पंकज पराशर का यात्रा संस्मरण 'पहली रात टोकियो में'


पंकज पराशर 


हरेक सभ्यता के जीने रहने का अपना विशेष अनुशासन होता है। उसके अपने अभिप्राय होते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने जितनी तकनीकी प्रगति की वह दुनिया के सामने एक मिसाल की तरह है। जापानी लोग यह ख्याल रखते हैं कि उनकी वजह से अगला व्यक्ति प्रभावित दुष्प्रभावित न हो। इसीलिए वहां के लोगों की आवाज भी एकदम धीमी होती है। यह हमारी दक्षिण एशियाई संस्कृति के बरक्स बिल्कुल विपरीत है जहाँ लोग बिना शोर के कोई भी काम करने के अभ्यस्त नहीं होते। हम अपरिचित से भी बात करने का कोई न कोई सूत्र ढूँढ लेते हैं जबकि जापानी लोग खुद को अपने तक ही सीमित रखते हैं। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मानवीय भावनाओं, संवेदनाओं, अनुभूतियों और स्पर्श की जगह मशीनें नहीं ले सकतीं। पंकज पराशर ने हाल ही में जापान की यात्रा की और इसे शिद्दत से महसूस किया। अपने यात्रा संस्मरण में वे लिखते हैं 'एक शाम शिंजुकु स्टेशन के बाहर हजारों लोगों की भीड़ को सड़क पार करते देखा। वह संसार के सबसे व्यस्त सड़क पार करने वाले मार्गों में से एक था। चारों तरफ़ नीयॉन लाइटें। विशाल स्क्रीनें। विज्ञापन। फैशन स्टोर्स, लेकिन उस पूरी दृश्यात्मक चकाचौंध के भीतर भी एक गहरी भावनात्मक शांति थी। कोई सड़क किनारे बहस नहीं कर रहा था। कोई जोर से हँस नहीं रहा था। कोई गाना नहीं गा रहा था। टोकियो की भीड़ अत्यंत जीवंत हो कर भी अजीब तरह से शांत रहती है और यही बात मुझे बार-बार विचलित करती रही। सभ्यताएँ अपने अपराधों को भी उसी सलीके से छिपा लेती हैं, जिस सलीके से वे अपनी सुंदरता को सजाती हैं। यह विचार आया और उतनी ही चुपचाप भीतर कहीं बैठ गया।' आज पंकज पराशर ने उम्र का पचासवां पड़ाव पार कर लिया है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए इस अवसर पर पहली बार पर हम पढ़ते हैं पंकज पराशर का यात्रा संस्मरण 'पहली रात टोकियो में'।


यात्रा संस्मरण

'पहली रात टोकियो में'


पंकज पराशर


सुबह का वह रंग मैंने पहले कभी नहीं देखा था! विमान बादलों से नीचे उतर चुका था और खिड़की के बाहर समुद्र फैला हुआ था—बहुत शांत, बहुत स्थिर-जैसे रात अभी पूरी तरह गई न हो। पानी पर हल्की धूसर रोशनी थी, जिसके भीतर कहीं दूर उगते सूरज का फीका सोना घुलना शुरू हुआ था। पूरी दुनिया उस समय मानो दो रंगों के बीच ठहरी हुई थी—नीले और धूसर के बीच। विमान  नीचे आ रहा था और नीचे सिर्फ समुद्र था। इतना समुद्र कि कुछ देर बाद मुझे बेचैनी होने लगी। रनवे कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। जमीन कहीं नहीं थी। सिर्फ पानी था और पानी के ऊपर उतरता हुआ विमान। मैंने अनायास अपनी सीट की बाँह पकड़ ली। फिर समुद्र के भीतर से जैसे एक पतली कंक्रीट की रेखा उभरी। रनवे और अगले ही क्षण विमान ने जमीन को छू लिया। पहियों से निकली घर्षण की आवाज़ कुछ सेकंड तक केबिन में गूँजती रही। बाहर पानी अब भी बिल्कुल पास था। इतना पास कि लगता था-जैसे रनवे समुद्र के ऊपर ही रखा हो। तब मुझे जापान का वास्तविक भूगोल समझ में आया—एक ऐसा देश जिसने पहाड़ों, भूकंपों और समुद्र के बीच अपने लिए जगह बनाई है। प्रकृति से लड़ कर नहीं, उसके साथ एक विनत समझौता कर के। घड़ी में सुबह के पौने पाँच बजे थे। हम समय से पहले टोकियो के हानेदा एयरपोर्ट पर उतर चुके थे। 

मेरे बगल में बैठी जापानी महिला ने बाहर देखते हुए बहुत धीमी आवाज़ में कहा, ‘सुबह साफ़ है… आज टोकियो सुंदर लगेगा।’ उसकी अँगरेज़ी धीमी थी, लगभग फुसफुसाहट-जैसी। वह करीब साठ-पैंसठ वर्ष की रही होगी। छोटे सफ़ेद बाल, बिना किसी आभूषण का चेहरा और आँखों में वह शांत थकान, जो अक्सर उन लोगों में दिखाई देती है, जिन्होंने जीवन को लंबे समय तक भीतर से व्यवस्थित करके जिया हो। दिल्ली से उड़ान भरने के बाद से हम बीच-बीच में बातें करते रहे थे। उसने बताया था कि वह टोकियो में योग सिखाती है और भारत से लौट रही है। हर साल कुछ महीने भारत में बिताती है—ऋषिकेश, पुणे, तो कभी वाराणसी। मेरी विंडो सीट थी। बीच वाली सीट खाली रह गई थी। गलियारे वाली सीट पर वही जापानी महिला बैठी थी। उसने सीट पर बैठते ही हल्का-सा सिर झुका कर अभिवादन किया था। उसके बाद बहुत देर तक हम दोनों चुप रहे, लेकिन वह चुप्पी असहज नहीं थी। उसमें एक प्रकार की जगह थी—दूसरे मनुष्य को बिना बाधित किए उसके साथ मौजूद रहने की जगह। कुछ घंटे बाद बातचीत की शुरुआत उसी ने की।, ‘क्या आप जापान जा रहे हैं?’ मैंने हाँ कहा। वह हल्का मुस्कुराई। फिर कुछ देर बाद बोली, ‘जाने वाले लोग टोकियो देख कर अक्सर बहुत चुप हो जाते हैं।’

