प्रेमकुमार मणि का आलेख 'गाँधी को कैसे देखें'



महान होने के बावजूद गांधी हाड़ मांस से बने एक मनुष्य थे और इसी नाते उनमें कई मानवीय कमज़ोरियां भी थीं। गांधी ने कभी अपनी गलतियों को छुपाने की कोशिश नहीं की। खुद अपनी आत्मकथा में वे अपनी गलतियों को खुले रूप में स्वीकार करते हैं। अपने समय के नायकों से उनके वैचारिक मतभेद भी थे। रवींद्र नाथ ठाकुर, मुहम्मद अली जिन्ना, भीम राव अंबेडकर, वीर सावरकर, जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस से उनके मत मतांतर थे। इसके बावजूद इन सब के लिए उनके मन में कोई तल्खी नहीं थी। वे सबके साथ मिलते, बैठते और खुले मन से बातचीत करते थे। केवल एक बार 1924 के बेलगांव कांग्रेस के वे अध्यक्ष चुने गए फिर भी कांग्रेस पर उनका पूरा नियंत्रण रहा। आज गांधी जी को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशें की जा रही हैं। ऐसे में तटस्थता के साथ गांधी का मूल्यांकन करने की एक कोशिश प्रेमकुमार मणि करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रेमकुमार मणि का आलेख 'गाँधी को कैसे देखें।


'गाँधी को कैसे देखें'

 

प्रेमकुमार मणि 


गाँधी को मैंने किसी अनुयायी अथवा लकीर के फकीर गाँधी-वादियों की तरह नहीं, बल्कि अपने विवेक से देखने की कोशिश की है। कोई पूछ सकता है यह विवेक से देखना क्या होता है।  स्पष्ट कर दूँ अन्धभक्त मैं किसी का नहीं हुआ। अब इस उम्र में क्या होऊँगा। लेकिन गाँधी को एक आलोचक की तरह जाँचने-परखने की सम्भव कोशिश की है। गाँधी को Romain Rolland और Louis Fischer के नजरिए से  देखा और आंबेडकर, नेहरू व सुभाष के नजरिये में भी। गाँधी को अपने जीवन काल में भी आलोचकों की कमी नहीं थी। राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े जितने मेधावी नेता थे उनमें अधिकांश उनसे मतभेद रखते थे। जिन्ना, सावरकर, आंबेडकर, नेहरू, सुभाष, भगत सिंह, समाजवादी और साम्यवादी सब किसी न किसी स्तर पर उनसे असहमत थे। 

मैंने अपने अध्ययन क्रम में पाया कि आंबेडकर और जवाहर लाल ने जितनी गहराई से उन्हें देखा, शायद अन्य किसी ने नहीं। जवाहर लाल उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थे और चूंकि वह उनके पिता के हमउम्र थे इसलिए उनसे पितृवत व्यवहार करते थे। उनके अपने  पिता मोती लाल से भी विचारधारा के स्तर पर उनकी टकराहट होती थी। स्वयं को वह गाँधी का मानस पुत्र मानते थे, लेकिन अनेक मुद्दों पर वैचारिक भिन्नता रखते थे। इसे वह छुपाते भी नहीं थे। अपने लेखन में जवाहर लाल ने गाँधी के व्यक्तित्व का काव्यात्मक वर्णन किया है, मसलन गाँधी जी स्वच्छ हवा के ताजे झोंके की तरह आए.. और कि उनका व्यक्तित्व बिल्लौर की तरह स्वच्छ और मेमने की तरह कोमल था आदि। किन्तु उनके ग्राम स्वराज और ब्रह्मचर्य जैसे विचारों की उन्होंने भरपूर आलोचना भी की है। हाँ, यह अवश्य था जब नेतृत्व का प्रश्न उठता था वह गाँधी के साथ हो जाते थे। जवाहर लाल जानते थे मैं भारत को उतना नहीं जानता, जितना गाँधी जानते हैं। वह गाँधी के माध्यम से ही भारत को समझ रहे थे। 

गाँधी कई कारणों से जवाहर लाल को अधिक पसंद करते थे। वह जिस दुनिया के आकांक्षी थे, शायद जवाहर लाल औरों के मुकाबले उसे अधिक समझते थे। यही कारण था कि जवाहर लाल को उन्होंने अपना वैचारिक उत्तराधिकारी घोषित किया।

