राजीव जोशी की कहानी 'वो गुलाब'
राजीव जोशी सामान्यतया 'हां' और 'ना' जैसे शब्द छोटे दिखते हैं। लेकिन कई बार परिस्थितियां कुछ ऐसी होती हैं कि इन शब्दों को कह बोल पाना बहुत कठिन होता है। खासकर उन महिलाओं के लिए जिनके 'हां' या 'ना' की परवाह यह समाज करता ही नहीं और उसकी व्याख्या कुछ अपने तरीके से ही कर लेता है। युवा कहानीकार राजीव जोशी की कहानी वो गुलाब इस परिप्रेक्ष्य को करीने से उद्घाटित करती है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राजीव जोशी की कहानी 'वो गुलाब'। वो गुलाब राजीव जोशी ढक्कन खुलते ही गुलाब के तरोताजा फूल की महक नाक तक पहुंची। डिब्बे में देखा तो एक मरून गुलाब अपनी डण्डी को चारों ओर गोल घुमाए, तीन-चार पत्तियों के साथ पड़ा था। एकदम फिट्ट। बड़ी जिज्ञासा से मैंने वह छोटा डिब्बा खोला था। टिफिन केस के डिब्बों से छोटे साइज का यह डिब्बा किसी टैक्सी गाड़ी में लटक कर आए यात्री की तरह केस बैग के किनारे ठूँसा हुआ, मेरे पास पहुंचा था। वैसे तो सबसे पहले टेबल में यही उतरा था लेकिन फिर वहीं पड़ा रह गया। भूख इतनी लगी थी कि बड़े डिब्बों की तरफ पहले हाथ गया। फिर जो खुला उसके पास गले से उतरत...