हितेन्द्र पटेल का आलेख 'भारत को फिर से सोचने का समय'


हितेन्द्र पटेल 


रोजी रोजगार जीवन से जुड़े ऐसे मुद्दे हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। लोकतांत्रिक सरकार की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने देश के युवाओं को रोजगार प्रदान करे जिससे कि वह अपना जीवन यापन करने के साथ समाज और राष्ट्र की सेवा कर सके। लेकिन युवाओं को रोजगार देने के बजाय सरकारें अपनी इस जिम्मेदारी से बचने के प्रयास में लग जाती हैं। एक और दिक्कत है जो थोड़ी बहुत नौकरियां बची हैं उनकी भर्ती प्रक्रिया में ऐसा भ्रष्टाचार व्याप्त है जिससे दिन रात हाड़तोड़ परिश्रम करने वाले योग्य अभ्यर्थी रोजगार पाने की प्रक्रिया से ही बाहर हो जाते हैं जबकि अयोग्य लोग भ्रष्ट अधिकारियों को साध कर या रिश्वतखोरी के जरिए रोजगार प्राप्त कर लेते हैं। हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक होने का मामला बार बार सामने आया है। ऐसे में युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक है जो जंतर मंतर से ले कर रांची तक प्रखर रूप में दिखाई पड़ रहा है। युवाओं (जिन्हें जेन जी कहा जा रहा है) के प्रदर्शन में उनकी भाषा और तरीके को ले कर बुद्धिजीवियों के द्वारा प्रश्नचिह्न उठाए जा रहे हैं। लेकिन इस पीढ़ी को सवालों की परवाह तनिक भी नहीं है बल्कि वह अपने तरीके से अपना प्रतिवाद व्यक्त कर रही है। एक युवा ने मुझसे कहा 'संविदा पर अगर नौकरियां हो सकती हैं तो राजनीति क्यों नहीं। चुनावों पर इतना धन खर्च करने की क्या जरूरत है। राजनीति को भी क्यों नहीं संविदा के हवाले ही कर दिया जाए।' किसी भी युवा के रोजगार पाने के सपने के साथ दरअसल उसके पूरे घर परिवार का सपना जुड़ा होता है। उसके सपने के टूटने के साथ पूरे घर परिवार का सपना बिखर जाता है। इन मुद्दों के क्रम में हितेन्द्र पटेल अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं - 'युवा असफलता सह सकता है, यदि उसे विश्वास हो कि परीक्षा निष्पक्ष थी। वह यह स्वीकार कर सकता है कि कोई दूसरा उससे अधिक योग्य निकला। लेकिन वह यह कैसे स्वीकार करे कि उसकी मेहनत भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता या पैसे और संपर्क की शक्ति के सामने बेकार हो गई? यहीं आक्रोश पैदा होता है। यह आक्रोश केवल नौकरी न मिलने का आक्रोश नहीं है। यह उस सामाजिक अनुबंध के टूटने का आक्रोश है जिसमें राज्य और समाज ने युवा से कहा था —तुम पढ़ो, परिश्रम करो, नियमों का पालन करो; तुम्हें अवसर मिलेगा। जब नियम का पालन करने वाला व्यक्ति बार-बार पराजित होता है और नियम तोड़ने वाला आगे निकलता दिखाई देता है, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था की वैधता कमजोर होती है।इसलिए परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल प्रशासनिक प्रश्न नहीं है। यह लोकतंत्र की नैतिक विश्वसनीयता का प्रश्न है।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हितेन्द्र पटेल का आलेख  'भारत को फिर से सोचने का समय'।


'भारत को फिर से सोचने का समय'


हितेन्द्र पटेल 



युवा असंतोष, भारतीय आधुनिकता और एक इतिहास के विद्यार्थी की चिंता

पिछले कुछ दिनों में मेरे कुछ मित्रों ने मुझसे एक स्वाभाविक प्रश्न पूछा। अधिकतर लोगों ने अपरोक्ष रूप से ही सही इसे व्यक्त भी किया। एक प्रिय ने तो “कम से कम चुप रहने" की सलाह भी दे डाली। एक अग्रज मित्र ने कहा कि इनकी थोड़ी तारीफ़ करने में क्या हर्ज होता!”

कुल मिला कर उन्हें लगा कि जंतर-मंतर पर हुए ‘कॉकरोच’ समूह के प्रदर्शन को ले कर मेरी प्रतिक्रिया अपेक्षित उत्साह से कुछ कम है। कुछ मित्रों को मेरे वक्तव्य में आंदोलन के प्रति सहानुभूति से अधिक उसकी आलोचना दिखाई दी। उनका आशय शायद यह था कि जब युवा अपने भविष्य से जुड़े प्रश्नों को ले कर सड़क पर उतर रहे हों, उस समय आंदोलन की दिशा, नेतृत्व और राजनीतिक परिणामों पर विचार करने के बजाय सबसे पहले उनके साथ खड़ा होना चाहिए।

इस आपत्ति को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। किसी लेखक के लिए यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि उसके लिखे हुए शब्दों से पाठक तक कौन-सा अर्थ पहुँच रहा है। लेखक अपने मन में कितना ही स्पष्ट क्यों न हो, यदि उसकी भाषा उसके वास्तविक आशय से भिन्न प्रभाव पैदा कर रही है तो उसे अपनी बात दोबारा कहनी चाहिए।

इसलिए आरंभ में ही यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि युवाओं के इस प्रदर्शन के प्रति कोई उदासीनता नहीं है। परीक्षाओं की अनियमितता, भर्ती-प्रक्रिया में विलंब, रोजगार की अनिश्चितता और युवाओं के भविष्य के साथ होने वाला संस्थागत खिलवाड़ मामूली प्रश्न नहीं हैं। जिन युवाओं ने वर्षों तक पढ़ाई की है, अपने परिवारों के सीमित संसाधनों पर आश्रित रह कर परीक्षाओं की तैयारी की है और जीवन का एक बड़ा हिस्सा किसी अवसर की प्रतीक्षा में लगा दिया है, उनके आक्रोश को अनुशासनहीनता या क्षणिक उत्तेजना कह कर नकारा नहीं जा सकता। उनका शांतिपूर्ण प्रतिरोध लोकतांत्रिक समाज की एक आवश्यक आवाज़ है।

