राकेश बिहारी की कहानी फाँसी
राकेश बिहारी महात्मा गांधी का एक कथन अक्सर मुझे याद आता है 'पाप से घृणा करो पापी से नहीं'। राकेश बिहारी की 'फांसी' कहानी पढ़ते हुए मुझे महात्मा गांधी के इस कथन की शिद्दत से याद आई। वैसे मनुष्य चाहे जो भी हो, वह राजनेता हो या नौकरशाह, ठेकेदार हो या जल्लाद, सबके अंदर एक संवेदना होती है। यही संवेदना उसे सही अर्थों में मनुष्य बनाती है। हालांकि हमारे तथाकथित उदारवादी समाज में अहिंसक और राष्ट्र प्रेमी देखने वाले तमाम ऐसे हिंसक और मनुष्यद्रोही लोग भी हैं जो अपना सितारा चमकाने के लिए कुछ भी करने को उद्यत रहते हैं। आज के टी वी न्यूज चैनलों के एंकरों की भूमिका लगभग वैसी ही है। चीखते चिल्लाते न्यूज़ टीवी के ये एंकर जल्लादों से भी कहीं अधिक खौफनाक नजर आते हैं। जबकि जमीन से जुड़ा एक जल्लाद कहीं अधिक मानवीय लगता है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जरिए आधारहीन एवम झूठे संदेशों को फैलाने वाले लोग, जिस आधिकारिक तरीके से किसी भी मुद्दे पर अपने संदेश फैलाते हैं, वे अत्यंत हास्यास्पद होते हैं। लेकिन यह भी सच है कि वास्तविक शिक्षा से दूर आम जनता को बहकाने में इनकी भूमिका आज काफी डरावनी है। राके...