विमल चन्द्र पाण्डेय का उपन्यास अंश 'गुल अब्बास'




युवावस्था में मन की उमंगें उड़ान भरती रहती हैं। लेकिन गाँव के युवाओं का जीवन उनके अभिभावकों द्वारा नियंत्रित करने की कोशिशें की जाती है। ऐसे में एक संकोच उनके मन में बना रहता है। भले ही शहर में लड़के लड़कियों की आपसी दोस्ती आम हो आज भी गांवों में लड़कियों को ले कर लड़के सतर्क रहने की कोशिश करते हैं। विमल चन्द्र पाण्डेय हमारे समय के ऐसे कथाकार हैं जो अपने समय की प्रतिध्वनियों को अपनी रचनाओं में करीने से रेखांकित करते हैं। हाल ही में उनका उपन्यास 'गुल अब्बास' प्रकाशित हुआ है। पूर्वांचल के समाज की एक झलक इसमें सहज ही देखी जा सकती है। आज विमल चन्द्र पाण्डेय का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विमल चन्द्र पाण्डेय का उपन्यास अंश 'गुल अब्बास'।


उपन्यास अंश

'गुल अब्बास'


विमल चन्द्र पांडेय 


काली और आरके ब्लैक एण्ड व्हाइट नोकिया का पुराना मोबाइल इस्तेमाल करते थे। आरके को स्मार्टफोन के बारे में पता था लेकिन उसने बेटे तक ऐसे किसी आविष्कार के बारे में जल्दी खबर नहीं पहुँचने दी। नौवीं के बाद आरके ने काली की पढ़ाई छुड़वा दी थी और उसे शरीर की ताकत की अहमियत बताई। धीरे-धीरे काली अपने दोस्तों गाँव वालों से कट गया और जीवन में उसकी दो ही दिलचस्पियाँ रह गई थीं, शरीर बनाना और पौधों के बारे में जानकारी हासिल करना। दुनिया उसने उतनी ही देखी थी जितनी वह बलिया पौधे खरीदने जाने में देखता था। ये भी करने की अनुमति आरके ने उसे कुछेक साल पहले ही दी थी वरना जरूरत की सारी चीजें लाने शहर वही जाया करता था। वहाँ उसने लोगों को स्मार्टफोन यूज करते देखा था लेकिन आरके से पूछने पर उसने बताया कि ये नए जमाने के लड़कों को उनके लक्ष्य से भटकाने के लिए किया गया आविष्कार है। मोबाईल का असली इस्तेमाल कॉल और मैसेज करना है और ये दोनों काम हमारे फोन से आसानी से हो जाता है। और तो और इसमें स्नेक समेत दो गेम भी हैं जिन्हें खेल कर अपना टाइम पास किया जा सकता है। अगर पास करने के लिए इससे भी ज्यादा टाइम है तो दोष फोन का नहीं, ज़िंदगी का है। 

रोज़मर्रा के लिए बनाए गए नियमों में ये भी था कि दुनिया में कोई आपका सच्चा दोस्त नहीं हो सकता क्योंकि ये दुनिया मतलब से चलती है। कोई आपका दोस्त तब तक ही होता है जब तक आपसे उसको फायदा लेना होता है। इसलिए बाहर दोस्त बनाने की जगह अखाड़े की मिट्टी और व्यायामशाला के उपकरणों से दोस्ती होनी चाहिए। इधर दो तीन सालों से काली ने बलिया में इक्का दुक्का दोस्त बनाए थे और जब से बाहरी दुनिया से उसका संपर्क हुआ था, वह आरके के सामने सवाल उठाने लगा था। आरके उन सवालों से डरता था। उसने काली को बचपन से अब तक एक खास संविधान के तहत बड़ा किया था जिसमें उसके बाहरी दुनिया से कटे संपर्क ने बहुत मदद की थी लेकिन काली अब इतना बड़ा हो गया था कि उसे रोकना मुश्किल था। फिर भी आरके पुराने नियमों को उसके सामने दोहराता रहता था कि ज़िंदगी कहीं भी कैसी भी जीनी हो, नियमों से बंध कर ही जीनी चाहिए। नियम सूत्र वाक्यों से पैदा होते थे। ये एक सूत्र वाक्य था कि लड़कियां लड़कों की ज़िंदगी में सिर्फ इसे मुश्किल बनाने के लिए आती हैं। 

