परिचय दास का श्रद्धांजलि आलेख 'फिल्म गायिका : सुमन कल्याणपुर'


सुमन कल्याणपुर 

संगीत अपने आप में एक साधना है। रियाज इसका मुख्य हिस्सा होता है। जो इसे साध लेता है वह संगीत की ऊँचाइयों तक पहुँच जाता है। यह ऊँचाई बिरले ही प्राप्त कर पाते हैं। सुमन कल्याणपुर ऐसे ही गायिकाओं में शुमार की जाती हैं जिनका स्वर अनायास ही श्रोताओं को अपनी तरफ आकृष्ट कर लेता था। उनके समय में तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी जो आवाज को बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सके। परिचय दास लिखते हैं 'तब गायकी संवेदना का अपना अनुशासन हुआ करता था। उन्होंने इस अनुशासन को पूरी ईमानदारी से निभाया। शायद इसीलिए उनके गीतों में एक आंतरिक संतुलन दिखाई देता है—जो आज के असंतुलित, जल्दबाज़ संगीत में कम ही मिलता है।' 31 मई 2026 को सुमन कल्याणपुर का मुम्बई में निधन हो गया। उन्हें सादर नमन। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं परिचय दास का महत्त्वपूर्ण आलेख 'फिल्म गायिका : सुमन कल्याणपुर'।


श्रद्धांजलि 

'फिल्म गायिका : सुमन कल्याणपुर'


परिचय दास 


1

विरलता की उजली गूँज : सुमन कल्याणपुर


सुमन कल्याणपुर का स्मरण किसी गीत को याद करने जैसा नहीं है; वह किसी बहुत पुरानी, बहुत आत्मीय अनुभूति के लौट आने जैसा है। जैसे समय के किसी कोने में रखा हुआ एक दीपक, जिसे हमने बुझा हुआ मान लिया था, अचानक फिर से जल उठे—धीरे, बिना किसी घोषणा के, बिना किसी चकाचौंध के।


उनकी आवाज़ में एक अजीब तरह की विनम्रता थी—वह अपने होने का दावा नहीं करती थी, वह बस उपस्थित रहती थी। आज जब संगीत अक्सर अपने अस्तित्व को साबित करने में लगा रहता है, तब उनकी आवाज़ का यह स्वभाव और भी दुर्लभ लगता है। वह किसी मंच की नहीं, किसी भीतर के एकांत की गायिका थीं।


उनका स्वर सुनते हुए कभी ऐसा नहीं लगता कि कोई हमें प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। बल्कि यह एहसास होता है कि कोई हमारे भीतर पहले से मौजूद किसी भावना को धीरे-धीरे छू रहा है। जैसे कोई पुराना पत्र, जिसे हम भूल चुके थे, अचानक हाथ लग जाए और हम बिना पढ़े ही उसके अर्थ को महसूस करने लगें।


उनकी गायकी में एक प्रकार की धैर्यपूर्ण गति थी। वह जल्दी में नहीं थीं। हर शब्द, हर स्वर अपने समय पर आता था—न उससे पहले, न बाद में। यह समय-बोध ही उनके संगीत को एक विशिष्ट गरिमा देता है। वह गाती नहीं थीं, वह ठहर कर बोलती थीं—और इस ठहराव में ही उनकी असली शक्ति थी।


सुमन कल्याणपुर का स्वर अक्सर लता मंगेशकर की आवाज़ से मिलता-जुलता माना गया और यह समानता केवल सतही नहीं थी बल्कि उसकी जड़ें उनकी गायकी की बुनियादी संरचना में थीं। दोनों के स्वरों में अद्भुत कोमलता, स्वच्छता और सुर की पारदर्शिता थी जो श्रोता के मन में बिना किसी बाधा के प्रवेश कर जाती थी।


सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में वही महीन कंपन, वही संतुलित ऊँचाई और वही नियंत्रित विस्तार था जो लता जी के गायन की पहचान रहा। कई बार तो सामान्य श्रोता दोनों के बीच अंतर कर पाना कठिन समझते थे। यह समानता उनके लिए एक ओर प्रशंसा का कारण बनी तो दूसरी ओर एक छाया भी, जिसमें उनकी अपनी विशिष्टता दबती चली गई।


लेकिन गहराई से सुनने पर यह स्पष्ट होता है कि यह केवल समानता का मामला नहीं है। जहाँ लता मंगेशकर का स्वर व्यापकता, तेजस्विता और एक दिव्य उज्ज्वलता लिए होता है, वहीं सुमन कल्याणपुर का स्वर अधिक अंतरंग, मृदुल और संयमित भावभूमि में स्थित है। उनकी आवाज़ में एक प्रकार की निजी निकटता है—जैसे कोई धीमे स्वर में केवल आपके लिए गा रहा हो।


इस प्रकार, लता जी से तुलना ने उन्हें पहचाना भी और सीमित भी किया पर उनके स्वर की अपनी एक अलग पहचान रही—शांत, सौम्य और भीतर तक उतरने वाली। वह अनन्य थी जिसकी अब भी समालोचना बाक़ी है। इनकी समालोचना होते ही बहुतों के ताज पर पुनर्विचार होगा। 


उनके गीतों में कोई नाटकीय उभार नहीं मिलता। वहाँ कोई ऐसा क्षण नहीं आता जहाँ आवाज़ अचानक ऊँची हो जाए और श्रोता चौंक जाए। इसके विपरीत, उनका गायन धीरे-धीरे श्रोता को अपने भीतर खींचता है। यह आकर्षण तत्काल नहीं, बल्कि स्थायी होता है। एक बार जो भीतर उतर गया, वह लंबे समय तक बना रहता है।


उनकी आवाज़ का एक और अद्भुत पक्ष था—उसकी पारदर्शिता। उसमें कोई आवरण नहीं था, कोई अतिरिक्त सजावट नहीं। जैसे साफ पानी में नीचे तक सब कुछ दिखता है, वैसे ही उनके स्वर में भाव साफ दिखाई देते हैं। इस पारदर्शिता में एक प्रकार की नैतिक सच्चाई भी छिपी थी—वह कुछ छिपाती नहीं थीं, कुछ बढ़ा कर भी नहीं कहती थीं।


वे उस पीढ़ी की गायिका थीं, जहाँ संगीत साधना था, प्रदर्शन नहीं। वहाँ आवाज़ का अर्थ सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि संवेदना का अनुशासन भी था। उन्होंने इस अनुशासन को पूरी ईमानदारी से निभाया। शायद इसीलिए उनके गीतों में एक आंतरिक संतुलन दिखाई देता है—जो आज के असंतुलित, जल्दबाज़ संगीत में कम ही मिलता है।


उनकी उपस्थिति हमेशा थोड़ी कम आंकी गई, थोड़ा कम कही गई। पर यह ‘कम’ ही उनकी पहचान बन गया। उन्होंने जितना कहा, उससे अधिक नहीं कहा; और यही संयम उन्हें विशिष्ट बनाता है। वे उस तरह की कलाकार थीं, जिन्हें समझने के लिए शोर नहीं, बल्कि एकाग्रता चाहिए।


उनका स्मरण करते हुए यह भी महसूस होता है कि संगीत में ‘धीमेपन’ का कितना महत्व है। तेज़ी से बदलते समय में हम अक्सर धीमे स्वरों को भूल जाते हैं। पर वही धीमे स्वर सबसे लंबे समय तक टिकते हैं। वे समय के साथ घुल जाते हैं, पर समाप्त नहीं होते।


