संदेश

वसुधा डालमिया लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वसुधा डालमिया का आलेख ‘औपनिवेशिक भारत में परम्परा का संघटन : हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान; अनुवाद -संजीव कुमार

चित्र
वसुधा डालमिया आज अलग अर्थों में ‘राष्ट्रवाद’ और ‘हिन्दू’ शब्द बड़ी चर्चा में है । इस पहचान को एक कट्टरवादी तबका इन दिनों अपनी संकीर्णता में व्याख्यायित करने की कोशिशें कर रहा है। यह जाने बगैर कि राष्ट्रवाद की अवधारणा बिलकुल आधुनिक यूरोपीय अवधारणा है। और हिन्दू शब्द भी उन अर्थों में प्रयुक्त तो नहीं ही किया गया है जिन अर्थों में आज उसे समेटने की कोशिशें की जा रही हैं। प्रख्यात लेखिका वसुधा डालमिया ने अपनी किताब के एक अध्याय में भारतेंदु के बलिया व्याख्यान के सन्दर्भ में ‘हिन्दू’ शब्द और उससे सम्बंधित सन्दर्भों को अलग तरह से समझने की कोशिश किया है। यह अनुवाद ‘हिन्दू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण : भारतेंदु हरिश्चंद्र और उन्नीसवीं सदी का भारत’ नाम से राजकमल प्रकाशन से शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। युवा आलोचकों में संजीव कुमार अपने सुचिंतित विचार और प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं । संजीव ने आलोचना के साथ-साथ अनुवाद में भी बेहतर काम किया है। इधर संजीव ने वसुधा डालमिया की उपर्युक्त किताब का अनुवाद किया है। ‘पाखी’ के अप्रैल २०१६ अंक में इस आलेख का एक हिस्सा प्रकाशित किया गया है। ...