‘लड़की जिस दिन से किसी लड़के की ज़िंदगी में आती है, उसी दिन से उस लड़के के रोने के दिन शुरू हो जाते हैं।' आरके का लड़कियों के विषय में ब्रह्मवाक्य था। इससे निकला नियम था कि किसी भी लड़की से किसी से भी स्थिति में नज़दीकी नहीं बढ़ानी है। काली इस बात में भरोसा करता था। गाँव के उत्तर टोला से फूल पौधे खरीदने आने वाली मुस्कान को देख कर स्पष्ट था कि वो सिर्फ फूल पौधे खरीदने नहीं आती। हर दो-तीन दिन पर कॉलेज जाने से पहले वो हाथ में किताबें लिए हुए इधर आ जाती और काली से ऐसी-ऐसी बातें करती जो उसे बिलकुल समझ में नहीं आतीं। बचपन में कई साल दोनों एक ही कक्षा में रहे थे, साथ खेले थे लेकिन काली के स्कूल छोड़ने के बाद भी मुस्कान ने अपनी तरफ से दोस्ती कभी नहीं तोड़ी। काली बड़ा होने के बाद उससे कटने की कोशिश करता लेकिन वो हमेशा उसे बात करने के बहाने खोजती। उसकी हँसी उसकी ख़ास पहचान थी। वो ऐसे हँसती कि एक ज़िन्दा झरने की परिभाषा लगती। कभी वो किताब से उसे कोई कविता सुनाने लगती तो कभी कोई ऐसा सवाल पूछती जिसका जवाब उसे सपने में भी नहीं सूझ सकता था। अक्सर वो काली से कहती कि उसे बुलेट पर बिठा कर गाँव का एक चक्कर लगवा दे लेकिन काली पेट्रोल कम होने का बहाना बना देता। एक बार उसने ऐसे पौधे की मांग की जिसमें ढेर सारे रंगों के फूल खिलते हों।

‘ऐसा पौधा शहर में मिलता है सब, क्रॉस कर के बनाते हैं।’ काली ने उसे झिड़क दिया था।

‘कितना कम जानते हो तुम।’ उसने ताना मारा था। काली कुछ कहना चाहता था लेकिन इस लड़की से वो कोई भी कड़ी बात कहने से बचता था। फिर भी वो काली को इतना मजबूर करती थी कि उसे कुछ न कुछ कहना ही पड़ता था।

एक दिन ऐसे ही काली ने उसे कायदे से झिड़का था और डांटते हुए कहा था, “हमारे पास न इतना टाइम है न इंटरेस्ट, कुछ लेना है तो लो या फिर निकलो।” काली की बात सुन कर वो ऐसे हँसी थी जैसे उसने कोई बेहद बचकानी बात कह दी हो। जाते हुए उसने जो कहा उसे समझ कर भी काली समझना नहीं चाहता था।

‘तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें

हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया’

धीरे-धीरे उसे झरने जैसी हँसी वाली इस लड़की से बात करना अच्छा लगने लगा। वो अनजाने में उसका इंतज़ार करने लगा था। लेकिन जब भी वह उसके नज़दीक आने की कोशिश करती, ज़्यादा दोस्ताना होने की कोशिश करती, उसे आरके की कही बात याद या जाती और वह मुस्कान से दूर हो जाता। मुस्कान उसके इस अजीब व्यवहार को समझने की कोशिश में उलझ जाती। 

