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रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'मातृभाषा : नैसर्गिक विकास का सुंदर द्वार'

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रणविजय सिंह सत्यकेतु  भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होने के साथ साथ अपने समुदाय के साथ एकजुट होने का भी सशक्त माध्यम भी है। हम अपनी सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति अपनी मातृ भाषा में ही कर सकते हैं। उपनिवेश स्थापना के क्रम में कुछ यूरोपीय देश पहला हमला अधीन देश की भाषा और संस्कृति पर ही करते थे। यही वजह है कि अफ्रीका और दक्षिण अमरीकी महाद्वीप में अवस्थित अनेक देश अपनी मूल भाषा गँवा कर उसकी जगह यूरोपीय भाषाओं मसलन अंग्रेजी, स्पेनिश, पोर्चुगीज, फ्रेंच और डच का ही प्रयोग करते हैं।  धर्म के आधार पर भले ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ लेकिन भाषा वह कारक बन गई जो अन्ततः उसके विभाजन के रूप में परिणत हुआ। ढाका यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 21 फरवरी 1952 में तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की भाषायी नीति का विरोध किया। यह प्रदर्शन अपनी मातृभाषा के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए था। प्रदर्शनकारी बांग्ला भाषा को आधिकारिक दर्जा देने की मांग कर रहे थे, जिसके बदले में पाकिस्तान की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाई। लेकिन लगातार जारी विरोध के चलते अंत में सरकार को बांग्ला भाषा क...

मनीष चौरसिया की रपट 'प्रयागराज की साहित्यिक विरासत और प्रतिरोध की गूंज: 'चेतना के दस द्वीप'

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इलाहाबाद की ख्याति एक अरसे तक हिन्दी साहित्य की राजधानी के तौर पर रही है। एक से बढ़ कर एक दिग्गज साहित्यकार यहां की मिट्टी से निकले और साहित्य जगत में उन्होंने ख्याति अर्जित की। आज भी यहां अनेक ऐसे कवि हैं जिनके बिना हिन्दी कविता का कोई भी वृत्त पूरा नहीं। होता। प्रतिरोध की परम्परा यहां के मन मिजाज में है। गंगा जमुनी तहजीब यहां को धरोहर है। रणविजय सिंह सत्यकेतु ने इलाहाबाद के दस कवियों को ले कर एक किताब 'चेतना के दस द्वीप' सम्पादित की है जो न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। सत्यकेतु ने किताब की एक सुविचारित भूमिका लिखी है जिसमें उन्होंने यह बताया है कि इस किताब में 1967 से 1977 के बीच जन्मे ऐसे  कवियों की कविताओं का चयन किया गया है जो मूलतः कवि हैं और जिन्होंने इलाहाबाद से ही अपने लिखने का क्रम शुरू किया । आत्म कथ्य के साथ सभी कवियों की चुनिंदा पांच कविताएं भी दी गई हैं। इस किताब पर 27 जनवरी 2026 को एक बातचीत का आयोजन किया गया जिसकी विस्तृत रपट मनीष चौरसिया ने तैयार की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मनीष चौरसिया की रपट 'प्रयागराज की साहित्यिक विरासत औ...

चंद्रभानु सरोज द्वारा की गई समीक्षा 'समय समाज की संवेदनाओं, प्रतिरोधों और संवादों की थाती : चेतना के दस द्वीप'

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कवि कथाकार रणविजय सिंह सत्यकेतु के सम्पादन में 'चेतना के दस द्वीप' नामक एक संग्रह का प्रकाशन  अभी  हाल ही में   हुआ है। इस संग्रह में सम्पादक ने दस कवियों की पांच पांच कविताएं प्रस्तुत की हैं। एक समयांतराल में जन्मे इन कवियों की कविताओं के माध्यम से अपने देश और समाज को बेहतर ढंग से जाना जा सकता है। चंद्रभानु सरोज ने  इस किताब की समीक्षा लिखी है । चंद्रभानु जी पत्रकार के साथ साथ एक उम्दा लोक कलाकार भी हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चंद्रभानु सरोज द्वारा की गई समीक्षा 'समय समाज की संवेदनाओं, प्रतिरोधों और संवादों की थाती : चेतना के दस द्वीप'। 'समय समाज की संवेदनाओं, प्रतिरोधों और संवादों की थाती : चेतना के दस द्वीप'  चंद्रभानु सरोज समकालीन हिन्दी कविता एक निरंतर बहती धारा है- कभी शान्त, कभी स्मृतियों से बोझिल, तो कभी आशाओं से दीप्त। रणविजय सिंह सत्यकेतु द्वारा संपादित कृति चेतना के दस द्वीप इन्हीं चमकती दस धाराओं को एकत्र करती है। यह केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय काव्य-संवेदना के विविध रंगों का एक विराट कोश है। दस कवियों की पांच-पांच श्रेष्ठ...

रणविजय सिंह सत्यकेतु का आलेख 'सृजन की ऊर्जा के संपूर्ण सौंदर्य का सस्वर गायन'

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  शालिग्राम कहानीकार परिचय  शालिग्राम 1934 में बिहार में अकाल पड़ा। उसी साल 21 मई को कथाकार शालिग्राम का जन्म हुआ। नई कहानी के ठीक बाद वाली पीढ़ी के रचनाकार हैं शालिग्राम। धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती ने देशभर के जिन 17 नए रचनाकारों को एक शृंखला के तहत छापा, उनमें ज्ञानरंजन, मेहरुन्निशा परवेज और शालिग्राम शामिल थे। इसके अलावा साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, दिनमान, नई कहानियां में उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रहीं। इजोतिया, नटुआ दयाल, पाही आदमी, बासमती, राकस, साफा, केंचुल आदि उनकी चर्चित कहानियां हैं। पहला कहानी संग्रह 1963 में पाही आदमी नाम से आया जिसकी रेणु और नागार्जुन ने भी मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उनकी अन्य रचनाओं में किनारे के लोग, कित आऊं कित जाऊं, मैलो नीर भरो (सभी उपन्यास) के अलावा संघाटिका, आंगन में झुका आसमान (कविता संग्रह) और घोघो रानी कित्ता पानी (रिपोर्ताज), देखा दर्पण अपना तर्पण (आत्मकथा) शालिग्राम की आंचलिक कहानियां शामिल हैं। 1971 में भारत-नेपाल पर आधारित सांस्कृतिक रिपोर्ताज 'अटपट बैन मोरंगिया रैन' राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल हुआ।...