आंबेडकर का कोण अलग था। सामाजिक प्रश्नों पर दोनों अलग विचार रखते थे। आंबेडकर गाँधी को आधा संत और आधा राजनेता मानते थे। उनकी चाहना थी कि गाँधी पूरे तौर पर संत हो जाते। आंबेडकर को लगता था गाँधी यदि राजनेता वाला कौटिल्य त्याग देते तो उनके साथ  विचार सेतु आसानी से बन सकता था। 1930 के दशक में वर्ण और जाति व्यवस्था पर गाँधी और आंबेडकर की जोरदार भिड़ंत हुई। इससे पूर्व इस मुद्दे पर गाँधी टैगोर से भी भिड़े थे। लेकिन टैगोर को उन्होंने अपनी वकील बुद्धि से शान्त कर दिया था। गाँधी ने वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के पक्ष में जैसे तर्क दिए हैं उसे गांधीवादियों को देखना चाहिए। गाँधी संत की तरह नहीं, घुटे वकील की तरह बहस करते हैं। यह 1930 के पूर्व के गाँधी हैं। आंबेडकर को उन्होंने पहले हल्के में लिया, लेकिन जब जोरदार भिड़ंत हुई तब गाँधी झुक गए। जैसे अंबपाली के सवाल से निरुत्तर हो तथागत झुके थे। आंबेडकर के साथ उनकी टकराहट ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया। 1936 के आंबेडकर के प्रसिद्ध भाषण पर गाँधी ने दो बार लिखा और जाति प्रथा पर उनके साहसिक विचारों की सराहना की। गाँधी ने 1933 से ही स्वयं को दलितोद्धार के लिए समर्पित कर दिया था। वर्ण और जाति व्यवस्था पर गाँधी की राय हमेशा के लिए बदल गई।

1940 के बाद गाँधी एक बार फिर बदलते हैं। अब उनकी निकटता युवा समाजवादियों से दिखती है। और भी कई बदलाव हैं जिसे गांधीवादी भी छुपाते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध में उन्होंने अंग्रेजों को संकट काल में मुश्किल में नहीं डालने का फैसला लिया था। वह अंग्रेजी सेना में लोगों को शामिल होने की अपील करते हुए दिखते हैं। लेकिन अंग्रेज उससे भी अधिक संकट में 1942 में थे। इस मुश्किल घड़ी में उन्होंने 'क्विट इण्डिया मूवमेंट' छेड़ दिया। यह उनकी राजनीति थी। इस राजनीति को आंबेडकर को समझना मुश्किल था। क्योंकि उनकी प्राथमिक लड़ाई उपनिवेशवाद से नहीं, ब्राह्मणवाद से थी। 

ऐसा नहीं है कि गाँधी से भूलें नहीं हुईं। वह देवता नहीं थे। खिलाफत आन्दोलन का समर्थन, असहयोग आन्दोलन को अचानक स्थगित करना, जिन्ना और सुभाष के बारे में उनका अक्खड़ और रुखा व्यवहार आदि ऐसे मसले हैं जिसे शायद ही कोई सही मानेगा। लेकिन गलतियां तो बड़े लोगों से भी होती ही हैं। बड़े लोगों की गलतियां भी बड़ी होती हैं।

गाँधी के महत्व का एक सूत्र उनकी पुस्तिका 'हिंद-स्वराज' में मुझे मिला। गाँधी से कोई नौजवान इटली में राष्ट्रवाद और देशभक्ति के मुद्दे पर प्रश्न करता है। जवाब देते हुए गाँधी मेजिनी और गैरीबाल्डी का अन्तर स्पष्ट करते हैं। मेजिनी की दृष्टि से इटली का मतलब है इटली के लोग, वहाँ के किसान। लेकिन गैरीबाल्डी के लिए इटली का मतलब है वहां का राजा और उसके दरबारी। गाँधी ने तय कर लिया था कि उनके लिए भारत का मतलब है भारत के किसान और सामान्य लोग। यहीं वास्तविक गाँधी उभरते हैं। गाँधी के लिए शस्य श्यामल सुजलाम सुफलाम धरा, नदियाँ और पहाड़ भारत नहीं था।  बाघ पर बैठी कोई स्त्री भारत माता नहीं थी। उनके लिए भारत का अर्थ था यहाँ के मेहनतकश लोग, किसान, मजदूर और फटेहाल महिलाएं। उन्होंने चंपारण के किसानों में नए राष्ट्र निर्माण का बीज तत्त्व देखा। राजा-महाराजाओं और सेठ-जमींदारों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उदघाटन के जलसे (1916) में राजा महाराजाओं की जिस तरह उन्होंने आलोचना की थी, वह नए भारत का आरम्भ था।