घर में घुसते ही काली ने बोर्ड पर लिखा तीसरा नियम ‘बूढ़ों पर गोली नहीं चलानी है’ को मार्कर से काट दिया। एक बार काट कर मन नहीं भरा तो उसने तीन बार काटा और तब तक गाढ़ा करता रहा जब तक चेहरे पर चिंता लिए आरके आ कर सामने नहीं खड़ा हो गया। वह आरके को थोड़ी देर घूरता रहा फिर अपनी साफ रखी टी शर्ट उठाई और बोर्ड पर लिखे सारे नियम मिटा दिए। फिर एक तरफ कपड़ा फेंक कर तमतमाया हुआ बाहर चला गया। आरके मामले को गंभीर समझने के बावजूद इसकी गंभीरता का लेवल अभी भी नहीं समझ पाया था। उसने मन में सोचा कि अभी बेटे को थोड़ी देर अकेला छोड़ दे, सुबह उसका पसंदीदा आलू की पूड़ी और टमाटर की चटनी बनायेगा और मना लेगा। सब कुछ फिर से ठीक हो जाएगा और वह अपने बेटे का सबसे विश्वसनीय साथी बन जाएगा। 

आरके के अनुसार काली जब तीन साल का था तो उसकी माँ दौलत का देहांत हो गया था। आरके ने उसे बताया था कि उसकी माँ उसे बहुत प्यार करती थी। काली अपने कमरे में उदास लेटा अपनी अब तक की ज़िंदगी को याद कर रहा था। 

उसके कुछ दोस्त बने थे जो काली की हर बात को ऐसे सुनते जैसे वह दूसरे ग्रह से आया कोई अजूबा है। जैसे काली ने बताया कि आज तक वह ट्रेन में नहीं चढ़ा तो उन्हें आपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने काली को अपने साथ जबरदस्ती बलिया जंकशन पर एक ट्रेन में बिठाया और सहतवार स्टेशन पर उतार लिया। काली को इन कुछ मिनटों में एहसास हुआ कि ट्रेन को दूर से देखने और ट्रेन में बैठने में बहुत फ़र्क होता है।  

स्मार्टफोन को ले कर काली की हैरानी पर एक ने उसे अपने मोबाईल में गूगलअर्थ खोल कर काली का घर तक दिखा दिया। काली बहुत हैरान हुआ। उसे डर भी लगा कि वह हर पल दुनिया की निगाह में है और उसे पता तक नहीं है। उसे विश्वास था कि खुद को दुनिया का चौधरी समझने वाला उसका बाप भी ये बात शर्तिया नहीं जानता होगा। लौट कर उसने ये बात आरके को बताई तो आरके उसे डांटने लगा। 

‘ऐसा कुछ नहीं होता। ऐसे डरा कर लोग तुम्हारा राज जानने की कोशिश करते हैं। अभी विज्ञान इतना आगे नहीं चला गया है कि कोई कहीं बैठे-बैठे किसी के घर के अंदर झांक लेगा। तुम फालतू का डरा मत करो।' उसने काली को नसीहत दे कर बात खतम कर दी थी। 

विज्ञान कितना आगे चल रहा है और समय कितना डरावना होता जा रहा है, दोनों बाप बेटों को इसकी भनक तक नहीं थी। अगर थोड़ी भी होती तो आरके समझ जाता कि वह वक़्त उसके जीवन में दस्तक देना शुरू कर चुका है जिसका सामना करने से वह आखिर-आखिर तक बचना चाहता था।     

ऐसी बहुत सारी घटनाओं के बावजूद काली मानता था कि उसका बाप समय से थोड़ा पीछे हो सकता है लेकिन झूठा नहीं हो सकता। आरके ने बेटे के सामने ईमानदारी, नियम और सच का जो मुलम्मा बड़ी मेहनत से अपने ऊपर चढ़ाया था, उसके उतरने की शुरुआत हो चुकी थी। पहली बार ऐसा हुआ था कि काली बाप से दुखी था और उसे माँ की याद आई तो वह रूआँसा नहीं हुआ। उसने माँ की तस्वीर दीवार से उतारी और उसे देखने लगा। तस्वीर बदरंग हो रही थी। उसने देखा सीलन की वजह से तस्वीर पर लगा प्लास्टिक खराब हो चुका था। उसने प्लास्टिक नोच कर निकाल दिया। उसने तस्वीर को एक साफ कपड़े से पोंछा और तय किया कि कल सुबह वह तस्वीर ले कर बाजार जाएगा और अच्छे से शीशे में इसे मढ़वा देगा। 