उनके साथ खड़ा होना चाहिए।

लेकिन किसी आंदोलन के साथ खड़ा होने और उसके बारे में विचार करना एक-दूसरे के विरोधी कर्म नहीं हैं। समर्थन का अर्थ विवेक का स्थगन नहीं हो सकता। किसी आंदोलन का सम्मान करने का अर्थ यह भी है कि उसकी वास्तविक सामाजिक भूमि को समझा जाए, उसकी संभावनाओं और सीमाओं पर विचार किया जाए और यह पूछा जाए कि उसकी ऊर्जा आगे किस दिशा में जाएगी।

मेरी चिंता आंदोलन को छोटा करने की नहीं है। चिंता यह है कि कहीं हम एक बड़े ऐतिहासिक प्रश्न को केवल एक प्रदर्शन, एक भाषण, एक संगठन अथवा एक तत्काल राजनीतिक माँग तक सीमित न कर दें।

जंतर-मंतर पर जितने लोग पहुँचे, उससे कहीं अधिक लोग वहाँ अनुपस्थित हो कर भी उस प्रदर्शन की सामाजिक पृष्ठभूमि का हिस्सा हैं। वे देश के छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में रहते हैं। वे कोचिंग संस्थानों, किराए के कमरों, पुस्तकालयों और परीक्षा केंद्रों के बीच अपना यौवन बिताते हैं। वे हर वर्ष नए आवेदन पत्र भरते हैं, नई परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, परिणामों की प्रतीक्षा करते हैं और कई बार यह जाने बिना आगे बढ़ते रहते हैं कि यह प्रतीक्षा कहाँ समाप्त होगी।

इसलिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि जंतर-मंतर का प्रदर्शन कितना बड़ा था। प्रश्न यह है कि भारत के युवाओं के भीतर यह बेचैनी इतनी व्यापक कैसे हुई।

इतिहासकार की रुचि घटना में होती है, लेकिन वह घटना पर रुकता नहीं। वह उन प्रक्रियाओं की खोज करता है जिन्होंने घटना को संभव बनाया। कोई आंदोलन अचानक पैदा नहीं होता। किसी एक नारे, वीडियो, वक्तव्य या प्रशासनिक निर्णय से उसका आरंभ दिखाई दे सकता है, पर उसकी जड़ें कहीं अधिक गहरी होती हैं। वह लंबे समय से जमा होते अनुभवों, अपमानों, असफलताओं, आशाओं और निराशाओं के मेल से बनता है।

बौद्ध दर्शन में प्रतित्यसमुत्पाद का सिद्धांत यही बताता है कि कोई वस्तु या घटना अकेली उत्पन्न नहीं होती। वह अनेक कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर होती है। इस दृष्टि को सामाजिक इतिहास पर लागू करें तो समझ में आता है कि आंदोलन भी किसी एक कारण की संतान नहीं होते। परीक्षा की गड़बड़ी केवल तात्कालिक कारण हो सकती है; उसके पीछे शिक्षा, रोजगार, कृषि, सामाजिक गतिशीलता, असमानता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की लंबी प्रक्रियाएँ काम कर रही होती हैं।

इसीलिए इस आंदोलन के साथ न्याय तभी होगा जब हम उसके पीछे खड़े भारत को देखने का प्रयास करें।

आकांक्षा का विस्तार और अवसर का संकुचन

स्वतंत्रता के बाद भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक यह रही कि उसने समाज के बड़े हिस्से में आकांक्षा पैदा की। शिक्षा धीरे-धीरे उन समुदायों और परिवारों तक पहुँची जिनके लिए कभी विद्यालय, विश्वविद्यालय और सरकारी सेवा दूर की चीज़ें थीं। संविधान ने समान नागरिकता का आश्वासन दिया। लोकतंत्र ने यह विश्वास जगाया कि जन्म मनुष्य की अंतिम नियति नहीं है। शिक्षा और प्रतियोगिता के माध्यम से सामाजिक स्थिति बदली जा सकती है।

इस विश्वास ने भारत को बदला है।

पिछड़े वर्गों, दलितों, आदिवासियों, ग्रामीण समाज और निम्न मध्यवर्ग के लाखों परिवारों ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति के साधन के रूप में ग्रहण किया। परिवारों ने अपनी सीमित आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करना शुरू किया। अनेक माता-पिता स्वयं अशिक्षित रहे, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को विद्यालय और विश्वविद्यालय भेजा। वे जानते थे कि पढ़ा-लिखा बेटा या बेटी केवल नौकरी नहीं पाएगा; वह पूरे परिवार की सामाजिक स्थिति बदल सकता है।

लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस आकांक्षा और उपलब्ध अवसरों के बीच दूरी बढ़ती गई है।

सपने पहले की अपेक्षा अधिक व्यापक हुए हैं। सूचना और संचार के प्रसार ने जीवन की संभावनाओं को सबके सामने ला दिया है। छोटे कस्बे का युवक भी जानता है कि दुनिया में क्या हो रहा है, कौन आगे बढ़ रहा है, कौन-सी नौकरी कितनी प्रतिष्ठित है और कौन-सा जीवन संभव है। वह अपने माता-पिता की स्थिति को अपरिवर्तनीय नहीं मानता। वह अधिक सम्मान, अधिक स्वतंत्रता और अधिक सुरक्षित भविष्य चाहता है।

यह आकांक्षा स्वस्थ है। किसी समाज की प्रगति का अर्थ ही है कि उसकी नई पीढ़ी पुरानी सीमाओं को स्वीकार न करे।

समस्या यह है कि अवसर उसी गति से नहीं बढ़े।

एक ओर शिक्षा का विस्तार हुआ, दूसरी ओर स्थिर और सम्मानजनक रोजगार सीमित रहे। एक पद के लिए हजारों और कभी-कभी लाखों उम्मीदवार आवेदन करते हैं। चयन की संभावना अत्यंत कम होती है, लेकिन तैयारी का सामाजिक और आर्थिक निवेश बहुत बड़ा होता है। किसी युवा की परीक्षा में असफलता केवल उसकी व्यक्तिगत असफलता नहीं रह जाती; कई बार वह पूरे परिवार के सपने का टूटना होती है।

