया। उसके चेहरे पर शरारत की जगह याचना का भाव गर्दिश करने लगा। डर वापसी के सारे मार्ग पर पूर्ण विराम लगा देता है।
"चल आ अब, बड़ा मजा आया न अमरुद खाने में। आ अब डंडे का मजा चखाता हूँ।" रामदीन लाठी भाँजते हुए बोला। तब तक जाह्नवी भी आ चुकी थी। वह छोटू को देखते ही चीखने चिल्लाने लगी।
मानू इस दृश्य को देखी तो कांप कर रह गई। पछताने लगी कि आज फिर उसकी वजह से छोटू पिटेगा। वह उसके बचाव का मार्ग तलाशने लगी। वह सबके सामने क्या सफाई दे कि छोटू बच जाए।
जाह्नवी चीख रही थी- "इसका उपद्रव बढ़ता ही जा रहा है। इसे सबक सिखाना ही पड़ेगा। सच है जिसका बाप ही कामचोर और जीभ-चट था, बात-बात पर मुँह मारने का लत था। उसका सपूत कैसा होगा...!"
मानू जानती है कि बात उड़ते उड़ते उसके पिता या चाचा जी के पास पहुँच गया तो फिर छोटू की खैर नहीं। खासकर वह अपने चाचा के गुस्से को जानती थी। वे नौकरों से बड़ी निर्दयता से पेश आते थे। वह डर गई थी। जबकि छोटू शांत पेड़ की टहनियों से चिपका था। उसके चेहरे पर भय का परत धीरे-धीरे गायब हो गई और अब उसकी जगह आने वाले संकटो से निपटने के लिए एक बेफिक्र साहस परवाज कर रहा था।
रह रह कर हवा चलती तो टहनियाँ हिलते हुए कड़कड़ाने लगती।
मुन्नी भी शोरगुल सुन कर दौड़ी चली आई। जाह्नवी के तमतमाए मुख को देखी तो मारे खौफ के काँप गई। हाथ जोड़ कर उसने जाह्नवी के कदमों में माथा टेक दिये। और बड़े ही दीन भाव से बोली -"मालकिन आज क्या शरारत कर दी मेरे बेटे ने। मुझे बताइए अपराध को क्षमा कीजिए मालकिन।" फिर वह छोटू पर बरसती हुई बोली -" क्यों हमारी जान पर पड़ा है। हमारे कोख को नसाएगा क्या?" आँखों में आँसू आ गए उसके।
वह जाह्नवी के स्वभाव से परिचित थी। वह रो रही थी। उसके आँखों से बहते आँसू याचना कर रहे थे। जबकि जाह्नवी आँखे तरेर कर फटकार लगाने लगी।
"ये मुनिया तूं आई है बेटे की चिरौरी करने। चल भाग यहाँ से कामचोर कहीं की। सारा काम पड़ा हुआ है, अब तक कुलमुही क्या कर रही है। जा भाग यहाँ से।" जाह्नवी मुन्नी को कस कर फटकार लगाई।
बेवश मुन्नी क्या करती। पेट की भूख और कर्तव्य बोध की बंदिशें स्वयं पर आये विपत्ति में सिर्फ आँसू बहाता है। वह विरोध करने का सभी अधिकार खो चुका होता है।
मुन्नी कातर और दीन भाव से कभी जाह्नवी को कभी अपने बेटे छोटू को देखती हुई चली जा रही थी। पैर उठते न थे। बेटे की ममता उसे व्याकुल किये जा रही थी। लेकिन मालकिन का भय और सख्ती ने जैसे उसकी सारी ममता की नदी को मवाद की पीड़ा से भर दिया था। वह रोती जाती थी, बिलखती जाती थी, लेकिन उसकी विपदा को कौन सुने?
नन्ही मानू इस दृश्य को देखी तो कांप कर रह गई। उसे अपनी माँ की अमानुषिक क्रूरता पर क्रोध आ रहा था। पछतावा भी हो रहा था अपने आप पर।
पछता रही थी कि वह छोटू को अमरुद तोड़ने के लिए बोली ही क्यो थी? इस काम के लिए वह रामदीन काका को भी तो कह सकती थी। छोटू भी कितना शरारती है। उसका हर इल्जाम आप लेती हूँ लेकिन उसका तनिक भी परवाह करता है। बस दिन रात शरारत...!
