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रणविजय सिंह सत्यकेतु की कविताएँ

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रणविजय सिंह सत्यकेतु  सभ्यताएं एक दिन में नहीं बनती। उन्हें बनने संवरने में शताब्दियां लग जाती हैं। ऐसा भी होता है कि एक ही समय में विभिन्न सभ्यताएं आपस में श्रेष्ठता के लिए संघर्ष करती रहती हैं। परमाणु हथियारों की खोज के बाद दुनिया में शक्ति के समीकरण बदल गए हैं। संयुक्त राज्य अमरीका वर्चस्व की होड़ में खुद को श्रेष्ठ तो मानता ही है साथ ही यह भी दर्शाना चाहता है कि वह दुनिया की एकमात्र महाशक्ति है। इसी क्रम में ईरान उसके निशाने पर आया। लेकिन अमेरिका यह भूल गया कि ईरान वेनेजुएला जैसा देश नहीं है। फारस की सभ्यता दुनिया की पुरानी सभ्यताओं में से एक है। प्रतिरोध की परंपरा वहां की जड़ों में है। ईरान के प्रतिरोध की परंपरा ने संयुक्त राज्य अमेरिका के अहंकार को दरका दिया है। अपनी एक कविता में रणविजय सिंह सत्यकेतु लिखते हैं : 'एक सतत सभ्यता/  किसी असभ्य अभियान से मात नहीं खाती/ श्रमशील, प्रतिबद्ध और कर्मठ आबादी को मिटाने वाले/ मतिछिन्न मंसूबों को कामयाब नहीं होने देती/ ईमान को ऊंचा रखने वाली जनता ने सिखाया/ दमदार संस्कृति हमेशा इतिहास रचती है/ विखंडित भूगोल के मायने बदल देती है/ ठोस इ...

रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'मातृभाषा : नैसर्गिक विकास का सुंदर द्वार'

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रणविजय सिंह सत्यकेतु  भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होने के साथ साथ अपने समुदाय के साथ एकजुट होने का भी सशक्त माध्यम भी है। हम अपनी सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति अपनी मातृ भाषा में ही कर सकते हैं। उपनिवेश स्थापना के क्रम में कुछ यूरोपीय देश पहला हमला अधीन देश की भाषा और संस्कृति पर ही करते थे। यही वजह है कि अफ्रीका और दक्षिण अमरीकी महाद्वीप में अवस्थित अनेक देश अपनी मूल भाषा गँवा कर उसकी जगह यूरोपीय भाषाओं मसलन अंग्रेजी, स्पेनिश, पोर्चुगीज, फ्रेंच और डच का ही प्रयोग करते हैं।  धर्म के आधार पर भले ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ लेकिन भाषा वह कारक बन गई जो अन्ततः उसके विभाजन के रूप में परिणत हुआ। ढाका यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 21 फरवरी 1952 में तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की भाषायी नीति का विरोध किया। यह प्रदर्शन अपनी मातृभाषा के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए था। प्रदर्शनकारी बांग्ला भाषा को आधिकारिक दर्जा देने की मांग कर रहे थे, जिसके बदले में पाकिस्तान की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाई। लेकिन लगातार जारी विरोध के चलते अंत में सरकार को बांग्ला भाषा क...

मनीष चौरसिया की रपट 'प्रयागराज की साहित्यिक विरासत और प्रतिरोध की गूंज: 'चेतना के दस द्वीप'

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इलाहाबाद की ख्याति एक अरसे तक हिन्दी साहित्य की राजधानी के तौर पर रही है। एक से बढ़ कर एक दिग्गज साहित्यकार यहां की मिट्टी से निकले और साहित्य जगत में उन्होंने ख्याति अर्जित की। आज भी यहां अनेक ऐसे कवि हैं जिनके बिना हिन्दी कविता का कोई भी वृत्त पूरा नहीं। होता। प्रतिरोध की परम्परा यहां के मन मिजाज में है। गंगा जमुनी तहजीब यहां को धरोहर है। रणविजय सिंह सत्यकेतु ने इलाहाबाद के दस कवियों को ले कर एक किताब 'चेतना के दस द्वीप' सम्पादित की है जो न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। सत्यकेतु ने किताब की एक सुविचारित भूमिका लिखी है जिसमें उन्होंने यह बताया है कि इस किताब में 1967 से 1977 के बीच जन्मे ऐसे  कवियों की कविताओं का चयन किया गया है जो मूलतः कवि हैं और जिन्होंने इलाहाबाद से ही अपने लिखने का क्रम शुरू किया । आत्म कथ्य के साथ सभी कवियों की चुनिंदा पांच कविताएं भी दी गई हैं। इस किताब पर 27 जनवरी 2026 को एक बातचीत का आयोजन किया गया जिसकी विस्तृत रपट मनीष चौरसिया ने तैयार की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मनीष चौरसिया की रपट 'प्रयागराज की साहित्यिक विरासत औ...

चंद्रभानु सरोज द्वारा की गई समीक्षा 'समय समाज की संवेदनाओं, प्रतिरोधों और संवादों की थाती : चेतना के दस द्वीप'

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कवि कथाकार रणविजय सिंह सत्यकेतु के सम्पादन में 'चेतना के दस द्वीप' नामक एक संग्रह का प्रकाशन  अभी  हाल ही में   हुआ है। इस संग्रह में सम्पादक ने दस कवियों की पांच पांच कविताएं प्रस्तुत की हैं। एक समयांतराल में जन्मे इन कवियों की कविताओं के माध्यम से अपने देश और समाज को बेहतर ढंग से जाना जा सकता है। चंद्रभानु सरोज ने  इस किताब की समीक्षा लिखी है । चंद्रभानु जी पत्रकार के साथ साथ एक उम्दा लोक कलाकार भी हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चंद्रभानु सरोज द्वारा की गई समीक्षा 'समय समाज की संवेदनाओं, प्रतिरोधों और संवादों की थाती : चेतना के दस द्वीप'। 'समय समाज की संवेदनाओं, प्रतिरोधों और संवादों की थाती : चेतना के दस द्वीप'  चंद्रभानु सरोज समकालीन हिन्दी कविता एक निरंतर बहती धारा है- कभी शान्त, कभी स्मृतियों से बोझिल, तो कभी आशाओं से दीप्त। रणविजय सिंह सत्यकेतु द्वारा संपादित कृति चेतना के दस द्वीप इन्हीं चमकती दस धाराओं को एकत्र करती है। यह केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय काव्य-संवेदना के विविध रंगों का एक विराट कोश है। दस कवियों की पांच-पांच श्रेष्ठ...