मनोज कुमार झा की कविताएँ
मनोज कुमार झा यह जीवन जितना ही सुंदर दिखता है उतनी ही जटिल इसकी संरचना है। कुदरत की इस जटिल संरचना को समझ पाना और भी मुश्किल काम है। एक कवि इसी मायने में अलग होता है कि वह इस समझ को जानने बूझने की कोशिश करता है। वह घटना के एक तार को देख सुन कर उसके तह में उतरने की गहन व्याकुलता से भरा होता है। इसी क्रम में उनके यहाँ वह प्रश्नाकुलता दिखायी पडती है जो एक मनुष्य होने के नाते होनी चाहिए। मनोज कुमार झा हमारे समय के एक चर्चित युवा कवि हैं। मनोज के कविता की एक पुस्तिका ‘ हम तक विचार ’ तथा दो कविता संग्रह ‘ तथापि जीवन ’ और ‘ कदाचित अपूर्ण ’ प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कविताओं में हम उन ध्वनियों को सहज ही सुन सकते हैं जो आम तौर पर अनसुनी रह जाती हैं। मनोज का शिल्प भी औरों से अलहदा है। हर पंक्ति एक रागात्मकता के साथ जैसे जीवन राग से संपृक्त हो। आज पहली बार पर प्रस्तुत है मनोज कुमार झा की कविताएँ। मनोज कुमार झा की कविताएँ जलना अब एक जटिल क्रिया थी लंका दहन के दिन मां जरूर ले जाती थी रामलीला हम लोगों को लगता था कि कुछ बुरा जल रहा है। रा...