चंद्रेश्वर से पंजाबी- हिन्दी लेखक जतिंदर औ की बातचीत


चन्द्रेश्वर 



यह साक्षात्कार पंजाबी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका 'अनुताश' के जुलाई-दिसंबर 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। उस साक्षात्कार का हिन्दी में अनुवाद कुछ परिवर्द्धन के साथ पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हिन्दी भोजपुरी के कवि चंद्रेश्वर से पंजाबी-हिन्दी लेखक जतिंदर औलख की बातचीत।


वरिष्ठ हिन्दी-भोजपुरी कवि-गद्यकार चंद्रेश्वर से  पंजाबी- हिन्दी लेखक जतिंदर औलख की बातचीत 

“मानवीय संवेदना के बिना साहित्यकार होना असंभव है”


औलख : चंद्रेश्वर साहब, आप अपने जन्म और परिवार के बारे में कुछ बताइए?

चन्द्रेश्वर : मेरा जन्म बिहार के भोजपुर ज़िले (अब बक्सर) के एक गांव आशा पड़री में एक कट्टरपंथी ब्राह्मण परिवार में हुआ। मेरे बाबा पंडित भृगुनाथ पाण्डेय संस्कृत के विद्वान थे। वे वैयाकरणविद, साहित्याचार्य एवं ज्योतिषाचार्य थे और काशी की विद्वत्परंपरा में सन् 1950 से 1993 तक उनका महत्व बना रहा। काशी में उन्होंने प्रेमचंद, प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल आदि हिन्दी के महान लेखकों को देखा था। यद्यपि वे संस्कृत के आगे हिन्दी को विशेष महत्व नहीं देते थे। वे हज़ारी प्रसाद द्विवेदी से एक-दो बार मिले थे। वे उनके समकालीन थे। हालांकि दोनों के विचारों में बहुत अंतर था। मेरे बाबा का जन्म 1905 में हुआ था जबकि हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 1907 में। मेरे बाबा एक साथ शिव, विष्णु और दुर्गा के उपासक थे। उनका अधिकांश समय पूजा-पाठ में व्यतीत होता था। मेरे पिता भी धार्मिक व्यक्ति थे। वे स्कूली शिक्षक थे। सनातनी परंपराएँ मुझे जन्म से ही मिलीं। हालांकि आरा के हर प्रसाद दास जैन कॉलेज के विद्यार्थी जीवन के दौरान मेरा मन वामपंथी आंदोलन से जुड़े जनवादी विचारों की ओर मुड़ गया। मैं जिन दिनों बी.ए, हिन्दी (आनर्स) में पढ़ रहा था, सन् 1982 में तो 'जनवादी लेखक संघ' के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में शिरकत करने दिल्ली गया हुआ था। 'जनवादी लेखक संघ' से मुझे चंद्रभूषण तिवारी एवं नीरज सिंह ने जोड़ा था। जब मैं बलरामपुर कॉलेज में हिंदी के असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुआ, तब बलरामपुर हिंदी लेखकों और शायरों-कवियों का गढ़ तो था। वैसे वहां जनवादी विचारों के लिए वह माहौल नहीं था जो मुझे आरा में मिला था। फिर भी बलरामपुर के महारानी लाल कुंवरि स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी साहित्य पढ़ते -पढ़ाते हुए मेरे भीतर जनवादी-प्रगतिशील विचारों का प्रभाव और गहरा होता गया। बाद में मैं 'जनवादी लेखक संघ' में राष्ट्रीय परिषद का सदस्य  रहा। वर्ष 2003-04 के पटना राष्ट्रीय सम्मेलन तक। इसके बाद मेरा 'जनवादी लेखक संघ' से रिश्ता कमज़ोर होता गया, जिसके मूल में मेरे द्वारा लिया गया डॉ. शिवकुमार मिश्र का एक इंटरव्यू भी था जो बुधवार, 14 जून सन् 2006 को लखनऊ के दैनिक 'हिन्दुस्तान' में 'रचना' पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था। इसे पूरे पृष्ठ पर दो तिहाई स्पेस मिला था। उन दिनों इस दैनिक के लखनऊ संस्करण के फीचर संपादक थे नागेन्द्र। नागेन्द्र एक सुलझे हुए प्रगतिशील विचारों के निष्पक्ष पत्रकार होने के साथ-साथ प्रख्यात हिन्दी आलोचक (अब स्मृति शेष) वीरेंद्र यादव के छोटे भाई भी हैं। डॉ. शिवकुमार मिश्र उन दिनों 'जलेस' के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे। उस इंटरव्यू में उन्होंने संगठन की कुछ कमजोरियों पर बात की थी। बाद में लखनऊ में जन संस्कृति मंच की ज़िला इकाई का अध्यक्ष भी रहा सन् 2022-24 में। इसके पहले सन् 2011-15 के दौरान इस मंच की केन्द्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद में भी सदस्य के रूप में रह चुका था। मैंने जन संस्कृति मंच की सदस्यता ग्रहण की थी, सन् 2011 की जनवरी में गोरख पाण्डेय के गांव पर,  एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान। उन दिनों प्रणय कृष्ण 'जसम' के महासचिव थे। मैं लखनऊ में अनिल सिन्हा और कौशल किशोर के संपर्क में था। बाद में यहां भी कुछ वैसी ही कमज़ोरियां दिखीं। जसम लखनऊ इकाई में। जो हो, अब किसी लेखक संघ या मंच का सदस्य नहीं हूं। आजकल सेवानिवृत्त होने के बाद लखनऊ में रह कर स्वतंत्र लेखन करते हुए लखनऊ, अयोध्या एवं बरेली से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक 'जनमोर्चा' के रविवारीय पृष्ठ 'अवकाश' का संपादन भी कर रहा हूं। 

