संदेश

आदित्य विक्रम सिंह लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आदित्य विक्रम सिंह का आलेख 'भारतीय संगीत परंपरा की जीवंत धरोहर है आशा भोंसले की गायकी'

चित्र
                        आशा भोंसले  भारतीय संगीत की जीवन्त आवाज थीं आशा भोंसले। बीते 12 अप्रैल 2026 को मुम्बई में 92 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। वे प्रख्यात गायिका लता मंगेशकर की बहन थीं। हालांकि आशा जी ने अपने हुनर से गायन की दुनिया में अपनी एक अलग जगह बनाई। संगीतकार ओ. पी. नैयर की साझेदारी ने आशा भोसले को एक खास पहचान दिलाया। ओ. पी. नैयर और आशा भोसले की यादगार फिल्मों में ‘आईये मेहरबाँ...’ (हावड़ा ब्रिज-1958), ‘ये है रेशमी जुल्फो का अंधेरा... (मेरे सनम-1965) आदि है। ओ. पी. नैयर ने कई हिट गीतों को आशा जी के साथ रिकार्ड किया यथा- नया दौर (1957), तुम सा नहीं देखा (1957), हावड़ा ब्रिज (1958), एक मुसाफिर एक हसीना (1962), कशमीर की कली (1964) आदि। इनकी साझेदारी में गए कुछ मशहूर गीत हैं - आओ हुजुर तुमको...(किस्मत), जाईये आप कहाँ जाएगे... (मेरे सनम) आदि है। इनके द्वारा गाए कुछ प्रमुख युगल गीत हैं ‘उडे जब जब जुल्फे तेरी...(नया दौर), मै प्यार का राही हूँ...(एक मुसाफिर एक हसीना), दीवाना हुआ बादल..., इशारो इशारो में...(काश्मी...

आदित्य विक्रम सिंह का आलेख 'हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते'

चित्र
  धर्मेन्द्र  सदाबहार अभिनेता धर्मेन्द्र का कल 24 नवम्बर 2025 को निधन हो गया। हिन्दी फिल्मों की शृंखला में उन्होंने कई ऐसी यादगार फिल्मों में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी जो आम आदमी की स्मृतियों में आज भी करीने से दर्ज है। उनके अभिनय में आम आदमी जैसे अपना ही अक्स महसूस करता था। सुपर स्टार राजेश खन्ना जब अपनी कामयाबी के शिखर पर थे तब यह धर्मेंद्र ही थे जो 'जीवन मृत्यु', 'राजा जानी', 'लोफ़र', 'सीता और गीता' और 'मेरा गांव मेरा देश' जैसी बड़ी-बड़ी हिट फ़िल्में दे रहे थे और कॉमेडी से ले कर, रोमांस और एक्शन हर अंदाज़ में बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे।  फ़िल्म 'अनुपमा' में एक संवेदनशील लेखक, समाज से सरोकार रखने वाला 'सत्यकाम' का आदर्श ज़िद्दी नौजवान, कॉमेडी से लोटपोट करने वाला 'चुपके-चुपके' का प्रोफ़ेसर परिमल.., इन सारी भूमिकाओं में धर्मेन्द्र परफेक्ट दिखाई पड़े। 1975 में 'शोले' आते-आते तो उनकी यानी वीरू की लोकप्रियता शीर्ष पर थी। चाहे टंकी पर चढ़ जाने वाला ये सीन हो- "वैन आई डेड, पुलिस कमिंग.. पुलिस कमिंग, बुढ़िया गोइंग ...

आदित्य विक्रम सिंह का स्मृति लेख “वह नाम जो रवि था”

चित्र
  रविशंकर उपाध्याय वह एक धूमकेतु की तरह आया और कुछ पल की चमक बिखेर कर पता नहीं कहाँ ब्रह्माण्ड के विस्तार में अपना हिस्सा बँटाने चला गया। उससे जब भी मैं मिला वह हमेशा मुस्कुराते मिला। उसको देख कर या उससे बात कर एक पल के लिए भी ऐसा नहीं लगता था कि वह एक अत्यन्त सामान्य कृषक परिवार का है, जिसकी नियति आर्थिक अभाव की होती है। अभी उसकी उम्र ही क्या थी लेकिन निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि वह एक उम्दा संयोजनकर्ता था। अपने साथियों के लिए प्रेरणास्पद व्यक्तित्व था। आज भी उसके तमाम मित्र उसका नाम आते ही सम्मान से श्रद्धावनत हो जाते हैं और उनकी आंखें सहज ही नम हो आती हैं। उसके चुम्बकीय आकर्षण से बच पाना लगभग नामुमकिन होता था। वह छात्र था लेकिन गुरुजन आज भी उसे श्रद्धा से याद करते हैं। उसकी अभी उम्र ही क्या थी लेकिन झूठ को सच करते हुए एक परिन्दे की मानिन्द वह इस दुनिया से किसी दूसरी दुनिया में चला गया। ऐसे व्यक्तित्व का नाम था रविशंकर उपाध्याय। आज भी उसके लिए 'था' या 'स्वर्गीय' लिखने को जी नहीं करता। वाकई वह नाम के अनुरूप ही रवि था। आदित्य विक्रम सिंह ने अपने मित्र रविशंकर को ...