मैं किसी आधुनिक देश में नहीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता में प्रवेश कर रहा हूँ, जिसने अपने शोर को नियंत्रित करना सीख लिया है। हानेदा एयरपोर्ट के भीतर प्रवेश करते ही मुझे यह एहसास हुआ कि जापान में ‘व्यवस्था’ केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि एक प्रकार की सांस्कृतिक चेतना है। इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर भी कोई भागता हुआ नहीं दिख रहा था। लोग तेज़ी से चल रहे थे, लेकिन उनके भीतर वह घबराई हुई जल्दी नहीं थी, जो दुनिया के अधिकतर बड़े शहरों में दिखाई देती है। सब कुछ जैसे पहले से तय लय में घट रहा था। इमिग्रेशन की कतारें लंबी थीं, मगर उनमें कोई बेचैनी नहीं थी। लोग अपने-अपने सूटकेस के साथ शांत खड़े थे-जैसे प्रतीक्षा भी यहाँ एक सामाजिक अनुशासन का हिस्सा हो। एयरपोर्ट से बाहर निकलते समय सुबह पूरी तरह खुल चुकी थी। आसमान हल्का सफेद था और हवा में समुद्र की नमी घुली हुई थी। भारत की सुबहों में एक जीवित अव्यवस्था होती है—दूर से आती हुई आवाज़ें, चाय की दुकानों की हलचल, तेज़ हॉर्न, पक्षियों का शोर, कहीं कोई रेडियो। टोकियो की सुबह इसके बिल्कुल विपरीत थी। इतनी विशाल नगरी की सुबह हो कर भी उसमें लगभग ध्वनिहीनता थी। 

यह पहली चीज़ थी जिसने मुझे भीतर तक विचलित किया। मेरा होटल टाबाता इलाके में था। वहाँ पहुँचने के लिए मुझे दो ट्रेनें बदलनी थीं। जापान आने से पहले मैंने टोकियो मेट्रो के बारे में बहुत पढ़ रखा था—दुनिया की सबसे जटिल और सबसे समयनिष्ठ शहरी रेल व्यवस्था। जब मैं स्टेशन के भीतर उतरा, तब समझ में आया कि नक्शे और वास्तविकता के बीच कितना अंतर होता है। हर तरफ संकेत-चिह्न थे, रंगों से अलग-अलग लाइनों को दिखाया गया था, इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड लगातार चमक रहे थे, लोग बिना रुके अपने-अपने रास्तों पर बह रहे थे, लेकिन इस पूरी जटिलता में भी कोई अफरातफरी नहीं थी। कोई किसी से टकरा नहीं रहा था। लोग चलते समय फोन पर ऊँची आवाज़ में बात नहीं कर रहे थे। यहाँ तक कि ट्रेन के आने की ध्वनि भी नियंत्रित और मृदु थी। मैं अपना बड़ा सूटकेस खींचते हुए भीड़ के बीच चल रहा था। मुझे बार-बार लग रहा था कि मैं इस शहर की गति से थोड़ा पीछे हूँ। वह  दिखाई देती है—ट्रेन के समय पर आने में, एस्केलेटर पर लोगों के एक तरफ खड़े होने में, प्लेटफॉर्म की सफाई में और उस शांति में जिसमें करोड़ों लोग रहते हैं। दो ट्रेनें बदलते हुए मैं टाबाता पहुँचा। यह इलाका टोकियो के उन हिस्सों में से था, जहाँ पर्यटकों की भीड़ अपेक्षाकृत कम होती है। 

स्टेशन से बाहर निकलते ही मुझे जापान का बसा हुआ चेहरा दिखाई दिया। संकरी लेकिन अत्यंत साफ़ सड़कें। छोटे-छोटे घर। साइकिलें और एक ऐसी चुप्पी जो भारतीय शहरों में लगभग असंभव है। सुबह हो चुकी थी, लोग काम पर जा रहे थे, लेकिन सड़क पर कोई शोर नहीं था। यहाँ तक कि कारें भी जैसे धीमे स्वर में चल रही थीं। होटल की इमारत बहुत साधारण थी। अगर उसके बाहर नाम न लिखा होता, तो मैं उसे पहचान भी नहीं पाता। मैं भीतर गया और कुछ क्षणों तक समझ ही नहीं पाया कि रिसेप्शन कहाँ है। सामने सिर्फ एक बड़ी मशीन लगी हुई थी। टच स्क्रीन। उसके नीचे कार्ड स्लॉट। बगल में एक छोटा स्कैनर। बस वही था। कोई रिसेप्शनिस्ट नहीं। कोई ‘वेलकम सर’ नहीं। कोई घंटी नहीं। कोई इंसानी चेहरा नहीं। मैं कुछ देर वहाँ खड़ा रहा। फिर समझ में आया कि पूरा चेक-इन उसी मशीन से होना है। पासपोर्ट स्कैन करो, बुकिंग नंबर डालो, मशीन से कार्ड निकल जाएगा और वही तुम्हारे कमरे की चाबी है। मैं कमरे में पहुँचा। मैं लगभग पूरी रात जागा हुआ था। शरीर अब भी भारतीय समय में अटका हुआ था। सिर भारी लग रहा था। बाहर की दुनिया नई थी, लेकिन भीतर थकान इतनी गहरी थी कि उत्साह भी उसके ऊपर टिक नहीं पा रहा था। 

