हर्ष मणि सिंह द्वारा की गई समीक्षा 'कस्बाई मुहल्ले के मार्फ़त बड़े शहरों के मुहल्लों की कहानी रचता मिसराना मुहल्ला'
समीक्षा
'कस्बाई मुहल्ले के मार्फ़त बड़े शहरों के मुहल्लों की कहानी रचता मिसराना मुहल्ला'
हर्ष मणि सिंह
ख़रामा-ख़रामा चलती ज़िंदगी को अतीत के साये से निकाल कर जब कोई इतिहासकार उपन्यास में तब्दील करता है तो यह केवल नास्टैल्जिया ही नहीं होता बल्कि उन शहरों का भी उत्खनन करता है जहाँ से निकल कर जाने वाले लोग फिर वहां लौट नहीं पाये। 'मिसराना मुहल्ला' जो 'सुधीर चन्द्र' की कृति है में एक छोटे शहर के मुहल्ला का ज़िक्र है लेकिन लेख़क छोटे शहर को बड़े कैनवास पर किसी ब्रांड की तरह पेश करता है।
ब्रांडिंग के लिए वैसे तो चौबों के रहन-सहन को उपन्यास विस्तार देता है। लेकिन विस्तार इतना व्यापक है कि कब लेखक छोटे शहर के छोटे मुहल्ले को ब्रांडेड शहर के पुराने इलाकों के मुहल्लों के बराबर में ला खड़ा कर देता है, जहाँ एक गैर महानगरी पुराना शहर धीरे-धीरे अपने फेफड़ों में हवा भरता रहता है। पाठकों को लगता है कि यह उनके मुहल्ले की बात हो रही है। लेखक स्वयं लिखता है कि जिस संवेदना को इस उपन्यास में केंद्रीय स्थान दिया गया है वह चौबों तक सीमित नहीं थी। वह लोक संवेदना थी। सामुदायिक जीवन और संयुक्त परिवार जिस तेज़ी से आज समाप्त हो रहे हैं, और जिस तरह हमारा जीवन छोटी-छोटी पारिवारिक इकाइयों में सिमटता जा रहा है। ......मसलन एक ख़ास रवायत वह खान-पान की भी है और बोल-चाल के साथ रस्म-रिवाज की भी, कि जैसे क़िल्लत है। उसी का बयान है 'मिसराना मुहल्ला'।
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| सुधीर चन्द्र |
लेखक के भाषा-बिछोह का दर्द अपनों से बिछुड़ने के दर्द से कम नहीं। दरसअल हर भाषा की अपनी आत्मीयता होती है जो वहां के भूगोल का सरमाया है। संवाद के दफ़न होने से भाषा तो मरती ही है आत्मीयता भी मरती जाती है। लेखक लिखता है ''कभी-कभी तो लगने लगता है कि बिसरा शब्द वापस नहीं आया तो सांस नहीं ले पाउँगा।'' उपन्यास का सौंदर्य कई करिश्माई शब्दों का प्रयोग जो एक प्रथा की तरह है। बहू के लिए चिरुआ लाज, मुग़ल पसारना, किंछाव, पालागन, प्रिय भोज्य पदार्थ फजीता, ब्यारू, गुलेथी आदि के साथ इस छोटे शहर जो ब्रज और बुंदेलखंड या यूँ कहें जमुना और चंबल की तासीर पैदा करती लोक उक्ति के कई उदाहरण हैं।
चौबों के चार मुहल्ले चौथियाना, सौतियाना, भरतवाल और मिसराना मुहल्ला सभी मुहल्ले बहुत कम चौड़ी पतली-पतली गलियों से जुड़े हुए थे। आप इन गलियों से गुजरते वक़्त भी पंक्चुएसन के रूप में गालियों की बंदिश सुन सकते जैसे कि तुम चूतियन के लयें, भैँच्चोद, और बैसें तौ यार, अब हमाऔ खास कछू बचौ नाइँ। सब भैया अपईं-अपईं नौकरी के चक्कर में बाहर चले गए हैं। हमऊँ दूर मद्रास में परे हैं। तौऊ मन मांत नाइँ जाएँ बिना। भलैंई हुआँ करिबे कौं कछू होत नाइँ सिवाइ ठलुअई के। सब पुराने यार-दोस्त जुड़ि जात हैं, भाँग छंति है, नास्ता-पानी चल्तु है, हाहा-हीही होत है। पतौई नाइँ लगत कि कब छुट्टीं बीति गईं। ऐसेंईं एक दिन जमघट लगौ भओ हो कि एक ने पूछी कि मद्रासिन के बीच में अफसरी ठीक-ठाक तौ चल रई है। हम नैं बताइबौ सुरू ही करौ हो कि बीच में एक कूदि परे, बोले-“मानिबौ परैगौ, बद्री, तुम ससुर चूतिया के चूतिया ई रहि गए।"
रोज़ीना ज़िंदगी पर रोज़नामचा शैली पैर लिखा यह उपन्यास एक छोटे शहर के अपने अल्हड़ और तुनकमिज़ाजी को बखूबी उकेरता है। जो किसी भी शहर के चौक की बसावट को एक लय में पिरोता है। अगर जीवन निर्वाह पर गुरुत्वाकर्षण का नियम तारी न हो तो हर मुहल्ले का अपना जिओ टैग होता है।
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| हर्ष मणि सिंह |
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