हर्ष पाठक की कविताएँ


हर्ष पाठक 

आम आदमी से ही कोई भी राष्ट्र और राष्ट्रीयता है। आम आदमी से ही कोई धर्म, नस्ल या जाति है। लेखक आम आदमी की पीड़ाओं को ही शब्दबद्ध करने का दावा करते हैं। यानी कि आज आम आदमी के नाम पर ही दुनिया का सारा कार्य व्यापार चल रहा है। यहाँ तक कि निरंकुश शासक भी खुद को आम आदमी का ही सेवक कहते बताते हैं। लेकिन एक सवाल उठ खड़ा होता है कि आम आदमी आज भी कहां पर खड़ा है? आम आदमी का जीवन आज भी बदहाल क्यों है? युवा कवि हर्ष पाठक अपनी कविता 'उनका होना' में लिखते हैं : "उन्होंने कई सारी गलतियों को सुधारा/ ढेरों मुकम्मल लड़ाइयां लड़ीं/ किसी के आगे की थाली नहीं छीनी/रूखी–सूखी में गुजारा किया/ सभाओं में उपस्थित रहे/ सम्मेलनों की कुर्सियां खींची/ किताबों की इमारतें खड़ी कर दी/ जगह–जगह आवाज़ें ऊंची ही रखी/ फिर भी बदहवास से भटक रहे थे"। हर्ष की कविताएँ अपने समय और सरोकारों की वह कविता है जिसके केन्द्र में वह आम आदमी है जो तमाम तरह की सत्ताओं के मकड़जाल में खुद को कुछ इस तरह उलझा पा रहा है कि उसे बाहर निकल पाने की राह तक नहीं दिख रही। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हर्ष पाठक की कविताएँ।


हर्ष पाठक की कविताएँ 


मुक्ति की लड़ाई 


मेरे सामने एक

अजनबियत की खिड़की रखी गई

मैं उचाट सन्नाटे में

सूरज को बार-बार चौंक कर देख रहा हूँ

बीच-बीच में मन

बादलों की छाँव में एक अडिग

साँझ की प्रतीक्षा में रत है

किंतु दिन मुंहजोर हो रहा है

और अपने आप से धोखा खा रहा हूँ

कई कीलें मेरे

अशांत मन में पेंच से कसे जा रहे हैं

भरी दोपहर में

रक्त से तर-ब-तर हूँ

और बहती बूंदे एक सभ्यता की भाँति

फ़ैल रही हैं

किसी दलदल में फंस चुका हूँ

और आवेग के लोथड़े को त्याग नहीं पा रहा हूँ 

इसी चक्कर में

एक उलझी हुई कविता

लिख बैठा हूँ


कवियों का उलझन भरी कविता लिखना 

सिहरन पैदा करता है 

और शब्दों से घपला हो जाता है


मैंने दुःखों का गृह-प्रवेश करा दिया है

अब वे भोर में मंगलाचरण गायेंगी

उदासियों को पोसेंगी 

और मैं दिनों-दिन

मौन सा उद्दंड हो जाऊंगा


किसी को भनक नहीं लगेगी कि

स्वयं से मुक्ति की लड़ाई में

मैं किस हद तक कुनमुना रहा हूँ


मुझे इंसान बनने में

कुछ ही दिन शेष हैं और

दोषी जिंदगी से बहुत सचेत हूँ।


युद्ध में चिड़ियों का स्वर


चिड़ियों का स्वर संगीत है

नहीं है साथ में कोई वाद्य-यंत्र

केवल शांत संगीत 

बांसुरी की धुन-सी है


गाँव के बाहर 

बियाड़े वाली खेतों की मेड़ों के उस पार 

रहती है चिड़िया 

मिल जाएगी किसी पेड़ पर 

शांति बुनते हुए


यह काम हम पर है

कि तय करें कर्कशता चाहिए

या शांति;