मेरी जन्मभूमि में ही मेरी स्कूली शिक्षा पूरी हुई और आरा में रह कर मेरी पढ़ाई-लिखाई हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर तक हुई है। मैंने 'भारतीय जन नाट्य आंदोलन' पर सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ विद्यानगर, गुजरात से प्रोफ़ेसर डॉ. शिवकुमार मिश्र के निर्देशन में पीएच.डी. की थी। वहां सन् 1987-91 तक शोध के सिलसिले में रहना पड़ा था। मुझे यूजीसी स्कालरशिप मिली थी। कर्मभूमि उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र के एक शहर बलरामपुर में रही है। मेरे जीवन की स्मृतियों और मेरी रचनाओं में ये सभी जगहें पूरी तरह समाई हुई हैं। आरा के बारे में भोजपुरी में लिखी मेरी पुस्तक ‘आपन आरा’ बहुत लोकप्रिय हुई और बलरामपुर के बारे में हाल ही में प्रकाशित मेरी पुस्तक ‘मेरा बलरामपुर’ छपने के कुछ समय बाद ही बिक गई। अब इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हो चुका है। इधर वल्लभ विद्यानगर, गुजरात की स्मृतियों को भी दर्ज करने में लगा हूं। दरअसल कविता के बाद मैंने कथेतर गद्य लिखने में हिन्दी और भोजपुरी में भी ज़्यादा दिलचस्पी दिखाई है।


औलख : आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि केवल कविता या साहित्य के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है, लेकिन इतिहास पढ़ें तो पता चलता है कि साहित्य बड़ी सामाजिक क्रांतियों का आधार बना है। जैसे भक्ति आंदोलन ने पंजाब में सिख आंदोलन जैसी क्रांतिकारी लहर को जन्म दिया।

चन्द्रेश्वर : कविता और साहित्य के माध्यम से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए ज़मीन तैयार की जा सकती है। लोगों को मानसिक रूप से तैयार किया जा सकता है। लेकिन समाज में बदलाव के लिए संगठित रूप से प्रयास किए जाने की आवश्यकता होती है। दुनिया में जितनी भी क्रांतियाँ हुई हैं, वे वैचारिक रूप से परिपक्व लोगों द्वारा संगठन और योजनाओं के साथ की गई हैं।


औलख : आपने हिंदी और भोजपुरी में भी लिखा है। सबसे अधिक आनंद आपको किस भाषा में लिख कर मिलता है?