गाँधी ने लोगों को बताया डरो मत। आपस में लड़ो मत। आगे बढ़ो और राजनीति व समाज निर्माण में हिस्सा लो। स्त्री शक्ति को घूँघट से निकाला। उन्हें पढ़ने-लिखने के लिए उत्साहित किया। लोगों को भयमुक्त करने के खयाल से जेल जाना सिखाया। इस तरह राजनीतिक प्रशिक्षण दिया। क्रांतिकारियों का वह सम्मान करते थे। किन्तु जानते थे कि हिंसा के रास्ते से जनता का राजनीतिकरण नहीं हो सकता। कमजोर से कमजोर व्यक्ति को राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल कराना था। वह क्रान्तिकारी अभियान के साथ सम्भव नहीं होता।

हमारे देश में जो परिश्रम करते थे वे नीची निगाह से देखे जाते थे। हिन्दू मुस्लिम दोनों समाज में शारीरिक परिश्रम को नीची निगाह से देखा जाता था। बैठ कर खाना बड़प्पन की बात होती थी। आज भी है। गाँधी ने इसे तोड़ने की कोशिश की। सबसे चरखा चलवाया। खद्दर बनवाया। जुलाहा का काम हमारे समाज में खराब माना जाता था। उन्होंने राजा जी, जवाहर लाल, राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल सब को जुलाहा बना दिया। साफ-सफाई स्वयं करना। अपनी भाषा अपनी संस्कृति से प्रेम करना उन्होंने सिखलाया। वह अंग्रेजी में भी अपनी आत्मकथा लिख सकते थे। लेकिन उन्होंने गुजराती में लिखा। उनकी मौलिक रचना बहुत नहीं है। लेकिन जो लिखा अधिकांश गुजराती में लिखा। 

उन्होंने लोगों को जीना सिखाया, बोलना और सोचना सिखाया। जीवन का अर्थ है उसकी खुशियाँ। हिंसा और नफरत के रास्ते हम उमंग का जीवन नहीं जी सकते। उनके स्वराज के विचार में व्यक्ति बहुत महत्व रखता है। हर व्यक्ति स्वतंत्र होना है। आजादी का अर्थ व्यक्ति की सम्पूर्ण आजादी है। समूह की उस पर हुकूमत नहीं होनी चाहिए। उसे भीड़ का हिस्सा नहीं होना चाहिए। हमारे उपनिषद के ऋषियों ने हर जीव को ब्रह्म माना था। वह तुम हो। कबीर ने कहा जिसे तुम ढूंढ रहे हो वह तुम्हारे पास है। गाँधी ने स्वराज को व्यक्ति के भीतर ढूँढा। व्यक्ति की स्वतन्त्रता ही वास्तविक स्वराज है। गाँधी का व्यक्ति समाज, समूह या भीड़ का अनुगामी नहीं है। उसकी अपनी स्वायत्ता है।

इसलिए कहता हूं गाँधी की पूजा बन्द होनी चाहिए। उन पर विचार किया जाना चाहिए। मेरा आग्रह होगा अपने भीतर एक गाँधी विकसित कीजिए। गाँधी को अपने जीवन के उत्सव में शामिल कीजिए। अपने धर्म मज़हब के पुरोहित, पार्टी के सुप्रीमो और शासकों की मनमानी पर स्वयं को मुखर कीजिए। जहाँ कहीं दमन और अत्याचार है वहाँ उससे लड़िए। यही गाँधी को याद करने का तरीका हो सकता है। गांधीत्व के भी निरन्तर परिमार्जन की जरूरत है।

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