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प्रेमचन्‍द गांधी

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तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझती हुई यह 'स्त्री की अदम्य जिजीविषा' ही है जिसने हमारी दुनिया को इस कदर खूबसूरत बनाए रखा है। लेकिन सवाल यह है कि उसकी जिजीविषा की तह में कितने लोग झाँक पाते हैं? यह कवि है जो इस दुनिया में शिद्दत से प्रवेश करता है। और देखता है कि कैंसर के रोग से उबर कर नए जीवन की तलाश में आगे बढ़ती स्त्री है। नकाब के दायरे से बाहर निकल कर सोचती हुई लड़कियाँ है। साथ-साथ जीवन की बलिबेदी पर अपने सारे चाहतों, सारी खुशियों को आहूत करती अखण्ड कुमारियाँ हैं। प्रेमचंद गाँधी हमारे समय के एक सशक्त रचनाकार हैं जिनकी दृष्टि इस दुनिया के उन कोनो-अतरों तक जाती है जो प्रायः उपेक्षित हैं और जिनका एक बड़ा हाथ है इस दुनिया को आभामय बनाने में। पहली बार पर प्रस्तुत है प्रेमचंद गांधी की कुछ इसी रंग की कविताएँ।             सपनों में रोती हुई स्‍त्री मेरे सपनों में अ क्‍स र वो आती है रोती हुई उसकी घुटी - घुटी चीखें कांपती हुई दीये की लौ जैसी आवाज़ अंधेरों को चीरकर मुझ तक...