पटना, प्रयागराज, दिल्ली, कोटा और देश के अनेक छोटे-बड़े शहरों में एक अलग प्रकार का युवा जीवन विकसित हुआ है। किराए के छोटे कमरों, सस्ते भोजनालयों, कोचिंग संस्थानों और पुस्तकालयों के बीच जीवन के पाँच-सात वर्ष निकल जाते हैं। यह जीवन वर्तमान में नहीं जीता; वह भविष्य की प्रतीक्षा में स्थगित रहता है। हर वर्ष यह विश्वास बना रहता है कि अगली परीक्षा, अगला परिणाम, अगली भर्ती जीवन बदल देगी।

लेकिन जब भर्ती स्थगित होती है, परीक्षा रद्द होती है, प्रश्नपत्र बाहर आता है अथवा परिणाम विवादों में घिर जाता है, तब केवल एक अवसर नष्ट नहीं होता। व्यवस्था की नैतिकता पर विश्वास टूटता है।

युवा असफलता सह सकता है, यदि उसे विश्वास हो कि परीक्षा निष्पक्ष थी। वह यह स्वीकार कर सकता है कि कोई दूसरा उससे अधिक योग्य निकला। लेकिन वह यह कैसे स्वीकार करे कि उसकी मेहनत भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता या पैसे और संपर्क की शक्ति के सामने बेकार हो गई?

यहीं आक्रोश पैदा होता है।

यह आक्रोश केवल नौकरी न मिलने का आक्रोश नहीं है। यह उस सामाजिक अनुबंध के टूटने का आक्रोश है जिसमें राज्य और समाज ने युवा से कहा था—तुम पढ़ो, परिश्रम करो, नियमों का पालन करो; तुम्हें अवसर मिलेगा।

जब नियम का पालन करने वाला व्यक्ति बार-बार पराजित होता है और नियम तोड़ने वाला आगे निकलता दिखाई देता है, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था की वैधता कमजोर होती है।

इसलिए परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल प्रशासनिक प्रश्न नहीं है। यह लोकतंत्र की नैतिक विश्वसनीयता का प्रश्न है।

मेरी कक्षाओं में हॉब्सबाउम और ‘किसान की मृत्यु’

एम.ए. की कक्षाओं में एरिक हॉब्सबाउम की पुस्तक 'द एज ऑफ एक्स्ट्रीम्स' पर चर्चा करते हुए मैं प्रायः एक विशेष प्रसंग पर रुकता हूँ। हॉब्सबाउम बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े सामाजिक परिवर्तनों में किसान समाज के ऐतिहासिक अवसान को रखते हैं। विद्यार्थियों से चर्चा करते हुए प्रश्न उठता है—‘किसान की मृत्यु’ का अर्थ आखिर क्या है?

क्या इसका अर्थ केवल यह है कि खेती में लगे लोगों की संख्या कम हो गई? क्या किसान शहरों में जा कर मजदूर, कर्मचारी और उपभोक्ता बन गया? या इसके साथ एक पूरी सामाजिक दुनिया का अंत हुआ—एक ऐसी दुनिया जिसमें उत्पादन, परिवार, ऋतु, प्रकृति, समुदाय, स्मृति और स्थानीय ज्ञान परस्पर जुड़े हुए थे?

यह प्रसंग हर बार कक्षा को यूरोपीय इतिहास से भारत की ओर ले आता है।

यूरोप के औद्योगिक परिवर्तन में किसान समाज का विघटन पूँजीवाद के विकास की बड़ी कथा का हिस्सा था। भूमि से विस्थापित लोग नगरों और कारखानों में पहुँचे। यह प्रक्रिया क्रूर और असमान थी, लेकिन औद्योगिक व्यवस्था ने धीरे-धीरे एक नए श्रमिक समाज का निर्माण किया। किसान की पुरानी दुनिया समाप्त हुई, पर उसके स्थान पर मजदूर और शहरी नागरिक की एक नई सामाजिक दुनिया बनी।

भारत में यह प्रक्रिया अलग रूप ले रही है।

यहाँ भी किसान की दुनिया संकट में है। जोतें छोटी हो रही हैं, खेती की लागत बढ़ रही है, आय अनिश्चित है और अगली पीढ़ी कृषि को सम्मानजनक भविष्य के रूप में नहीं देखती। ग्रामीण परिवार अपने बच्चों को पढ़ाते हैं ताकि वे खेती से बाहर निकल सकें। खेती से बाहर निकलना सामाजिक उन्नति का प्रतीक बन गया है।

लेकिन कृषि से बाहर आने वाला युवा कहाँ जाता है?

क्या उसके लिए कारखाने तैयार हैं? क्या भारतीय उद्योग इतनी बड़ी आबादी को स्थायी रोजगार दे रहा है? क्या शहर उसे संगठित श्रमिक, सुरक्षित कर्मचारी और सम्मानित नागरिक के रूप में समाहित कर रहे हैं?

अनेक बार ऐसा नहीं होता।

किसान का बेटा किसान नहीं रहना चाहता, लेकिन वह औद्योगिक मजदूर भी नहीं बन पाता। वह प्रतियोगी परीक्षार्थी, ठेका कर्मचारी, अस्थायी शिक्षक, सुरक्षाकर्मी, चालक, डिलीवरी कर्मी अथवा अनिश्चित सेवा-क्षेत्र का मजदूर बन जाता है। कृषि से मिली सीमित सुरक्षा समाप्त हो जाती है, पर आधुनिक अर्थव्यवस्था की स्थिरता उसे प्राप्त नहीं होती।

वह दो संसारों के बीच फँस जाता है।

पुराना संसार उसे अब पर्याप्त नहीं लगता। नई दुनिया उसे पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं करती।

इस स्थिति को केवल बेरोजगारी कहना पर्याप्त नहीं है। यह अधूरी आधुनिकता का संकट है। समाज पुरानी संरचनाओं से निकल रहा है, लेकिन नई संरचनाएँ इतनी व्यापक और सुरक्षित नहीं हैं कि विस्थापित लोगों को अपने भीतर समाहित कर सकें।

