रमेश प्रजापति के कविता संग्रह ‘शून्य काल में बजता झुनझुना’ पर राहुल देव की समीक्षा
पिछले दिनों युवा कवि रमेश प्रजापति का एक नया कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है – ‘शून्य काल में बजता झुनझुना’। लम्बे अंतराल के बाद आया रमेश का यह संग्रह उनकी काव्य-यात्रा के विकास को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है। कवि किसी हडबडी में नहीं है। वह अपने समय और समाज को गौर से देखते हुए रचनारत है। इसीलिए उसकी कविताओं में अब एक परिपक्वता दिखायी पड़ रही है। युवा कवि राहुल देव ने इस संग्रह पर एक पारखी नजर डाली है। आज पहली बार प्रस्तुत है रमेश प्रजापति के कविता संग्रह ‘शून्य काल में बजता झुनझुना’ पर राहुल देव की समीक्षा ‘प्राकृतिक संवेदना की कविताएँ’। प्राकृतिक संवेदना की कविताएँ राहुल देव जिस तरह चाहो, बजाओ इस सभा में हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं -दुष्यंत कुमार रमेश प्रजापति कम लिखने वाले लेकिन जनवादी सरोकारों से सीधा वास्ता रखने वाले कवियों में से हैं। ‘शून्यकाल में बजता झुनझुना’ उनका दूसरा कविता संग्रह है । उनका पहला संग्रह ‘पूरा हँसता चेहरा’ वर्ष 2006 में आया था। नौ वर्षों के एक लम्बे समय के बाद कवि...