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शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'छपे हुए शब्दों का महत्व आज भी है'

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शैलेन्द्र चौहान  छपे हुए शब्दों की अपनी एक अलग महत्ता होती है। हमारे भारतीय सन्दर्भ में इसकी महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि अरसे तक आबादी का एक बड़ा अनपढ़ रहा। और उसे छपे हुए इन शब्दों पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था। यही वजह है कि आज भी आम जनता रामायण, महाभारत या तमाम पुराणों में छपी हुई बातों को एकदम सच का वृत्तांत समझ बैठता है। यह छपे हुए शब्द में यकीन का ही परिणाम है। आज भी भारत की आम जनता में मुद्रित शब्दों के प्रति यह यकीन बना हुआ है। शैलेन्द्र चौहान उचित ही लिखते हैं कि 'दरअसल, छपे हुए शब्दों के भीतर एक प्रकार की स्थायित्व-चेतना निहित होती है। वे क्षणिक नहीं होते, न ही वे केवल प्रतिक्रिया की तत्क्षणिक उत्तेजना में पैदा होते हैं। उनके पीछे विचार का अनुशासन, भाषा का संयम, और सत्य के प्रति एक नैतिक प्रतिबद्धता काम करती है। यही कारण है कि पाठक लिखे हुए शब्दों को अक्सर ‘सच’ के अधिक निकट मानते हैं। यह विश्वास अकारण नहीं है; यह उस दीर्घ परंपरा का परिणाम है जिसमें शब्द केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का वहनकर्ता भी रहे हैं।' छपे हुए शब्दों का असर पाठक के मन ...

शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'पहल पत्रिका : हिंदी साहित्य में वैचारिक हस्तक्षेप की एक सशक्त परंपरा'

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पहल का पहला अंक साहित्यिक पत्रकारिता की जब भी बात की जाएगी 'पहल' का नाम अनिवार्य तौर पर लिया जाएगा। अपने समय में 'पहल' ऐसी जरूरी पत्रिका बन गई थी जिसे हर रचनाकार और साहित्यिक सरोकारों से जुड़ा हर व्यक्ति पढ़ना और देखना चाहता था। इसमें छपना हर रचनाकार का सपना होता था। साहित्यिक पत्रकारिता सामान्य पत्रकारिता से अलग होती है। इसकी चुनौतियां अलग होती हैं। केवल कविता, कहानी, आलेख और समीक्षा बटोर कर उसे एक जिल्द में छाप देना बहुत आसान काम होता है, जैसा कि आज की हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाएं कर रही हैं। लेकिन साहित्यिक पत्रिका का मूल उद्देश्य होता है : ऐसी रचनाएँ छापना जो पाठकों को उद्वेलित करे, अपने समय के सरोकारों से परिचित कराए, प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना की तरफ मोड़ दे और लीक से अलग हट कर चलना सिखाए। 'पहल' इन सारे प्रतिमानों पर हमेशा खरी उतरी। सम्पादक ज्ञानरंजन की संपादकीय प्रतिबद्धता को इस बात से समझा जा सकता है कि इस पत्रिका के सम्पादन के लिए उन्होंने खुद का अपना लेखन निर्ममता से स्थगित कर दिया। और अन्त में जब उन्हें ऐसा लगा कि वे बढ़ती उम्र के चलते पहल के प्रति न...

शैलेन्द्र चौहान की कविताएं

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शैलेन्द्र चौहान  माना जाता है कि लोकतन्त्र का उद्देश्य है जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए'। इसे अभी तक की सबसे बेहतर शासन पद्धति माना जाता है। लेकिन शासक की उस मानसिकता का क्या किया जा सकता है जो गद्दी पाते ही अपने को राजा ही समझने लगता है। लोकतन्त्र अपने उद्देश्यों को पाने में प्रायः असफल रहा है। भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं लगाया जा सका। नेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों, दलालों ने देश को जम कर लूटा है। जातिवाद टूटने की बजाए कहीं और मजबूत हुआ है। धर्म का वर्चस्व और बढ़ा है। समानता की बात कागज पर ही सिमट कर रह गई है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं पाने के लिए लोगों को भटकना पड़ता है। इस लोकतन्त्र में लोक ही गायब हो गया है। तन्त्र और शक्तिशाली हुआ है। कवि शैलेन्द्र चौहान लिखते हैं : "लोकतंत्र/ धीरे-धीरे/ लोक से दूर/ भोग के करीब पहुँच गया/ जहाँ सेवा का स्थान/ सुविधा ने ले लिया/ और आदर्शों की जगह/आरामकुर्सियों ने/ निराश हताश लोक ने भी/ यह सत्य स्वीकार लिया"। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शैलेन्द्र चौहान की कविताएं। शैलेन्द्र चौहान की कविताएं  धमकी देने वाला अज़ब-ग...

शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'कविता में वैचारिक प्रतिबद्धता : कात्यायनी की कविताएं'

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  कात्यायनी हर जमाने के अपने कुछ मूल्य, कुछ आदर्श और कुछ प्रतिबद्धताएं होती हैं। बदलते समय के साथ इन तीनों के प्रतिमानों में गिरावट आई है। आज के समय में जब सब कुछ लाभ लोभ और स्वार्थ के तराजू पर तौला जाने लगा है तब लगता है कि प्रतिबद्धता अब बीते दिनों की बात होती जा रही है। साहित्य में भी अब प्रतिबद्धता कोई मूल्य नहीं रह गई है। ऐसे समय में भी कोई कवि अगर अपनी प्रतिबद्धताएं बचाए हुए हो तो सहज ही हमारी नजर उसकी तरफ जाती है। कात्यायनी ऐसी ही कवयित्री हैं जिनके लिए वैचारिक प्रतिबद्धता सर्वोपरि है। कात्यायनी के कविताओं की पड़ताल करते हुए शैलेन्द्र चौहान लिखते हैं ' यह प्रतिबद्धता किसी नारेबाज़ी या घोषित वैचारिक घोषणापत्र के रूप में नहीं आती, बल्कि जीवन की ठोस स्थितियों, संबंधों और संघर्षों के भीतर से उभरती है। उनकी कविताएँ सामाजिक अन्याय, पितृसत्ता, वर्ग-विभाजन, श्रम के शोषण और स्त्री की असुरक्षा जैसे प्रश्नों को अत्यंत सहज लेकिन तीखे ढंग से उठाती हैं। यहाँ ‘स्त्री’ कोई अमूर्त प्रतीक नहीं, बल्कि एक जीती-जागती, सोचती-समझती और प्रतिरोध करती हुई सत्ता है।' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते है...

शैलेन्द्र चौहान का आलेख 'हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता और प्रतिरोध'

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  शैलेन्द्र चौहान  भारत में पत्रकारिता का अध्याय उस ब्रिटिश काल से आरम्भ होता है जिसने सही मायनों में आधुनिकता के कई नए आयामों की शुरुआत की। धीरे धीरे यह पत्रकारिता प्रतिरोध के रास्ते की तरफ बढ़ी, जिसने प्रकारांतर से भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को बढ़ावा दिया। इस दौर में शायद ही कोई ऐसा व्यक्तित्व हो, जो पत्रकारिता से न जुड़ा हो। इसी क्रम में भारत में साहित्यिक पत्रकारिता की भी शुरुआत हुई जिसने प्रतिरोध को और भी तीखा यानी अलग स्वर प्रदान किया।  साहित्यिक पत्रकारिता में इन लघु पत्रिकाओं का योगदान अहम है। व्यक्तिगत प्रयासों से निकलने वाली ये पत्रिकाएं आज भी निरन्तर न केवल प्रकाशित हो रही हैं बल्कि नए प्रतिमान भी स्थापित कर रही हैं। आज ही उत्तराखंड के दिनेशपुर में राष्ट्रीय लघु पत्र पत्रिका सम्मेलन का आरम्भ हो रहा है। इस सम्मेलन के लिए हमारी शुभकामनाएं। हम यह उम्मीद व्यक्त करते हैं कि यह सम्मेलन लघु पत्र पत्रिका आन्दोलन को एक नई दिशा प्रदान करेगा। इस अवसर पर हम वरिष्ठ रचनाकार और 'धरती' जैसी महत्त्वपूर्ण लघु पत्रिका के संपादक शैलेन्द्र चौहान का महत्त्व...