इसीलिए हॉब्सबाउम की ‘किसान की मृत्यु’ की अवधारणा भारत में नया अर्थ ग्रहण करती है। यहाँ किसान की दुनिया मर रही है, लेकिन जिस आधुनिक समाज को उसका उत्तराधिकारी होना था, वह अभी पूरी तरह जन्म नहीं ले पाया है।

यह एक सामाजिक शून्य पैदा करता है।

उस शून्य में सबसे अधिक युवा खड़े हैं।

उनके पास मोबाइल फोन है, डिग्री है, दुनिया की जानकारी है और बेहतर जीवन की आकांक्षा है। लेकिन उनके पास स्थिर काम, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की स्पष्ट दिशा नहीं है। यह विरोधाभास राजनीतिक असंतोष का सबसे बड़ा स्रोत बन सकता है।



भारतीय गाँव : न आदर्शलोक, न केवल पिछड़ापन

किसान समाज की चर्चा करते हुए एक सावधानी आवश्यक है। भारतीय गाँव को किसी खोए हुए स्वर्णयुग की तरह प्रस्तुत करना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। गाँव जाति, अस्पृश्यता, भूमि-वंचना, पितृसत्ता और सामाजिक वर्चस्व की कठोर संरचनाओं का स्थान भी रहा है। वहाँ समुदाय था, लेकिन समुदाय के भीतर समानता नहीं थी। परस्पर निर्भरता थी, लेकिन वह कई बार अपमानजनक पदानुक्रम पर आधारित थी।

इसलिए कृषि और ग्रामजीवन की रक्षा का अर्थ पुराने सामाजिक अन्यायों की रक्षा नहीं हो सकता।

लेकिन इसके उलट यह मान लेना भी गलत होगा कि गाँव में केवल पिछड़ापन था और आधुनिकता का अर्थ उसका पूर्ण विघटन है। ग्रामीण समाज ने परिवार, समुदाय, स्थानीय ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और संकट के समय परस्पर सहयोग की अनेक प्रणालियाँ विकसित की थीं। इनमें से बहुत कुछ आलोचना और परिवर्तन की माँग करता है, पर सब कुछ विनाश योग्य नहीं है।

आधुनिक भारत का प्रश्न यह है कि वह परंपरागत समाज की अन्यायपूर्ण संरचनाओं को बदलते हुए उसकी सामाजिक शक्ति को कैसे बचाए।

सुधार और विनाश एक ही चीज़ नहीं हैं।

यूरोप की आधुनिकता ने व्यक्ति को सामंती और धार्मिक बंधनों से मुक्त किया। उसने विज्ञान, तर्क, नागरिक अधिकार और उत्पादन की अभूतपूर्व क्षमता विकसित की। लेकिन उसने व्यक्ति को समुदाय से अलग भी किया, प्रकृति को संसाधन में बदला और समाज को प्रतिस्पर्धी व्यक्तियों के समूह के रूप में देखने की प्रवृत्ति को बढ़ाया।

भारत को आधुनिकता चाहिए। विज्ञान, उद्योग, नगरीकरण और प्रौद्योगिकी से पीछे लौटने की कोई आवश्यकता नहीं है। गरीबी और अभाव को परंपरा के नाम पर स्वीकार करना भी उचित नहीं है।

लेकिन आधुनिकता का अर्थ आत्मविस्मृति नहीं होना चाहिए।

भारत को यह पूछना होगा कि क्या वह ऐसी आधुनिकता विकसित कर सकता है जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता और समुदाय की सुरक्षा दोनों सुरक्षित रहें; जिसमें उद्योग बढ़े, लेकिन कृषि को अनुपयोगी अवशेष न माना जाए; जिसमें शहर विकसित हों, लेकिन गाँव केवल श्रम-आपूर्ति केंद्र न बन जाएँ; जिसमें प्रतिस्पर्धा हो, पर सामाजिक सहयोग का अंत न हो।

यही भारतीय विकास-दर्शन का मूल प्रश्न है।

विकास का अर्थ

पिछले दशकों में भारत ने आर्थिक और प्रौद्योगिकीय क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। संचार, बुनियादी संरचना, सेवा क्षेत्र, निजी उद्यम और डिजिटल अर्थव्यवस्था ने जीवन के अनेक हिस्सों को बदला है। एक नया मध्यवर्ग उभरा है। भारतीय प्रतिभा और पूँजी ने वैश्विक उपस्थिति बनाई है।

इन उपलब्धियों को नकारना आत्मवंचना होगी।

लेकिन विकास का मूल्यांकन केवल कुल उत्पादन, निवेश और बाजार के विस्तार से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि उस विकास ने कितने लोगों को स्थिर और सम्मानजनक जीवन दिया। यदि अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़े, पर रोजगार असुरक्षित हों; यदि संपत्ति बढ़े, पर उसका केंद्रीकरण भी बढ़ता जाए; यदि शहर चमकें, पर उनमें काम करने वाले लोग असुरक्षित बस्तियों में रहें—तो विकास की सामाजिक गुणवत्ता पर प्रश्न उठेगा।

विकास किसका है और किसके लिए है—यह प्रश्न विकास-विरोधी नहीं है। बल्कि यही प्रश्न विकास को नैतिक और लोकतांत्रिक बनाता है।

भारत के सामने केवल गरीबी हटाने की चुनौती नहीं है। उसके सामने सम्मानजनक जीवन का विस्तार करने की चुनौती है। मनुष्य को जीवित रखना और उसे गरिमापूर्ण जीवन देना एक ही बात नहीं है।

युवा केवल किसी भी प्रकार का काम नहीं चाहता। वह ऐसा काम चाहता है जिसमें भविष्य हो, पहचान हो और सामाजिक सम्मान हो। वह अपने माता-पिता से अधिक शिक्षित है; उसकी अपेक्षाएँ भी अधिक हैं। यदि अर्थव्यवस्था उसे केवल अनिश्चित और असुरक्षित श्रम देती है तो असंतोष स्वाभाविक होगा।