मैंने बैग एक तरफ रखा, जूते उतारे और बिना कुछ सोचे बिस्तर पर लेट गया। नींद तुरंत आ गई। जब आँख खुली तो शाम हो चुकी थी और तभी मुझे महसूस हुआ कि शरीर में कुछ गड़बड़ है। सीने में तीखी जलन थी। पेट अजीब तरह से मरोड़ रहा था। पहले लंबी उड़ान और अनियमित खाने की वजह से होगा, लेकिन कुछ ही देर में डायरिया शुरू हो गया। रात तक हालत ऐसी हो गई कि कमरे से बाहर निकलना मुश्किल लगने लगा। अगले तीन दिन लगभग उसी छोटे कमरे में बीते। बाहर टोकियो था—दुनिया का सबसे जीवित, सबसे जटिल, सबसे आधुनिक शहरों में से एक और मैं कमरे के भीतर बंद था, अपने शरीर की असहायता के साथ। 



तीसरे दिन की शाम तक शरीर की हालत कुछ संभलने लगी थी। एसीडिटी अब भी थी, कमजोरी भी बनी हुई थी, लेकिन लगातार कमरे में बंद रहने के बाद भीतर एक अजीब घुटन पैदा होने लगी थी। आठवें माले पर स्थित उस छोटे-से कमरे में पिछले तीन दिनों से मेरी दुनिया लगभग सिमट गई थी—एक बिस्तर, एक छोटी मेज़, दीवार पर टंगा टेलीविज़न और खिड़की के बाहर दिखाई देता हुआ टोकियो का शांत इलाका। 

बीच-बीच में मैं परदे हटा कर नीचे सड़क देखता रहता। लोग आते-जाते रहते। साइकिलें। स्कूल यूनिफॉर्म में बच्चे। ऑफिस से लौटते आदमी, लेकिन उस पूरे दृश्य में एक दूरी थी। जैसे मैं किसी शहर को नहीं, काँच के पीछे चल रही एक दुनिया को देख रहा हूँ। शाम होते-होते भूख ने ठीक से सिर उठाया। कमरे में रखा पानी और एयरपोर्ट से लाया हुआ थोड़ा-बहुत सामान लगभग खत्म हो चुका था। नीचे जा कर कुछ खाने-पीने की चीज़ें लानी ही थीं। मैं लिफ्ट से नीचे उतरा। होटल के भीतर अब भी वही मशीननुमा शांति थी। लॉबी खाली थी। रिसेप्शन की जगह लगी स्क्रीन अब भी नीली रोशनी में चमक रही थी। मुझे याद आया कि पिछले तीन दिनों में मैंने इस होटल में किसी मनुष्य से ठीक से बात नहीं की थी। यह एक अजीब अनुभव था—इतने विशाल शहर में रह कर भी लगभग मानवीय संपर्क से बाहर होना। होटल से थोड़ा आगे बढ़ते ही सड़क के कोने पर सेवन इलेवन का छोटा-सा स्टोर दिखाई दिया। भीतर गया। दुकान लगभग खाली थी। फ्रिजों की लगातार गूँजती हुई मशीनकी हल्की-सी ध्वनि पूरे वातावरण में फैली हुई थी। डिब्बाबंद खाने की चीज़ें बेहद सलीके से सजी थीं-ऑनिगिरी, सैंडविच, जूस, इंस्टैंट नूडल्स। मैं अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहा था कि क्या खाया जा सकता है और क्या नहीं, क्योंकि पेट पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ था। 

दुकान लगभग खाली थी। फ्रिजों की लगातार गूँजती हुई हल्की मशीनों की ध्वनि पूरे वातावरण में फैली हुई थी। मैं खाने की चीज़ें देख ही रहा था कि पीछे से  हिंदी सुनाई दी, ‘भैया, इंडिया से हो क्या?’ मैंने मुड़ कर देखा। काउंटर के पीछे एक नेपाली लड़का खड़ा था। दुबला-पतला, गोल चेहरा, आँखों में पहाड़ी लोगों वाली सहज चमक। उसके साथ एक लड़की भी थी, उससे थोड़ी छोटी उम्र की। दोनों ने नेम टैग लगा रखा था। लड़के का नाम लामिछाने था और लड़की का गीता। उनकी हिंदी सुनते ही भीतर-जैसे कुछ ढीला पड़ा। परदेश थोड़ा कम परदेश लगने लगा। तीन दिनों से जापानी शब्दों, मशीनों और नियंत्रित शिष्टाचार के बीच रहने के बाद हिंदी का वह सहज स्वर किसी पुराने परिचित कमरे की तरह लगा। मैंने मुस्कुरा कर कहा कि हाँ, भारत से हूँ। फिर बातचीत शुरू हो गई। गीता ने बताया कि वह नेपाल के पोखरा के पास के किसी छोटे शहर से है। लामिछाने काठमांडू के बाहर के इलाके से। दोनों टोकियो में पढ़ाई करने आए थे। दिन में कॉलेज और शाम चार बजे से रात दस बजे तक इस स्टोर में काम। सप्ताह में छह दिन। कभी-कभी परीक्षा के समय शिफ्ट कम कर लेते हैं, लेकिन बाकी समय लगभग यही दिनचर्या रहती है। 

