प्रियंका यादव की कविताएं
प्रियंका यादव जद्दोजहद यानी संघर्ष किसी के भी जीवन में हो, अपना एक खास मायने रखता है। यह हमें बहुत कुछ सिखाता और बताता है। इन दिनों में ही हम अपनों की परख कर पाते हैं। लेकिन जब जद्दोजहद का अंतहीन सिलसिला हो, तब यह बात अलग हो जाती है। दुर्भाग्यवश आज भी हमारे समाज में रंग, नस्ल, लिंग आदि ऐसे कारक हैं जिनके आधार पर भेदभाव किया जाता है। पीड़ित पक्ष का उत्पीड़न खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। लेकिन बात जब स्त्रियों की हो, तब इस उत्पीड़न के मायने कुछ और भी तीखे हो जाते हैं। पितृसत्तात्मक समाज का ढांचा ही कुछ इस तरह का निर्मित किया गया है कि स्त्रियां हर मोर्चे पर दोहरा संघर्ष करते नजर आती हैं। कवियों की जो नई पीढ़ी है उसमें अच्छी खासी तादाद स्त्रियों की है जो इस उत्पीड़न को अपने तेवर के साथ न केवल दर्ज कराती हैं बल्कि उसके माध्यम से अपना सशक्त विरोध भी व्यक्त करती हैं। 'वाचन पुनर्वाचन' कॉलम के अन्तर्गत इस माह जिस कवयित्री को रेखांकित किया गया है वह वह हैं छत्तीसगढ़ की प्रियंका यादव। प्रियंका की कविताएं देखन में भले ही छोटी हों, घाव गम्भीर करती हैं। नासिर अहमद सिकन्दर ने उचित ही लि...