चन्द्रेश्वर : बेशक मैं कॉलेज में हिंदी का प्रोफ़ेसर रहा हूँ और हिंदी में मेरी पुस्तकों के अनेक संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं, लेकिन भोजपुरी में लिख कर जो आनंद मिलता है, वह किसी अन्य भाषा में लिख कर नहीं मिलता। जब मैं भोजपुरी के लोकगीत सुनता हूँ तो मुझे अपना बचपन याद आ जाता है। ये गीत आत्मा को उड़ान देते हैं।


औलख : आज सोशल मीडिया के दौर में साहित्य की प्रस्तुति के रूप बदल रहे हैं। डिजिटलीकरण के इस दौर में साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?

चन्द्रेश्वर : मानव इतिहास के शुरुआती दौर में श्रुति की परंपरा रही है। वेद अगली पीढ़ियों तक श्रुति के रूप में ही पहुँचे। साहित्य को मुख्य रूप से कंठस्थ अर्थात मौखिक रूप से याद किया जाता था।

बाद में ताड़ के पत्तों के रूप में पत्र, यानी प्रारंभिक दौर के काग़ज़ की खोज हुई तो परंपरावादी विद्वानों ने इसका कड़ा विरोध किया, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि पत्र पर लिखा साहित्य बाढ़ या बारिश में खराब हो जाएगा, जबकि मौखिक साहित्य ही जीवित रह सकेगा। बाद में जब प्रिंटिंग प्रेस का दौर आया तो इस प्रवृत्ति का भी विरोध हुआ, लेकिन विरोध के बावजूद यह सफल हुआ।

इसी तरह मुझे याद है कि जब सोशल मीडिया का दौर नया-नया आया था तो हिंदी के बहुत से साहित्यकारों ने न केवल इससे दूरी बनाए रखी, बल्कि इसका विरोध भी किया। लेकिन सोशल मीडिया का चलन आज सफल है।

हिंदी में बहुत से लोकप्रिय ब्लॉग हैं। मैंने इनमें से बहुत से कवियों की कविताएँ और कहानियाँ पढ़ी हैं। मोबाइल या किंडल पर पढ़ना अधिक सुविधाजनक है। मेरा मानना है कि कागज पर छपी पुस्तकों का दौर धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा और डिजिटल साहित्य बहुत प्रभावी साबित होगा।


औलख : भारतीय समाज मिथकों और विश्वासों पर आधारित समाज है, जहाँ आज धर्म न केवल धंधा बन कर रह गया है, बल्कि जनता के शोषण का भी साधन बन गया है। क्या कविता या साहित्य भारतीय समाज में कुछ क्रांतिकारी परिवर्तनों का आधार बन सकेगा?

चन्द्रेश्वर : भारतीय समाज पौराणिक मान्यताओं वाला समाज है। सदियों से चले आ रहे लोकविश्वास और मिथक आज भी लोकजीवन पर हावी हैं। भारतीय समाज में मिथक और इतिहास आपस में इस तरह घुले-मिले हुए हैं कि उन्हें अलग करना कठिन है। मैं पिछले दिनों वृंदावन गया था। वहाँ का माहौल देख कर और लोगों से मिल कर ऐसा लगा जैसे श्रीकृष्ण का जन्म अभी कल की ही बात हो।

लेकिन यदि भारतीय भाषाओं के आधुनिक साहित्य की बात करें तो इस साहित्य ने नई सोच का प्रसार करने का प्रयास किया है। परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ने की कोशिश ज़रूर हुई है। मैंने अपनी पुस्तक ‘आपन आरा’ में लिखा है कि आधुनिक साहित्य पढ़ना और उससे प्रेम करना आज समाज-विरोधी एवं बगावत माना जाता है। यदि आप मुक्तिबोध, निराला या प्रेमचंद को पढ़ रहे हैं तो यह भी गली-सड़ी परंपराओं के विरुद्ध विद्रोह करने जैसा है।


औलख : आप अध्ययन के सिलसिले में आरा में भी रहे और बलरामपुर में भी। एक आपकी जन्मभूमि से जुड़ी जगह है और दूसरी कर्मभूमि है। दोनों कस्बों में ऐसी कौन-सी शख्सियतें थीं, जिनसे आपने प्रभाव ग्रहण किया?