वे दोनों बहुत सहज ढंग से यह सब बता रहे थे। उनके चेहरों पर वह स्थायी थकान साफ़ दिखाई देती थी, जो दक्षिण एशिया से आए प्रवासी छात्रों और मजदूरों के चेहरों पर दुनिया के हर विकसित देश में दिखाई देती है। बेहतर जीवन की संभावना और लगातार श्रम का मिश्रण। लामिछाने ने हँसते हुए कहा, ‘यहाँ शुरू में सबको मुश्किल लगता है। खासकर खाना। बहुत लोग बीमार पड़ जाते हैं।’ मैंने कहा कि मैं भी पिछले तीन दिनों से कमरे में बंद हूँ। वह तुरंत गंभीर हो गया, फिर उसने कुछ पैकेट उठा कर सुझाए कि अभी क्या खाना ठीक रहेगा—हल्का सूप, चावल का दलिया-जैसा पैक्ड भोजन, इलेक्ट्रोलाइट वाला ड्रिंक। मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि कुछ ही मिनटों में बातचीत का स्वर कितना आत्मीय हो गया था। जापान में लगातार महसूस हो रही अजनबियत के बीच दक्षिण एशियाई दुनिया की वह परिचित गर्मी लौट आई थी, जहाँ लोग जल्दी बातचीत शुरू कर देते हैं, सलाह देने लगते हैं, आपकी तकलीफ़ को निजी तौर पर लेने लगते हैं। गीता बीच-बीच में मुस्कुरा कर बातें करती रही। उसने बताया कि शुरुआत में उसे जापान बहुत अकेला लगा था। ‘यहाँ कोई किसी की जिंदगी में दखल नहीं देता,’ उसने कहा, ‘पहले अच्छा लगता है, फिर कभी-कभी बहुत अकेला।’ उसका यह वाक्य मेरे भीतर देर तक गूँजता रहा। 

दुकान के बाहर रात  गहराने लगी थी। शीशे के पार टोकियो की सड़क शांत थी। लोग आते, कुछ खरीदते और बिना अतिरिक्त शब्दों के चले जाते। दुकान के भीतर हम तीन दक्षिण एशियाई लोग हिंदी में बातें कर रहे थे—नेपाल, भारत और जापान के बीच फैले हुए एक छोटे-से अस्थायी सांस्कृतिक द्वीप की तरह। मुझे  एहसास हुआ कि परदेस में भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं रहती; वह भावनात्मक आश्रय बन जाती है। अपनी भाषा सुनते ही आदमी का शरीर थोड़ा ढीला पड़ जाता है-जैसे भीतर लगातार खिंची हुई कोई अदृश्य नस  आराम पा गई हो। वापस होटल लौटते समय मेरे हाथ में छोटा-सा खाने का बैग था, लेकिन भीतर एक हल्की राहत भी थी। टोकियो अब भी उतना ही अजनबी था, उतना ही शांत, उतना ही मशीनों से संचालित। लगा कि इस विशाल शहर के भीतर कहीं-कहीं छोटे मानवीय कोने अब भी बचे हुए हैं, जहाँ भाषा, थकान और परदेस एक-दूसरे को पहचान लेते हैं। मुझे निदा फ़ाज़ली के वे शेर याद आए—

‘हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी

फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी


सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ

अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी।’

मैंने उन शेरों को भारत में न जाने कितनी बार पढ़ा था, लेकिन उस रात टोकियो की सड़क पर खड़े हो कर उनका अर्थ लगभग शारीरिक रूप से महसूस किया। एक शाम शिंजुकु स्टेशन के बाहर हजारों लोगों की भीड़ को सड़क पार करते देखा। वह संसार के सबसे व्यस्त सड़क पार करने वाले मार्गों में से एक था। चारों तरफ़ नीयॉन लाइटें। विशाल स्क्रीनें। विज्ञापन। फैशन स्टोर्स, लेकिन उस पूरी दृश्यात्मक चकाचौंध के भीतर भी एक गहरी भावनात्मक शांति थी। कोई सड़क किनारे बहस नहीं कर रहा था। कोई जोर से हँस नहीं रहा था। कोई  गाना नहीं गा रहा था। टोकियो की भीड़ अत्यंत जीवंत हो कर भी अजीब तरह से शांत रहती है और यही बात मुझे बार-बार विचलित करती रही। सभ्यताएँ अपने अपराधों को भी उसी सलीके से छिपा लेती हैं, जिस सलीके से वे अपनी सुंदरता को सजाती हैं। यह विचार  आया और उतनी ही चुपचाप भीतर कहीं बैठ गया। आसमान अब पूरी तरह काला हो चुका था। दूर कहीं से ट्रेन गुजरने की आवाज़ आई—बहुत हल्की, लगभग किसी स्मृति-जैसी। टोकियो में ट्रेनें केवल परिवहन का साधन नहीं लगतीं; वे शहर की धड़कन की तरह महसूस होती हैं। हर कुछ मिनट पर कोई न कोई ट्रेन इस विशाल महानगर के भीतर लोगों को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रही होती है।