सरकारी नौकरी की चाह को केवल मानसिकता कहकर नकार देना आसान है। लेकिन यह भी समझना चाहिए कि सरकारी सेवा बहुत से परिवारों के लिए स्थिरता, सामाजिक सम्मान और संस्थागत सुरक्षा का प्रतीक क्यों बनी। जब निजी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा अस्थायी, अनुबंध आधारित और सामाजिक सुरक्षा से रहित हो, तब सरकारी नौकरी की आकांक्षा केवल औपनिवेशिक मानसिकता नहीं रहती; वह असुरक्षित अर्थव्यवस्था के विरुद्ध सुरक्षा की तलाश बन जाती है।

प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति को सरकारी नौकरी देना संभव नहीं है। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक आजीविका का अवसर देना राज्य और समाज की जिम्मेदारी अवश्य है।

इसलिए समाधान सरकारी नौकरियों के अंतहीन विस्तार और बाजार की पूर्ण अनिश्चितता के बीच खोजा जाना चाहिए। छोटे और मध्यम उद्योग, स्थानीय उत्पादन, कृषि-आधारित उद्यम, सहकारिता, शिल्प, विकेंद्रीकृत ऊर्जा, सामाजिक क्षेत्र और नई प्रौद्योगिकी के मानवीय उपयोग—इन सबको विकास की केंद्रीय रणनीति बनाना होगा।

आंदोलन और राष्ट्रीय एकता

युवाओं के असंतोष को समझने का अर्थ उसकी प्रत्येक राजनीतिक अभिव्यक्ति का अनुमोदन करना नहीं है। कोई भी आंदोलन कई दिशाओं में जा सकता है। वह लोकतांत्रिक सुधार का साधन बन सकता है; वह किसी दल या समूह का राजनीतिक संसाधन भी बन सकता है। वह रचनात्मक सामाजिक ऊर्जा पैदा कर सकता है; वह असंतोष को विभाजनकारी दिशा में भी मोड़ सकता है।

लोकतंत्र में विपक्ष का अधिकार है कि वह सरकार से प्रश्न पूछे और सामाजिक असंतोष को राजनीतिक स्वर दे। लेकिन विपक्ष की जिम्मेदारी केवल सरकार को अस्थिर करना नहीं, विश्वसनीय विकल्प देना भी है। उसी प्रकार सरकार की जिम्मेदारी केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं, असंतोष के कारणों को समझना भी है।

सरकार यदि हर विरोध में षड्यंत्र देखेगी तो वह समाज की वास्तविक पीड़ा से दूर होती जाएगी। विपक्ष यदि हर असंतोष को सत्ता प्राप्ति के हथियार के रूप में देखेगा तो वह भी युवाओं के साथ न्याय नहीं करेगा।

युवाओं को केवल भीड़ में बदल देना आसान है। उन्हें नागरिक बनाना कठिन है।

यही कारण है कि समर्थन के साथ प्रश्न पूछना आवश्यक है। प्रश्न आंदोलन को कमजोर करने के लिए नहीं, उसे क्षणिक उत्तेजना से टिकाऊ राजनीतिक विवेक की ओर ले जाने के लिए पूछे जाने चाहिए।

क्या आंदोलन केवल किसी परीक्षा की अनियमितता तक सीमित रहेगा? क्या वह भर्ती-प्रणाली की पारदर्शिता की माँग करेगा? क्या वह रोजगार की संरचना पर प्रश्न उठाएगा? क्या वह शिक्षा के चरित्र और विकास के मॉडल पर विचार करेगा? क्या वह विभिन्न सामाजिक समूहों को जोड़ पाएगा? क्या वह अपनी ऊर्जा को हिंसा, घृणा और ध्रुवीकरण से बचा सकेगा?

जो आंदोलन इन प्रश्नों का सामना करता है, वही इतिहास में दूर तक जाता है।

राष्ट्रीय एकता का अर्थ असहमति का अभाव नहीं है। लोकतांत्रिक राष्ट्र में असहमति एकता की शत्रु नहीं, उसकी परीक्षा होती है। लेकिन राष्ट्रीय एकता केवल संविधान, सीमा और सेना से भी नहीं बनती। वह उस विश्वास से बनती है कि राष्ट्र की प्रगति में प्रत्येक नागरिक का स्थान है।

यदि करोड़ों युवाओं को यह अनुभव होने लगे कि उनके लिए अवसर के दरवाजे बंद हैं, तो राष्ट्र की सामाजिक भूमि कमजोर होगी। इसलिए युवाओं के आक्रोश को सुनना राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध नहीं, उसकी रक्षा का कार्य है।

भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा असहमति नहीं, निराशा है। असहमति संवाद चाहती है; निराशा व्यवस्था से अपना संबंध तोड़ देती है।

भारत का बौद्धिक प्रश्न

यहाँ से प्रश्न अर्थव्यवस्था और राजनीति से आगे बढ़ कर बौद्धिक जीवन तक पहुँचता है।

आधुनिक भारतीय विश्वविद्यालयों और सामाजिक विज्ञानों का विकास पश्चिमी ज्ञान-परंपराओं के साथ संपर्क में हुआ। आधुनिक इतिहास-लेखन, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, संवैधानिकता, वैज्ञानिक पद्धति और मानवाधिकार की अवधारणाओं ने भारतीय समाज को स्वयं को नए ढंग से देखने में सहायता दी। इनके महत्त्व को अस्वीकार करना न तो संभव है, न उचित।

समस्या पश्चिम को पढ़ने में नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब पश्चिम सिद्धांत का एकमात्र स्रोत बन जाता है और भारत केवल उदाहरण में बदल जाता है।

भारतीय समाज से सामग्री ली जाती है, लेकिन उसे समझने की अवधारणाएँ किसी दूसरे ऐतिहासिक अनुभव से आती हैं। सिद्धांत यूरोप में बनता है; भारत पर उसका अनुप्रयोग होता है। यह बौद्धिक श्रम उपयोगी हो सकता है, लेकिन यदि यही ज्ञान की अंतिम पद्धति बन जाए तो भारतीय अनुभव की अपनी वैचारिक क्षमता दब जाती है।