उनकी आवाज़ अब प्रत्यक्ष नहीं है, यह सच है। पर यह भी उतना ही सच है कि वह अनुपस्थित नहीं है। वह हमारे भीतर के उन कोनों में बसी है, जहाँ हम कम ही जाते हैं—पर जब जाते हैं, तो वहीं सबसे अधिक अपने होते हैं।


सुमन कल्याणपुर का जाना एक घटना है; पर उनका स्वर—वह अब भी एक निरंतरता है।


और शायद यही किसी भी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है— कि उसके जाने के बाद भी उसका होना समाप्त न हो।


सुमन कल्याणपुर के स्वर में एक ऐसी सांध्य-छाया थी, जो दिन और रात के बीच की उस नाज़ुक रेखा को छूती है जहाँ प्रकाश भी है और अंधकार भी, पर दोनों में कोई टकराव नहीं। यही कारण है कि उनके गीतों में एक गहरी शांति का भाव मिलता है—वह शांति जो किसी निष्कर्ष से नहीं, बल्कि स्वीकार से जन्म लेती है।


वे गाती नहीं थीं, जैसे कोई जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को धुन में बदल रहा हो। उनके स्वर में कोई आग्रह नहीं था—न सुने जाने का, न सराहे जाने का। यह अनाग्रह ही उन्हें विशिष्ट बनाता है, क्योंकि कला का सबसे ऊँचा रूप वही होता है जो स्वयं को सिद्ध करने की चेष्टा से मुक्त हो।


उनके गीतों में जो अंतरंगता है, वह केवल आवाज़ की विशेषता नहीं, बल्कि एक दृष्टि का परिणाम है। वे भावों को बाहर नहीं फेंकतीं, उन्हें भीतर ही भीतर घुलने देती हैं। इसीलिए उनके गाए हुए शब्द श्रोता के मन में जा कर अपना घर बना लेते हैं। वे क्षणिक प्रभाव नहीं छोड़ते, बल्कि धीरे-धीरे स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं।


आज के समय में, जहाँ हर चीज़ तत्काल और तीव्र प्रभाव पैदा करने की होड़ में है, उनका गायन एक अलग ही मूल्य प्रस्तुत करता है। वह हमें याद दिलाता है कि प्रभाव का संबंध तीव्रता से नहीं, गहराई से होता है। और गहराई हमेशा धीमी होती है, संयमित होती है, और लंबे समय तक टिकती है।


उनकी गायकी में एक और सूक्ष्म गुण था—‘अपूर्णता का सौंदर्य’। वे हर भाव को पूर्णता तक नहीं ले जातीं; कुछ अधूरा छोड़ देती हैं। यह अधूरापन ही श्रोता को सक्रिय करता है, उसे गीत के भीतर भागीदार बनाता है। जैसे कोई चित्र, जिसमें कुछ रेखाएँ जानबूझ कर अधूरी छोड़ी गई हों, ताकि देखने वाला उन्हें अपने अनुभव से पूरा करे।


उनका स्वर किसी बड़े उद्घोष का नहीं, बल्कि एक निजी संवाद का माध्यम था। वह भीड़ को संबोधित नहीं करता; वह व्यक्ति को संबोधित करता है। इसलिए उनके गीत सुनते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि यह आवाज़ सिर्फ हमारे लिए है, किसी और के लिए नहीं।


यह भी एक प्रकार की विरलता है—जहाँ कलाकार और श्रोता के बीच कोई दूरी नहीं बचती। और यही वह क्षण है जहाँ संगीत, कला से आगे बढ़ कर अनुभव बन जाता है।


अब जब हम उनकी अनुपस्थिति को स्वीकारने की कोशिश करते हैं, तो यह समझ में आता है कि उन्होंने अपने स्वर में सिर्फ ध्वनि नहीं, समय भी सहेजा था। उनके गीतों में एक पूरा युग साँस लेता है—पर वह युग किसी इतिहास की तरह नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभूति की तरह उपस्थित होता है।


उनकी स्मृति में यह कहना पर्याप्त नहीं कि वे एक महान गायिका थीं। वे उस तरह की आवाज़ थीं, जो जीवन के शोर में भी अपनी शांति बनाए रखती है।


और शायद इसीलिए, उनके जाने के बाद भी—जब भी हम किसी गहरे, शांत, और आत्मीय क्षण में होते हैं, वहीं कहीं, बहुत धीरे से, उनका स्वर फिर से सुनाई देने लगता है।





2

जो सुना नहीं गया, वही सबसे गहरा था


सुमन कल्याणपुर की गायकी को समझना केवल एक स्वर की पहचान करना नहीं है; यह उस सांस्कृतिक और सौंदर्यबोध की परतों को पढ़ना है, जो हिंदी फिल्म संगीत के भीतर धीरे-धीरे निर्मित हुईं और जिनमें उनका योगदान अक्सर सूक्ष्म होकर भी निर्णायक रहा। वे उन कलाकारों में हैं जिनकी उपस्थिति शोर से नहीं, बल्कि अंतरालों से पहचानी जाती है—जहाँ वे गाती कम हैं, और सुनने की एक नई संवेदना का निर्माण अधिक करती हैं।


उनकी सबसे पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है—अनुपस्थित रहते हुए भी उपस्थित रहना। यह सुनने में विरोधाभास लगता है पर उनकी गायकी का यही केंद्रीय बिंदु है। वे अपने स्वर को इस तरह बरतती हैं कि वह गीत के भीतर घुल जाता है, अलग से उभरकर अपनी सत्ता स्थापित नहीं करता। आज के संदर्भ में, जहाँ गायक अपनी पहचान को स्वर के ऊपर रखता है, सुमन कल्याणपुर का यह दृष्टिकोण लगभग एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप की तरह है—वे हमें याद दिलाती हैं कि संगीत का केंद्र ‘मैं’ नहीं, ‘अनुभव’ है।


उनकी आवाज़ की बनावट में एक असाधारण संतुलन था—न तो अत्यधिक नाजुक कि वह टूटने लगे, न इतनी सघन कि वह बोझिल हो जाए। यह संतुलन उन्हें एक ऐसी श्रेणी में रखता है जहाँ वे विभिन्न प्रकार के गीतों में सहज रूप से प्रवेश कर सकती थीं। पर उनका असली कौशल यह नहीं था कि वे हर गीत गा सकती थीं; बल्कि यह था कि वे हर गीत को अपनी विशिष्ट आंतरिक लय दे सकती थीं।


सुमन कल्याणपुर का गायन उस परंपरा से जुड़ता है, जहाँ संयम ही अभिव्यक्ति का माध्यम है। वे भावों को बढ़ाकर प्रस्तुत नहीं करतीं; वे उन्हें सीमित रखकर अधिक प्रभावी बनाती हैं। यह ‘कम में अधिक’ का सौंदर्यशास्त्र है—जो भारतीय काव्य परंपरा में भी गहराई से उपस्थित है। उनके स्वर में जो मृदुलता है, वह केवल ध्वनि की विशेषता नहीं, बल्कि एक विचारधारा का परिणाम है—एक ऐसी दृष्टि, जो मानती है कि गहराई शोर से नहीं, सूक्ष्मता से आती है।


यहाँ उनका हस्तक्षेप सबसे स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। फिल्म संगीत, विशेषकर 50 और 60 के दशक का, एक ओर भव्यता और विस्तार की ओर बढ़ रहा था—ऑर्केस्ट्रा बड़ा हो रहा था, ध्वनि अधिक परतदार हो रही थी, और गायन में भी एक प्रकार की नाटकीयता बढ़ रही थी। इस परिदृश्य में सुमन कल्याणपुर का स्वर एक संतुलनकारी तत्व की तरह उभरता है। वे इस भव्यता के भीतर एक आंतरिक शांति स्थापित करती हैं। उनका गायन यह संकेत देता है कि विस्तार के भीतर भी सूक्ष्मता संभव है।