लाखों लोग हर दिन इस नेटवर्क के भीतर चलते हैं, लगभग बिना किसी अव्यवस्था के। यह देख कर मेरे भीतर विस्मय पैदा हुआ था। भारत में हम इतने लंबे समय से अव्यवस्था के साथ जीते आए हैं कि सुव्यवस्था कभी-कभी अस्वाभाविक लगने लगती है। टोकियो की व्यवस्था केवल मशीनों की वजह से संभव नहीं है। उसके पीछे मनुष्यों का प्रशिक्षण है। जापान में बच्चा बचपन से सीखता है कि सार्वजनिक जगह साझा जगह है। आपकी आवाज़, आपका व्यवहार, आपका कचरा, आपकी देरी—सब दूसरों को प्रभावित करते हैं। इसी कारण यहाँ करोड़ों लोग साथ रहते हुए भी शहर थका हुआ नहीं लगता। वह लगातार चलता रहता है, बिना किसी शिकायत के। मैं चलते-चलते फिर उसी सेवन इलेवन के सामने आ कर रुक गया, जहाँ कुछ देर पहले गीता और लामिछाने से मुलाकात हुई थी। दुकान अब भी खुली थी। भीतर वही सफेद रोशनी, वही मशीनों की हल्की गूँज। आधुनिक शहरों में असली मानवीय गर्मी अक्सर प्रवासियों के हिस्से में बची रह जाती है। वे लोग जो अपने घरों से दूर होते हैं, वे भाषा, चेहरे और छोटी-छोटी आत्मीयताओं को ज्यादा गहराई से पकड़ते हैं। परदेस में दक्षिण एशियाई लोग बहुत जल्दी एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। 

भाषा वहाँ सिर्फ संप्रेषण नहीं रहती; वह घर का अस्थायी विकल्प बन जाती है। मैंने काँच के पार देखा। गीता किसी ग्राहक को बिल दे रही थी। लामिछाने पीछे शेल्फ़ में सामान जमा रहा था। दोनों के चेहरों पर थकान थी, लेकिन उस थकान में एक उद्देश्य भी था। पढ़ाई, नौकरी, परदेस, संघर्ष—आधुनिक एशिया की एक पूरी कहानी उन दोनों के भीतर चल रही थी और उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि टोकियो केवल जापानियों का शहर नहीं है। यह उन लाखों एशियाई लोगों का भी शहर है जो यहाँ काम करने, पढ़ने, पैसा कमाने, या सिर्फ बेहतर जीवन की तलाश में आए हैं। फिलीपींस, नेपाल, वियतनाम, चीन, कोरिया, भारत—पूरी एशिया की अदृश्य श्रमशक्ति इस चमकदार महानगर के भीतर कहीं चुपचाप काम करती रहती है। रात और गहरी हो रही थी। मैं वापस होटल की ओर लौटने लगा। सड़क लगभग खाली थी। दूर किसी अपार्टमेंट की खिड़की में नीली रोशनी जल रही थी। हवा में हल्की ठंडक थी। उसी चलते हुए क्षण में मुझे यह एहसास हुआ कि ‘पहली रात’ दरअसल किसी भी शहर की सबसे सच्ची रात होती है। उसके बाद  हम उस शहर के आदी होने लगते हैं। उसकी विचित्रताएँ सामान्य लगने लगती हैं। उसका मौन हमें चौंकाना बंद कर देता है। 

पहली रात हमेशा हमारी पुरानी दुनिया और नई दुनिया के बीच खड़ी रहती है। उस रात टोकियो मेरे सामने किसी शहर की तरह नहीं, बल्कि एक प्रश्न की तरह खुल रहा था। एक ऐसा प्रश्न, जिसका उत्तर पूरी यात्रा के बाद भी पूरी तरह नहीं मिलने वाला था। टाबाता स्टेशन के बाहर पहुँचते ही भीड़ घनी होने लगी। लोग लगातार भीतर जा रहे थे। सूट पहने पुरुष। साफ़-सुथरे कपड़ों में महिलाएँ। कॉलेज छात्र। बुज़ुर्ग। इस भीड़ में भी एक विचित्र एकांत था। कोई किसी को देख नहीं रहा था। सबके चेहरे शांत थे, लगभग भावहीन। भारतीय स्टेशनों में लोग एक-दूसरे की जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं—अनजाने में ही। कोई रास्ता पूछ लेता है, कोई घूरने लगता है, कोई बातचीत शुरू कर देता है। टोकियो में लोग आपको जगह देते हैं, लेकिन आपके भीतर प्रवेश नहीं करते। मैं प्लेटफॉर्म पर खड़ा हो कर लोगों को देखता रहा। ट्रेन ठीक समय पर आई। लोग कतार से चढ़े। भीतर इतनी भीड़ थी कि कई लोग एक-दूसरे से सटे हुए खड़े थे, लेकिन फिर भी पूरा डिब्बा लगभग शांत था। सिर्फ ट्रेन की आवाज़। बीच-बीच में किसी मोबाइल की धीमी-सी ध्वनि वातावरण में लहर-सी उठती। 