फिर छोटू की भी गलती क्या है। उसे तो हमने अमरुद तोड़ने को कहा था। अब वह हमें चिढ़ाए या मनाये इससे क्या? दूसरों को क्या बिगड़ता है. ये रामदीन काका भी हैं न। पता नहीं क्यों हमेशा छोटू से चिढ़ते रहते हैं। बस चले आए तिल का ताड़ बनाने। हल्ला कर के पूरा आसमान उठा लाए। आज किसी तरह छोटू बच जाए अब मै कभी उससे कोई अपना काम करने की जिद्द नहीं करूँगी। सीधे मन से करता है तो ठीक। नहीं तो आप करूँगी।
डरी सहमी मानू कभी छोटू के शांत और निर्भीक चेहरे को देख रही थी कभी अपनी माँ को। वह अपनी माँ के चेहरे पर ऐसी वितृष्णा, घृणा के ऐसे भाव, नफ़रत के ऐसे शोले देखी कि उसका कोमल हृदय पूरी तरह काँप कर रह गया।
एकाएक उसे गुस्सा आया। बहुत तेज गुस्सा आया अपनी माँ पर। वह गुस्से की ज्यादती में चीख पड़ी -"माँ तुम क्यों मनमानी कर रही हो. इसमें छोटू का क्या दोष है। मैंने ही तो उसे बड़ी खुशामद कर पेड़ पर चढ़वाया था। वह तो मना भी कर रहा था।" पता नहीं वह किस अज्ञात प्रेरणा से बोल तो दी लेकिन फिर सिटपिटा गई।
"अच्छा महारानी तुम फिर इसकी वकालत करने लगी। तुम ऐसे नीच लोगों को क्यों मुंह लगती हो. ये मुंहफट लोग हैं। राड़-रेयान की बुद्धि कितनी होती है।" जाह्नवी मानू को डपटती हुई बोली।
"लेकिन माँ छोटू निर्दोष है। तुम बिना कसूर के नौकरों को सजा क्यों देती हो। छोटू की जगह मै होती और कोई मुझे पीटता तो सोचो तुम क्या करती।" जाह्नवी निरुतर हो गई।
जबकि छोटू हँस पड़ा- "हाँ हाँ बड़े आदमी... सजा...कसूर...! छोटू के इन शब्दों में व्यंग्य था या नियति का स्वीकार, कोई समझ न पाया। वह अजीब, बेफिक्र होकर हंस रहा था।
एक सामान्य से जीवन में अकस्मात आए बदलाव कितना कुछ छीन लेता है किसी को पता नहीं चलता। कितना कुछ बिखर जाता है जब नित्य दिनचर्चा में असमान्य दुःख का तत्व शामिल हो जाता है।
तभी, जैसे प्रकृति ने इस सामाजिक विसंगतियों पर अपना धैर्य खो दिया। आसमान अचानक एक अज्ञात हादसों से गहरा गया और एक बहुत तेज, दिल को दहला देने वाली हवा का झोंका आया। पूरा अमरूद का पेड़ थरथरा उठा। एक भयानक 'चट-चट' की आवाज वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने सुना—वही आवाज जो छोटू की पीठ पर पड़ी खजूर की छड़ी से निकली थी. और... कड़ाक! एक जोरदार आवाज के साथ पेड़ की वह हरी-भरी शाखा, जिस पर छोटू बैठा था, धड़ाम से धरती पर आ गिरी।
शाखा के साथ ही छोटू की एक चीख हवा में तैरी और अचानक सन्नाटे में तब्दील हो गई। वह चीख इतनी मर्मभेदी थी कि हवेली के भीतर बर्तन मांजती मुन्नी का कलेजा मुंह को आ गया. वह बदहवास, नंगे पैर, हाथ में लगा साबुन का फेन पोंछते हुए दौड़ी।
धरती पर अमरूद के पत्तों और धूल के बीच छोटू निश्चेष्ट पड़ा था। उसके सिर से खून की एक पतली लकीर निकल कर सूखी मिट्टी में जज्ब हो रही थी। उसका वह ढीठ, जिद्दी और शरारती चेहरा अब बिल्कुल शांत था—असीम रूप से शांत।
मुन्नी ने चीख कर अपने कलेजे के टुकड़े को गोद में उठा लिया, "ओ छोटू रे... माई का लाल... बोल रे!" उसके आँसू छोटू के चेहरे के खून को धोने लगे। पेट की भूख और मालकिन का खौफ, ममता के इस महासागर के सामने बह गए थे।
जाह्नवी वहीं खड़ी थी, निर्विकार, पत्थर की मूरत जैसी। उसकी आँखों में अब न नफरत थी, न गुस्सा। वहाँ केवल एक सुन्न कर देने वाला खालीपन था। क्या एक गरीब के बच्चे की 'उदंडता' की सजा यही थी? प्रकृति के इस अचानक आए विनाश ने उसकी बड़प्पन की सारी हेकड़ी को एक पल में मिट्टी में मिला दिया था. वह अपनी रेशमी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में भींचे, अपनी ही बनाई क्रूरता के मलबे को देख रही थी।
मानू आगे बढ़ी, उसके कदम कांप रहे थे। उसने छोटू के उस नंगे बदन को देखा, जहाँ कुछ देर पहले छड़ी के लाल निशान उभरे थे और अब वहाँ मौत की नीलिमा उतर रही थी। मानू की आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला, पर उसके कंठ रुंध गए थे। वह रोना चाहती थी, चिल्लाना चाहती थी, अपनी माँ से कहना चाहती थी—'देखो मां! तुमने इसकी खाल खींचने को कहा था न? देखो, यह अब कभी झूठ नहीं बोलेगा...' पर वह कुछ बोल न सकी।
मानू ने कांपते हाथों से अपनी जेब में हाथ डाला. उसकी छोटी सी जेब में वही 'बाम' की डिबिया' रखी थी, जिससे वह छोटू की टिसती हुई पीठ को सहलाना चाहती थी। उसने डिबिया को कसकर अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
पेड़ से टूटी वह हरी शाखा ज़मीन पर निर्जीव पड़ी थी, और उसके ठीक बगल में कुचली गई बचपन की एक और 'शाखा' हमेशा के लिए टूट चुकी थी। मानू अपलक छोटू को देख रही थी, और वहाँ हवा में अमरूद के पत्तों की सरसराहट में किसी मूक शोकगीत की तरह गूँज रही थी. मुन्नी का विलाप दीर्घ होता जा रहा था, महल के गुम्बजों से भी उपर...!
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
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