उनकी उच्चारण-शुद्धता और शब्दों के प्रति उनका सम्मान भी एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। वे शब्दों को केवल ध्वनि के रूप में नहीं लेतीं; वे उनके अर्थ, उनकी भाव-गंध को भी साथ लेकर चलती हैं। इसीलिए उनके गीतों में भाषा केवल माध्यम नहीं रहती, वह अनुभव का हिस्सा बन जाती है। हिंदी, मराठी या अन्य भाषाओं में उनका गायन इस बात का प्रमाण है कि वे भाषा की आत्मा को पकड़ती हैं, न कि केवल उसके स्वरूप को।


उनकी गायकी में शास्त्रीयता का एक शांत, विनम्र प्रवाह भी है। वे शास्त्रीयता का प्रदर्शन नहीं करतीं, पर उसकी उपस्थिति को कभी छोड़ती भी नहीं। यह संतुलन साधना आसान नहीं है। कई गायक शास्त्रीयता को दिखाने के प्रयास में गीत को बोझिल बना देते हैं, और कई पूरी तरह उसे छोड़ कर सतही हो जाते हैं। सुमन कल्याणपुर इस द्वंद्व से बाहर निकलती हैं। उनके यहाँ शास्त्रीयता एक आधार है, सजावट नहीं।


तुलनाओं के संदर्भ में अक्सर उनका नाम लता मंगेशकर के साथ लिया गया। यह तुलना एक हद तक स्वाभाविक भी थी, क्योंकि दोनों के स्वरों में कोमलता और पारदर्शिता का एक साझा गुण था। पर यह तुलना जितनी उन्हें पहचान दिलाती है, उतनी ही उनके स्वर की स्वतंत्रता को सीमित भी करती है। सुमन कल्याणपुर का असली महत्त्व इस बात में नहीं है कि वे किसी के समान थीं बल्कि इस बात में है कि उन्होंने समानता के भीतर भी अपनी अलग पहचान बनाए रखी।


उनकी आवाज़ में जो अंतरंगता है, वह उन्हें अन्य गायिकाओं से अलग करती है। उनका स्वर दूर से आता हुआ नहीं लगता; वह पास बैठा हुआ महसूस होता है। यह ‘निकटता’ केवल ध्वनि का गुण नहीं, बल्कि एक भावात्मक संरचना है। वे श्रोता के साथ एक निजी संबंध स्थापित करती हैं, और यह संबंध किसी बड़े नाटकीय प्रभाव से नहीं बल्कि छोटे-छोटे सूक्ष्म स्पर्शों से बनता है।


उनकी गायकी में ‘रिक्त स्थान’ का प्रयोग भी उल्लेखनीय है। वे हर क्षण को भर देने की कोशिश नहीं करतीं। जहाँ चुप्पी की आवश्यकता होती है, वहाँ वे चुप रहती हैं। यह चुप्पी ही गीत को सांस लेने की जगह देती है। आधुनिक संगीत में जहाँ हर क्षण को भर देने की प्रवृत्ति है, वहाँ उनका यह दृष्टिकोण एक महत्त्वपूर्ण सौंदर्यबोध प्रस्तुत करता है।


सुमन कल्याणपुर का योगदान केवल उनके गाए हुए गीतों में नहीं है; वह उस सुनने की संस्कृति में भी है, जिसे उन्होंने आकार दिया। उन्होंने श्रोता को धैर्य सिखाया—धीरे सुनना, ध्यान से सुनना, और भावों को भीतर उतरने देना। यह एक प्रकार का सांस्कृतिक हस्तक्षेप है, क्योंकि यह हमारे सुनने के तरीके को बदलता है।


उनकी उपस्थिति हमें यह भी सिखाती है कि कला में विनम्रता कितनी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कभी अपने स्वर को केंद्र में रखकर गीत को पीछे नहीं किया। वे गीत के भीतर रहती हैं, उसके साथ चलती हैं। यह दृष्टिकोण आज के समय में, जहाँ कलाकार अक्सर अपनी पहचान को प्राथमिकता देते हैं, एक महत्त्वपूर्ण संतुलन प्रस्तुत करता है।


उनका जीवन और उनका संगीत यह भी दर्शाता है कि हर महानता को बड़े शोर की आवश्यकता नहीं होती। कुछ महानताएँ ऐसी होती हैं, जो धीरे-धीरे, चुपचाप अपना स्थान बनाती हैं। सुमन कल्याणपुर उसी परंपरा की प्रतिनिधि हैं।


अब जब हम उनके।गायन को पीछे मुड़ कर देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि उनका महत्व केवल उनके समय तक सीमित नहीं है। वे आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि उन्होंने जो सौंदर्यबोध स्थापित किया, वह समय से परे है।


उनका हस्तक्षेप हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या संगीत केवल प्रभाव पैदा करने का माध्यम है या वह एक गहरी, स्थायी अनुभूति का निर्माण भी कर सकता है। सुमन कल्याणपुर का उत्तर स्पष्ट है—संगीत का असली उद्देश्य भीतर की उस जगह को छूना है, जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं और केवल अनुभव रह जाता है।


उनकी स्मृति में यह कहना पर्याप्त नहीं कि वे एक उत्कृष्ट गायिका थीं। वे उस परंपरा की वाहक थीं, जिसमें संगीत एक साधना है, एक आंतरिक अनुशासन है और सबसे बढ़कर, एक संवेदनात्मक संवाद है।


वे चली गई हैं—यह समय का नियम है। पर उनका स्वर, उनका सौंदर्यबोध, और उनका वह शांत हस्तक्षेप— वह अब भी हमारे भीतर काम कर रहा है, धीरे, बिना किसी शोर के।




जब दो आवाज़ें अलग दिशाओं में खिलती हैं 


तुलना मनुष्य की वह आदत है जो दो अलग-अलग नदियों को भी एक ही घाट पर खड़ा कर देती है और फिर पूछती है—कौन गहरी है। लता मंगेशकर और सुमन कल्याणपुर के स्वरों के साथ भी यही हुआ। फर्क यह है कि यहाँ तुलना ने केवल निर्णय नहीं दिए, उसने सुनने के तरीके भी गढ़े—और कुछ गलतफहमियाँ भी।


पहली बात, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है: 1950–70 के दशक का फिल्म-संगीत एक “वॉयस-इकोनॉमी” पर चलता था। बड़े बैनर, सीमित रिकॉर्डिंग स्लॉट, रेडियो की प्राथमिकताएँ, और संगीत निर्देशकों की अपनी स्थायी पसंद—इन सबने मिलकर एक ऐसी संरचना बनाई जिसमें बहुत कम आवाज़ें बार-बार सुनी जाती थीं। यह किसी एक गायिका की “रोक” से ज़्यादा, उद्योग की कार्यप्रणाली का परिणाम था। इस ढाँचे में लता मंगेशकर का प्रभुत्व उनकी असाधारण गुणवत्ता, निरंतरता और भरोसेमंद डिलीवरी से बना; यह सच है। उतना ही सच यह भी है कि इस प्रभुत्व ने दूसरों के लिए जगह को संकुचित किया—पर यह संकुचन व्यक्तिगत नहीं, संरचनात्मक था।