चन्द्रेश्वर : मैंने अपनी पुस्तक ‘मेरा बलरामपुर’ में लिखा भी है कि आरा और बलरामपुर में बहुत अंतर है। आरा में प्रगतिशील विचारों और क्रांतिकारी सोच का अधिक प्रभाव था, जबकि बलरामपुर एक पिछड़ा हुआ, सामंती विचारधारा वाला शहर था। इसका कारण यह है कि आरा में वीर कुंवर सिंह की शख्सियत का बहुत अधिक प्रभाव रहा है।

1857 के गदर के दौरान वीर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों को मात दी और जब तक वीर कुंवर सिंह जीवित रहे, अंग्रेज यहाँ अपना झंडा नहीं फहरा सके। इस क्रांतिकारी व्यक्तित्व का आरा और आसपास के क्षेत्रों पर बहुत प्रभाव रहा। नक्सलबाड़ी आंदोलन का सबसे अधिक प्रभाव भी आरा के दक्षिणवर्ती क्षेत्र में रहा।

आज़ादी से पहले एक महानायक कवि कैलाश भी आरा में हुए, जिन्हें अंग्रेजों ने सरेआम पेड़ से लटकाकर फाँसी दी थी। 1967 से 1970 के दशक के दौरान आरा पूरी तरह नक्सल आंदोलन के प्रभाव में था। चारु मजूमदार और कानू सान्याल की विचारधारा फैल चुकी थी। 

कॉमरेड विनोद मिश्रा जब लंबे समय तक भूमिगत रहने के बाद वापस आए तो उनके भाषणों का क्षेत्र के युवा वर्ग पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। उसी दौर में नागार्जुन ने हिंदी कविता लिखी—

“मुन्ना मुझे दिल्ली-पटना मत जाने दो, मुझे यही रहने दो,

मैं बारूद छर्रे की खुशबू सूँघना चाहता हूँ।”

वामपंथी आंदोलन की तीनों धाराओं के प्रभाव में हिंदी-भोजपुरी  के बहुत से लेखक आरा में हुए— वेद नंदन, चंद्रभूषण तिवारी, श्रीराम तिवारी, रामनिहाल गुंजन, मधुकर सिंह, विजेन्द्र अनिल, मिथिलेश्वर, नीरज सिंह, रामेश्वर उपाध्याय, नवेन्दु, श्रीकांत, सिरिल मैथ्यू, अरविन्द कुमार, अनंत कुमार सिंह, शीन हयात, बद्रीनारायण, निलय उपाध्याय, सगीर रहमानी, बलभद्र, कुमार वीरेंद्र, हरे प्रकाश उपाध्याय आदि। चंद्रभूषण तिवारी ने ‘वाम’ नाम की पत्रिका शुरू की, जिसने हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता को एक नई दिशा दी। 1980-90 के दशक में आरा से मैं, निलय उपाध्याय, बद्रीनारायण, प्रकाश उदय जैसे लेखक और कवि सक्रिय हुए। आरा से ही अनंत कुमार सिंह के संपादन में ‘जनपथ’ नाम की पत्रिका निकली। इन दिनों भी अरुण शीतांश 'देशज' निकाल रहे हैं।

बलरामपुर आरा से बिल्कुल विपरीत था। यहाँ प्रगतिशील आंदोलन का कोई प्रभाव नहीं था। यहाँ ज्यादातर स्टेजी (मंचीय) कवि थे। यहाँ अली सरदार जाफरी जैसे शायर हुए, लेकिन वे बाहर रहे। बेकल उत्साही भी यहीं पैदा हुए, जो कांग्रेस के सांसद भी रहे। पास ही गोंडा शहर है, जहाँ अदम गोंडवी पैदा हुए।

बलरामपुर सामंती सोच वाला शहर था, जहाँ पूरी नौकरी के दौरान मुझे हमेशा संदेह की नज़र से देखा गया। फिर भी मेरा लेखन स्थगित नहीं हो सका। 


औलख : क्या लेखक या कवि का किसी विचारधारा के प्रति समर्पित होना जरूरी है?