ये सोच कर उसने सोने के लिए जैसे ही आँखें बंद कीं, उसकी आँखों के सामने मुस्कान आ गई और उसे पहली बार लगा कि आपने पिता की बात मान कर वह लगातार इस लड़की से ज़्यादती करता रहा है। उसने यह भी सोचा कि अब वह चाहे जिस भी दिन आएगी, उसे एक गुलाब का पौधा मुफ़्त में देगा। दो अच्छी बातें सोच कर उसने सोने के लिए आँखें बंद की तो होंठों पर मुस्कान और आँखों में नींद उतरने लगी। 

नींद में उतरते हुए आखिरी खयाल यही आया कि ये बात भी उसे उसके पिता ने ही सिखाई है कि कोई भी तनाव ले कर बिस्तर पर नहीं जाना चाहिए। ज़िंदगी में कितनी भी टेंशन हो, सोते वक़्त कोई अच्छी बात सोच कर सोना चाहिए।



आरके ने आलू उबाल लिए थे और उन्हें मसल कर मसाला मिलाने के बाद आटा गूँथ रहा था। उसने टमाटर की चटनी में इतना धनिया मिलाया था कि आसपास खुशबू फैल गई थी। पूड़ी की तैयारी में ही बाल गृह से फोन आ गया। 

‘राम जी नमस्कार, खाने का मेन्यू पूछ रहा था हलवाई।' उधर से अनाथालय के हेड साहब थे। 

‘तबीयत थोड़ी गड़बड़ है काली की। कुछ दिन बाद का रखते हैं।' उसने बहाना बना कर हेड साहब को टालने की कोशिश की। 

‘ठीक है राम जी, बताइएगा।'

फोन काट कर उसने एक ओर रखा। पहली पूड़ी उसने तवे पर डाली ही थी कि उसे बुलेट स्टार्ट होने की आवाज़ आयी। 

काली ने नर्सरी में छोटे-मोटे काम निपटाए और बुलेट की नंबर प्लेट बदल रहा था कि मुस्कान वहाँ आ गई। पहले का दिन होता तो काली ये काम नर्सरी के दरवाजे के पीछे कर रहा होता लेकिन फिलहाल उसे न किसी से कोई डर था न कोई परवाह। मुस्कान ने थोड़ी देर उसे नयी प्लेट बदल कर पुरानी प्लेट लगाते हुए देखा और फिर सामने आ कर हथेली आगे बढ़ायी। 

‘क्या है?’ काली ने उठ कर पसीना पोंछते हुए पूछा।

‘यही है जो तुम्हारे नर्सरी में होना चाहिए लेकिन नहीं है।’ काली ने कागज की पुड़िया हाथ बढ़ा कर ले लिया। उसने बीज पहचानने की कोशिश की।

‘कौन सा फूल है?’ 

‘अभी लगा दो, बाद में बताएँगे। इस फूल में और तुम्हारे में एक बात एक जैसी है।’ मुस्कान ने रहस्यमयी अंदाज़ में कहा। काली को यही सब अबूझ लगता था। वो हमेशा टालने की कोशिश करता था और लड़की हमेशा ऐसे बात करती जैसे कितने करीबी दोस्त से बात कर रही हो।

‘ठीक है, लगायेंगे शाम को।’

‘धन्यवाद तो बोलो। आभारी होना चाहिए तुमको।’ मुस्कान ने शरारत से कहा। बदले में काली ने भौहें टेढ़ी कर के उसे देखा।

‘क्यों? भारी होने के लिए नहीं इतना पसीना बहाते हैं।’ काली ने बायीं भुजा की मछलियाँ चमकाते हुए कहा। ऐसी हरकत मुस्कान के सामने उसने पहली बार की थी और उसे खुद भी अजीब लगा। वो तुरंत फिर से काम में लग गया। लेकिन बात ख़तम होते ही मुस्कान हँसने लगी। वो काली की कई ऐसी बातों पर दिल खोल कर हँसती थी और काली उसे हैरानी से देखता रहता था कि आखिर वो हँस क्यों रही है। वो कभी काली के शब्दों को ठीक करने की कोशिश नहीं करती थी। वो जैसा था, वैसा ही उसे पसंद था।

