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शिवकुमार मिश्र का आलेख 'मिट्टी से जुड़ी कवि-संवेदना'

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हमारे चारों तरफ लोक जीवन अपने अंदाज में जी रहा होता है। इस जीवन में अथाह पीड़ा, असमाप्य संघर्ष है लेकिन लोक की अदम्य जिजीविषा इस पीड़ा और संघर्ष को कभी मुखर नहीं होने देती। यह अलग बात है कि विकास की होड़ में दिन प्रतिदिन हम लोक से कटते जा रहे हैं। केशव तिवारी सही मायनों में लोक के कवि हैं। उन्होंने न केवल उसे देखा है बल्कि जिया भी है। इसीलिए उनकी कविताओं में यह लोक अपने चटख अंदाज में दिखाई पड़ता है। चर्चित आलोचक जीवन सिंह के सम्पादन में एक किताब आई है 'साँसों को पढ़ता कवि'। इस किताब में कुल 23 लेखकों के आलेख संकलित किए गए हैं। ये आलोचक तीन पीढ़ियों के हैं। इनमें एक तरफ जहां शिव कुमार मिश्र जैसे वरिष्ठ आलोचक हैं वहीं दूसरी तरफ भरत प्रसाद, अविनाश मिश्र और सन्तोष अर्श जैसे युवा आलोचक भी हैं। केशव की कविताई पर यह किताब एक मुकम्मल पड़ताल है। बानगी के तौर पर हम शिव कुमार मिश्र का आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं जो उन्होंने केशव तिवारी के पहले कविता संग्रह पर लिखा था। शीघ्र ही इस किताब से एक और आलेख हम प्रकाशित करेंगे जो कवि के इधर की कविताओं पर आज की पीढ़ी के आलोचक का होगा। तो आइए आज पहली ब...

रवि रंजन का आलेख 'नदी का मर्सिया और स्मृतियों का कचनार: केशव तिवारी की कविता का समकालीन पाठ'

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केशव तिवारी  जीवन के अस्तित्व के लिए पानी जरूरी है। लेकिन दिन ब दिन पानी के स्रोत सिमटते जा रहे हैं। एक खबर के अनुसार जमीन से जितना पानी भारत निकाल रहा है उतना कोई देश नहीं निकालता। इस काम से पृथ्वी की हालत लगातार खराब होती जा रही है। इससे पृथ्वी के संतुलन पर लगातार खराब असर पड़ रहा है। यहां तक की पृथ्वी अपनी धुरी से ही खिसकती जा रही है। दुनिया में जमीन से जितना जल निकाला जा रहा है उसका 25 फ़ीसदी से ज्यादा केवल भारत में हो रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में भी पाया गया है कि नदियां सूखती जा रही हैं। ऐसा वैश्विक स्तर पर हो रहा है।  केशव तिवारी की बकुलाही, चन्द्रावल, पहुज, क्वारी, सिंध, धसान, उर्मिल, चेलना और जेमनार जैसी लुप्तप्राय नदियों पर केंद्रित कविताएँ समकालीन हिंदी साहित्य में इको-क्रिटिसिज्म (पारिस्थितिकीय आलोचना) का एक जीवंत और मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं को चेरिल ग्लोटफेलिटी (Cheryl Glotfelty) की इस स्थापना के निकष पर परखा जा सकता है कि "साहित्यिक अध्ययन को भौतिक जगत के साथ अंतर्संबंधों की तलाश करनी चाहिए।" केशव तिवारी इन नदियों को केवल जलधाराओं क...