भारतीय बौद्धिक वर्ग ने पश्चिमी विचारकों को गंभीरता से पढ़ा—और पढ़ना चाहिए था। परंतु उसने अनेक बार भारतीय परंपराओं को या तो श्रद्धा की वस्तु माना या अतीत का अवशेष। उन्हें आधुनिक प्रश्नों के जीवित संवाद-सहभागी के रूप में पढ़ने की प्रवृत्ति सीमित रही।

परिणाम यह हुआ कि भारतीयता की चर्चा दो विपरीत छोरों में बँट गई। एक ओर उसका अनालोचनात्मक गौरवगान हुआ; दूसरी ओर सभ्यतागत भारतीयता का कोई भी उल्लेख संदेह की दृष्टि से देखा गया।

दोनों प्रवृत्तियाँ ज्ञान के लिए बाधक हैं।

भारतीय सभ्यता महान है—यह कहना इतिहास नहीं है। भारतीय सभ्यता केवल हिंसा, जाति और वर्चस्व की संरचना रही—यह भी संपूर्ण इतिहास नहीं है। इतिहासकार का काम गौरव और निंदा के बीच चुनाव करना नहीं, जटिल अनुभव को समझना है।

भारतीय सभ्यता में जाति, बहिष्कार, धार्मिक संघर्ष और सत्ता की हिंसा रही है। लेकिन इसी सभ्यता के भीतर आत्मालोचना, करुणा, अहिंसा, समानता, भक्ति, सेवा और अनेकांत की परंपराएँ भी पैदा हुईं। बुद्ध और महावीर भारतीय समाज के बाहर से नहीं आए थे; वे उसी समाज के भीतर से उत्पन्न आलोचनात्मक आवाज़ें थे। भक्ति और सूफ़ी परंपराएँ भी किसी निर्जीव समन्वय की कथा नहीं थीं; वे स्थापित धार्मिक और सामाजिक संरचनाओं से संवाद और असहमति दोनों करती थीं।

भारतीयता की सभ्यतागत दृष्टि का अर्थ अंतर्विरोधों को छिपाना नहीं है। उसका अर्थ यह समझना है कि भारत ने अपने अंतर्विरोधों से संवाद करने के लिए कौन-कौन सी बौद्धिक और नैतिक भाषाएँ विकसित कीं।



गांधी, विवेकानंद और रवीन्द्र नाथ के बीच अवरुद्ध संवाद

आधुनिक भारत के बौद्धिक इतिहास को पढ़ते हुए एक विचित्र विभाजन दिखाई देता है। विवेकानंद को प्रायः सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के खाते में रख दिया गया, रवीन्द्र नाथ को उदार विश्वमानववाद के और गांधी को नैतिक राजनीति के। इन तीनों की भिन्नताएँ वास्तविक थीं और उन्हें मिटाना अनुचित होगा। लेकिन इन भिन्नताओं को इतना निर्णायक बना दिया गया कि उनके बीच के आंतरिक संवाद की संभावना लगभग अदृश्य हो गई।

तीनों पश्चिम से संवाद कर रहे थे। तीनों भारत की परंपरा को नए अर्थ में पढ़ रहे थे। तीनों आधुनिकता को आवश्यक मानते हुए भी आत्मविस्मृति का पर्याय मानने से इनकार करते थे।

विवेकानंद ने भारतीय समाज को आत्मविश्वास, शक्ति और सेवा की भाषा दी। वे आध्यात्मिकता को निष्क्रियता नहीं मानते थे। उनके लिए मनुष्य की सेवा और राष्ट्र का निर्माण धार्मिक जीवन से अलग नहीं थे। उन्होंने पश्चिम से विज्ञान, संगठन और सक्रियता ग्रहण करने की बात की, लेकिन भारत को अपनी आत्मा छोड़ देने की सलाह नहीं दी।

रवीन्द्र नाथ ने भारत की सभ्यतागत शक्ति को उसकी बहुलता और संवादशीलता में देखा। वे संकीर्ण राष्ट्रवाद के आलोचक थे, लेकिन जड़विहीन विश्वनागरिकता के समर्थक नहीं। उनका विश्वमानववाद भारतीय अनुभव से पैदा हुआ था। शांतिनिकेतन और विश्वभारती में उन्होंने ऐसी शिक्षा की कल्पना की जिसमें प्रकृति, कला, स्थानीय संस्कृति और विश्व-ज्ञान एक-दूसरे से संवाद करें।

गांधी ने इस प्रश्न को राजनीति और अर्थव्यवस्था के केंद्र में रखा। उनके लिए स्वराज केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था। वह आत्मनियंत्रण, सामुदायिक उत्तरदायित्व और ऐसी जीवन-पद्धति की खोज था जिसमें मनुष्य अपनी इच्छाओं का दास न बने। ग्रामस्वराज, स्वदेशी, अहिंसा और ट्रस्टीशिप इसी व्यापक चिंता के भाग थे।

इन तीनों को अलग-अलग विचारधारात्मक डिब्बों में रख देने से उनकी एक साझा चिंता अदृश्य हो गई—भारत आधुनिक कैसे बने, बिना अपनी सभ्यतागत स्मृति खोए?

संभवतः आधुनिक भारतीयता की एक विशेष ‘सेक्युलर’ व्याख्या ने भी इस संवाद को कठिन बनाया। यहाँ धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक और नैतिक महत्त्व पर कोई प्रश्न नहीं है। भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में राज्य की निष्पक्षता, नागरिक समानता और धार्मिक स्वतंत्रता अपरिहार्य हैं।

समस्या धर्मनिरपेक्षता की नहीं, उसकी उस व्याख्या की है जिसमें आधुनिक होने के लिए भारतीय सभ्यतागत स्मृति से दूरी बनाना आवश्यक समझा गया। इस दृष्टि में भारतीयता को संवैधानिक नागरिकता और राजनीतिक बहुलता की भाषा में स्वीकार किया गया, लेकिन उसके सांस्कृतिक और दार्शनिक अनुभव का उल्लेख करते ही आशंका उत्पन्न होने लगी कि कहीं हम बहुसंख्यकवादी राजनीति की ओर तो नहीं बढ़ रहे।

इस आशंका के ऐतिहासिक कारण हैं और उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। लेकिन आशंका को बौद्धिक निषेध में बदल देना भी उचित नहीं है।