‘अलग अलग गमले में लगा देना बीज नर्सरी के कोनों में।’ उसने काली के सामने जाते हुए कहा, वो फिर से काम में लग गया था।

‘ठीक है।’ काली ने रोज़ की तरह टालने की कोशिश की क्योंकि उसे समझ में नहीं आ रहा था अचानक से कैसे ये ज़ाहिर करे कि उसका बात करना, इस तरह करीब आना उसे अच्छा लगता है।

वो बार-बार काली के सामने जा कर बात करती थी और काली पलट कर काम में व्यस्त हो जाता था। आखिरकार मुस्कान ने उसकी हथेली पकड़ ली। 

‘आज क्या सीन है?'

‘किस चीज का?’ काली ने हथेली छुड़ाई और नर्सरी के अंदर चला गया। मुस्कान उसके पीछे अंदर आ गई। 

‘दुनिया में सारी लड़ाई तेल की है। आज घुमाओगे बुलेट पे या आज भी टंकी खाली है?’ काली उसकी बात सुन कर पलटा। 

‘एक बार घुमा दिये तो फिर नहीं न बोलेगी रोज-रोज?’ काली की शर्त से मुस्कान के चेहरे पर मुस्कान आl गई।

‘फिर एक हफ्ता तक नहीं।' उसने चेहरे पर आई ढेर सारी खुशी को छिपाते हुए कहा। 

‘चलो।' काली नर्सरी से बाहर निकल कर हैंडपंप तक गया और हाथ मुंह धोए, बाल ठीक किये और बुलेट स्टार्ट किया। मुस्कान उसे मुग्ध भाव से देख रही थी। 

आरके जल्दी-जल्दी चिमटे में पकड़ी पहली पूड़ी ले कर ही बाहर भाग आया था। उसने बेटे को आवाज़ दी लेकिन काली बाप से दूर जा चुका था। 

बाप बेटे को हर पल खुद से दूर जाता देख रहा था। 

बीच में कुछ था तो सिर्फ धूल का गुबार।


**


काली बुलेट चलाता हुआ गाँव की सीमा से बाहर निकल गया था। मुस्कान ने कस्बे में कदम रखते ही काली की कमर में हाथ डाल दिया। काली ने हल्के से उसका हाथ पकड़ा और अलग कर दिया। 

‘आराम से बैठो।' उसके कहने का मतलब था कि चिपक कर मत बैठो। मुस्कान ने खुद को थोड़ा संभाला और काली के कंधे पर हाथ रख दिया। काली ने हल्का सिर घुमा कर कंधे पर रखे हाथ को तिरछी नजर से देखा। 

‘कहीं तो सहारा लेना पड़ेगा ना!’ मुस्कान ने ताना देने वाले अंदाज़ में कहा। 

‘हमारा सहारा मत लो। हमारा खुद कोई सहारा नहीं है।' पहली बार काली ने उस अंदाज़ में मुस्कान से बात की थी जो वह हमेशा से सुनना चाहती थी लेकिन काली आज तक बोला नहीं था। 

‘कहीं अकेली जगह देख के रोकना।' उसने काली के कान के करीब चेहरा ला कर कहा। काली कुछ नहीं बोला। बुलेट अब कस्बे के बाहर सुनसान सड़क से गुजर रही थी जिसे आगे जाकर शहर जाने वाली व्यस्त सड़क में मिल जाना था। 

‘रोकना कहीं।’ उसने फिर से कहा।

‘अब बैठी रहो चुपचाप। पहले घूमना था अब रोकना है। एक चक्कर मार कर वापस चलेंगे। काली ने झिड़का।