शांति पाना सरल तो नहीं

देखा न दो-दो सशस्त्र विश्व युद्ध, एक 

नम्बर एक की आर्थिक ख़िताबी जंग

और अतिवादियों के हमले,

इधर अभी भी जारी हैं कई जंग

और शांति के नाम पर

एक धेला भर नहीं

मैं तो कहता हूँ

चाहिए शांति तो आओ

इन्हीं पेड़ों के नीचे

देखो इन चिड़ियों का क्रियाकलाप

महसूस करो इनके स्वर को

इसी प्रक्रिया से हो कर

बुद्ध को शांति मिली थी


देखा है मैंने

जब-जब हम कराह में होते हैं

डाल पर बैठ कर यही चिड़िया

अलापती है राग सहानुभूति के

हम होते हैं खुश तो

चहक बढ़ जाती है स्वरों में

जबकि इन्हें कोई नहीं बताता

राज अपने


ये सत्ताधारी लोग

पेड़ों की चिड़िया नहीं हैं

रहते हैं

घरों के छतों या बाहर निकले जँगले पर,

तिनके सजाए 

सपना बुना

और हो गए फुर्र

शाम को बदल गई दिशा

दे गए मन्त्र : खोजते रहो!

हम खोजते भी रहे।


पेड़ भी कम जादूगर नहीं होते,

वे सहारे के मंत्र से चिड़ियों को बाँध लेते हैं

पेड़ केवल चिड़ियों का नहीं होता

वहाँ से कोई दुरदुराया नहीं जाता

सबका अपना घर है

पेड़ ले चलते हैं साथ और

दुःख बुहारते हैं

यहाँ तक कि सभ्य गंजों को मानसिक

यातनाओं से उबारते हैं


हो सकता है 

कोई मेज़बान आ कर ये कहे आपसे

कि आहार चक्र में 

सन्तुलन का क्या?

तो पेड़ों का सहारा लो

मत छेड़ो चिड़ियों को

शायद थोड़ी शांति बनी रहे धरती पर

युद्ध से ऊब चुका हूँ मैं

मत छेड़ो 

क्योंकि संगीत है चिड़ियों का स्वर

क्योंकि चिड़ियों ने बुद्ध दिए

क्योंकि हाल जान लेती है

ये डाल पर झूलती बच्ची।



हिसाब


हमारी उदासियों का

ओढ़े लबादा

और आँखों के पास ठहरे पानी में 

गोते लगा कर

तुम पाओगे

कि हमारे जीवन में सूखा कितना

ज्यादा रहा है

सुख की अपेक्षा


रही है रात काली खूब काली

काफी दिन थे हमारी झोली में किंतु

हम वंचित रह गए

अपने मनपसन्द दिन को

हथियाने से


हमारी पेशानी पर जीवन को

विस्मय मान खोद दिया है विधाता ने


हम एक दिन हिसाब बराबर करने बैठेंगे।


उनका होना


उन्होंने कई सारी गलतियों को सुधारा 

ढेरों मुकम्मल लड़ाइयां लड़ीं 

किसी के आगे की थाली नहीं छीनी 

रूखी–सूखी में गुजारा किया 

सभाओं में उपस्थित रहे 

सम्मेलनों की कुर्सियां खींची 

किताबों की इमारतें खड़ी कर दी 

जगह–जगह आवाज़ें ऊंची ही रखी 

फिर भी बदहवास से भटक रहे थे;