कुछ लोग आँखें बंद किए खड़े थे, कुछ किताबों में डूबे थे। कुछ मोबाइल स्क्रीन पर झुके हुए थे। उस पूरे दृश्य में सबसे विचलित करने वाली चीज़ यह थी कि इतने सारे लोग एक साथ मौजूद होकर भी जैसे भावनात्मक रूप से अनुपस्थित थे। मैंने सोचा, आधुनिक सभ्यता का अंतिम रूप यही है—मनुष्य एक-दूसरे के बहुत करीब रहेंगे, लेकिन उनके भीतर की दुनिया लगातार निजी होती जाएगी। ट्रेन की खिड़की से बाहर शहर तेजी से गुजर रहा था। छोटे मकान। बिजली के तार। कहीं मंदिर की छत। कहीं वेंडिंग मशीन। जापान की आधुनिकता का सबसे दिलचस्प पक्ष यही है कि वह अपने भीतर पुराने और नए को एक साथ रखता है। टोकियो पूरी तरह भविष्यवादी हो कर भी विचित्र रूप से पुराना है। जैसे उसकी तकनीक बहुत आगे निकल गई हो, लेकिन उसकी आत्मा अब भी कहीं पारंपरिक जापानी समय में अटकी हुई हो। स्टेशन से बाहर निकलते ही मैंने सड़क किनारे एक वेंडिंग मशीन से कॉफी खरीदी। मैं वापस होटल की ओर लौटने लगा। रास्ते में हवा में हल्की ठंडक थी। दूर से फिर एक ट्रेन गुज़री। सड़कें अब भी साफ़ थीं। लोग अब भी शांत थे और मुझे  एहसास होने लगा था कि जापान को समझना उसके दर्शनीय स्थलों को देखना नहीं, बल्कि उसकी रोज़मर्रा की चुप्पियों को पढ़ना है। 

टोकियो रात में भी पूरी तरह शांत नहीं होता, लेकिन उसका शोर भी जैसे अनुशासित होता है। यहाँ रात आपको जगा कर नहीं रखती; वह बस  आपके भीतर भरती रहती है। मैं बिस्तर पर लेटा छत को देखता रहा। किसी शहर ने मुझे एक ही समय में इतना आकर्षित और विचलित किया था। दुनिया में ऐसे शहर हैं जो आपको तुरंत अपना बना लेते हैं—दिल्ली, इस्तांबुल, बैंकॉक, मुंबई। वे आपसे बात करते हैं, आपको धक्का देते हैं, आपको अपने भीतर खींच लेते हैं। टोकियो अलग था। वह आपको प्रभावित तो करता है, लेकिन जल्दी खुलता नहीं। उसके भीतर प्रवेश करने के लिए आपको लगातार धैर्य रखना पड़ता है। जैसे वह पहले आपको देखता हो, परखता हो और फिर अपनी परतें खोलता हो। खिड़की से बाहर शहर अब भी जाग रहा था। सामने वाली इमारत की कुछ खिड़कियों में रोशनी जल रही थी। किसी कमरे में कोई आदमी अभी काम कर रहा था। कहीं कोई टीवी देख रहा होगा। कहीं कोई छात्र देर रात तक पढ़ रहा होगा। कहीं कोई अकेला आदमी सेवन इलेवन या लॉसन से खरीदा हुआ खाना खाकर सोने की तैयारी कर रहा होगा। 

साढ़े तीन करोड़ से अधिक लोगों का यह महानगर अपनी पूरी विराटता में भी अजीब तरह से व्यक्तिगत था। यहाँ सामूहिकता व्यवस्था में थी, जीवन में नहीं और यही चीज़ तार बेचैन कर रही थी। भारत में आदमी चाहे जितना अकेला हो, वह पूरी तरह अकेला नहीं छोड़ा जाता। कोई पड़ोसी, कोई रिश्तेदार, कोई मित्र, कोई चायवाला—जीवन लगातार आपके आसपास बना रहता है। कई बार यह दमघोंटू लगता है। हम भारतीयों के पास निजी स्पेस की संस्कृति बहुत सीमित है, लेकिन उसी के भीतर भावनात्मक सहारा भी छिपा रहता है। जापान में मैंने महसूस किया कि निजी स्वतंत्रता का अंतिम परिणाम कभी-कभी गहरी भावनात्मक दूरी भी हो सकता है। मुझे दिन में मिली गीता की बात याद आई, ‘पहले अच्छा लगता है, फिर कभी-कभी बहुत अकेला।’ उसने यह बात बहुत सहज ढंग से कही थी, लेकिन उसके भीतर पूरा आधुनिक जापान छिपा हुआ था। यहाँ का मौन केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि इस समाज में बने रहने का एक तरीका भी है। इतने विशाल, इतने घने और इतने अनुशासित समाज में मनुष्य अपने भीतर लौटे बिना जी ही नहीं सकता।



यहाँ सार्वजनिक जीवन अत्यंत नियंत्रित है। ट्रेन में धीरे बोलो। सड़क पर रास्ता मत रोको। फोन पर ऊँची आवाज़ में बात मत करो। दूसरों को असुविधा मत पहुँचाओ। समय पर पहुँचो। लाइन में खड़े रहो। अपने हिस्से की जगह से बाहर मत फैलो। पूरा समाज एक ऐसे सामूहिक अनुशासन में बदल जाता है, जहाँ हर व्यक्ति स्वयं को लगातार नियंत्रित करता रहता है और इसी कारण जापान एक साथ इतना सुंदर और इतना उदास लगता है। मुझे याद है, उस रात मैंने होटल की खिड़की खोल दी थी। बाहर हवा ठंडी थी। नीचे सड़क लगभग खाली पड़ी थी। दूर एक वेंडिंग मशीन अकेली चमक रही थी। उस मशीन की सफेद रोशनी फुटपाथ पर फैल रही थी और उसके आसपास कोई नहीं था। जापान की पूरी आधुनिकता इसी दृश्य में छिपी है—अत्यंत कार्यक्षम, अत्यंत शांत, और भीतर से थोड़ा अकेला। आधुनिक सभ्यता का सपना अंततः मनुष्य को सुविधा तो दे सकता है, लेकिन आत्मीयता नहीं। मशीनें आपकी जरूरतें पूरी कर सकती हैं, आपकी भावनाएँ नहीं। होटल का चेक-इन मशीन कर सकती है, लेकिन आपकी थकान को पहचान नहीं सकती। 

