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राकेश बिहारी की कहानी फाँसी

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  राकेश बिहारी महात्मा गांधी का एक कथन अक्सर मुझे याद आता है 'पाप से घृणा करो पापी से नहीं'। राकेश बिहारी की 'फांसी' कहानी पढ़ते हुए मुझे महात्मा गांधी के इस कथन की शिद्दत से याद आई। वैसे मनुष्य चाहे जो भी हो, वह राजनेता हो या नौकरशाह, ठेकेदार हो या जल्लाद, सबके अंदर एक संवेदना होती है। यही संवेदना उसे सही अर्थों में मनुष्य बनाती है। हालांकि हमारे तथाकथित उदारवादी समाज में अहिंसक और राष्ट्र प्रेमी देखने वाले तमाम ऐसे हिंसक और मनुष्यद्रोही लोग भी हैं जो अपना सितारा चमकाने के लिए कुछ भी करने को उद्यत रहते हैं। आज के टी वी न्यूज चैनलों के एंकरों की भूमिका लगभग वैसी ही है। चीखते चिल्लाते न्यूज़ टीवी के ये एंकर जल्लादों से भी कहीं अधिक खौफनाक नजर आते हैं। जबकि जमीन से जुड़ा एक जल्लाद कहीं अधिक मानवीय लगता है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जरिए आधारहीन एवम झूठे संदेशों को फैलाने वाले लोग, जिस आधिकारिक तरीके से किसी भी मुद्दे पर अपने संदेश फैलाते हैं, वे अत्यंत हास्यास्पद होते हैं। लेकिन यह भी सच है कि वास्तविक शिक्षा से दूर आम जनता को बहकाने में इनकी भूमिका आज काफी डरावनी है। राके...

मिलजुल मन : किरदारों का आत्मीय अंतरंग

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  (चित्र में मृदुला गर्ग और अचला बंसल के साथ राकेश बिहारी) तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद पुरस्कारों के क्षेत्र में साहित्य अकादमी पुरस्कारों की अपनी अलग महत्ता है. हर किसी को यह जानने की उत्सुकता रहती है कि इस वर्ष का पुरस्कार किसे दिया जा रहा है.'मिलजुल मन' उपन्यास पर मृदुला गर्ग को इस वर्ष का प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया है. मृदुला जी के इस उपन्यास का चयन श्रेष्ठ हिन्दी कृति के लिए किया गया है. इस उपन्यास पर एक आलेख हमारे लिए लिखा है  आलोचक मित्र राकेश बिहारी ने. मृदुला जी को बधाई देते हुए हम प्रस्तुत कर रहे हैं राकेश बिहारी का आलेख 'मिलजुल मन :  किरदारों का आत्मीय अंतरंग' राकेश बिहारी किसी घोषित वाद के खांचे से बाहर रह कर अपने लेखन में मानवीय संबंधों की बारीक बुनाई के लिये जानी जाने वाली और ‘कठगुलाब’ तथा ‘अनित्य’ जैसे बहुचर्चित और बहुपठित उपन्यास की लेखिका मृदुला गर्ग का उपन्यास ‘मिलजुल मन’ जीवनी के रूप में उपन्यास और उपन्यास के रूप में जीवनी का एक जीवंत कथा संसार रचता है. उल्लेखनीय है कि ‘अनित्य’ के कथा विन्यास में जहां स्वतन्त्रता आ...

राकेश बिहारी

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राकेश बिहारी हमारे समय के कुछ उन युवा रचनाकारों में से एक हैं जिन्होंने आलोचना के क्षेत्र में बेहतर काम करने के साथ-साथ कई बेहतर कहानियां भी लिखीं हैं। 'बाकी बातें फिर कभी' राकेश की ऐसी ही एक सशक्त कहानी है जिसमें सरकारी कार्यालयों के काम-काज और अधिकारियों के सामंती रंग-ढंग के बारे में बेबाकी से बताया गया है। तो आईये पड़ते हैं राकेश की यह नयी कहानी बाकी बातें फिर  कभी लगभग एक घंटे बाद  जब उसका जवाबी एस एम एस आया, 2302 हावड़ा राजधानी एक्सप्रेस गाजियाबाद को पीछे छोड़ चुकी थी। यात्रीगण शाम का वेलकम स्नैक्स लगभग खत्म कर चुके थे और मेरा को-पैसेंजर ऊपर की बर्थ पर जा चुका था। मेरा को-पैसेंजर यानी आफताब, ‘एम’ 53। मैंने गाड़ी में चढ़ने से पहले आरक्षण चार्ट पर नजर दौड़ाई थी। नाम पर तो बाद में नजर गई, पहले ‘एम’ 53 देख कर ही मेरा चेहरा एक धुंधली सी निराशा में लिपट गया था। गो कि यह अनायास था और मैं सिर्फ अपना बर्थ नंबर कनफर्म करने ही आरक्षण चार्ट तक गया था। लेकिन न जाने क्यूं एक हल्की सी कचोट मेरे मन में छिहुल गई थी, काश कोई ‘एफ’ 22-23 य...