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शंभुनाथ का आलेख 'आत्मनिरीक्षण का जोखिम'

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  किसी भी व्यक्ति के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है आत्म निरीक्षण। हालांकि आज का समय ही कुछ ऐसा है कि लोग आत्म निरीक्षण से बचना चाहते हैं। व्यक्तित्व के विकास के लिए यह बहुत जरूरी होता है। कबीर अपना आत्म निरीक्षण करते हुए कहते हैं 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना मुझ सा बुरा न कोय।' यह आत्म निरीक्षण कमजोर व्यक्ति कर ही नहीं सकता। इसके लिए साहस की जरूरत होती है। इस आत्म निरीक्षण पर ही  शंभुनाथ जी ने  ’वागर्थ’ मई-2023 की अपनी संपादकीय लिखी है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं  शंभुनाथ का आलेख 'आत्मनिरीक्षण का जोखिम'   'आत्मनिरीक्षण का जोखिम' शंभुनाथ कई बार मनुष्य के पास सिर्फ एक उपाय होता है, ‘जो घटित हो रहा है उसे चुपचाप जियो’। यह अंधेरे का फोटो खींचने से अलग हो सकता है, यदि हमारे सामने यह सवाल हो- ‘फिर भी यह जीवन अपना है, तो इसका क्या अर्थ है?’ इस प्रश्न का संबंध सबसे पहले आत्मनिरीक्षण से है। भारतीय समाज में सामंती मानसिकता की प्रधानता के कारण यह कठिन है, पर जरूरी है। हमें जिन चीजों से परेशानी होती है, सबसे पहले यह दे...

शंभुनाथ का आलेख फिल्म 'गांधी गोडसे एक युद्ध' पर चंद बातें'

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  इतिहास के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि यह झूठ का साथ नहीं देता। दिक्कत यह भी है कि यह आधारहीन बातें नहीं करता। जो  भी बात करता है उसके लिए सबूत या स्रोत मांगता है।  कई बार यह काफी असुविधा भी पैदा करता है। इससे बिलग साहित्य में रचनाकार को कल्पना लोक में उड़ने की पूरी आजादी होती है। यहां सबूत नहीं गढ़ना महत्त्वपूर्ण होता है। एक बात और भी है कि इतिहास स्रोत के रूप में साहित्य का भी सहारा लेता है। अलग बात है कि ऐसा करते समय इतिहासकार को बहुत सजग सतर्क रहना पड़ता है। जब हम इस जगह पर खड़े हो कर देखते हैं तो मामला दिलचस्प हो जाता है। इधर एक फिल्म आई है 'गांधी गोडसे एक युद्ध'। चूंकि इस फिल्म के लेखक के रूप में असगर वजाहत का नाम जुड़ा है इसलिए बौद्धिक वर्ग में इसे ले कर वाद विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा समय उन प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है जो किसी न किसी रूप में हिन्दू राष्ट्रवाद या प्रतिक्रियावाद से जुड़ी हुई हैं। गोडसे इसका वाहक है। गांधी उस समन्वय के पक्षधर थे जो सभी को साथ ले कर चलने में यकीन करती है। गांधी को पता था कि सबको साथ लिए ब...

शंभु नाथ का आलेख 'रेत समाधि : उपन्यास पर कुछ बातें'

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  गीतांजलि श्री   गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि का डेज़ी रॉकवेल द्वारा किए अंग्रेज़ी अनुवाद ‘टॉम्ब ऑफ सैंड’ को वर्ष 2022 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार प्रदान किया गया है। इस तरह 'रेत समाधि' हिंदी का ऐसा पहला उपन्यास है, जिसके अंग्रेज़ी अनुवाद को इस पुरस्कार के लिए चुना गया। इस पुरस्कार के लिए गीतांजलि श्री की 'रेत समाधि' सहित जिन छह लेखकों की क़िताबों की शॉर्टलिस्टेड थीं - वे हैं कोरियाई लेखिका बोरा चुंग की 'कर्स्ड बनी', नार्वेजियन जॉन फोस्से की 'ए न्यू नेम : सेप्टोलॉजी सिक्स टू सेवन', जापानी मीएको कावाकामी की 'हेवन', स्पेनिश क्लॉडिया पिनेइरो की 'एलेना नोज' और पोलैंड की ओल्गा तुगार्चुक की 'द बुक्स ऑफ जैकब' - ये सभी अपनी-अपनी भाषाओं के बड़े रचनाकार हैं। इन सभी में से 'रेत समाधि' या 'टॉम्ब ऑफ सैंड' का चयन अपने आप में मायने रखता है। वरिष्ठ आलोचक शंभू नाथ ने 'रेत समाधि' और 'बुकर सम्मान' की एक पड़ताल की है। यह आलेख हमने वागर्थ के  जुलाई 2022 अंक से साभार लिया है। आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं शंभू नाथ...