“हमको पेशाब लगी है।” उसने फुसफुसा कर कहा। मुस्कान की इस बात ने काली के शरीर में एक अनजानी सिहरन को जन्म दिया। उसे ऐसा लगा जैसे ये लड़की उसके जीवन में पहले से आ चुकी है और हमेशा चेहरा दूसरी तरफ घुमाये रखने की वजह से वो इस बात को समझ नहीं सका है। ये एक ऐसी बात थी जो ये लड़की इतने आराम से अपने किसी करीबी से ही कह सकती थी। काली को लगा जैसे उसके जीवन का फ़िलहाल सबसे बड़ा काम मुस्कान को किसी अनुकूल जगह पर पेशाब करवाना है।

एक बंद पड़ी चीनी मिल थी जहाँ काली की बुलेट खड़ी थी और वो मुस्कान का इंतज़ार कर रहा था। मुस्कान दीवार के पीछे एक अकेले कोने में पेशाब करने के बाद काली की तरफ वापस लौट रही थी। काली सोच रहा था कि अब उसे क्या बात करनी चाहिए। मुस्कान उसके पास आई तो उसके शरीर से उठने वाली महक ने काली की सारी सोच भुला दी। अब वो सिर्फ ये सोचने में लग गया कि इसके पहले उसने मुस्कान को गौर से क्यों नहीं देखा था, या फिर उसके शरीर से उठने वाली खुशबू आज इतनी अलग लग रही है या फिर हमेशा से ऐसी थी और उसने ही ध्यान नहीं दिया था।

“क्या बोल रहे थे? तुम्हारा सहारा नहीं है मतलब?” अब वो फुर्सत से थी और बहुत सारे सवालों के जवाब चाहती थी।

“कुछ नहीं, ऐसे ही बोल दिए थे। छोडो।” मुस्कान समझ गयी कि दूरियों को एक दिन एक मुलाकात में नहीं पाटा जा सकता। इसके लिए समय लगता है और सामने वाले का भरोसा जीतना पड़ता है।



“अच्छा छोड़ो लेकिन एक बात तुमसे पूछनी है हमको बहुत दिन से।” उसकी झरने जैसी आवाज़ के छींटे काली पर पड़ रहे थे और वो एक अलग से द्रव में भीगता जा रहा था।

“क्या?” उसने न चाहते हुए भी पूछ लिया. उसके मन में दो काली हो गए थे। एक पहले का बचा अवशेष था जो कह रहा था बस बहुत हुआ, इस बिना बात के हँसने वाली लड़की को वापस छोड़ और अपने घर चल; दूसरा नया जिसने इधर ही होश संभाला था वो कह रहा था ये लड़की हँसती हुई कितनी खूबसूरत लगती है, ये बस बोलती रहे और वो सुनता रहे।

“तुम हमसे इतना खराब व्यवहार क्यों करते हो?” उसके पूछते ही काली का चेहरा उतर गया. उसके मन में बहुत से जवाब चलने लगे लेकिन कोई भी वाक्य में सम्पूर्ण होकर ज़बान तक नहीं पहुँच पाया। जब मोहित काली कोई जवाब नहीं तैयार कर पाया तो क्रोधित काली ने मामला संभाल लिया।

“तो भी तो तुम मुँह उठा कर पहुंची रहती हो हर दूसरे दिन।” अपने आवाज़ की कड़वाहट को महसूस करते हुए काली को लगा कि वो इसी अंदाज़ से न जाने कब से बोलते हुए अपनी वो आवाज़ भूल चुका है जो अभी बाहर आना चाहती है लेकिन उसे रास्ता नहीं मिल रहा। उसे लगा मुस्कान इस जवाब पर नाराज़ होगी लेकिन वो फिर से हँसने लगी।

“उसकी एक वजह है।” उसने हँसते हुए कहा. काली ने सवालिया नज़रों से उसे देखा। मुस्कान ने खुद से जवाब दिया।

“मेरे कॉलेज या गांव में कई लड़कों ने हमको प्रेमपत्र लिखा है। किसी से एक बार बात कर लेते हैं तो वो बात करने का बहाना खोजने में पूरी मेहनत लगा देता है। तुम दुनिया के पहले और आखिरी आदमी हो जो हमसे दूर भागते हो?”