क्यूआर कोड आपको जानकारी दे सकता है, लेकिन बीमारी में आपकी आवाज़ नहीं सुन सकता। इसीलिए अत्यधिक विकसित समाजों में लोग फिर से योग, ध्यान, आध्यात्मिकता और मानसिक उपचार के विभिन्न तरीकों की ओर लौटने लगते हैं। जब जीवन से अव्यवस्था खत्म होने लगती है, तब आदमी अर्थ खोजने लगता है। मेरे दिमाग में विमान वाली जापानी महिला का चेहरा फिर उभरा। वह हर साल भारत क्यों आती होगी? ऋषिकेश में उसे क्या मिलता होगा, जो टोकियो में नहीं मिलता? वही चीज़ जिसकी कमी मुझे इन कुछ दिनों में महसूस होने लगी थी—मानवीय अव्यवस्था की गर्मी। बिना वजह बातचीत। किसी अजनबी का आपकी बीमारी पर सचमुच चिंता करना। सड़क पर  सुनाई देती हँसी। लोगों का आपके जीवन में थोड़ा-बहुत दखल। टोकियो में हर चीज़ व्यवस्थित थी, लेकिन जीवन कभी-कभी बहुत सँवारा हुआ-सा लगता था। जैसे समाज ने मनुष्य के व्यवहार के तीखे किनारों को घिस कर मुलायम बना दिया हो और फिर भी, इसी शहर में एक गहरा आकर्षण था, क्योंकि टोकियो आपको लगातार सोचने पर मजबूर करता है। 

वह अपने अनुशासन से आपको प्रभावित करता है, अपनी शांति से आपको अस्थिर करता है और अपनी दक्षता से आपको अपने ही समाज के बारे में नए सवाल पूछने पर मजबूर कर देता है। मैं देर तक जागता रहा। दूर कहीं से फिर ट्रेन गुज़री। घड़ी में रात के दो बजे थे। मुझे  महसूस हुआ कि ‘पहली रात टोकियो में’ दरअसल खत्म नहीं हुई है। वह आने वाले दिनों, हफ्तों और वर्षों तक मेरे भीतर चलती रहने वाली है। कुछ शहर यात्रा के बाद स्मृति बन जाते हैं और कुछ शहर आपकी सोच का हिस्सा बन जाते हैं। टोकियो दूसरे प्रकार का शहर था। तीसरे या चौथे दिन की शाम रही होगी, जब मैं टोकियो के उस चेहरे तक पहुँचा, जिसे दुनिया पोस्टरों, फिल्मों और इंटरनेट की चमकदार तस्वीरों में पहचानती है। अब तक मेरा जापान टाबाता की शांत गलियों, होटल के छोटे कमरे, मेट्रो की नियंत्रित भीड़ और सेवन इलेवन की सफेद रोशनियों तक सीमित था। उस शाम मैंने यामानोते लाइन पकड़ी और शिंजुकु की तरफ़ निकल गया। ट्रेन जैसे-जैसे शहर के भीतर बढ़ती गई, बाहर का दृश्य  बदलने लगा। छोटी इमारतों की जगह ऊँचे ढाँचे आने लगे। विज्ञापन बढ़ने लगे। रोशनियाँ घनी होने लगीं। स्टेशन बड़े होते गए और फिर बिना किसी नाटकीय घोषणा के, टोकियो अपने पूर्ण आकार में सामने खुल गया। 

शिंजुकु स्टेशन पर उतरते ही मुझे सबसे पहले जो चीज़ महसूस हुई, वह थी—मानव प्रवाह। भीड़ मैंने पहले भी देखी थी। दिल्ली मेट्रो की भीड़, मुंबई लोकल की भीड़, प्रयागराज कुंभ की भीड़, लेकिन यह कुछ अलग था। यहाँ की भीड़ अराजक नहीं, लगभग गणितीय थी। हजारों लोग एक साथ चल रहे थे, मानो किसी अदृश्य सूत्र द्वारा संचालित हों। कोई किसी से टकरा नहीं रहा था। हर आदमी जैसे पहले से जानता हो कि उसे किस दिशा में मुड़ना है, किस एस्केलेटर पर जाना है, कहाँ रुकना है, कहाँ नहीं रुकना। मैं कुछ क्षण वहीं खड़ा रह गया। दुनिया का सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन। हर दिन लगभग पैंतीस लाख लोग, लेकिन फिर भी कोई शोर नहीं। भारत में इतनी भीड़ का अर्थ है—घोषणाएँ, धक्के, आवाज़ें, जल्दी, पसीना, बहसें। यहाँ सिर्फ कदमों की लगातार बहती हुई आवाज़ थी। इलेक्ट्रॉनिक बीप। दूर से आती ट्रेन और हजारों मनुष्यों की नियंत्रित गति। मैं स्टेशन से बाहर निकला और कि आधुनिक सभ्यता इसी दृश्य की तरफ़ बढ़ रही थी। चारों तरफ़ नीयॉन रोशनियाँ थीं। विशाल डिजिटल स्क्रीनें लगातार विज्ञापन बदल रही थीं। किसी स्क्रीन पर कॉस्मेटिक ब्रांड था, दूसरी पर एनीमे का पात्र, तीसरी पर कोई पॉप स्टार। गगनचुंबी इमारतों के बीच से गुजरती रोशनी आँखों पर नहीं, सीधे तंत्रिका तंत्र पर असर करती थी। 