वे उनके जो नहीं थे।



कभी नहीं


अपने सबसे व्यस्ततम दिनों की फ़ेहरिस्त में 

बिल्कुल खलिहर पड़ा हुआ हूं

इसी जद्दोजहद में 

कई दकियानूसी विचारों की श्रृंखलाएं 

उकड़ू बैठी हुई हैं 

ऊब इस कदर हावी हो चुकी है

कि लगता है 

यही फेफड़ों से रिसने वाला है

हम इस कदर दुखते लोगों में से आते हैं 

जिन्हें पता नहीं होता

अपना ठीक–ठीक पता

ठीक ठिकाना 

अपना घर–बार भी 

अपना ख़ुद का चेहरा तक नहीं


ख़ुद से ज़्यादा चालाकी करते हुए

धरा जाता हूं

और निरीह साबित करने के लिए

निपोर देता हूं खींस

मैं बना चोर हूं

मेरी चोरी कोई नहीं पकड़ सकता

जब तक मैं न साबित करूं 


सड़कों पर चलती हुई

तेज रफ़्तार गाड़ियां भी नहीं भटका पा रही हैं

मेरा ध्यान

दुःख के प्रति इतनी प्रतिबद्धता आखिर 

कहां ले जाएगी?

सिगरेट के दुकान के बाहर बैठ कर गिरी हुई 

राख देखना नित्य क्रिया बन चुका है

पैर की छोटी उंगली का ठोकर भी अब

विचलित नहीं कर पाता


कमरे में चिपका अंधेरा 

बिना स्वार्थ का साथी है

चाहता हूं चिपका ही रहे

मन को बांधे रहने के सारे जतन करके देख लिए

षड्यंत्रों की गिरफ्त में आ कर 

कहीं का नहीं हुआ 

लंगड़ी मार कर किनारे किया गया


पीछे देखने पर सब धुंधला दिखाई देता है

चश्मा भी साफ़ नहीं करना चाहता 

जमी रहने दो धूल

यही असली हक़ीक़त है


आत्मा खोखली हुई जा रही है

प्रेम में असफल रह जाने का कोई ग़म नहीं

देहरी पर उन पांवों की थिरकन 

किसी स्मृति की तरह ही महसूसता हूं

और साथ जिए गए दिनों का हिसाब भी जारी है,

ताकि सुगंध बची रहे

साथ–ही–साथ प्रेम की कमी न खले,


मुझे और प्यार किया जाना था!


मैंने पूरे होशो–हवास में दो–दो आत्माओं की हत्या की है

आश्चर्य है, कोई कोतवाल दूर–दूर तक नहीं

कहीं कोई प्राथमिकी दर्ज़ नहीं

न ही कोई वैन दरवाज़े पर


औरों की उम्मीद बनते–बनते 

अपनी उम्मीद धूल चाट रही है

मैं वह कच्ची सहन हूं जो

मानसून की पहली नमी से बैठ गया है

माना कि जीवन रोज कुछ छूटते जाने का उपक्रम मात्र है! 

लेकिन यहां तो ख़ुद से छूट रहा हूं

आकाश की तरफ़ सिर किए

बोझिल मन से देखता हूं कि

मुक्त हो रही है आहिस्ते से मेरी देह

मुक्त हो रहा हूं मैं

मुक्त हो सकूंगा मैं?

नहीं! 

पूरी चीख के साथ नहीं!

कभी नहीं!


बातूनी लड़कियां


उन्होंने हर उस शख्स को

दुत्कार दिया 

जिसे अपनी मर्दानगी पर गर्व था

और खुद को ऊंचा रखना था


उन्होंने उसी से बातें चालू रखी 

जिसने उन्हें सुना और 

चुप्पी के संधि–स्थल तक 

सुनता रहा। 


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)




हर्ष पाठक 

जन्म : 30 जनवरी, 2001
जोगिया, सिद्धार्थनगर, उत्तर प्रदेश
हिंदी भाषा में स्नातकोत्तर एवं वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोधरत।


सम्पर्क 

वर्तमान पता : माधोकुंज कटरा, 
प्रयागराज ( 211002)

मोबाइल : 9335883003, 9554703123

ईमेल : pathakkarharsh9670@gmail.com



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मां की मृत्यु पर कविताएं

लकी राजीव की कहानी 'पारोमिता'

कुँवर नारायण की कविताएँ