इस बात ने काली में एक अलग सी लहर पैदा की। उसकी आवाज़ में उलाहने से पैदा हुई नाराज़गी थी जो सिर्फ किसी अपने को ही सौंपी जाती है।

“तो तुम हमको भी अपने पीछे भगाना चाहती हो? ताकि तुम्हारा लोड खतम हो जाये गांव में सबसे सुंदर होने का?” 

मुस्कान फिर से हँसने लगी।

“नहीं पागल! तुम अच्छे लगते हो हमको। तुम्हारे अंदर और लड़कों जैसा अपने को अच्छा और अलग दिखाने की जल्दबाजी नहीं है। तुम रहस्य की तरह हो। तुम्हें देखना, तुमसे बात करना अच्छा लगता है। जो अच्छा लगता है उसका सब कुछ अच्छा लगने लगता है। खुद से दूर भगाना भी। अच्छा ये सुनो ध्यान से, तुम्हारे लिए है- 

‘दुनिया-ए-तसव्वुर हम आबाद नहीं करते

याद आते हो तुम ख़ुद ही हम याद नहीं करते’।

उसके बोलने का अंदाज़ इतने अपनेपन से भरा था काली पहली बार मुस्कराया।

“अरे महाराज, वाह बोला जाता है।” मुस्कान ने कहा। काली को ये सब नहीं पता था। वो मुस्कराता रहा।

“हम क्यों वाह बोलें? हमसे पूछ के थोड़ी सुनाई हो।” इस बात पर मुस्कान भी मुस्कराई और पलों में ये मुस्कराहट हँसी में बदल गयी।

“तुम्हारा नाम मुस्कान कौन रखा?” काली की आवाज़ में पहली बार ऐसी मुलायमियत थी।

“अम्मा ने! क्यों?” उसने इठलाते हुए पूछा।

“तुम्हारा नाम हँस्कान होना चाहिए था मुस्कान नहीं। बिना बात के भी हँस लेती हो।” ये बात सुनते ही मुस्कान की हँसी बढ़ गयी। काली की इस बात ने उसे उसके करीब कर दिया था. उसका मन कर रहा था कि वो काली से ज़ोर से लिपट जाये लेकिन उसने ख़ुद को रोक रखा था।

“अपने मन से हमसे दूर भागते हो? या फिर कोई कसम है, प्रतिज्ञा, प्रण कुछ?” मुस्कान ने हँसना रोक गंभीर हो कर पूछा।

“बाबा बोलते हैं, जीवन में सुखी रहना है तो लड़कियों से दूर रहना।” काली की आवाज़ में गंभीरता थी। मुस्कान की रोकी हुई हँसी का झरना फिर से बहने लगा और काली उसमें फिर से भीगने लगा।

“अरे भगवान! तुम कितने साल के हो यार।” मुस्कान का यार कहना उसको अच्छा लगा और हालाँकि ये कोई सवाल न होकर एक ताना था, फिर भी काली के मुँह से जवाब निकल गया।

“सत्ताईस।” 

मुस्कान उसका जवाब सुन कर उसके चेहरे को देखती रही। काली को लगा मुस्कान अचानक चुप हो गयी है तो वो थोड़ा असहज हो गया. मुस्कान के चेहरे पर गहरी मुस्कान आयी फिर वो काली को इधर उधर देखता देख फिर से हँसने लगी।

“पागल हो क्या तुम? कितना हँसती हो!” काली की बात सुन कर मुस्कान की हँसी और तेज़ हो गयी।    

तभी उन्होंने देखा स्कूल यूनिफ़ॉर्म में दो लड़के वहां साइकिल से पहुंचे और साइकिल खड़ी कर इधर उधर देखने लगे। दाढ़ी मूंछ में लड़के कई साल के फेलियर लग रहे थे और उनका आत्मविश्वास भी इसकी पुष्टि कर रहा था। वो दीवार की आड़ में थे इसलिए उनकी नज़र बुलेट पर नहीं पड़ी। उन्होंने इधर उधर सावधानी से देखते हुए बैग से बियर की दो बोतलें निकाली और चियर्स किया। मुस्कान ने वहाँ से चलने का इशारा किया। काली के चेहरे की भंगिमाएं भी बदल गयी थीं। दोनों लड़कों के लिए उसके चेहरे पर गुस्सा था। उसने बुलेट स्टार्ट की तो लड़के चिहुंक गए। उन्होंने जल्दी से बोतल पीछे कर दीवार से इधर झाँका और जाती हुई बुलेट देख कर निश्चिन्त हो गए।