चन्द्रेश्वर : कवि या लेखक का मुख्य सरोकार संवेदना से होता है। जीवन-संघर्ष के प्रति उसका सरोकार होना जरूरी है। हिंदी आलोचना में यह मार्क्सवादी विचारधारा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। दक्षिणपंथ को मैं विचारधारा नहीं मानता। जो लेखक जीवन-मूल्यों के प्रति संवेदना रखते हुए  विचारधारा के प्रति समर्पित है, तो यह एक आदर्श स्थिति होती है। जैसे पंजाबी में पाश को ले लीजिए। वह वैचारिक प्रौढ़ता के साथ जीवन-मूल्यों को अभिव्यक्त करने वाला कवि था।

भगत सिंह आज़ादी के अनेक सेनानियों में एक अलग स्थान पर खड़े दिखाई देते हैं, क्योंकि उनके पास जीवन-दर्शन और एक विचारधारा थी। हिंदी साहित्य में प्रगतिशील विचारधारा वाले लेखक-लेखिकाओं में नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, शील, अमरकांत, मार्कण्डेय, शेखर जोशी, चंद्रकांत देवताले, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, पंकज सिंह, रमेश उपाध्याय, पंकज बिष्ट, संजीव, शिवमूर्ति, हृषीकेश सुलभ, शैलेन्द्र सागर, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, राजेश जोशी, उदय प्रकाश, अरुण कमल, विष्णु नागर, मनमोहन, शुभा, सविता सिंह आदि हैं। ये कविता और एक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहे हैं। अभी और कई नाम हैं। लंबी सूची है।

मेरा मानना है कि लेखक को आगे बढ़ने वाली, प्रगतिशील सोच का धनी होना चाहिए।


औलख : आपकी पुस्तकें बिकती भी हैं और आपके पास पाठक-वर्ग भी है। आपको अपनी कौन-सी पुस्तक सबसे अधिक पसंद है?

चन्द्रेश्वर : अभी तक मेरे तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। 2010 में ‘अब भी’, 2017 में ‘सामने से मेरे’ और 2021 में ‘डुमरांव नज़र आएगा’। 2026 में भोजपुरी कविताओं का संग्रह ‘गोहार’ भी आया है, जिसे सर्वभाषा ट्रस्ट के भोजपुरी प्रकाशन, दिल्ली ने प्रकाशित किया है।

इसी तरह भोजपुरी में मेरे दो संस्मरण-संग्रह ‘आपन आरा’ और ‘हमार गाँव’ प्रकाशित हुए हैं। मेरी एक पुस्तक इप्टा आंदोलन पर भी प्रकाशित हो चुकी है, जो आज़ादी से पहले ही सामने आया आंदोलन था। जल्द ही हिंदी कविताओं पर  आलोचना की पुस्तक भी सामने आएगी। बलरामपुर शहर के विभिन्न पक्षों पर मेरी पुस्तक ‘मेरा बलरामपुर’ प्रकाशित हुई है।

हिंदी में मेरी कविता-पुस्तक ‘सामने से मेरे’ सबसे अधिक पढ़ी और सराही गई। भोजपुरी में मेरी पुस्तक ‘हमार गाँव’ को भोजपुरी क्षेत्रों में उसके साहित्य समाज में काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला।


औलख : आपको आलोचकों से कोई गिला है?