अब उस बहुचर्चित समानता पर आएँ, जिसे अक्सर “टक्कर” कह दिया जाता है। दरअसल, दोनों स्वरों की मूलभूत धुरी—उच्च पिच पर स्थिरता, शुद्ध सुर, स्पष्ट उच्चारण—साझा थी। पर अंतर उनके “डिज़ाइन” में है। लता मंगेशकर का स्वर प्रकाश की तरह फैलता है—उज्ज्वल, विस्तारमय, बड़े ऑर्केस्ट्रा के बीच भी अपनी धार बनाए रखने वाला। इसके विपरीत सुमन कल्याणपुर का स्वर छाया की तरह काम करता है—मृदुल, अंतरंग और कम वॉल्यूम पर भी भाव को सघन करने वाला। एक “प्रोजेक्शन” की कला है, दूसरा “इंटिमेसी” की। यही कारण है कि कई रिकॉर्डिंग्स में, जहाँ माइक्रोफोनिंग अधिक संवेदनशील और अरेंजमेंट अपेक्षाकृत हल्का है, सुमन का स्वर असाधारण रूप से प्रभावी हो उठता है—वह श्रोता के बिल्कुल पास आ बैठता है।


यहाँ एक कम कही गई बात ध्यान देने योग्य है: सुमन कल्याणपुर की ताक़त “अंडरस्टेटमेंट” है—भाव को बढ़ाने के बजाय नियंत्रित करना। संगीतशास्त्रीय भाषा में कहें तो उनकी फ्रेज़िंग छोटी, साँस का उपयोग सधा हुआ और मींड इतनी मुलायम कि अलग से दिखती नहीं, बहाव में घुल जाती है। इससे गीत में रिक्त स्थान बनते हैं—वे जगहें जहाँ श्रोता अपना अनुभव भरता है। इस सौंदर्यबोध को भारतीय काव्य परंपरा के “ध्वनि” सिद्धांत से जोड़ा जा सकता है—कहा कम जाए, सुना अधिक जाए। इसके उलट, लता की गायकी में “उज्ज्वल अभिव्यक्ति” का पक्ष अधिक मुखर है—फ्रेज़िंग लंबी, उच्च स्वर पर निर्भीक नियंत्रण और क्लाइमैक्स की निर्मिति में असाधारण दक्षता। दोनों शैलियाँ अपने-अपने ढंग से पूर्ण हैं, पर उनके लक्ष्य अलग हैं।


सोशल मीडिया पर जो कथा बार-बार उछलती है—कि लता मंगेशकर जी ने सुमन कल्याणपुर को कई स्तरों पर रोका—वह एक सरल कहानी है, इसलिए लोकप्रिय है। जटिल सच्चाई यह है कि उद्योग में निर्णय कई स्तरों पर होते हैं: संगीत निर्देशक की पसंद, निर्माता की बाज़ार-चिंता, रिकॉर्डिंग की उपलब्धता, रेडियो/रिकॉर्ड कंपनियों की रणनीति और श्रोताओं की बनी हुई अपेक्षाएँ। हाँ, यह भी इतिहास का हिस्सा है कि बड़े सितारों के साथ स्थायी काम करने वाली आवाज़ें “डिफ़ॉल्ट” बन जाती हैं, जिससे अन्य प्रतिभाओं के अवसर सीमित होते हैं पर इसे एक व्यक्ति की इच्छाशक्ति तक समेट देना विश्लेषण को आसान तो बनाता है, सटीक नहीं।


एक और दिलचस्प, कम चर्चा में आने वाला पहलू है “वॉइस-डबलिंग” का व्यवहारिक उपयोग। जब किसी विशेष टिंबर की माँग होती थी—नायिका की स्क्रीन-इमेज, संगीतकार की कल्पना या रिकॉर्डिंग की परिस्थितियाँ—तो सुमन की आवाज़ उस ध्वनि-परिवार में सहज बैठ जाती थी जिसे श्रोता पहले से स्वीकार कर चुका था। इससे उन्हें ऐसे गीत भी मिले जहाँ अपेक्षित टोन वही था पर प्रस्तुति में उनका निजी स्पर्श दर्ज हो गया। यह “प्रतिस्थापन” नहीं बल्कि “अनुकूलन” की क्षमता है—और यह अपने आप में एक कलात्मक उपलब्धि है।


सांस्कृतिक स्तर पर देखें तो यह तुलना हमें एक बड़े प्रश्न तक ले जाती है: क्या हम कला में केवल शिखर देखते हैं, या उन पगडंडियों को भी, जो शिखर तक जाती हैं? सुमन कल्याणपुर उस परिदृश्य की वह पगडंडी हैं, जो शिखर के अनुभव को अधिक मानवीय, अधिक सुलभ बनाती है। उनके बिना परिदृश्य अधूरा है क्योंकि वे हमें बताते हैं कि संगीत केवल विराटता नहीं, निकटता भी है; केवल प्रकाश नहीं, उसकी कोमल छाया भी।


नई जानकारी अक्सर किसी सनसनीखेज तथ्य में नहीं, देखने के कोण में छिपी होती है। अगर हम कोण बदलें तो यह स्पष्ट दिखता है कि दोनों स्वरों की “तुलना” दरअसल दो अलग सौंदर्यबोधों की बातचीत है—एक जो कहता है, “मैं पूरे आकाश में फैल जाऊँ,” और दूसरा जो कहता है, “मैं तुम्हारे भीतर जगह बना लूँ।” भारतीय फिल्म-संगीत की समृद्धि इसी संवाद से बनी है।


यह मान लेना ज्यादा ईमानदार है कि इतिहास में प्रभुत्व और उपस्थिति साथ-साथ चलते हैं। किसी एक का उभार दूसरे के लिए जगह कम कर सकता है पर इससे दूसरे की गुणवत्ता कम नहीं हो जाती। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ इस बात का प्रमाण है कि सूक्ष्मता भी अपनी राह बनाती है—धीरे, पर स्थायी रूप से। और जब शोर थमता है तो वही सूक्ष्म स्वर सबसे देर तक सुनाई देता है।




सुमन कल्याणपुर 


4

हिंदी सिनेमा की स्त्री गायिकी का मौन शिखर


।। एक ।।


मनुष्य को सरल निष्कर्ष बहुत प्रिय होते हैं। वह जटिलता से घबराता है, इसलिए उसे हर असाधारण चीज़ को किसी और के संदर्भ में रखकर समझना आसान लगता है। यही कारण है कि सुमन कल्याणपुर की आवाज़ को सुनते ही सबसे पहले तुलना का दरवाज़ा खुलता है, जैसे बिना उसके कोई रास्ता ही नहीं और फिर वही पुराना वाक्य—“लता जैसी लगती हैं”—इतनी बार दोहराया जाता है कि जैसे वह सत्य का रूप ले लेता है, चाहे वह अधूरा व असत्य व भ्रामक ही क्यों न हो !