कुबेर नाथ राय ने अपने निबंधों में बार-बार इस बेचैनी को व्यक्त किया था कि आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी ने भारतीयता को राजनीतिक और समाजशास्त्रीय श्रेणियों में तो पढ़ा, लेकिन उसकी सभ्यतागत संवेदना से असहज बना रहा। उनकी भाषा, सांस्कृतिक आग्रहों और अनेक निष्कर्षों से असहमति संभव है। लेकिन उनका मूल प्रश्न आज भी प्रासंगिक है—क्या भारत अपनी सांस्कृतिक स्मृति से संबंध तोड़कर ही आधुनिक हो सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर अतीत की वापसी में नहीं है। उत्तर परंपरा के आलोचनात्मक पुनर्पाठ में है।

भारतीयता : एक खुली सभ्यतागत प्रक्रिया

भारतीय सभ्यता को किसी एक ग्रंथ, धर्म, जाति या कालखंड की रचना मानना उसके इतिहास को संकुचित करना है। भारत सहस्राब्दियों तक चले संवाद, संघर्ष, समावेश और पुनर्व्याख्या की प्रक्रिया से बना है।

उपनिषदों ने प्रश्न और संवाद को ज्ञान की पद्धति बनाया। बौद्ध परंपरा ने दुःख, करुणा, अनित्यता और कार्य-कारण संबंध की दृष्टि दी। जैन चिंतन ने अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत का विचार विकसित किया। अनेकांतवाद केवल सहिष्णुता नहीं है; वह यह स्वीकार करता है कि कोई एक दृष्टि संपूर्ण सत्य पर अधिकार नहीं कर सकती।

भक्ति परंपराओं ने जन्म, कर्मकांड और धार्मिक प्रतिष्ठान की सीमाओं को चुनौती दी। कबीर, रैदास, मीरा, चैतन्य और तुकाराम ने स्थानीय भाषाओं में मनुष्य, समाज और ईश्वर के संबंध को नए ढंग से व्यक्त किया।

सूफ़ी परंपराओं ने प्रेम, सेवा, संगीत और खानकाहों के माध्यम से भारतीय इस्लामी अनुभव को स्थानीय समाजों से जोड़ा। इस्लाम भारत में केवल बाहर से आई स्थिर व्यवस्था के रूप में उपस्थित नहीं रहा; वह भारतीय भाषाओं, सामाजिक संबंधों, कला, स्थापत्य, दर्शन और राजनीति के संपर्क में बदलता गया। भारतीय मुसलमानों का अनुभव भारतीय इतिहास के बाहर का अनुभव नहीं है।

सिख परंपरा ने भक्ति, श्रम, सेवा, समानता और अन्याय के प्रतिरोध को सामुदायिक अनुशासन में रूपांतरित किया।

इन परंपराओं के बीच संघर्ष भी हुए। भारतीय इतिहास को केवल समन्वय की मधुर कथा बनाना ऐतिहासिक सत्य से पलायन होगा। लेकिन उसे केवल अंतहीन संघर्ष की कथा बना देना भी उतना ही अधूरा है।

भारत की विशिष्टता मतभेदों की अनुपस्थिति में नहीं, मतभेदों के बावजूद संवाद की निरंतरता में रही है।

आज आवश्यकता इस संवाद को पुनर्जीवित करने की है।

दूसरा भारतीय बौद्धिक पुनर्संवाद

उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय नवजागरण ने औपनिवेशिक शासन, पश्चिमी ज्ञान और सामाजिक सुधार की चुनौती के बीच आधुनिक भारतीय आत्मचेतना का निर्माण किया। विवेकानंद, रवीन्द्र नाथ, गांधी और अनेक अन्य विचारकों ने इस प्रश्न का उत्तर खोजा कि भारत विश्व से संवाद करते हुए अपनी पहचान कैसे बनाए रखे।

आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है। लेकिन उसके सामने नई चुनौतियाँ हैं—युवा बेरोजगारी, कृषि संकट, पर्यावरणीय विनाश, तकनीकी परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल पूँजीवाद, असमानता, नगरीकरण और सामाजिक ध्रुवीकरण।

इन समस्याओं के तैयार उत्तर प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलेंगे। परंपरा कोई उत्तर-पुस्तिका नहीं है। वह हमें प्रश्न करने की भाषा, नैतिक दिशा और ऐतिहासिक अनुभव देती है।

बुद्ध की करुणा को आधुनिक सामाजिक नीति और मानसिक स्वास्थ्य से कैसे जोड़ा जाए? जैन अपरिग्रह उपभोग और पर्यावरण के प्रश्न पर क्या कह सकता है? अनेकांतवाद लोकतांत्रिक असहमति को कौन-सी बौद्धिक विनम्रता दे सकता है? भक्ति की समानता जातिगत न्याय के लिए क्या अर्थ रखती है? सूफ़ी प्रेम और सेवा सांप्रदायिक तनाव के समय किस प्रकार सार्वजनिक नैतिकता का आधार बन सकते हैं? रवीन्द्र नाथ की शिक्षा-दृष्टि हमारे विश्वविद्यालयों को क्या सिखाती है? गांधी का स्वराज केंद्रीकरण, स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के प्रश्नों पर किस प्रकार पुनर्पाठ की माँग करता है?

इन प्रश्नों के उत्तर परंपरा की पूजा से नहीं, उसके साथ आलोचनात्मक संवाद से निकलेंगे।

भारत को पश्चिम-विरोधी बौद्धिकता की आवश्यकता नहीं है। उसे बौद्धिक स्वाधीनता चाहिए। उसे मार्क्स, वेबर, ग्राम्शी और आधुनिक विज्ञान को पढ़ना चाहिए; लेकिन बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, विवेकानंद, रवीन्द्र नाथ और गांधी को भी आधुनिक प्रश्नों के जीवित संवाद-सहभागियों के रूप में पढ़ना चाहिए।

बौद्धिक स्वाधीनता का अर्थ दुनिया से कटना नहीं है। इसका अर्थ है दुनिया से बराबरी और आत्मविश्वास के साथ संवाद करना।