चन्द्रेश्वर : हिंदी कविता और आलोचना से मैं 1990 के दशक से जुड़ा रहा हूँ। हिंदी कवियों में जो गुटबाजी है, उससे मैं परिचित रहा हूँ। हिंदी आलोचना में अब वह पीढ़ी नहीं रह गई जो ईमानदारी और बेबाकी से बात करती थी। अब जो भी आलोचक बचे हैं, वे खेमेबाजी करते हैं।


औलख : जी हाँ! मैं यही पूछना चाह रहा था कि हमारे पंजाबी में कोई भी अच्छा साहित्यकार आलोचकों को बुला कर राजी नहीं है और आलोचक डॉलर-पाउंड वालों के पीछे घूमते रहते हैं। इसीलिए आलोचकों को कोई गंभीरता से नहीं लेता। हिंदी में क्या स्थिति है?

चन्द्रेश्वर : मैंने 2015 में कलकत्ता से प्रकाशित पत्रिका ‘लहक’ में लेख लिखा था कि आलोचना को विज्ञापन बनने से बचाना चाहिए। आज किसी भी पुस्तक या लेखक के बारे में आलोचक निष्पक्ष रह कर बात नहीं करते। इसीलिए आलोचना लगातार अविश्वसनीय होती जा रही है।

हिंदी में भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या आलोचना का अंत हो गया है? यह अक्सर पूछा जाता है कि क्या अब आलोचना की कोई आवश्यकता नहीं रह गई? कविता और गद्य को लोग आज भी पढ़ रहे हैं, लेकिन आलोचना की पुस्तक कोई नहीं खरीदता। आलोचना केवल अकादमिक दुनिया में ही अधिक पढ़ी सुनी जा रही है।


औलख : आलोचना या आलोचक से लेखक-पाठकों का मोहभंग इसलिए भी हो सकता है कि आज के आलोचक की भाषा जटिल हो गई है?

चन्द्रेश्वर : आप हिंदी में नामवर सिंह, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल जैसे आलोचकों को पढ़िए तो उनकी कोई बात समझ में आती है। मुझसे कई बार कुछ लोगों ने पूछा कि इधर कोई ऐसा आलोचक बताइए जो अच्छा काम कर रहा हो, लेकिन मेरा जवाब यही होता है कि मुझे तो कोई ऐसा आलोचक दिखाई नहीं देता।


औलख : आज साहित्यिक संस्थाओं की कितनी प्रासंगिकता बची है?

चन्द्रेश्वर : साहित्यिक संस्थाओं की लेखकों, पाठकों और आम जनता में कोई साख नहीं बची। खासकर सरकारी संस्थाएँ केवल सरकार के निर्देशों का पालन करने तक ही सीमित हैं। पुरस्कार निष्पक्षता से तय नहीं होते। भाई-भतीजावाद बहुत है। मैं पिछले कई वर्षों से संस्थाओं और उनके समारोहों में जाना छोड़ चुका हूँ।


औलख : क्या इसके लिए सचेत प्रयास हो रहे हैं कि साहित्य को केवल अकादमिक दायरों में कैद कर दिया जाए?

चन्द्रेश्वर : साहित्य और साहित्यिक आलोचना का उद्देश्य जनमानस में चेतना पैदा करना होना चाहिए। जनता से जुड़ना होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा।

हिंदी में पत्रिकाएँ बंद हो रही हैं। किसी जमाने में ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘दिनमान’, ‘रविवार’, ‘सारिका’ जैसी पत्रिकाएँ निकलती थीं। इनके संपादक रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर आदि इतिहास रच गए।

जो पत्रिकाएँ बची हैं, जैसे ‘हंस’, ‘पाखी’, 'वागर्थ' ‘तद्भव’, ‘कथादेश’ आदि, उनकी संख्या बहुत कम रह गई है। यह चिंताजनक रुझान है। मेरी जानकारी में ‘हंस’ की अस्सी के दशक में 40-50 हजार प्रतियाँ छपती थीं, लेकिन अब यह शायद चार-पाँच हजार तक सिमट कर रह गई है।

अकादमिक संस्थान केवल औपचारिक खानापूर्ति कर रहे हैं। पाठकों का घटता हुआ दायरा चिंताजनक है। साहित्य को लोगों से जोड़ना आज के समय की मुख्य आवश्यकता है।


औलख : इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं?