 कुछ आवाज़ें तुलना के लिए नहीं होतीं, वे अनुभव के लिए होती हैं। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ ऐसी ही है—धीरे-धीरे खुलने वाली, बिना किसी आक्रामकता के अपने भीतर जगह बनाती हुई। उसमें कोई दावा नहीं है, कोई प्रदर्शन नहीं है, कोई ऊँची घोषणा नहीं है। वह शोर से परहेज़ करती है और शायद इसी कारण शोर से भरी दुनिया ने उसे पूरी तरह सुना ही नहीं।


लता मंगेशकर की आवाज़ एक विस्तृत आकाश की तरह है—उदात्त, विराट, सबको अपने भीतर समेट लेने वाली। उसके सामने सुमन की आवाज़ एक शांत नदी है जो बिना किसी हड़बड़ी के बहती है। नदी को समझने के लिए किनारे पर बैठना पड़ता है, उसके साथ समय बिताना पड़ता है लेकिन यहाँ तो सबको आसमान देखना था—नदी के पास रुकने का धैर्य किसके पास था।


यही वह बिंदु है जहाँ आलोचना अपना आलस्य प्रकट करती है। उसने समानता को पकड़ लिया, भिन्नता को छोड़ दिया। उसने ध्वनि की बनावट नहीं सुनी, सिर्फ उसकी सतह को पहचाना। जबकि सुमन की गायकी की असली शक्ति उसकी भीतरी संरचना में है—स्वर का संयम, भाव का नियंत्रित प्रवाह, और रागदारी की वह सूक्ष्म समझ जो बिना किसी दिखावे के काम करती है।


उनके गीतों को ध्यान से सुनिए—“ना तुम हमें जानो,” “कहती है झुकी झुकी नज़र,” या “बुझा दिए हैं खुद अपने हाथों”—इनमें कोई जल्दी नहीं है। वे श्रोता को बाँधने के लिए चौंकाती नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अपने भीतर खींचती हैं। यह आकर्षण तात्कालिक नहीं, दीर्घकालिक है। शायद इसी कारण वह लोकप्रियता की चकाचौंध में उतनी स्पष्ट नहीं दिखीं लेकिन स्मृति में उनकी पकड़ कहीं अधिक गहरी है।


मोहम्मद रफ़ी के साथ उनके युगल गीतों को अक्सर एक “अवसर” की तरह देखा गया, जैसे वे किसी अस्थायी खाली जगह को भरने आई हों। यह दृष्टि भी उतनी ही सतही है। उन गीतों में उनकी उपस्थिति संतुलन की तरह है—रफ़ी की खुली, ऊर्जस्वित आवाज़ के सामने सुमन की संयत, भीतर की ओर जाती ध्वनि एक आवश्यक प्रतिपक्ष रचती है। यह प्रतिस्पर्धा नहीं, संवाद है।


यह एक निहायत कल्पना ही है कि  वे अपनी अलग राह बनातीं ! यह  एक तरह का भ्रम है !! उनकी अलग राह थी और उतनी ही स्पष्ट थी। समस्या यह नहीं कि उन्होंने रास्ता नहीं चुना, समस्या यह है कि उस रास्ते को पहचानने वाली दृष्टि संगीत~कला ~समालोचना में  विकसित नहीं की गई।


हर युग कुछ आवाज़ों को ऊँचा उठाता है और कुछ को धीरे से किनारे रख देता है। यह चयन हमेशा न्यायपूर्ण नहीं होता और अक्सर यह उस समय की सामूहिक सुनने की आदतों पर निर्भर करता है। सुमन कल्याणपुर उसी चूक का हिस्सा हैं—एक ऐसी आवाज़, जो अपने समय में पूरी तरह समझी नहीं गई।


उनकी गायकी में एक तरह की विनम्रता है, जो आज लगभग लुप्त हो चुकी है। वह अपने अस्तित्व का शोर नहीं मचाती बल्कि उसे साधती है। वह श्रोता को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करती बल्कि उसके भीतर उतरने की प्रतीक्षा करती है।


शायद इसी कारण उन्हें फिर से सुनने की आवश्यकता है—तुलना से मुक्त होकर, पूर्वाग्रह से दूर हो कर क्योंकि कुछ आवाज़ें इतिहास में खोती नहीं, बस थोड़ी देर के लिए अनसुनी रह जाती हैं।


सुमन कल्याणपुर की आवाज़ भी वैसी ही है—एक लाजवाब, अद्वितीय, नायाब स्वर—जो किसी के समांतर नहीं, अपने भीतर पूर्ण है; बस उसे सुनने की तैयारी अभी अधूरी है।


।।दो।।


और यहीं से बात थोड़ी और गहरी होती है, जहाँ सुनना सिर्फ “सुनना” नहीं रह जाता बल्कि एक तरह की साधना बन जाता है क्योंकि सुमन कल्याणपुर की आवाज़ को पकड़ने के लिए कान ही नहीं, धैर्य भी चाहिए—और यह चीज़ मनुष्य अक्सर बचाकर रखता है, जैसे किसी आपातकाल के लिए।


उनकी गायकी में एक विशेष प्रकार की “मृदु दूरी” है। वे भाव के भीतर जाती हैं लेकिन उसमें डूबकर उसे बिखरने नहीं देतीं। यह एक कठिन संतुलन है। अधिकांश गायक या तो भाव में इतने डूब जाते हैं कि स्वर टूटने लगता है या फिर इतने नियंत्रित रहते हैं कि भाव सूख जाता है। सुमन इस दोधारी तलवार पर बिना कटे चलती हैं।


ध्यान से सुनिए—उनके उच्चारण में कोई अतिरिक्त आग्रह नहीं है। शब्द उनके पास आकर ठहरते हैं, भागते नहीं। जैसे “नज़र” शब्द को वे जिस तरह खोलती हैं, उसमें ‘न’ का हल्का स्पर्श, ‘ज़र’ की मुलायम गिरावट—यह सब मिलकर एक दृश्य रचता है। यह सिर्फ गाना नहीं, ध्वनि के भीतर अर्थ का स्थापत्य है।


यहाँ एक और दिलचस्प बात है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। लता मंगेशकर की आवाज़ में एक दिव्यता का भाव है—एक तरह की अलौकिक चमक जो श्रोता को ऊपर उठाती है। इसके विपरीत, सुमन की आवाज़ में मानवीयता का ताप है। वह आपको ऊपर नहीं ले जातीं, आपके पास आ बैठती हैं।


अब यह तय करना कि कौन-सी चीज़ अधिक मूल्यवान है—यह तो श्रोता के स्वभाव पर निर्भर करता है लेकिन यह मान लेना कि जो अधिक चमकदार है वही अधिक महत्त्वपूर्ण है—यह थोड़ी बचकानी समझ है, जिसे आलोचना ने अक्सर गंभीरता का चोला पहना दिया।


मोहम्मद रफ़ी के साथ उनके युगल गीतों में यह बात और स्पष्ट हो जाती है। रफ़ी की आवाज़ में विस्तार है, उड़ान है, एक खुलापन है जो आकाश को छूता है। सुमन वहाँ ज़मीन की तरह उपस्थित होती हैं—स्थिर, संतुलित, आधार देती हुई। यह संबंध प्रतिस्पर्धा का नहीं, संरचना का है।


और फिर वह प्रसंग, जिसे बार-बार दोहराया जाता है—रफ़ी और लता के बीच मनमुटाव और उसके बाद सुमन को मिले अवसर। मनुष्य को कथाएँ बहुत प्रिय होती हैं, खासकर वे जिनमें थोड़ा सा नाटकीय तनाव हो। लेकिन यह पूरी कहानी को समझने का तरीका नहीं है, यह सिर्फ उसे रोचक बनाने का तरीका है।


सच यह है कि किसी भी संगीतकार ने केवल “अनुपस्थिति” के कारण किसी को नहीं चुना। चयन हमेशा एक ध्वनि की ज़रूरत से होता है। सुमन की आवाज़ में वह कोमल संतुलन था जो कई रचनाओं के लिए आवश्यक था। और जब वह आवश्यकता समाप्त हुई, तो अवसर भी कम हो गए। यह कठोर है पर संगीत की दुनिया में भावनाओं से ज़्यादा ध्वनि की उपयोगिता काम करती है।


लेकिन यहाँ भी एक सूक्ष्म प्रश्न छिपा है—क्या उनकी आवाज़ की संभावनाएँ वास्तव में समाप्त हो गई थीं या उन्हें तलाशने की इच्छा ही कम हो गई थी?


