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शेष नारायण मिश्र की गजलें

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शेष नारायण मिश्र काशी विद्यापीठ वाराणसी के संस्कृत विभाग में रिसर्च फेलो हैं। संवेदनाओं से भरी हुईं इनकी गज़लें हमें अन्दर तक झकझोरती हैं एवं सोचने के लिए विवश करती हैं। आईए पढ़ते हैं शेष नारायण की कुछ नयी गज़लें।   (1) पास रहकर लड़ो लड़ कर नहीं जाने दूँगा। अब मिले हो तो बिछड़ कर नहीं जाने दूँगा जाते-जाते जरा बेशर्म तो होता जाऊँ , खुद को मैं शर्म से गड़ कर नहीं जाने दूँगा। (2) गुनाह जब-जब , अजाब तब-तब। सवाल जब-जब , जवाब तब-तब। वो हुस्न कुछ हमसे आशना है , निगाह जब-जब , शबाब तब-तब। (3) यादों के करीने की गजल ढूँढ़ रहा हूँ। आँसू के नगीने की गजल ढूँढ रहा हूँ। अब तक जो सुनी है वो मेरे खूँ की गजल थी , अब तेरे पसीने की गजल ढूँढ रहा हूँ। (4) हमें अकेले ही नाचना है , किसी के हाथों में बीन क्यों हों ? अगर खुदी पर यकीन है तो , किसी खुदा पर यकीन क्यों हों ? (5) आ तेरे कागज पे अब अपनी इबारत छोड़ दूँ। इस तरह के दौर में कैसे तिजारत छोड़ दूँ ? तू कहे तो आज से मै फेर लूँ अपनी नजर , ये नहीं होगा कि देखूँ तो हिकारत छोड़ दूँ। (6) ...

शेष नारायण मिश्र की गज़लें

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  शेष नारायण मिश्र  का जन्म उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के मऊ में दो जनवरी  १९८५ को हुआ. स्थानीय महामति प्राणनाथ महाविद्यालय मऊ से स्नातक स्तर तक की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात इन्होने  वर्ष २००५ में दिल्ली के जवाहर  लाल नेहरु विश्वविद्यालय  से संस्कृत में स्नातकोत्तर  किया. अपने समूचे अध्ययन काल  में शेषनारायण एक मेधावी छात्र रहे. २००६ में यू. जी. सी. की जे. आर. एफ. के लिए  चयनित हुए. सम्प्रति इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ‘ध्वनिवादियों के पारस्परिक सैद्धांतिक मत वैभिन्य का समीक्षात्मक  अध्ययन’ शीर्षक से शोधरत. आमतौर पर लोकतंत्र से एक आम आदमी बहुत कुछ उम्मीदें पाल बैठता है. उस उम्मीद के टूटने पर जो आक्रोश इस आम आदमी के मन में सहज ही पैदा होता है उसी की परिणति हैं शेष नारायन की गज़लें. शेष के यहाँ पाने और जीतने  में एक बड़ा फर्क है. एक संवेदनशील  म...