कैलाश गौतम की कविता 'गान्‍ही जी'


महात्मा गांधी 



गांधी जी राजनीति को सेवा धर्म मानते थे। आज की राजनीति पेशा हो गई है जिसका एक मात्र उद्देश्य किसी भी तरह सत्ता में बने रहना है। राजनीति किसी भी देश को दिशा देने का काम करती है लेकिन अगर वही दिशाहीन हो जाए तो फिर किससे उम्मीद की जाए। गांधी जी की नजर में कतार में खड़ा अन्तिम आदमी होता था। आज के राजनीतिज्ञों की नजर पूंजीपतियों, माफियाओं और उन दबंगों पर होती है जो येन केन प्रकारेण चुनाव जितवा सकें। आज दिखावा और पाखण्ड ज्यादा है। गांधी जी ऐसी स्थिति में सहज ही याद आते हैं जिनका कहना था मेरा जीवन ही सन्देश है। क्या आज ऐसा कोई दिख रहा है जो यह कह सकने की स्थिति में हो। सही बात तो यह है कि हम गांधी को भुलाने की कोशिशें करने लगे हैं। लेकिन दिक्कतें ऐसी हैं कि बार बार गांधी की याद अनायास ही दिलाती हैं। कैलाश गौतम अपनी एक भोजपुरी कविता में गांधी जी को याद करते हुए लिखते हैं : 'जे अललै बेइमान इहां ऊ डकरै किरिया खाला/ लम्‍बा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला/ चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला/ एक्‍को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला'। आज दो अक्टूबर गांधी जी का जन्मदिन है। उनकी स्मृति को नमन। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कवि कैलाश गौतम की कविता 'गान्‍ही जी'।


'गान्‍ही जी'


कैलाश गौतम 


सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्‍ही जी

देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्‍ही जी

बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज चरत हौ, गान्‍ही जी

तोहरे घर क रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्‍ही जी


हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुंडई, डकैती हउवै

देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै

छुआछूत हौ, ऊंच नीच हौ, जात-पांत पंचइती हउवै

भाय भतीजा, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भंड़इती हउवै


का बतलाई कहै सुनै में सरम लगत हौ, गान्‍ही जी

केहुक नांही चित्त ठेकाने बरम लगत हौ, गान्‍ही जी

अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ, गान्‍ही जी

गाभिन हो कि ठांठ मरकहीं भरम लगत हौ, गान्‍ही जी


जे अललै बेइमान इहां ऊ डकरै किरिया खाला

लम्‍बा टीका, मधुरी बानी, पंच बनावल जाला

चाम सोहारी, काम सरौता, पेटैपेट घोटाला

एक्‍को करम न छूटल लेकिन, चउचक कंठी माला


नोना लगत भीत हौ सगरों गिरत परत हौ गान्‍ही जी

हाड़ परल हौ अंगनै अंगना, मार टरत हौ गान्‍ही जी

झगरा क जर अनखुन खोजै जहां लहत हौ गान्‍ही जी

खसम मार के धूम धाम से गया करत हौ गान्‍ही जी


उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्‍बौ हौ

कब्‍बौ गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्‍बौ हौ

दूसर के कब्‍जा में आपन पानी दाना अब्‍बौ हौ

जहां खजाना रहल हमेसा उहै खजाना अब्‍बौ हौ


कथा कीर्तन बाहर, भीतर जुआ चलत हौ, गान्‍ही जी

माल गलत हौ दुई नंबर क, दाल गलत हौ, गान्‍ही जी

चाल गलत, चउपाल गलत, हर फाल गलत हौ, गान्‍ही जी

ताल गलत, हड़ताल गलत, पड़ताल गलत हौ, गान्‍ही जी


घूस पैरवी जोर सिफारिश झूठ नकल मक्‍कारी वाले

देखतै देखत चार दिन में भइलैं महल अटारी वाले

इनके आगे भकुआ जइसे फरसा अउर कुदारी वाले

देहलैं खून पसीना देहलैं तब्‍बौ बहिन मतारी वाले


तोहरै नाव बिकत हो सगरो मांस बिकत हौ गान्‍ही जी

ताली पीट रहल हौ दुनिया खूब हंसत हौ गान्‍ही जी

केहु कान भरत हौ केहू मूंग दरत हौ गान्‍ही जी

कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्‍ही जी


जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निसाना हउवै

पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै

आजादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै

साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै


अइसन चढ़ल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्‍ही जी

आग लगत हौ, धुवां उठत हौ, नाक बजत हौ गान्‍ही जी

करिया अच्‍छर भंइस बराबर बेद लिखत हौ गान्‍ही जी

एक समय क बागड़ बिल्‍ला आज भगत हौ गान्‍ही जी


कैलाश गौतम 


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