यही वह जगह है जहाँ “अन्वेषित न की गई राह” का अर्थ खुलता है। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में जो भीतरीपन है, वह आधुनिक संगीत में एक अलग दिशा बन सकता था—एक ऐसी गायकी जो अधिक निजी, अधिक आत्मीय, अधिक अंतर्मुखी हो। लेकिन हिंदी फिल्म संगीत उस समय सामूहिक भावनाओं का माध्यम था, उसे बड़े कैनवास की ज़रूरत थी।


छोटी, धीमी, भीतर उतरती आवाज़ें वहाँ अक्सर छूट जाती हैं—जैसे किसी भीड़भाड़ वाले मेले में कोई धीरे से बोलने वाला व्यक्ति।


और शायद यही कारण है कि आज, जब शोर और अधिक बढ़ गया है, सुमन कल्याणपुर की आवाज़ पहले से ज़्यादा प्रासंगिक लगती है। वह एक विकल्प की तरह उभरती है—एक ऐसी संभावना, जिसमें गायकी प्रदर्शन नहीं, संवाद बनती है।


उनके स्वर में कोई आग्रह नहीं है कि आप उन्हें सुनें। वे बस मौजूद हैं—अपने पूरे संयम, अपनी पूरी सुघरता के साथ। और अजीब बात यह है कि यही अनाग्रह उनकी सबसे बड़ी पुकार है।


क्योंकि जो आवाज़ें अपने लिए जगह नहीं माँगतीं, वे अक्सर सबसे अधिक जगह घेर लेती हैं—धीरे-धीरे, बिना शोर के, स्मृति के भीतर।


सुमन कल्याणपुर की गायकी भी उसी तरह काम करती है। वह तत्काल नहीं जीतती, वह टिकती है।


और शायद कला का अंतिम सत्य यही है—जो टिक जाए, वही वास्तव में जीवित रहता है।


।। तीन।।


मनुष्य को संगीत सुनते समय अक्सर यह भ्रम रहता है कि वह “भाव” सुन रहा है, जबकि सच यह है कि वह अधिकतर “प्रभाव” सुनता है। प्रभाव तात्कालिक होता है, तेज़ होता है, और जल्दी पकड़ में आ जाता है। भाव धीमा होता है, परतदार होता है, और अपने को तुरंत नहीं खोलता। सुमन कल्याणपुर की गायकी इसी दूसरे क्षेत्र में आती है—जहाँ चीज़ें तुरंत नहीं चमकतीं, बल्कि धीरे-धीरे अपनी संरचना प्रकट करती हैं।


उनकी आवाज़ की बनावट को अगर संगीतशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए, तो सबसे पहले जो तत्व सामने आता है, वह है स्वर-संयम । वे किसी भी नोट पर अनावश्यक कंपन नहीं देतीं। उनके यहाँ वाइब्रेटो का उपयोग अत्यंत सीमित है, लगभग अनुपस्थित। इसका परिणाम यह होता है कि स्वर सीधा, स्पष्ट और स्थिर रहता है—जैसे किसी शांत जल में गिरा हुआ चंद्रमा, बिना लहरों के।


इसके विपरीत, कई गायकों में भाव पैदा करने के लिए स्वर को हल्का-हल्का हिलाया जाता है, जिससे एक तात्कालिक आकर्षण पैदा होता है। सुमन इस सस्ते आकर्षण से दूर रहती हैं। वे स्वर को टिकाकर अर्थ पैदा करती हैं। यह तकनीक शास्त्रीय परंपरा से आती है, जहाँ एक-एक स्वर अपने भीतर पूरा भाव-संसार लिए होता है।


दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है उनका मींड और सूक्ष्म गमन। वे एक स्वर से दूसरे स्वर तक छलांग नहीं लगातीं, बल्कि उनके बीच की अदृश्य दूरी को पार करती हैं। यह जो “बीच का क्षेत्र” है—यही असल संगीत है, और यहीं अधिकांश श्रोता सुनना बंद कर देते हैं।


“ना तुम हमें जानो” जैसे गीत में यह स्पष्ट दिखाई देता है। शब्दों के बीच जो हल्की-सी ढलान है, वह सीधे-सीधे रागदारी की देन है। यहाँ वे सिर्फ धुन नहीं गा रहीं, बल्कि स्वरों के बीच के रिश्ते को जी रही हैं।


अब अगर उच्चारण और ध्वनि-आकृति  की बात करें तो सुमन कल्याणपुर की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे शब्द को “तोड़ती” नहीं हैं। वे उसे बहने देती हैं। कई बार गायक भाव के दबाव में शब्दों को खींच देते हैं या उन्हें नाटकीय बना देते हैं। सुमन ऐसा नहीं करतीं। उनके यहाँ शब्द और स्वर एक-दूसरे के विरोधी नहीं, सहचर हैं।


इसका एक परिणाम यह होता है कि उनके गीतों में काव्य का अर्थ अक्षुण्ण रहता है। आप सिर्फ धुन में नहीं बहते, आप शब्द को भी सुनते हैं। यह गुण आज के संगीत में लगभग विलुप्त है, जहाँ शब्द अक्सर बीट्स के नीचे दब जाते हैं।


तीसरा, और शायद सबसे कम समझा गया पक्ष है उनका डायनामिक कंट्रोल । वे ऊँचे सुर में भी चिल्लाती नहीं हैं और धीमे सुर में भी टूटती नहीं हैं। उनकी आवाज़ का वॉल्यूम एक सीमित दायरे में रहता है लेकिन उसी दायरे में वे असंख्य भाव पैदा करती हैं।


यह “सीमितता” दरअसल उनकी शक्ति है। क्योंकि जब आप ऊँचाई या तीव्रता के सहारे भाव नहीं बना सकते, तब आपको सूक्ष्मता का सहारा लेना पड़ता है और सुमन की पूरी गायकी इसी सूक्ष्मता पर टिकी है।


अब अगर इसे लता मंगेशकर की गायकी से तुलना के बिना समझने की कोशिश करें—जो कि करना चाहिए—तो फर्क और स्पष्ट हो जाता है। लता की आवाज़ में जो विस्तार है, वह उन्हें बड़े भावों के लिए उपयुक्त बनाता है—विरह, उत्कट प्रेम, भक्ति का उत्कर्ष।


सुमन की आवाज़ छोटे भावों की कलाकार है—संकोच, हल्की उदासी, अंतरंग प्रेम, आत्मसंवाद। यह वे भाव हैं, जो चिल्लाकर नहीं कहे जाते। इन्हें धीरे से कहा जाता है, और उतनी ही सावधानी से सुना जाता है।


यही कारण है कि उनके गीतों में एक तरह की अंतरंग नाटकीयता  है। यह बाहरी नहीं, भीतरी है। वहाँ कोई बड़ा विस्फोट नहीं होता, बल्कि एक धीमी-सी दरार पड़ती है, जो धीरे-धीरे फैलती है।


मोहम्मद रफ़ी के साथ उनके युगल गीतों में यह अंतरंगता एक और स्तर पर पहुँच जाती है। रफ़ी जहाँ भाव को खुलकर व्यक्त करते हैं, वहीं सुमन उसे भीतर समेटती हैं। यह विरोधाभास नहीं, संतुलन है।