चन्द्रेश्वर : हिन्दी में एक उपन्यास लिख रहा हूं जो अभी अधूरा है।

हिन्दी में चौथे कविता संग्रह की पांडुलिपि भी तैयार किया हूं जो शीघ्र ही प्रकाशित होगी। 

                                ***




चंद्रेश्वर वरिष्ठ कवि हैं। हिन्दी-भोजपुरी की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में 1982-83 से कविताओं और लेखों का लगातार प्रकाशन। अब तक आठ पुस्तकें प्रकाशित । तीन हिन्दी कविता संग्रह - 'अब भी' (2010), 'सामने से मेरे' (2017), 'डुमराँव नज़र आयेगा' (2021)। भोजपुरी में पहला कविता संग्रह 'गोहार' (2026)। इतिहास, आलोचना एवं साक्षात्कार की पुस्तक 'इप्टा आंदोलन' (2026)। एक शोधालोचना की पुस्तक 'भारत में जन नाट्य आंदोलन' (1994 ) एवं एक साक्षात्कार की पुस्तिका 'इप्टा-आंदोलनः कुछ साक्षात्कार' (1998) का प्रकाशन। भोजपुरी कथेतर गद्य की दो पुस्तकें --'हमार गाँव' (2020), 'आपन आरा' (2023) एवं 'मेरा बलरामपुर' (हिन्दी में कथेतर गद्य, 2021-22 ) का भी प्रकाशन।

पिछले डेढ़ साल से जनपक्षधर हिन्दी दैनिक 'जनमोर्चा' (अयोध्या, लखनऊ एवं बरेली) के रविवारीय पृष्ठ 'अवकाश' का संपादन।

सम्मान : भोजपुरी कथेतर गद्य कृति 'हमार गांव' पर सर्वभाषा सम्मान (2024), रेवांत साहित्य गौरव सम्मान (2024)।

एम.एल.के. पी.जी. कालेज, बलरामपुर, उत्तर प्रदेश में हिन्दी विषय में 26 वर्षों तक अध्यापन। 30 जून 2022 में विभागाध्यक्ष और प्रोफ़ेसर पद से सेवानिवृत्त होने के उपरांत लखनऊ में रहते हुए स्वतंत्र लेखन।

ई-मेल : cpandey227@gmail.com


जतिंदर औलख


जतिंदर औलख का जन्म भारत के पंजाब प्रांत के एक छोटे से गाँव कोहाली में हुआ, जो भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित है। वे पंजाबी की साहित्यिक पत्रिका ‘मेघला’ के संपादक रह चुके हैं। उनके लेख और कविताएँ देश के प्रमुख समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। उनकी कविताएं विश्व की बहुत सारी भाषाओं में अनुवाद हो चुकी हैं।  जतिंदर औलख विभिन्न समाचार-पत्रों में स्तंभकार के रूप में भी लिखते रहे हैं।

पेशे से वे होम्योपैथिक चिकित्सक हैं और पुरातात्त्विक स्थलों पर उनके शोधकार्य को व्यापक रूप से मान्यता मिली है। वर्तमान में वे न्यूयॉर्क से प्रकाशित समाचार-पत्र ‘Punjabi Writer Weekly’ के साहित्यिक संपादक हैं, जहाँ वे दुनिया भर के लेखकों की रचनाओं को प्रकाशित करते हैं।

जतिंदर औलख की पुस्तक ‘Majha in Ancient Ages’ हजारों वर्ष पुराने इतिहास में मौजूद प्राचीन और अब खंडहर हो चुके नगरों पर आधारित एक शोधपरक कृति है। वे ‘Fall Can’t Cease the Springs’ नामक बेस्टसेलर उपन्यास के लेखक भी हैं, जिसका प्रकाशन Evincee Publisher द्वारा किया गया है।

हाल ही में उनकी चीनी ज़ेन कविताओं के हिंदी अनुवाद पर आधारित पुस्तक ' 'सन्यासी और जंगली हवा' भी वेरा पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित हुई है।


सम्पर्क : जतिंदर औलख

मोबाइल: 9815534653

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