“इतने छोटे-छोटे लड़के शराब पीने लगे हैं बताओ।” काली ने चिंता ज़ाहिर की।

“आजकल सबको सब जल्दी करना है। जाने दो हटाओ।” मुस्कान ने कहा।

“मतलब ये कोई उम्र है शराब पीने की?” काली की आवाज़ में गुस्सा था।

“छोड़ो ना, शराब नहीं है बियर है। इनसे छोटे बच्चे पीने लगे हैं। ये तो फिर भी अठारह के लग रहे हैं।” मुस्कान ने अपने दुनियादार होने का परिचय दिया।

“अठारह से क्या हो गया? अठाईस की उमर का काम करने की इतनी जल्दी है आजकल लड़कों को।” काली की बात सुन कर मुस्कान एक पल को उलझन में पड़ी फिर निकल गयी।

“किसने बताया कि शराब पीने की उमर अठाईस साल है?” मुस्कान ने उसका चेहरा देखने की कोशिश करते हुए पूछा। काली ने पलट कर जवाब दिया।

“बाबा ने। हमको बोले हैं अगले साल से पीने देंगे।”

मुस्कान कुछ पल चुप हो गयी। काली ने गौर किया मुस्कान की हँसी इतनी खनखनाती हुई है कि वो एक दो पल के लिए भी चुप होती है तो आसपास एकदम सन्नाटा सा छा जाता है।

“क्या हुआ?”

“रोको जरा।”

“हुआ क्या?”

“रोको तो।”

काली ने बुलेट रोकी। मुस्कान ने अपना स्मार्टफोन निकाला और उस पर शराब पीने की वैधानिक उम्र खोजी। ज़्यादातर राज्यों में इक्कीस और कुछ में अठारह साल देख कर काली सदमे में आ गया।

“और क्या क्या बताएं हैं बाबा तुमको?” मुस्कान ने छेड़ने वाली आवाज़ में पूछा। काली चुप्पी में डूब गया था. मुस्कान उससे पहले मज़ाक में फिर गंभीरता से कुछ-कुछ पूछती रही लेकिन वह नहीं बोला।

उसे लग रहा था उसकी पूरी ज़िंदगी धोखे में गुज़रती रही है। उसे आरके के ऊपर बहुत गुस्सा आ रहा था। उसने सोचा वह अब घर नहीं जाएगा लेकिन कहाँ रहेगा क्या खाएगा जैसे सवालों के बारे मे उसने कभी एक मिनट ठहर कर सोचा ही नहीं था इसलिए ये सारे सवाल उसकी ज़िंदगी के फैसलों से फिलहाल बड़े थे। 

‘देख ये मत समझना हम तुमको बाबा के खिलाफ भड़का रहे हैं लेकिन वह शायद तुमसे इतना प्यार करते हैं कि कभी तुमको बड़ा नहीं होने देना चाहते। अब तुम्हारे ऊपर है तुम बड़ा होना चाहते हो या नहीं।' मुस्कान ने कहा। काली कुछ नहीं बोला। उसने बुलेट स्टार्ट कर दी. मुस्कान चुपचाप पीछे बैठ गयी। हवा में ताज़ा ताज़ा जवान हुए एक रिश्ते की महक थी लेकिन एक पुराने रिश्ते के बासी होने का अफसोस हवा को गाढ़ा बना रहा था। काली को सीने में कुछ फँसा फँसा सा महसूस हो रहा था। मुस्कान चुप थी। वो एक बच्चे को अपने सामने बड़ा होता देख रही थी।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


विमल चन्द्र पाण्डेय 


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विमल चन्द्र पाण्डेय

मोबाइल : +91 982083904


ई मेल : vimalchandrapandey1981@gmail.com

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