अगर संगीत को एक स्थापत्य माना जाए, तो रफ़ी उसके स्तंभ हैं—दृश्य, ऊँचे, प्रभावशाली। सुमन उसकी दीवारें हैं—जो सब कुछ थामे रहती हैं, पर स्वयं सामने नहीं आतीं।


और शायद यही उनकी त्रासदी भी है—और महिमा भी।


क्योंकि जो चीज़ें संरचना बनाती हैं, वे अक्सर दिखाई नहीं देतीं। वे बस होती हैं—चुपचाप, स्थिर, अनिवार्य।


सुमन कल्याणपुर की गायकी भी वैसी ही है। वह संगीत का दृश्य नहीं, उसका आधार है। और आधार को देखने के लिए, आँख नहीं, समझ चाहिए— जो दुर्भाग्य से, हर किसी के पास नहीं होती।


सुमन कल्याणपुर की  गायकी  की भविष्य में ऐसी समालोचना कर सकें जो फिल्म गायकी के मर्म का वाजिब उद् घाटन कर सके और वह सचमुच  सुमन कल्याणपुर की गायकी की ऊँचाई को सामने लाना चाहे तो उसे कुछ बुनियादी आलस्य छोड़ने होंगे।  इससे एक सर्वोत्कृष्ट सुमन कल्याणपुर सामने आएंगी। वह किसी गायिका की  अनुवर्ती नहीं लगेंगी।


सबसे पहले देखना होगा स्वर की नैतिकता। यह शब्द थोड़ा भारी लग सकता है लेकिन मतलब सीधा है—वे सुर के साथ कितना ईमानदार व्यवहार करती हैं। सुमन का सुर कभी दिखावा नहीं करता। वह जहाँ है, वहीं रहता है। उसमें कोई अतिरिक्त सजावट नहीं, कोई अनावश्यक कंपन नहीं। यह एक तरह का नैतिक अनुशासन है जो उन्हें शास्त्रीय परंपरा से जोड़ता है। भविष्य की आलोचना को यह पहचानना होगा कि उनकी “सीधी” लगने वाली गायकी दरअसल अत्यंत कठिन साधना का परिणाम है।


उनकी गायकी को सूक्ष्म-गतियों के स्तर पर पढ़ना होगा। सामान्य श्रोता नोट से नोट तक सुनता है लेकिन सुमन नोट के भीतर गाती हैं। एक स्वर के भीतर जो हल्की-सी ढलान जो अनकहा कंपन जो अदृश्य मींड है—वही उनका असली क्षेत्र है। अगर आलोचना इन सूक्ष्म गतियों को नहीं पकड़ती, तो वह उनकी गायकी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को खो देती है।


उनका मौन के साथ संबंध देखना होगा। यह थोड़ा असुविधाजनक क्षेत्र है क्योंकि यहाँ सुनने से ज़्यादा “रुकना” पड़ता है। सुमन के गीतों में शब्दों के बीच जो छोटे-छोटे विराम हैं, वे खाली नहीं हैं। वे अर्थ से भरे हुए हैं। वे उस भाव को साँस लेने की जगह देते हैं। आज की आलोचना, जो लगातार बोलने और भरने की आदी है, इस मौन को अक्सर “कुछ नहीं” समझ लेती है। जबकि वहीं सबसे ज़्यादा कुछ हो रहा होता है।


उनकी गायकी को आंतरिक नाटकीयता के स्तर पर देखना होगा।वे भाव को बाहर नहीं फेंकतीं, उसे भीतर रचती हैं। यह नाटकीयता मंचीय नहीं, मनोवैज्ञानिक है। “ना तुम हमें जानो” जैसे गीत में कोई बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं दिखता, लेकिन भीतर एक निरंतर तनाव चलता रहता है—एक अनकहा संवाद, एक अधूरा कथन। भविष्य की समालोचना को इस “भीतरी नाटक” को पढ़ना सीखना होगा।


अत्यंत ज़रूरी है कि उनकी ध्वनि की बनावट  को समझें। लता मंगेशकर की आवाज़ जहाँ अधिक उजली, खुली और आकाशीय है, वहीं सुमन की ध्वनि में एक हल्की-सी धुंधलाहट है—एक “वेल्वेटी” गुण, जो उसे अंतरंग बनाता है। यह धुंधलाहट कोई कमी नहीं, यह उनकी ध्वनि की पहचान है। आलोचना को इस बनावट को “कम चमक” कह कर खारिज करने की आदत छोड़नी होगी।


उनके युगल गीतों का मूल्यांकन करते समय सह-अस्तित्व की सौंदर्यशास्त्र को समझना होगा।मोहम्मद रफ़ी के साथ गाते हुए वे कभी प्रतिस्पर्धा नहीं करतीं। वे जगह बनाती हैं, जगह छोड़ती हैं, और उसी में संतुलन रचती हैं। यह गुण अत्यंत दुर्लभ है। आज के समय में, जहाँ हर आवाज़ खुद को आगे रखना चाहती है, यह सह-अस्तित्व एक अलग ही ऊँचाई है।


सबसे कठिन, उनकी गायकी को “कम में अधिक”  के सिद्धांत से पढ़ना होगा। वे कम साधनों में अधिक अर्थ पैदा करती हैं। कोई अनावश्यक आलंकारिकता नहीं, कोई अतिरिक्त तान नहीं, कोई दिखावटी विस्तार नहीं। यह न्यूनता ही उनकी शक्ति है। लेकिन मनुष्य को अधिक पसंद है—ज़्यादा सुर, ज़्यादा ऊँचाई, ज़्यादा शोर। इसलिए वह इस “कम” को अक्सर “कमज़ोरी” समझ लेता है।


सुमन को सुनने के लिए एकांत चाहिए—संगीत का भी और मन का भी। और यह काम आसान नहीं है। क्योंकि इसके लिए श्रोता को भी थोड़ा बदलना पड़ता है।


लेकिन अगर यह बदलाव आ गया, तो उनकी गायकी की जो ऊँचाई दिखेगी—वह शायद अब तक की सारी तुलना को अनावश्यक बना देगी।


सुमन कल्याणपुर 


5

शांत स्वर की मद्धिम आंच : सुमन कल्याणपुर की गायकी का अंतरंग लोक


सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में कोई दावा नहीं है, कोई शोर नहीं है, कोई आकांक्षी चढ़ान नहीं है—फिर भी वह अपने श्रोता के भीतर जिस तरह से उतरती है, वह एक विचित्र प्रकार की आत्मीयता रचती है। यह गायकी अपने आप को सिद्ध करने के लिए बाहर की दुनिया में नहीं भागती; वह भीतर की एक शांत जगह में बैठकर, धीरे-धीरे, बिना हड़बड़ी के, अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। जैसे कोई जलधारा, जो दिखती कम है पर अपने स्पर्श से मिट्टी को नम बनाए रखती है।


उनकी स्वर-संरचना में एक अद्भुत संयम है। स्वर कभी भी अपनी मर्यादा नहीं तोड़ता, न ही वह भाव के दबाव में आकर काँपता है। यह स्थिरता, यह संतुलन, उनके गायन का मूल गुण है। ऊँचे सुरों पर भी वे चढ़ती नहीं बल्कि जैसे वहाँ पहले से ही विराजमान हों। इस सहजता में एक गहरी साधना का संकेत है, जो दिखती नहीं, पर हर सुर में महसूस होती है। उनके यहाँ ‘गायन’ एक क्रिया नहीं, एक स्थिति बन जाता है—एक ऐसी स्थिति जिसमें स्वर और भाव का भेद धीरे-धीरे मिटने लगता है।


