भरत प्रसाद का आलेख 'जिनकी आत्मा में अंचलगंधी धरती की रूह झड़ती है'।
प्रेमचंद के पश्चात रेणु ऐसे कथाकार हैं जो हिन्दी जन मानस में रचे बसे हुए हैं। आँचलिक मुद्दों , समस्याओं , बातों-विचारों को ले कर रेणु ने अपना जो कथा शिल्प गढ़ा वह प्रतिमान बन गया। रेणु के जन्मशताब्दी वर्ष पर पहली बार के विशेष आयोजन में अब तक आप विनोद तिवारी , रणेन्द्र , पंकज मित्र , जीवन सिंह , कुमार वीरेंद्र को पढ़ चुके हैं। इसी क्रम में आज प्रस्तुत है भरत प्रसाद का आलेख ' जिनकी आत्मा में अंचलगंधी धरती की रूह झड़ती है ' । जिनकी आत्मा में अंचलगंधी धरती की रुह झरती है। भरत प्रसाद स्वाधीनोत्तर भारतवर्ष की करवट बदलती ग्रामीण दुनिया के शिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु। प्रेमचंद के पीछे खड़े गंवई चित्त , चरित्र , चालचलन और चालाकियों के अव्वल चिकित्सक रेणु , जिन्हें गांव की हवाओं में बसती , बहती और तरंगित होती अबूझ गमक की विलक्षण पकड़ थी। वे रेणु , जो कलम से नहीं , आंखों से लिखते थे , शब्दों का नहीं , ध्वनियों का ...