भारतीय बौद्धिक समाज की परीक्षा अब इस बात से होगी कि वह विदेशी सिद्धांतों को कितनी दक्षता से लागू करता है, इससे नहीं; बल्कि इस बात से कि वह भारतीय अनुभव से कितनी नई अवधारणाएँ विकसित कर सकता है।

असंतोष से निर्माण की ओर

जंतर-मंतर का प्रदर्शन इसी व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करता है। वहाँ उपस्थित युवाओं की माँगों का सम्मान किया जाना चाहिए। परीक्षा और भर्ती की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना राज्य का तत्काल दायित्व है। लेकिन आंदोलन की सबसे बड़ी संभावना तब खुलेगी जब वह अपनी तात्कालिक माँगों से आगे बढ़ कर उस विकास-व्यवस्था पर प्रश्न उठाएगा जो आकांक्षा तो पैदा करती है, पर अवसर नहीं; कृषि को कमजोर करती है, पर पर्याप्त औद्योगिक रोजगार नहीं देती; शिक्षा का विस्तार करती है, पर शिक्षा को सम्मानजनक जीवन से नहीं जोड़ पाती।

युवाओं के आक्रोश को दबाना गलत है। लेकिन उसे केवल सत्ता-परिवर्तन की ऊर्जा में बदल देना भी पर्याप्त नहीं है।

आंदोलन का मूल्य इस बात में होगा कि वह युवाओं को भीड़ से नागरिक में बदलता है या नहीं। क्या वह उन्हें केवल विरोध करना सिखाता है, या समाज के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी भी देता है? क्या वह उन्हें शत्रु की पहचान कराता है, या समस्या की संरचना समझने की क्षमता भी देता है?

युवा वर्ग को यह विश्वास दिलाना होगा कि देश उसकी सुनता है। साथ ही उसे यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र केवल अधिकार प्राप्त करने की व्यवस्था नहीं, साझा भविष्य बनाने की प्रक्रिया है।

रोजगार की माँग राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन की माँग बने। परीक्षा में न्याय की माँग संस्थागत नैतिकता की माँग बने। व्यक्तिगत सफलता की आकांक्षा ऐसे समाज की माँग बने जिसमें सफलता के अवसर अधिक व्यापक और न्यायपूर्ण हों।

यही प्रतिरोध से राजनीतिक दृष्टि की यात्रा है।

भारत को फिर से सोचने का समय

इस लेख की शुरुआत मित्रों की एक आपत्ति से हुई थी। उन्होंने पूछा कि क्या मैं आंदोलन के साथ हूँ। उत्तर स्पष्ट है—हाँ, मैं युवाओं के न्यायपूर्ण, शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रतिरोध के साथ हूँ।

लेकिन मेरे लिए उनके साथ खड़े होने का अर्थ केवल उनके नारे दोहराना नहीं है। उनके साथ खड़े होने का अर्थ उन ऐतिहासिक परिस्थितियों को समझना भी है जिन्होंने उनके आक्रोश को जन्म दिया। इसका अर्थ यह पूछना है कि कृषि से विस्थापित समाज कहाँ जाएगा, शिक्षित युवा को सम्मानजनक जीवन कैसे मिलेगा, विकास की सामाजिक कीमत कौन चुका रहा है और भारत अपनी आधुनिकता को किस बौद्धिक आधार पर निर्मित करेगा।

कॉकरोच आंदोलन एक घटना है। वह समाप्त हो सकता है, बदल सकता है या किसी बड़े राजनीतिक प्रवाह में शामिल हो सकता है। लेकिन उसके पीछे का युवा असंतोष हमारे समय की स्थायी वास्तविकता है।

यह असंतोष केवल नौकरी का प्रश्न नहीं है। यह आकांक्षा और अवसर, शिक्षा और जीवन, विकास और न्याय, आधुनिकता और सभ्यतागत स्मृति के बीच बढ़ती दूरी का परिणाम है।

भारत के सामने अब केवल आर्थिक प्रगति का प्रश्न नहीं है। उसके सामने यह प्रश्न भी है कि वह किस प्रकार का समाज बनना चाहता है।

क्या वह पश्चिमी औद्योगिक आधुनिकता की हूबहू पुनरावृत्ति करेगा, जिसमें किसान और समुदाय का विघटन विकास की अनिवार्य कीमत माना गया? या वह अपने ऐतिहासिक अनुभव और आधुनिक ज्ञान के बीच नया संवाद स्थापित करेगा?

इस संवाद में बुद्ध की करुणा होगी, महावीर का अनेकांत और अपरिग्रह होगा, भक्ति की समानता होगी, सूफ़ी प्रेम होगा, भारतीय इस्लामी अनुभव की सृजनशीलता होगी, विवेकानंद का आत्मविश्वास होगा, रवीन्द्र नाथ की विश्वदृष्टि होगी और गांधी का स्वराज होगा। पर इनमें से किसी को अंतिम और संपूर्ण उत्तर नहीं माना जाएगा। वे हमारे साथ प्रश्न करने वाले विचार होंगे।

भारत की सभ्यतागत शक्ति किसी एक विचार की विजय में नहीं, अनेक विचारों को संवाद में रखने की क्षमता में रही है।

उन्नीसवीं शताब्दी में भारत ने आधुनिक आत्मचेतना की खोज की। बीसवीं शताब्दी में उसने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की। इक्कीसवीं शताब्दी की चुनौती बौद्धिक स्वाधीनता और समावेशी विकास की है।

भारत को केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बनना है। उसे एक विचारशील राष्ट्र भी बनना है—ऐसा राष्ट्र जो अपनी कमजोरियों का ईमानदारी से सामना कर सके, अपनी स्मृतियों से सीख सके और दुनिया के ज्ञान से आत्मविश्वास के साथ संवाद कर सके।

युवाओं का असंतोष इस यात्रा के लिए चेतावनी भी है और संभावना भी।

उसे दबाया गया तो वह निराशा बनेगा। उसे केवल राजनीतिक हथियार बनाया गया तो वह दिशाहीन हो जाएगा। लेकिन उसके कारणों को समझकर उसे सामाजिक पुनर्निर्माण से जोड़ा गया तो वही असंतोष एक नए भारतीय बौद्धिक पुनर्संवाद की शुरुआत बन सकता है।

भारत को फिर से सोचने का समय आ गया है।

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