ऐसा लग रहा था-जैसे शहर आपको लगातार उत्तेजित रखना चाहता हो, लेकिन इस पूरी दृश्यात्मक आक्रामकता के भीतर भी एक विचित्र शांति थी। यही चीज़ टोकियो को दुनिया के बाकी महानगरों से अलग बनाती है। न्यूयॉर्क अपनी ऊर्जा से आपको धक्का देता है। मुंबई अपनी बेचैनी से। बैंकॉक अपनी कामुकता से। टोकियो आपको बिना शोर किए अपने भीतर सोख लेता है। उसकी अति-आधुनिकता भी अजीब तरह से मौन है। मैं बहुत देर तक शिंजुकु की सड़कों पर घूमता रहा। कहीं से खाने की खुशबू आ रही थी। कहीं युवा लड़कियाँ हँसती हुई गुजर रही थीं। कहीं ऑफिस से लौटते लोग छोटे बारों में बैठे बीयर पी रहे थे। कहीं कोई अकेला आदमी रात के किसी छोटे स्टोर के बाहर खड़ा अपने फोन की स्क्रीन देख रहा था। पूरा शहर जीवित था, लेकिन उसका जीवन किसी नियंत्रित तापमान पर चल रहा था और उसी चलते हुए क्षण में  कि जापान दुनिया को इतना आकर्षित क्यों करता है। क्योंकि यह सिर्फ भविष्य नहीं दिखाता। यह भविष्य की कीमत भी दिखाता है। रात काफी हो चुकी थी जब मैं शिंजुकु स्टेशन के भीतर वापस लौटा। भीड़ अब भी थी, लेकिन उसका स्वर बदल चुका था। दिन की तुलना में लोगों की चाल धीमी हो गई थी। ऑफिस से लौटते हुए पुरुष, हाथों में बैग लिए महिलाएँ, कुछ लड़खड़ाते हुए वेतनभोगी लोग, कुछ युवा जोड़े, कुछ अकेले चेहरे। 

स्टेशन अब भी उतना ही व्यवस्थित था, उतना ही विशाल, लेकिन रात के भीतर उसकी चमक में हल्की-सी थकान उतर आई थी। मैं प्लेटफॉर्म पर खड़ा ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगा। दूर सुरंग के भीतर से आती हुई रोशनी  बड़ी होने लगी। ट्रेन समय पर आई। दरवाज़े खुले। लोग भीतर गए। सब कुछ इतना नियमित था कि लगता था-जैसे शहर नहीं, कोई विशाल घड़ी काम कर रही हो। मैं खिड़की के पास जा कर बैठ गया। टाबाता स्टेशन आ गया। मैं बाहर निकला। रात और गहरी हो चुकी थी। सड़कें लगभग खाली थीं। दूर किसी वेंडिंग मशीन की सफेद रोशनी चमक रही थी। हवा में हल्की नमी थी। चलते हुए कि टोकियो का असली चेहरा दिन में नहीं, रात में खुलता है। दिन में यह शहर अपनी कार्यक्षमता दिखाता है; रात में अपना अकेलापन। मैं  होटल की ओर लौटने लगा। सड़क पर चलते हुए मुझे स्पष्ट रूप से यह एहसास हुआ कि जापान ने मुझे सबसे अधिक अपने मौन से प्रभावित किया है। यह मौन निष्क्रिय नहीं था। इसके भीतर इतिहास था, अनुशासन था, सामाजिक प्रशिक्षण था, युद्धों की स्मृति थी, तकनीक थी, थकान थी। यह एक ऐसी सभ्यता का मौन था, जिसने बहुत कुछ खोकर खुद को दोबारा बनाया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का जापान राख से उठ कर दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बदल गया, लेकिन विकास कभी मुफ्त नहीं आता। हर आधुनिक समाज अपने भीतर कुछ छिपाता है। अमेरिका अपनी हिंसा छिपाता है। 

यूरोप अपना औपनिवेशिक इतिहास और जापान अपना अकेलापन। खिड़की के बाहर हवा थोड़ी तेज़ हो गई थी। नीचे सड़क पर एक अकेला आदमी छतरी लिए गुज़रा। दूर किसी अपार्टमेंट की खिड़की बुझ गई। शहर  रात की और गहरी परतों में उतर रहा था। उसी क्षण मुझे  एहसास हुआ कि ‘जहाँ लोग धीरे बोलते हैं’ केवल जापान के बारे में अध्याय नहीं है। यह उस प्रश्न के बारे में भी है, जो आधुनिक सभ्यता के भीतर लगातार गहरा रहा है—क्या बेहतर व्यवस्थाएँ मनुष्य को थोड़ा कम आत्मीय बना देती हैं? मैं इस प्रश्न का कोई अंतिम उत्तर नहीं खोज पाया। कोई अंतिम उत्तर है भी नहीं। जापान को पूरी तरह न प्रेम किया जा सकता है, न पूरी तरह अस्वीकार। यह देश आपको लगातार दो विपरीत भावनाओं के बीच रखता है—आकर्षण और उदासी के बीच। आप उसकी सफाई, उसकी विनम्रता, उसकी विश्वसनीयता से चमत्कृत होते हैं; फिर  किसी रात उसकी चुप्पी आपको भीतर तक उदास कर देती है, लेकिन यही किसी बड़ी सभ्यता की पहचान है। वह आपको आसान निष्कर्ष नहीं देती। वह आपको सोचते रहने पर मजबूर करती है। मैं बहुत देर तक खिड़की के पास बैठा रहा। दूर कहीं फिर रेल की एक हल्की आवाज़ उभरी। टोकियो अब भी जाग रहा था। धीरे। बहुत धीरे। ठीक अपने लोगों की आवाज़ों की तरह।


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