उनकी आवाज़ का रंग अत्यंत स्वच्छ है—न उसमें खुरदरापन है, न किसी प्रकार का कृत्रिम कंपन। यह पारदर्शिता उन्हें विशेष बनाती है। वे भाव को किसी नाटकीय विस्तार में नहीं ले जातीं; बल्कि भाव उनके भीतर एक सूक्ष्म कंपन की तरह रहता है, जो श्रोता तक बिना किसी आडंबर के पहुँचता है। यही कारण है कि उनकी गायकी में करुणा भी है पर वह चीत्कार नहीं बनती; अनुराग भी है पर वह उच्छृंखल नहीं होता। सब कुछ एक सीमित, नियंत्रित  किन्तु अत्यंत प्रभावी दायरे में घटित होता है।


उनकी उच्चारण-शुद्धता भी ध्यान खींचती है। शब्द उनके यहाँ केवल अर्थ नहीं देते, वे स्वर के साथ मिल कर एक विशेष ध्वनि-चित्र रचते हैं। हर शब्द अपनी पूरी स्पष्टता के साथ उभरता है पर वह स्वर से अलग नहीं होता। यह संतुलन बहुत कम गायकों में दिखाई देता है, जहाँ भाषा और संगीत एक-दूसरे को सहारा देते हैं, न कि प्रतिस्पर्धा करते हैं। उनके उच्चारण में हिंदी-उर्दू की कोमलता है और यह कोमलता उनके गीतों को एक अतिरिक्त लयात्मकता प्रदान करती है।


उनकी गायकी का सबसे आकर्षक पक्ष उसकी ‘अंतरंगता’ है। वे बड़े मंच की गायिका नहीं लगतीं; वे जैसे किसी एकांत कमरे में बैठ कर गा रही हों और श्रोता उस कमरे के बाहर खड़ा, धीरे-धीरे उस स्वर को सुन रहा हो। यह अंतरंगता ही उनके गीतों को निजी अनुभव बना देती है। सुनते समय ऐसा लगता है कि यह गीत किसी भीड़ के लिए नहीं, केवल मेरे लिए गाया गया है। यह निजीपन, यह एकांत की अनुभूति, उनकी आवाज़ को एक विशेष गरिमा प्रदान करती है।


उनके यहाँ अलंकारों का प्रयोग अत्यंत मितव्ययी है। वे तानों और गमकों के प्रदर्शन में विश्वास नहीं करतीं; बल्कि जहाँ आवश्यकता होती है, वहीं उनका सूक्ष्म प्रयोग करती हैं। इस मितव्ययिता में एक प्रकार का सौंदर्य-बोध है जो आज के समय में दुर्लभ होता जा रहा है। वे जानती हैं कि कहाँ रुकना है, कहाँ स्वर को बस एक हल्का-सा मोड़ देना है, और कहाँ उसे बिल्कुल सीधा बहने देना है। यह ‘रुकने’ की कला, यह विराम का बोध, उनकी गायकी को एक गहरी लय देता है।


उनकी आवाज़ में स्त्रीत्व की एक विशेष छाया है पर वह पारंपरिक अर्थों में नहीं। यह स्त्रीत्व किसी सजावट या लज्जा का रूप नहीं लेता; वह एक आत्मविश्वासी, शांत और भीतर से मजबूत स्वरूप में उपस्थित होता है। उनके गीतों में स्त्री की भावनाएँ हैं, पर वे भावनाएँ किसी निर्भरता या विवशता की तरह नहीं आतीं। वे अपने भीतर की एक स्वतंत्रता के साथ व्यक्त होती हैं, जो बहुत सूक्ष्म है, पर स्पष्ट है।

    

उनकी गायकी में समय का भी एक अलग व्यवहार दिखाई देता है। वे जल्दी में नहीं होतीं। हर पंक्ति, हर शब्द, हर स्वर को वे पर्याप्त समय देती हैं, ताकि वह पूरी तरह खुल सके। यह धैर्य, यह विस्तार, उनके गीतों को एक अलग ही आयाम देता है। आज की तेज़ रफ्तार सुनने की आदतों के बीच, उनका यह धीमा, ठहरा हुआ गायन एक अलग ही संसार रचता है—जहाँ चीज़ें जल्दी-जल्दी नहीं घटतीं, बल्कि अपने पूरे विस्तार में सामने आती हैं।


उनके स्वरों में एक प्रकार की ‘निस्संगता’ भी है। वे भाव से जुड़ी हैं, पर उसमें डूबती नहीं। यह दूरी उन्हें एक विशेष दृष्टि देती है, जहाँ वे भाव को देख भी सकती हैं और गा भी सकती हैं। यह दोहरा बोध—जुड़ाव और दूरी का—उनकी गायकी को एक गहरी परत प्रदान करता है। श्रोता उस भाव में प्रवेश करता है, पर साथ ही उसे देखने की क्षमता भी बनाए रखता है।


उनकी तुलना अक्सर लता मंगेशकर से की जाती रही है और यह तुलना कभी-कभी उनके लिए एक छाया भी बन जाती है। पर यदि उस छाया से बाहर आ कर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि उनकी गायकी का अपना एक स्वतंत्र प्रदेश है। वे किसी की प्रतिध्वनि नहीं हैं; वे अपने आप में एक अलग ध्वनि-संसार रचती हैं। उनका सौंदर्य किसी प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि अपनी विशिष्टता में है।


उनकी आवाज़ में एक ऐसी ‘मद्धिम आंच’ है जो धीरे-धीरे जलती है और लंबे समय तक बनी रहती है। यह आंच तेज़ नहीं है पर स्थायी है। उनके गीत तुरंत प्रभाव नहीं डालते; वे धीरे-धीरे अपने भीतर जगह बनाते हैं और फिर वहाँ से हटते नहीं। यही उनकी गायकी की सबसे बड़ी शक्ति है—वह स्मृति में एक स्थायी जगह बना लेती है।


उनकी गायकी को सुनते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि वे ‘कम’ में ‘अधिक’ कहने की कला जानती हैं। वे स्वर को अनावश्यक विस्तार नहीं देतीं; वे उसे उतना ही रखती हैं, जितना आवश्यक है। इस संक्षिप्तता में एक गहरी अर्थवत्ता है, जो श्रोता को स्वयं उस खाली जगह को भरने के लिए आमंत्रित करती है। यह सहभागिता, यह श्रोता को सक्रिय बनाने की क्षमता, उनकी गायकी को एक जीवंत अनुभव बना देती है।


उनके यहाँ संगीत कोई प्रदर्शन नहीं, एक आत्मीय संवाद है। यह संवाद शोर से नहीं, शांति से बनता है। वे अपनी आवाज़ से किसी को चौंकाती नहीं; वे उसे धीरे-धीरे अपने भीतर उतारती हैं। और जब वह स्वर भीतर उतर जाता है, तब उसकी उपस्थिति एक स्थायी प्रतिध्वनि बन जाती है।


इस तरह उनकी गायकी एक ऐसे सौंदर्य का निर्माण करती है, जो तात्कालिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक है; जो चकित नहीं करता, पर गहराई से प्रभावित करता है; जो बाहर से कम, भीतर से अधिक सक्रिय होता है। यह गायकी अपने समय के शोर से अलग, एक शांत, संयमित और गहन ध्वनि की तरह हमारे भीतर बनी रहती है—जैसे किसी दूर के मंदिर की घंटी, जो एक बार सुनाई देने के बाद भी लंबे समय तक मन में बजती रहती है।



परिचय दास 


सम्पर्क 


मोबाइल : 9968269237

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